
पुष्पकविमानेन सीताया युद्धभूमिदर्शनम् (Sita Shown the Battlefield in the Pushpaka)
युद्धकाण्ड
इस सर्ग में इन्द्रजीत अपने कार्य की सिद्धि मानो करके लंका लौटता है। उसके प्रतीयमान विजय से वानर-वीर राघव की रक्षा हेतु चारों ओर सतर्क घेरा बना लेते हैं और छोटी-सी हलचल को भी राक्षस-प्रवेश की आशंका से देखते हैं। रावण हर्षित होकर त्रिजटा सहित राक्षसी परिचारिकाओं को आज्ञा देता है कि वे अशोकवनिका से सीता को पुष्पक विमान में लाएँ और उसे राम-लक्ष्मण को मरे हुए-से दिखाकर उसका धैर्य तोड़ें। लंका सजाई जाती है और घोषणाएँ होती हैं कि दोनों भाई युद्ध में मारे गए हैं। सीता त्रिजटा के साथ रणभूमि में गिरे वानरों को और राक्षसों के उत्सव-भाव को देखती है। फिर वह शर-शय्या पर अचेत पड़े राम-लक्ष्मण को, टूटे कवच और धनुषों सहित देखकर उन्हें मृत मान लेती है और तीव्र शोक में मूर्छित होकर विलाप करती है। यह अध्याय कपटपूर्ण विजय-घोष के विपरीत सीता की अडिग निष्ठा तथा बंदिनी की आशा से खिलवाड़ करने के नैतिक मूल्य को उजागर करता है।
Verse 1
प्रतिप्रविष्टेलङ्कायांकृतार्थेरावणात्मजे ।राघवंपरिवार्यार्तुरक्षुर्वानरर्षभाः ।।।।
जब रावण का पुत्र अपना प्रयोजन सिद्ध करके लंका में फिर प्रविष्ट हुआ, तब वानरों में श्रेष्ठ वीरों ने दुःखी राघव को चारों ओर से घेरकर उसकी रक्षा की।
Verse 2
हनुमानङ्गदोनीलःसुषेणःकुमुदोनलः ।गजोगवाक्षोगवयश्शरभोगन्धमादनः ।।।।जाम्बवानृषभःसुन्दोरम्भःशतवलिःपृथुः ।व्यूढानीकाश्चयत्ताश्चद्रुमानादायसर्वतः ।।।।वीक्षमाणादिशस्सर्वास्तिर्यगूर्ध्वंचवानराः ।तृणेष्वपिचचेष्टत्सुराक्षसाइतिमेनिरे ।।।।
हनुमान, अंगद, नील, सुषेण, कुमुद, नल, गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, जाम्बवान, ऋषभ, सुन्द, रम्भ, शतवलि और पृथु—इन सबने वानर-सेना को सुव्यवस्थित पंक्तियों में सजाकर, चारों ओर से उखाड़े हुए वृक्षों को शस्त्र बनाकर मोर्चा बाँध लिया। वे तिरछे और ऊपर—सब दिशाओं में—निगाह रखकर राम की रक्षा करते रहे; और यदि तिनका भी हिलता, तो उसे राक्षस की चाल समझते।
Verse 3
हनुमानङ्गदोनीलःसुषेणःकुमुदोनलः ।गजोगवाक्षोगवयश्शरभोगन्धमादनः ।।6.47.2।।जाम्बवानृषभःसुन्दोरम्भःशतवलिःपृथुः ।व्यूढानीकाश्चयत्ताश्चद्रुमानादायसर्वतः ।।6.47.3।।वीक्षमाणादिशस्सर्वास्तिर्यगूर्ध्वंचवानराः ।तृणेष्वपिचचेष्टत्सुराक्षसाइतिमेनिरे ।।6.47.4।।
जाम्बवान्, ऋषभ, सुन्द, रम्भ, शतवलि और पृथु—सेनाओं को सुव्यवस्थित कर और मोर्चों पर तैनात करके—चारों ओर से वृक्ष उखाड़कर (हथियार व आड़ के लिए) ले आए।
