Ramayana Yuddha Kanda Sarga 93
Yuddha KandaSarga 9368 Verses

Sarga 93

Sarga 93: Rāvaṇa’s Grief and Fury after Indrajit’s Fall; Move to Slay Vaidehī and Ministerial Restraint

युद्धकाण्ड

इस सर्ग में पौलस्त्य रावण के मंत्री लक्ष्मण द्वारा—विभीषण की सहायता से—मेघनाद/इन्द्रजित के वध का दुःखद समाचार देते हैं। यह सुनकर रावण पहले मूर्छित होता है, फिर पुत्र-शोक में विलाप करता है और अंततः उसका क्रोध प्रलय-तुल्य हो उठता है। उसके भौंहों को प्रलय-सागर-सा, मुख से धुआँ-आग निकलने-सा और आँसुओं को जलते दीपक से टपकते तेल-सा बताकर उसके मनोविकार का चित्र खींचा गया है। वह ब्रह्मा के वरदान से प्राप्त अटूट कवच और भयंकर धनुष का स्मरण कर अपने वर-बल और दिव्यास्त्रों की सुरक्षा का गर्व प्रकट करता है, राक्षसों का युद्ध-उत्साह फिर जगाता है और राम-लक्ष्मण पर पुनः आक्रमण की घोषणा करता है। पर शोक प्रतिशोध को भटका देता है—वह वैदेही सीता का वध करने का निश्चय कर खड्ग लेकर अशोक-वाटिका की ओर दौड़ पड़ता है; राक्षस उसे अजेय मानकर हर्षित होते हैं। इसके बाद दृष्टि सीता पर आती है—वह भयभीत होकर हनुमान द्वारा पहले दिए गए उद्धार-प्रस्ताव को न मानने पर स्वयं को धिक्कारती है और राम तथा कौसल्या की चिंता करती है। तभी धर्मनिष्ठ मंत्री सुपार्श्व रावण को रोकता है—स्त्री-वध अधर्म है; क्रोध का उपयोग रण में होना चाहिए, सीता पर नहीं। रावण यह उपदेश मानकर लौट आता है और सभा की ओर फिर बढ़ता है—निजी प्रतिशोध से हटकर युद्ध-धर्म की ओर क्षणिक पुनर्संयोजन होता है।

Shlokas

Verse 1

ततःपौलस्त्यसचिवा्श्रुत्वाचेन्द्रजितोवधम् ।आचचक्षुरभिज्ञायदशग्रीवायसव्यथा: ।।।।

तदनन्तर पौलस्त्य-राज (रावण) के मंत्रियों ने इन्द्रजित् के वध का समाचार सुनकर, उसका गंभीर अर्थ समझते हुए, व्यथित होकर दशग्रीव रावण को वह दुःखद वृत्तान्त निवेदित किया।

Verse 2

युद्धेहतोमहाराजलक्ष्मणेनतवात्मजः ।विभीषणसहायेनमिषतांनोमहाद्युतिः ।।।।

महाराज! विभीषण की सहायता से लक्ष्मण ने युद्ध में आपके महातेजस्वी पुत्र का वध कर दिया—और हम सब देखते रह गए।

Verse 3

शूरंशूरेणसम्गम्यसम्युगेष्वपराजितः ।लक्ष्मणेनहतश्शूरःपुत्रस्तेमहेन्द्रजित् ।।।।गतस्सपरमान्लोकान्शरैस्सन्ताप्यलक्ष्मणम् ।

रण में शूर से शूर का संग्राम हुआ; युद्धों में अजेय तुम्हारा वीर पुत्र महेन्द्रजित् लक्ष्मण के हाथों मारा गया। उसने बाणों से लक्ष्मण को अत्यन्त पीड़ित कर, परम लोकों को प्रस्थान किया।

Verse 4

स तंप्रतिभयंश्रुत्वावधंपुत्रस्यदारुणम् ।।।।घोरमिन्द्रजितःसङ्ख्येकश्मलंप्राविशन्महत् ।

युद्ध में इन्द्रजित् के उस भयानक, आतंकजनक और दारुण वध का समाचार सुनकर वह महान् विषाद-मूर्च्छा में डूब गया।

Verse 5

उपलभ्यचिरात्संज्ञां राजाराक्षसपुङ्गव ।।।।पुत्रशोकाकुलोदीनोविललापाकुलेन्द्रियः ।

बहुत देर बाद राक्षसों का श्रेष्ठ राजा होश में आया। पुत्र-शोक से व्याकुल, दीन होकर, इन्द्रियाँ उद्विग्न लिए वह विलाप करने लगा।

Verse 6

हाराक्षसचमूमुख्यममवत्समहाबल ।।।।जित्वेन्द्रंकथमद्यत्वंलक्ष्मणस्यवशंगतः ।

हाय, हे राक्षस-सेना के प्रधान! मेरे वत्स, महाबली! जिसने कभी इन्द्र को भी जीत लिया था, वह आज लक्ष्मण के वश में कैसे आ गया?

