
राघव-रावणयोः घोर-द्वैरथ-युद्धम् (The Fierce Chariot-Duel of Rama and Ravana)
युद्धकाण्ड
इस सर्ग में श्रीराम और रावण का घोर द्वैरथ-युद्ध और भी तीव्र हो उठता है, जिसका भय संसार तक में वर्णित है। दोनों सेनाएँ क्षणभर के लिए अपने-अपने संग्राम रोककर, अस्त्र उठाए स्तब्ध खड़ी रहती हैं और विस्मय से इस निर्णायक द्वंद्व को देखती हैं। क्रोध से भरकर रावण श्रीराम के रथ-ध्वज को लक्ष्य कर बाण चलाता है, पर ध्वज कटता नहीं; बाण रथ को छूकर गिर जाते हैं। तब श्रीराम संयत रोष के साथ रावण के ध्वजदंड/केतु को बाण से काट गिराते हैं; ध्वजदंड के धरती पर गिरते ही रावण की ज्वलंत क्रोधाग्नि और भड़क उठती है। रावण प्रतिशोध में बाणों की वर्षा करता है और मायाबल से विशाल ‘शस्त्र-वर्षा’ रचता है—गदाएँ, लोहे के दंड, चक्र, मुद्गर, पर्वत-शिखर, वृक्ष, त्रिशूल और परशु आदि। दोनों ओर से छूटे बाणों से आकाश जाल-सा भर जाता है, मानो दूसरा आकाश बन गया हो; कोई अस्त्र व्यर्थ नहीं जाता—या तो लक्ष्य भेदता है या मध्य में टकराकर गिर पड़ता है। प्रहार-प्रतिप्रहार की इस धारा में दोनों के अश्वों पर भी वार होते हैं। ध्वज-भंग के अपमान से रावण का रोष और बढ़ता है और यह द्वैरथ-युद्ध कुछ समय के लिए अत्यंत रोमांचक, उग्र और कोलाहलपूर्ण हो उठता है।
Verse 1
ततःप्रवृत्तंसुक्रूरंरामरावणयोस्तदा ।सुमहदद्वैरथंयुद्धंसर्वलोकभयावहम् ।।6.109.1।।
तब राम और रावण के बीच अत्यन्त क्रूर, विशाल रथ-युद्ध आरम्भ हुआ, जो समस्त लोकों में भय उत्पन्न करने वाला था।
Verse 2
ततोराक्षससैन्यं च हरीणां च महद्बलम् ।प्रगृहीतप्रहरणंनिश्चेष्टंसमवर्तत ।।6.109.2।।
तब राक्षसों की सेना और वानरों की महान् वाहिनी—दोनों ही हाथों में शस्त्र लिए—निश्चेष्ट होकर ठहर गईं, मानो निर्णायक क्षण की प्रतीक्षा कर रही हों।
Verse 3
सम्प्रयुद्धेतुतौदृष्टवाबलवन्नरराक्षसौ ।व्याक्षिप्तहदृयास्सर्वेपरंविस्मयमागताः ।।6.109.3।।
निकट संग्राम में उस बलवान् नर और राक्षस को युद्धरत देखकर सबके हृदय विचलित हो उठे और वे परम विस्मय को प्राप्त हुए॥
Verse 4
नाप्रहरणैर्व्यग्रैर्भुजैर्विस्मितबुद्धयः ।तस्थुःप्रेक्षय च सर्वेतेनाभिजग्मुःपरस्परम् ।।6.109.4।।
विविध आयुधों से सुसज्जित, उत्सुक भुजाएँ उठाए, विस्मित बुद्धि वाले वे सब देखते हुए स्थिर खड़े रहे; वे परस्पर एक-दूसरे पर नहीं टूट पड़े॥
Verse 5
रक्षसांरावणंचापिवानराणां च राघवम् ।पश्यतांविस्मिताक्षाणांसैन्यंचित्रमिवाबभौ ।।6.109.5।।
राक्षसों के लिए रावण और वानरों के लिए राघव को विस्मित नेत्रों से देखते हुए, वह समस्त सेना मानो किसी अद्भुत चित्र के समान प्रतीत हुई॥
Verse 6
तौतुतत्रनिमित्तानिदृष्टवाराघवरावणौ ।कृतबुद्धीस्थिरामर्षौयुयुधातेह्यभीतवत् ।।6.109.6।।