Verse 4
हनुमानङ्गदोनीलःसुषेणःकुमुदोनलः ।गजोगवाक्षोगवयश्शरभोगन्धमादनः ।।6.47.2।।जाम्बवानृषभःसुन्दोरम्भःशतवलिःपृथुः ।व्यूढानीकाश्चयत्ताश्चद्रुमानादायसर्वतः ।।6.47.3।।वीक्षमाणादिशस्सर्वास्तिर्यगूर्ध्वंचवानराः ।तृणेष्वपिचचेष्टत्सुराक्षसाइतिमेनिरे ।।6.47.4।।
वानर सब दिशाओं में—आड़े-तिरछे और ऊपर की ओर भी—निगाह रखे हुए थे; तिनके-घास तक में हलचल होती तो उसे भी वे राक्षस ही समझते।
Verse 5
रावणश्चापिसम्हृष्टोविसृज्येन्द्रजितंसुतम् ।अजुहावततस्सीताक्षिणीराक्षसीस्तदा ।।।।
रावण भी अत्यन्त हर्षित होकर अपने पुत्र इन्द्रजित को विदा कर, तत्पश्चात् सीता की रक्षा में नियुक्त राक्षसियों को बुलाने लगा।
Verse 6
राक्षस्यस्त्रिजटाचैवशासनात्समुपस्थिताः ।ताउवाचततोहृष्टोराक्षसीराक्षसाधमः ।।।।
आज्ञा पाते ही त्रिजटा सहित राक्षसियाँ उपस्थित हो गईं। तब हर्षित उस अधम राक्षस ने राक्षसियों से कहा।
Verse 7
हताविन्द्रजिताख्यातवैदेह्यारामलक्ष्मणौ ।पुष्पकंतत्समारोप्यदर्शयध्वंहतौरणे ।।।।
‘इन्द्रजित ने रण में राम और लक्ष्मण को मार डाला है। वैदेही को उस पुष्पक विमान पर चढ़ाकर, युद्धभूमि में पड़े हुए उन दोनों को मरा हुआ दिखाओ।’
Verse 8
यदाश्रयादवष्टब्धामामुपतिष्ठति ।सोऽस्याभर्तासहभ्रात्रानिहतोरणमूर्धनि ।।।।
‘जिसके आश्रय से यह गर्वित होकर मुझे स्वीकार नहीं करती थी—वही इसका पति अपने भाई सहित रणभूमि के अग्रभाग में मारा गया है।’
Verse 9
निर्विशङ्कानिरुद्विग्नानिरपेक्षाचमैथिली ।मामुपस्थास्यतेसीतासर्वाभरणभूषिता ।।।।
‘तब मैथिली—संदेह से रहित, भय से मुक्त और आशा त्यागकर—सभी आभूषणों से विभूषित सीता मेरी सेवा में उपस्थित होगी।’
Verse 10
अद्यकालवशंप्राप्तंरणेरामंसलक्ष्मणम् ।अवेक्ष्यविनिवृत्तासाचान्यांगतिमपश्यती ।।।।निरपेक्षाविशालाक्षीमामुपस्थास्यतेस्वयम् ।
रावण ने मन में विचार किया—“आज रण में लक्ष्मण सहित राम को काल के वश में पड़ा देखकर विशालनेत्री सीता लौट आएगी। उसे कोई अन्य आश्रय न दिखेगा; आशा छोड़कर वह स्वयं मेरे पास आ जाएगी।”
Verse 11
तस्यतद्वचनंश्रुत्वारावणस्यदुरात्मनः ।।।।राक्षस्यस्तास्तथेत्युक्त्वाजग्मुर्वैयत्रपुष्पकम् ।
दुरात्मा रावण के वे वचन सुनकर उन राक्षसी स्त्रियों ने “तथास्तु” कहकर जहाँ पुष्पक था, वहाँ प्रस्थान किया।
Verse 12
ततःपुष्पकमादायराक्षस्योरावणाज्ञया ।।।।अशोकवनिकास्थांतांमैथिलींसमुपानयन् ।