Verse 7

ननुत्वमिषुभिःक्रुद्धोभिन्द्याःकालान्तकावपि ।।।।मन्दरस्यापिशृङ्गाणिकिंपुनर्लक्ष्मणंयुधि ।

तुम क्रोध में अपने बाणों से कालान्तक (मृत्यु) को भी बेध सकते हो, मन्दर पर्वत के शिखरों को भी; फिर युद्ध में लक्ष्मण तो क्या ही है!

Verse 8

अद्यवैनस्वतोराजाभूयोबहुमतोमम ।।।।येनाद्यत्वंमहाबाहो संयुक्तःकालधर्मणा ।

आज सचमुच नश्वर लोक के राजा यम मुझे और भी अधिक पूज्य प्रतीत होते हैं, क्योंकि आज, हे महाबाहो, तुम काल-धर्म के विधान से उनसे संयुक्त हो गए हो।

Verse 9

एषपन्थाःसुयोधानांसर्वामरगणेष्वपि ।।।।यःकृतेहन्यतेभर्तुस्सपुमान्स्वर्गमृच्छति ।

यह मार्ग श्रेष्ठ योद्धाओं का है—देवगणों में भी प्रसिद्ध; जो अपने स्वामी के हेतु मारा जाता है, वही पुरुष स्वर्ग को प्राप्त होता है।

Verse 10

अद्यदेवगणास्सर्वेलोकपालामहर्षयः ।।।।हतमिन्द्रजितंदृष्टवासुखंस्वप्स्यन्तिनिर्भयाः ।

आज इन्द्रजित के वध को देखकर समस्त देवगण, लोकपाल और महर्षि निर्भय होकर शान्ति से सोएँगे।

Verse 11

अद्यलोकास्त्रय: कृत्स्नापृथिवी च सकानना ।।।।एकेनेन्द्रजिताहीनाशून्येवप्रतिभातिमे ।

आज केवल इन्द्रजित के न रहने से मुझे तीनों लोक और वन सहित यह पृथ्वी भी शून्य, तमसाच्छन्न और तेजहीन-सी प्रतीत होती है।

Verse 12

अद्यनैरृतकन्यानांश्रोष्याम्यन्तःपुरेरवम् ।।।।करेणुसङ्घस्ययथानिनादंगिरिगह्वरे ।

आज मैं अन्तःपुर में राक्षसी कन्याओं का क्रन्दन सुनूँगा, जैसे पर्वत-गुहाओं में हथिनियों के झुंड का गर्जन गूँजता है।

Verse 13

यौवराज्यं च लङ्कां च रक्षांसि च परन्तप ।।।।मातरंमां च भार्याश्चक्वगतोऽसिविहायनः ।

हे शत्रुतापक! युवराज्य, लंका, राक्षस-समुदाय, अपनी माता, मुझे और अपनी पत्नियों को छोड़कर तुम कहाँ चले गए?

Verse 14

ममनामत्वयावीरगतस्ययमसादनम् ।।।।प्रेतकार्याणिकार्याणिविपरीतेहिवर्तसे ।

हे वीर! जब मैं यमलोक को जाता, तब मेरे प्रेतकर्म तुम्हें करने थे; पर आज तो उलटा हो गया—अब मुझे तुम्हारे प्रेतकर्म करने पड़ेंगे।

Verse 15

स त्वंजीवतिसुग्रीवेलक्ष्मणेन च राघवे ।।।।ममशल्यमनुद्धृत्यक्वगतोऽसिविहायनः ।

सुग्रीव के जीवित रहते, राघव और लक्ष्मण के रहते हुए भी, मेरे हृदय का शल्य निकाले बिना मुझे छोड़कर तुम कहाँ चले गए?