वहाँ के अपशकुन-शकुन देखकर राघव और रावण—दृढ़ निश्चय वाले, क्रोध में स्थिर—निर्भय होकर रण में भिड़ गए।
Verse 7
जेतव्यमितिकाकुत्स्थोमर्तव्यमितिरावणः ।धृतौस्ववीर्यसर्वस्वंयुद्धेऽदर्शयतांतदा ।।6.109.7।।
काकुत्स्थ ने निश्चय किया—“मुझे जीतना है”; और रावण ने—“मुझे मरना है”; तब दोनों ने युद्ध में अपने पराक्रम का सर्वस्व प्रकट कर दिया।
Verse 8
ततःक्रोधाद्धशग्रीवश्शरान्सन्धायवीर्यवान् ।मुमोचध्वजमुद्धिस्यराघवस्यरथेस्थितम् ।।6.109.8।।
तब क्रोध से भरे वीर दशग्रीव ने बाणों को संधान कर राघव के रथ पर स्थित ध्वज को लक्ष्य करके छोड़ दिया।
Verse 9
तेशरास्तमनासाद्यपुरन्दररथध्वजम् ।रथशक्तिंपरामृश्यनिपेतुर्धरणीतले ।।6.109.9।।
वे बाण पुरन्दर के रथ-ध्वज के समान उस ध्वज तक पहुँच न सके; रथ की काष्ठ-देह को छूकर वे धरती पर गिर पड़े।
Verse 10
ततोरामोऽपिसङ्क्रुद्धश्चपमाकृष्यवीर्यवान् ।कृतप्रतिकृतंकर्तुंमनसस्सम्प्रचक्रमे ।।6.109.10।।
तब पराक्रमी राम भी क्रोधित होकर धनुष खींच लाए और जो किया गया था उसका यथोचित प्रत्युत्तर देने का मन में निश्चय करने लगे।
Verse 11
रावणध्वजमुद्दिस्यमुमोचनिशितंशरम् ।महासर्पमिवासह्यंज्वलन्तंस्वेनतेजसा ।।6.109.11।।
रावण के ध्वज को लक्ष्य करके राम ने एक तीक्ष्ण बाण छोड़ा—जो महान् सर्प के समान असह्य था और अपने ही तेज से दहक रहा था।
Verse 12
रामश्चिक्षेपतेजस्वीकेतुमुद्धिश्यसायकम् ।जगाम स महींछित्त्वादशग्रीवध्वजंशरः ।।6.109.12।।
तेजस्वी राम ने ध्वज-दण्ड को लक्ष्य करके बाण छोड़ा; वह शर दशग्रीव के ध्वज को चीरता हुआ पृथ्वी में जा धँसा।
Verse 13
स निकृत्तोऽपतद्भूमौरावणस्यन्दनध्वजः ।ध्वजस्योन्मथनंदृष्टवारावणस्समहाबलः ।।6.109.13।।सम्प्रदीप्तोऽभवत्क्रोधादमर्षात्प्रहसन्निव ।स रोषवशमापन्नश्शरवर्षंववर्ष ह ।।6.109.14।।
कट जाने पर रावण के रथ का ध्वज भूमि पर गिर पड़ा। ध्वज का उखड़ना देखकर वह महाबली रावण उसे अपना अपमान मानकर मन में क्षुब्ध हो उठा।
Verse 14
स निकृत्तोऽपतद्भूमौरावणस्यन्दनध्वजः ।ध्वजस्योन्मथनंदृष्टवारावणस्समहाबलः ।।6.109.13।।सम्प्रदीप्तोऽभवत्क्रोधादमर्षात्प्रहसन्निव ।स रोषवशमापन्नश्शरवर्षंववर्ष ह ।।6.109.14।।
क्रोध और असह्य अपमान से वह दहक उठा, मानो उपहास में हँस रहा हो। रोष के वश होकर उसने बाणों की घोर वर्षा कर दी।
Verse 15
रामस्यतुरगान्दीप्तै: शरैर्विव्याथरावणः ।तेदिव्याहरयस्तत्रनास्खलन्नापिबभ्रमुः ।।6.109.15।।बभूवुःस्वस्थहृदयाःपद्मनालैरिवाहताः ।
रावण ने दीप्त बाणों से राम के घोड़ों को बेधा; पर वे दिव्य अश्व वहाँ न तो फिसले, न डगमगाए। वे शांतचित्त रहे, मानो कमल-नालों से ही आहत हुए हों।
Verse 16
तेषामसम्भ्रमंदृष्टवावाजिनांरावणस्तदा ।।6.109.16।।भूयएवसुसङ्क्रुद्धश्शरवर्षंमुमोच ह ।
घोड़ों को अडिग देखकर रावण तब और भी अधिक क्रुद्ध हो उठा। उसने फिर से बाणों की भारी वर्षा छोड़ दी।