तत्पश्चात् रावण की आज्ञा से राक्षसी स्त्रियाँ पुष्पक को लेकर अशोक-वाटिका में स्थित उस मैथिली के पास पहुँचीं।
Verse 13
तामादायतुराक्षस्योभर्तृशोकपराजिताम् ।।।।सीतामारोपयामासुर्विमानंपुष्पकंतदा ।
तब राक्षसी स्त्रियाँ पति-वियोग के शोक से पराजित सीता को लेकर, उसी समय उसे पुष्पक विमान पर चढ़ाने लगीं।
Verse 14
ततःपुष्पकमारोप्यसीतांत्रिजटयासह ।।।।जग्मुर्दर्शयितुंतस्यैराक्षस्योरामलक्ष्मणौ ।
फिर राक्षसी स्त्रियाँ सीता को त्रिजटा सहित पुष्पक विमान में बैठाकर, उसे राम और लक्ष्मण को दिखाने के लिए चलीं।
Verse 15
रावणोऽकारयल्लङ्कांपताकाध्वजमालिनीम् ।।।।प्राघोषयतहृष्टश्चलङ्कायांराक्षसेश्वरः ।राघवोलक्ष्मणश्चैवहताविन्द्रजितारणे ।।।।
हर्षित राक्षसेश्वर रावण ने लंका को पताकाओं और ध्वजों से सुसज्जित कराया और नगर में यह घोषणा कराई कि इन्द्रजित के संग्राम में राघव (राम) और लक्ष्मण दोनों मारे गए हैं।
Verse 16
रावणोऽकारयल्लङ्कांपताकाध्वजमालिनीम् ।।6.47.15।।प्राघोषयतहृष्टश्चलङ्कायांराक्षसेश्वरः ।राघवोलक्ष्मणश्चैवहताविन्द्रजितारणे ।।6.47.16।।
यह वही घोषणा पुनः है—हर्षित राक्षसेश्वर रावण ने लंका को ध्वज-पताकाओं से सजवाया और यह प्रचार कराया कि इन्द्रजित ने युद्ध में राम और लक्ष्मण को मार डाला है।
Verse 17
विमानेनापिगत्वातुसीतात्रिजटयासह ।ददर्शवानराणांतुसर्वंसैन्यंनिपातितम् ।।।।
विमान से त्रिजटा के साथ जाते हुए सीता ने वानरों की सारी सेना को धराशायी पड़ा हुआ देखा।
Verse 18
प्रहृष्टमनसश्चापिददर्शपिशिताशनान् ।वानरांश्चातिदुःखार्तान्रामलक्ष्मणपार्श्वतः ।।।।
उसने हर्षित मन वाले मांसभक्षी राक्षसों को देखा और राम-लक्ष्मण के समीप अत्यन्त दुःख से पीड़ित वानरों को भी देखा।
Verse 19
ततस्सीताददर्शोभौशयानौशरतल्पगौ ।लक्ष्मणंचापिरामंचविसंज्ञौशरपीडितौ ।।।।विध्वस्तकवचौवीरौविप्रविद्धशरासनौ ।सायकैचशिन्नसर्वाङ्गौशरस्तम्बमयौक्षितौ ।।।।
तब सीता ने राम और लक्ष्मण—दोनों को—बाणों की शय्या पर पड़े देखा; वे मूर्छित थे और बाणों से पीड़ित थे। उन वीरों के कवच टूट चुके थे, धनुष दूर जा पड़े थे; तीरों से उनके अंग कट-छिद गए थे, मानो वे धरती पर बाणों के झुरमुट-से बन गए हों।
Verse 20
ततस्सीताददर्शोभौशयानौशरतल्पगौ ।लक्ष्मणंचापिरामंचविसंज्ञौशरपीडितौ ।।6.47.19।।विध्वस्तकवचौवीरौविप्रविद्धशरासनौ ।सायकैचशिन्नसर्वाङ्गौशरस्तम्बमयौक्षितौ ।।6.47.20।।
उन दोनों वीरों के कवच चूर-चूर हो गए थे और उनके धनुष दूर जा पड़े थे। तीरों से उनके सब अंग छिन्न-भिन्न थे; वे धरती पर मानो बाणों के झुरमुट-से बने पड़े थे।