Verse 16

एवमादिविलापार्तंरावणंराक्षसाधिपम् ।।।।आविवेशमहान् कोपःपुत्रव्यसनसम्भवः ।

इस प्रकार पुत्र-शोक से व्याकुल होकर विलाप करते राक्षसाधिपति रावण में, पुत्र-वियोग से उत्पन्न महान् क्रोध आकर समा गया।

Verse 17

प्रकृत्याकोपनंह्येनंपुत्रस्यपुनराधयः ।।।।दीप्तंसन्दीपयामासुर्घर्मेऽर्कमिवरश्मयः ।

वह स्वभाव से ही क्रोधी था; और अब पुत्र-वियोग की नई पीड़ा ने उसे और भी प्रज्वलित कर दिया—जैसे ग्रीष्म में सूर्य अपनी किरणों से और दहक उठता है।

Verse 18

ललाटेभ्रुकुटीभिश्चसङ्गताभिर्व्यरोचत ।।।।युगान्तेसहनक्रैस्तुमहोर्मिभिरिवोदधिः ।

ललाट पर भृकुटियाँ कसकर चढ़ाए वह भयावह क्रोध में दीप्त हुआ—जैसे युगान्त में मगरों सहित महातरंगों से उफनता समुद्र।

Verse 19

कोपाद्विजृम्भमाणस्यवक्त्राद्व्यक्तमिवज्वलन् ।।।।उत्पपातसधूमानगिर्वृत्रस्यवदनादिव ।

क्रोध से जम्हाई लेते हुए उसके मुख से धुएँ सहित ज्वलित अग्नि मानो स्पष्ट ही उछल पड़ी—जैसे वृत्र के मुख से ज्वाला फूट निकलती हो।

Verse 20

स पुत्रवधसन्तप्तश्शूरःक्रोधवशंगतः ।।।।समीक्ष्यरावणोबुद्ध्यावैदेह्यारोचयद्वधम् ।

पुत्र-वध से संतप्त वह शूर रावण क्रोध के वश में हो गया; और मन में विचार कर उसने वैदेही के वध का निश्चय कर लिया।

Verse 21

तस्यप्रकृत्यारक्ते च रक्तेक्रोथानगिनापि च ।।।।रावणस्यमहाघोरेदीप्तेनेत्रेबभूवतुः ।

स्वभाव से ही लाल उसके नेत्र क्रोधाग्नि से और भी लाल हो उठे; उस महाघोर रावण की आँखें दहकती हुई प्रचण्ड हो गईं।

Verse 22

घोरंप्रकृत्यारूपंतत्तस्यक्रोधाग्निमूर्छितम् ।।।।बभूवरूपंक्रुद्धस्यरुद्रस्येवदुरासदम् ।

स्वभाव से ही भयानक उसका रूप क्रोधाग्नि से मूर्छित होकर—क्रुद्ध रुद्र के समान—अगम्य और दुर्जेय हो गया।

Verse 23

तस्यक्रुद्धस्यनेत्राभ्यांप्रापतन्नाश्रृबिन्दवः ।।।।दीपाभ्यामिवदीप्ताभ्यांसार्चिषस्स्नेहबिन्दवः ।

क्रुद्ध हुए उसके नेत्रों से आँसुओं की बूँदें गिरने लगीं—जैसे उज्ज्वल ज्वाला वाले दो दीयों से तेल की बूँदें टपकती हों।

Verse 24

दन्तावनिदशतस्तस्यश्रूयतेदशनस्वनः ।।।।यन्त्रस्यावेष्ट्यमाणस्य महतो दानवैरिव ।

उसके दाँत पीसने पर दाँतों की चरचराहट सुनाई देती थी—मानो दानव किसी विशाल यंत्र को लपेटकर घुमा रहे हों, वैसी कठोर ध्वनि।

Verse 25

कालानगिरिवसङ्क्रुद्धोयांयांदिशमवैक्षत ।।।।तस्यांतस्यांभयत्रस्ताराक्षसास्सन्विलियलिरे ।

प्रलयाग्नि के समान क्रुद्ध होकर वह जिस-जिस दिशा की ओर देखता, उसी-उसी ओर के राक्षस भय से काँपकर सिमट जाते और छिप जाते।

Verse 26

तमन्तकमिवक्रुद्धंचराचरचिखादिषुम् ।।।।वीक्षमाणंदिशस्सर्वाराक्षसानोपचक्रमुः ।

उसे मृत्यु के समान क्रुद्ध, चराचर को निगल जाने को उद्यत और सब दिशाओं को टटोलती दृष्टि से देखते हुए देखकर राक्षस उसके पास जाने का साहस न कर सके।

Verse 27

ततःपरमसङ्क्रुद्धोरावणोराक्षसाधिपः ।।।।अब्रवीद्रक्षसांमध्येसंस्तम्भयिषुराहवे ।

तब अत्यन्त क्रुद्ध राक्षसाधिपति रावण, युद्ध में उनका धैर्य दृढ़ करने की इच्छा से, राक्षसों के बीच बोल उठा।

Verse 28

मयावर्षसहस्राणिचरित्वापरमंतपः ।।।।तेषुतेष्ववकाशेषुस्वयम्भूःपरितोषितः ।

मैंने हजारों वर्षों तक परम तप का आचरण किया; अवसर-अवसर पर बार-बार—अन्ततः स्वयम्भू ब्रह्मा प्रसन्न हुए।

Verse 29

तस्यैवतपसोव्युष्ट्याप्रसादाच्छस्वयम्भुवः ।।।।नासुरेभ्यो न देवेभ्योभयंममकदाचन ।

उसी तपस्या के फल और स्वयम्भू ब्रह्मा की कृपा से मुझे कभी भय नहीं हुआ—न असुरों से, न देवों से।

Verse 30

कवचंब्रह्मदत्तंमेयदादित्यसमप्रभम् ।।।।देवासुरविमर्धेषु न भिन्नंवज्रमुष्टिभिः ।

मेरे पास ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त, सूर्य-सम तेजस्वी कवच है; देवासुर-संग्रामों में वह वज्र-प्रहारों से भी कभी भेदा नहीं गया।

Verse 31

तेनमामद्यसम्युक्तंरथस्थमिहसम्युगे ।।।।प्रतीयात्कोऽद्यमामाजौसाक्षादपिपुरन्दरः ।

आज उसी कवच से युक्त, इस संग्राम में रथस्थ होकर—आज रण में मेरा सामना कौन कर सकेगा? साक्षात् पुरन्दर (इन्द्र) भी नहीं।

Verse 32

त्तदातिप्रसन्नेनसशरंकार्मुकंमहत् ।।।।देवासुरविमर्धेषुममदत्तंस्वयम्भुवा ।अद्यतूर्यशतैर्भीमंधनुरुत्थाप्यतांमम ।।।।रामलक्ष्मणयोरेववधायपरमाहवे ।

स्वयम्भू ब्रह्मा ने अत्यन्त प्रसन्न होकर देवासुर-संग्रामों में मुझे जो महान्, बाणों सहित धनुष दिया था—वही मेरा भयानक धनुष आज सैकड़ों तूर्यों के निनाद के बीच उठाया जाए, इस परम युद्ध में राम और लक्ष्मण के वध हेतु।

Verse 33

त्तदातिप्रसन्नेनसशरंकार्मुकंमहत् ।।6.93.32।।देवासुरविमर्धेषुममदत्तंस्वयम्भुवा ।अद्यतूर्यशतैर्भीमंधनुरुत्थाप्यतांमम ।।6.93.33।।रामलक्ष्मणयोरेववधायपरमाहवे ।

रण में शूर से शूर का संग्राम हुआ; युद्धों में अजेय तुम्हारा वीर पुत्र महेन्द्रजित् लक्ष्मण के हाथों मारा गया। उसने बाणों से लक्ष्मण को अत्यन्त पीड़ित कर, परम लोकों को प्रस्थान किया।

Verse 34

स पुत्रवधसन्तप्तःक्रूरःक्रोधवशंगतः ।।।।समीक्ष्यरावणोबुद्ध्यासीतांहन्तुंव्यवस्यत ।

पुत्र-वध से संतप्त, क्रूर और क्रोध के वश में आया रावण मन में विचार कर सीता को मार डालने का निश्चय करने लगा।

Verse 35

प्रत्यवेक्ष्यताम्राक्षस्सुघोरोघोरदर्शनः ।।।।दीनोदीनस्वरान्सर्वांस्तानुवाचनिशाचरान् ।

ताम्र नेत्रों वाला, अत्यन्त भयानक और भयावह रूपधारी रावण चारों ओर देखकर, दीन होकर दीन स्वर में उन सब राक्षसों से बोला।

Verse 36

माययाममवत्सेनवञ्चनार्थंवनौकसाम् ।।।।किञ्चिदेवहतंतत्रसीतेयमितिदर्शितम् ।

वानरों को छलने के लिए मेरे पुत्र ने माया से वहाँ किसी वस्तु को मरा हुआ दिखाया और कहा—‘यह सीता है।’

Verse 37

तदिदंतथ्यमेवाहंकरिष्येप्रियमात्मनः ।।।।वैदेहींनाशयिष्यामिक्षत्रबन्धुमनुव्रताम् ।इत्येवमुक्त्वासचिवान्खङ्गमाशुपरामृशत् ।।।।