Verse 21
तौदृष्टवाभ्रातरौतत्रप्रवीरौपुरुषर्षभौ ।शयानौपुण्डरीकाक्षौकुमाराविवपावकी ।।।।शरतल्पगतौवीरौतथाभूतानरर्षभौ ।दुःखार्ताकरुणंसीतासुभृशंविललापह ।।।।
वहाँ उन दोनों भाइयों को—महावीर, पुरुषश्रेष्ठ, कमलनयन—शय्या पर पड़े देखकर, मानो वे अग्निदेव के दो कुमार हों, सीता ने देखा। बाणों की शय्या पर पड़े उस दशा में उन नरश्रेष्ठ वीरों को देखकर, दुःख से व्याकुल सीता करुण स्वर में अत्यन्त विलाप करने लगी।
Verse 22
तौदृष्टवाभ्रातरौतत्रप्रवीरौपुरुषर्षभौ ।शयानौपुण्डरीकाक्षौकुमाराविवपावकी ।।6.47.21।।शरतल्पगतौवीरौतथाभूतानरर्षभौ ।दुःखार्ताकरुणंसीतासुभृशंविललापह ।।6.47.22।।
उन दोनों पराक्रमी भ्राताओं—पुरुषसिंह, कमल-नेत्र—को बाणों की शय्या पर उसी दशा में पड़ा देखकर, दुःख से व्याकुल सीता करुण स्वर में अत्यन्त विलाप करने लगी।
Verse 23
भर्तारमनवद्याङ्गीलक्ष्मणंचासितेक्षणा ।प्रेक्ष्यपांसुषुचेष्टन्तौरुरोदजनकात्मजा ।।।।
निर्दोष अंगों वाली, श्यामलोचना जनकनन्दिनी ने अपने पति और लक्ष्मण को धूल में छटपटाते देखकर ऊँचे स्वर से रोना आरम्भ किया।
Verse 24
सबाष्पशोकाभिहतासमीक्ष्यतौभ्रातरौदेवसमप्रभावौ ।वितर्कयन्तीनिधनंतयोस्सादुःखान्वितावाक्यमिदंजगाद ।।।।
आँसुओं से भरी और शोक से आहत वह सीता, देवतुल्य प्रभा वाले उन दोनों भ्राताओं को देखकर, उनके निधन की आशंका करती हुई, दुःख से भरकर ये वचन बोली।
Rāvaṇa deploys psychological coercion: he stages public celebration and forces Sītā to witness Rāma and Lakṣmaṇa appearing dead, aiming to collapse her consent through despair rather than persuasion—raising a clear dharma-question about manipulation of a captive’s agency.
The sarga juxtaposes deceptive appearances with inner fidelity: external “proof” of defeat can be engineered, but dharmic loyalty persists as a moral stance; Sītā’s lament functions as testimony of devotion and the human cost of adharma-driven strategy.
Key landmarks include Laṅkā (as a propagandized civic space decorated with standards), Aśokavanikā (Sītā’s captivity locus), and the battlefield viewed from the Puṣpaka vimāna; culturally, the vimāna and proclamation rituals underscore royal spectacle used for wartime messaging.
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