अब मैं ही उस कपट को ‘सत्य’ कर दूँगा और अपने हृदय को तृप्त करूँगा। उस नीच क्षत्रबन्धु की अनुव्रता वैदेही का मैं विनाश कर दूँगा। ऐसा कहकर उसने मंत्रियों के सामने शीघ्र ही खड्ग पकड़ लिया॥

Verse 38

तदिदंतथ्यमेवाहंकरिष्येप्रियमात्मनः ।।6.93.37।।वैदेहींनाशयिष्यामिक्षत्रबन्धुमनुव्रताम् ।इत्येवमुक्त्वासचिवान्खङ्गमाशुपरामृशत् ।।6.93.38।।

अब मैं ही उस कपट को ‘सत्य’ कर दूँगा और अपने हृदय को तृप्त करूँगा। उस नीच क्षत्रबन्धु की अनुव्रता वैदेही का मैं विनाश कर दूँगा। ऐसा कहकर उसने मंत्रियों के सामने शीघ्र ही खड्ग पकड़ लिया॥

Verse 39

उत्प्लुत्यगुणसम्पन्नंविमलाम्बरवर्चसम् ।निष्पपात स वेगेनसभार्यःसचिवैर्वृतः ।।।।रावणःपुत्रशोकेनभृशमाकुलचेतनः ।सङ्क्रुद्धःखडगमादायसहसायत्रमैथिली ।।।।

निर्मल आकाश-सा दीप्तिमान, गुणसम्पन्न खड्ग उठाकर, पुत्र-शोक से अत्यन्त व्याकुलचित्त रावण क्रोध में भरकर सहसा उछल पड़ा। पत्नी सहित और मंत्रियों से घिरा हुआ वह वेग से निकल पड़ा—जहाँ मैथिली थी॥

Verse 40

उत्प्लुत्यगुणसम्पन्नंविमलाम्बरवर्चसम् ।निष्पपात स वेगेनसभार्यःसचिवैर्वृतः ।।6.93.39।।रावणःपुत्रशोकेनभृशमाकुलचेतनः ।सङ्क्रुद्धःखडगमादायसहसायत्रमैथिली ।।6.93.40।।

आज इसे देखकर वे दोनों भाई काँप उठेंगे। इसके क्रोध से तर्जित चारों लोकपाल भी विचलित हो जाएँ; और अन्य बहुत-से शत्रु भी युद्धों में इसी के द्वारा गिराए गए हैं॥

Verse 41

व्रजन्तंराक्षसंप्रेक्ष्यसिंहनादंविचक्रुशुः ।ऊचुश्चान्योन्यमालिङ्ग्यसङ्क्रुद्धंप्रेक्ष्यराक्षसम् ।।।।

क्रोध से बढ़ते हुए राक्षस-राज को जाते देखकर, राजभवन के राक्षस सिंह-नाद की भाँति गरज उठे। एक-दूसरे को आलिंगन करके, उस क्रुद्ध राक्षस को देखते हुए वे परस्पर बातें करने लगे॥

Verse 42

अद्यैनंतावुभौदृष्टवाभ्रातरौप्रव्यधिष्यतः ।लोकपालाहिचत्वारःक्रुद्धेनानेनतर्जिताः ।।।।बहवःशत्रवश्चान्येसम्युगेष्वभिपातिताः ।

आज इसे देखकर वे दोनों भाई काँप उठेंगे। इसके क्रोध से तर्जित चारों लोकपाल भी विचलित हो जाएँ; और अन्य बहुत-से शत्रु भी युद्धों में इसी के द्वारा गिराए गए हैं॥

Verse 43

त्रिषुलोकेषुरत्नानिभुङक्तेचाहृत्यरावणः ।।।।विक्रमे च बलेचैवनास्त्यस्यसदृशोभुवि ।

रावण तीनों लोकों से रत्न लाकर भोगता है। पराक्रम और बल में पृथ्वी पर उसके समान कोई नहीं है॥

Verse 44

तेषांसञ्जल्पमानामशोकवनिकांगताम् ।।।।अभिदुद्राववैदेहींरावणःक्रोधमूर्छितः ।

वे ऐसा परस्पर बोलते हुए अशोक-वनिका में पहुँचे ही थे कि क्रोध से मूर्छित रावण वैदेही की ओर दौड़ पड़ा।

Verse 45

वार्यमाणःसुसङ्क्रुद्धःसुहृद्भिर्हितबुद्धिभिः ।।।।अभ्यधावतसङ्क्रुद्धःखेग्रहोरोहिणीमिव ।

हितबुद्धि वाले सुहृदों द्वारा रोके जाने पर भी अत्यन्त क्रुद्ध रावण आगे दौड़ पड़ा—जैसे आकाश में ग्रह (मंगल) रोहिणी की ओर झपटता हो।

Verse 46

मैथिलीरक्ष्यमाणातुराक्षसीरनिन्दिता ।।।।ददर्शराक्षसंक्रुद्धंनिस्त्रिंशवरधारिणम् ।तंनिशाम्यसविस्त्रिंशंव्यथिताजनकात्मजा ।।।।निवार्यमाणंबहुशःसुहृद्भिरनिवर्तिनम् ।

राक्षसियों द्वारा पहरे में रखी गई निष्कलंक मैथिली सीता ने क्रोध से भरे उस राक्षस को देखा, जिसके हाथ में उत्तम खड्ग था। नंगी तलवार सहित उसे देखकर जनकनन्दिनी व्याकुल हो उठी; मित्रों द्वारा बार-बार रोके जाने पर भी वह लौटने वाला न था।

Verse 47

मैथिलीरक्ष्यमाणातुराक्षसीरनिन्दिता ।।6.93.46।।ददर्शराक्षसंक्रुद्धंनिस्त्रिंशवरधारिणम् ।तंनिशाम्यसविस्त्रिंशंव्यथिताजनकात्मजा ।।6.93.47।।निवार्यमाणंबहुशःसुहृद्भिरनिवर्तिनम् ।

राक्षसियों द्वारा पहरे में रखी गई निष्कलंक मैथिली सीता ने क्रोध से भरे उस राक्षस को देखा, जिसके हाथ में उत्तम खड्ग था। नंगी तलवार सहित उसे देखकर जनकनन्दिनी व्याकुल हो उठी; मित्रों द्वारा बार-बार रोके जाने पर भी वह लौटने वाला न था।

Verse 48

सीतादुःखसमाविष्टाविलपन्तीदमब्रवीत् ।।।।यथायंमामभिक्रुद्धःसमभिद्रवतिस्वयम् ।वधिष्यतिसनाथांमामनाथामिवदुर्मतिः ।।।।

दुःख से घिरी हुई सीता विलाप करती हुई बोली—“देखो, यह दुष्टबुद्धि क्रोध में स्वयं मुझ पर दौड़ रहा है; यह मुझे मार डालेगा, मानो मैं अनाथ और निराश्रय हूँ, जबकि मेरा रक्षक है।”

Verse 49

सीतादुःखसमाविष्टाविलपन्तीदमब्रवीत् ।।6.93.48।।यथायंमामभिक्रुद्धःसमभिद्रवतिस्वयम् ।वधिष्यतिसनाथांमामनाथामिवदुर्मतिः ।।6.93.49।।

“मैं पति-परायणा हूँ, फिर भी वह बार-बार मुझे उकसाता रहा—‘मेरी पत्नी बनो, मेरे साथ रमण करो।’ मैंने उसे दृढ़ता से ठुकरा दिया। अब मेरे न मानने से वह स्पष्टतः निराश हो गया है; क्रोध और मोह से ग्रस्त होकर मुझे मारने को उद्यत है।”

Verse 50

बहुशश्चोदयामासभर्तारंमामनुव्रताम् ।भार्याभवरमस्वेतिप्रत्याख्यातोध्रुवंमया ।।।।सोऽयंमामनुपस्थानेव्यक्तंनैराश्यमागतः ।क्रोधमोहसमाविष्टोनिहन्तुंमांसमुद्यतः ।।।।

“मैं पति-परायणा हूँ, फिर भी वह बार-बार मुझे उकसाता रहा—‘मेरी पत्नी बनो, मेरे साथ रमण करो।’ मैंने उसे दृढ़ता से ठुकरा दिया। अब मेरे न मानने से वह स्पष्टतः निराश हो गया है; क्रोध और मोह से ग्रस्त होकर मुझे मारने को उद्यत है।”

Verse 51

बहुशश्चोदयामासभर्तारंमामनुव्रताम् ।भार्याभवरमस्वेतिप्रत्याख्यातोध्रुवंमया ।।6.93.50।।सोऽयंमामनुपस्थानेव्यक्तंनैराश्यमागतः ।क्रोधमोहसमाविष्टोनिहन्तुंमांसमुद्यतः ।।6.93.51।।

वह बार-बार मुझे—जो पति-परायणा हूँ—उकसाता रहा, “मेरी पत्नी बनो, मेरे साथ रमण करो।” पर मैंने उसे निश्चय ही ठुकरा दिया। अब मेरे न मानने से वह स्पष्ट निराश हो गया है; क्रोध और मोह से घिरकर मुझे मार डालने को उद्यत है।

Verse 52

अथवातौनरव्याघ्रौभ्रातरौरामलक्ष्मणौ ।मन्निमित्तमनार्येणसमरेऽद्यनिपातितौ ।।।।

“अथवा क्या वे दोनों नर-व्याघ्र भ्राता—राम और लक्ष्मण—मेरे ही कारण आज उस अनार्य के द्वारा युद्ध में गिरा दिए गए हैं?”

Verse 53

भैरवोहिमहान्नादोराक्षसानांश्रुतोमया ।बहूनामिहहृष्टानांतथाविक्रोशतांप्रियम् ।।।।

मैंने यहाँ बहुत-से राक्षसों का भयानक, महान् कोलाहल सुना—वे हर्षित होकर अपने प्रियजनों को पुकारते हुए ऊँचे स्वर में चिल्ला रहे थे।

Verse 54

अहोधिङ्मन्निमित्तोऽयंविनाशोराजपुत्रयोः ।अथवापुत्रशोकेनअहत्यारामलक्ष्मणौ ।।।।विधमिष्यतिमांरौद्रोराक्षसःपापनिश्चयः ।

हाय—धिक्कार! क्या उन दोनों राजकुमारों का यह विनाश मेरे ही कारण हो रहा है? अथवा अपने पुत्र-शोक से व्याकुल, राम-लक्ष्मण को मार न सकने पर, वह रौद्र राक्षस—पाप-निश्चय वाला—मुझे ही नष्ट करने का निश्चय कर बैठा है?

Verse 55

हनूमतस्तुतद्वाक्यं न कृतंक्षुद्रयामया ।।।।यद्यहंतस्यपृष्ठेवतदायासमनिर्जिता ।नाद्यैवमनुशोचेयंभर्तुरङ्कगतासती ।।।।

क्षुद्र बुद्धि वाली मैं हनुमान् की वह बात न मान सकी। यदि तब मैं उनके पृष्ठ पर बैठकर चली जाती, तो अवश्य ही अजेय रूप से पहुँच जाती; आज मैं इस प्रकार शोक न करती, बल्कि सती होकर अपने पति की गोद में विश्राम कर रही होती।

Verse 56

हनूमतस्तुतद्वाक्यं न कृतंक्षुद्रयामया ।।6.93.55।।यद्यहंतस्यपृष्ठेवतदायासमनिर्जिता ।नाद्यैवमनुशोचेयंभर्तुरङ्कगतासती ।।6.93.56।।

मुझे लगता है कि कौसल्या का हृदय फट जाएगा, जब वह सुनेगी कि उसका एकमात्र पुत्र युद्ध में नष्ट हो गया।

Verse 57

मन्येतुहृदयंतस्याःकौसल्यायाःफलिष्यति ।एकपुत्रायदापुत्रंविनष्टंश्रोष्यतेयुधि ।।।।

मुझे लगता है कि कौसल्या का हृदय फट जाएगा, जब वह सुनेगी कि उसका एकमात्र पुत्र युद्ध में नष्ट हो गया।

Verse 58

साहिजन्म च बाल्यं च यौवनं च महात्मनः ।धर्मकार्याणिरूपं च रुदतीसंस्मरिष्यति ।।।।

वह रोती हुई उस महात्मा के जन्म, बाल्य, यौवन, धर्मकर्मों और उसके रूप को बार-बार स्मरण करेगी।

Verse 59

निराशानिहतेपुत्रेदत्त्वाश्राद्धमचेतना ।अग्निमावेक्ष्यतेनूनमापोवापिप्रवेक्ष्यति ।।।।

पुत्र के मारे जाने पर निराश होकर, शोक से अचेत-सी वह श्राद्ध देगी; फिर निश्चय ही अग्नि की ओर देखेगी, या जल में प्रवेश करेगी।

Verse 60

धिगस्तुकुब्जामसतींमन्थरांपापनिश्चयाम् ।यन्निमित्तमिमंशोकंकौसल्याप्रतिपत्स्यते ।।।।

धिक्कार है उस कुब्जा, दुष्टा, पाप-निश्चयी मंथरा को, जिसके कारण कौसल्या इस शोक को प्राप्त होगी।

Verse 61

इत्येवंमैथिलींदृष्टवाविलपन्तींतपस्विनीम् ।रोहिणीमिवचन्द्रेणविनाग्रहवशंगताम् ।।।।एतस्मिन्नन्तरेतस्यअमात्यःशीलवान् शुचिः ।सुपार्श्वोनाममेधावीरावणंरक्षसेश्वरम् ।।।।निवार्यमाणःसचिवैरिदंवचनमब्रवीत् ।

इस प्रकार विलाप करती हुई तपस्विनी मैथिली को देखकर—चन्द्रमा के बिना ग्रहदोष से ग्रस्त रोहिणी के समान—उसी समय शीलवान्, शुचि, मेधावी मंत्री सुपार्श्व ने, अन्य सचिवों द्वारा रोके जाने पर भी, राक्षसों के स्वामी रावण से ये वचन कहे।

Verse 62

इत्येवंमैथिलींदृष्टवाविलपन्तींतपस्विनीम् ।रोहिणीमिवचन्द्रेणविनाग्रहवशंगताम् ।।6.93.61।।एतस्मिन्नन्तरेतस्यअमात्यःशीलवान् शुचिः ।सुपार्श्वोनाममेधावीरावणंरक्षसेश्वरम् ।।6.93.62।।निवार्यमाणःसचिवैरिदंवचनमब्रवीत् ।

उसी समय उसका शीलवान, शुचि और मेधावी मंत्री सुपार्श्व, राक्षसों के स्वामी रावण से, अन्य सचिवों द्वारा रोके जाने पर भी, ये वचन बोला।

Verse 63

कथंनामदशग्रीव साक्षद्वैश्रवणानुज ।।।।हन्तुमिच्छसिवैदेहींक्रोधाद्धर्ममपास्य च ।

हे दशग्रीव, वैश्रवण (कुबेर) के साक्षात् अनुज! क्रोध में धर्म को त्यागकर तुम वैदेही को मारना कैसे चाह सकते हो?

Verse 64

वेदविद्याव्रतस्नातःस्वकर्मनिरतस्तथा ।।।।स्त्रियःकस्माद्वधंवीरमन्यसेराक्षसेश्वर ।

वेद-विद्या के व्रतों में स्नात और अपने कर्तव्य में रत होकर भी, हे वीर राक्षसेश्वर! तुम स्त्री के वध का विचार क्यों करते हो?

Verse 65

मैथिलींरूपसम्पन्नांप्रत्यवेक्षस्वपार्थिव ।।।।तस्मिन्नेवसहास्माभिराहेवक्रोधमुत्सृज ।

हे राजन्, रूप-सम्पन्न मैथिली (सीता) पर भली-भाँति दृष्टि डालो। उसी पर—हम सबके साथ—रण में अपना क्रोध छोड़ो (उसी पर केन्द्रित करो)।

Verse 66

अभ्युत्थानंत्वमद्यैवकृष्णपक्षचतुर्धशीम् ।।।।कृत्वानिर्याह्यमावास्यांविजयायबलैर्वृतः ।

आज ही कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को तैयारी कर लो; फिर अमावस्या के दिन, सेनाओं से घिरे हुए, विजय के लिए प्रस्थान करो।

Verse 67

शूरःधीमान् रथीखडगीरथप्रवमास्थितः ।।।।हत्वादाशरथिंरामंभवान् प्राप्स्यसिमैथिलीम् ।

तुम शूरवीर और बुद्धिमान हो—रथी हो, हाथ में खड्ग धारण किए। अपने श्रेष्ठ रथ पर आरूढ़ होकर दाशरथि राम का वध करो; तब तुम मैथिली को प्राप्त करोगे।

Verse 68

स तद्दुरात्मासुहृदानिवेदितंवचःसुधर्म्यंप्रतिगृह्यरावणः ।गृहंजगामथततश्चवीर्यवान् पुनःसभां च प्रययौसुहृद्वृतः ।।।।

उस दुरात्मा रावण ने मित्र द्वारा निवेदित धर्मयुक्त वचन स्वीकार किया। वह अपने भवन को गया; फिर पराक्रमी होकर, मित्रों से घिरा, पुनः सभा में पहुँचा।

Frequently Asked Questions

Rāvaṇa, overwhelmed by grief and rage after Indrajit’s death, decides to kill Vaidehī (Sītā)—a non-combatant—raising a direct dharma breach: retaliatory violence against the protected and powerless versus lawful conduct in war.

The sarga teaches that ungoverned krodha distorts judgment and targets the innocent; therefore, nīti and dharma function as corrective forces. Suparśva’s counsel frames moral limits as essential to legitimate power, even for a ruler in crisis.

Aśoka-vana (Aśoka grove) is foregrounded as Sītā’s guarded enclosure and a moral theater of vulnerability; the antaḥpura is referenced through the expected lamentation of rākṣasa women, while Laṅkā and the sabhā (council) situate the episode within royal and military institutions.

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