Verse 17
गदाश्चपरिघांश्चैवचक्राणिमुसलानि च ।।6.109.17।।गिरिशृङ्गाणिवृक्षांश्चतथाशूलपरश्वधान् ।
वहाँ गदाएँ और परिघ, चक्र और मुसल थे; पर्वत-शिखर और उखड़े वृक्ष भी, तथा शूल और परशु जैसे आयुध भी थे।
Verse 18
मायाविहितमेतत्तुशस्त्रवर्षमपातयत् ।।6.109.18।।सहस्रशस्तदाबाणानश्रान्तहृदयोद्यमः ।
तब अविचल संकल्प और अथक पराक्रम से उसने माया-रचित शस्त्र-वर्षा बरसाई और सहस्रों बाणों की धाराएँ छोड़ दीं।
Verse 19
तुमुलंत्रासजननंभीमंभीमप्रतिस्वनम् ।।6.109.19।।तद्वर्षमभवद्युद्धेनैकशस्त्रमयंमहत् ।
युद्ध में अनेक प्रकार के शस्त्रों की महान् वर्षा उठ खड़ी हुई—वह कोलाहलपूर्ण, भय उत्पन्न करने वाली, अत्यन्त भयानक और डरावनी प्रतिध्वनि से गूँजती थी।
Verse 20
राघवरथंसमन्ताद्वानरेबले ।।6.109.20।।सायकैरन्तरिक्षं च चकारसुनिरन्तरम् ।
राघव के रथ के चारों ओर से वानर-सेना पर बाणों की ऐसी घनी वर्षा हुई कि आकाश भी मानो बिना अंतर के भर गया।
Verse 21
मुमोच ह दशग्रीवोनिःसङ्गेनान्तरात्मना ।।6.109.21।।व्यायच्छमानंतंदृष्टवासत्वरमरावणंरणे ।प्रहसन्निवकाकुत्स्थसन्दधेनिशितान्शरान् ।।6.109.22।।स मुमो च ततोबाणान्शतशोऽथसहस्रशः ।
तब दशग्रीव ने निर्बन्ध अन्तःकरण से, बिना किसी रोक-टोक के, अपने बाण छोड़ने आरम्भ किए।
Verse 22
मुमोच ह दशग्रीवोनिःसङ्गेनान्तरात्मना ।।6.109.21।।व्यायच्छमानंतंदृष्टवासत्वरमरावणंरणे ।प्रहसन्निवकाकुत्स्थसन्दधेनिशितान्शरान् ।।6.109.22।।स मुमो च ततोबाणान्शतशोऽथसहस्रशः ।
रण में रावण को शीघ्रता से आगे बढ़ते देख काकुत्स्थ मानो मंद मुस्कान के साथ तीक्ष्ण बाणों को धनुष पर चढ़ाकर फिर सैकड़ों और सहस्रों की संख्या में छोड़ने लगे।
Verse 23
तान् दृष्टवारावणश्चक्रेस्वशरैःखंनिरन्तरम् ।।6.109.23।।ततस्थाभ्यांप्रमुक्तेनशरवर्षेणभास्वता ।शरबद्धमिवाभातिद्वितीयंभास्वदम्भरम् ।।6.109.24।।
उन बाणों को देखकर रावण ने भी प्रत्युत्तर में अपने बाणों से आकाश को निरन्तर भर दिया।
Verse 24
तान् दृष्टवारावणश्चक्रेस्वशरैःखंनिरन्तरम् ।।6.109.23।।ततस्थाभ्यांप्रमुक्तेनशरवर्षेणभास्वता ।शरबद्धमिवाभातिद्वितीयंभास्वदम्भरम् ।।6.109.24।।
उन दोनों से छोड़ी गई दीप्तिमान बाण-वृष्टि से आकाश बाणों के जाल से बँधा हुआ-सा दीख पड़ा—मानो दूसरा उज्ज्वल गगन हो।
Verse 25
नानिमित्तोऽभवद्भाणोनानिर्भेत्ता न निष्फलः ।अन्योन्यमभिसम्हत्यनिपेतुर्धरणीतले ।।6.109.25।।तथाविसृजतोर्भाणान् रामरावणयोर्मृथे ।
न कोई बाण लक्ष्य से चूका, न कोई भेदन-शक्ति से रहित था, न कोई निष्फल गया। वे परस्पर टकराकर धरती पर गिरते थे—ऐसा था रण में राम और रावण का शस्त्र-विनिमय।
Verse 26
प्रायुध्येतामविच्छिन्नमस्यन्तौसव्यदक्षिणम् ।।6.109.26।।चक्रतुश्चशरैर्घोरैर्निरुच्छवासमिवाम्बरम् ।
वे बिना रुके युद्ध करते रहे, बाएँ-दाएँ से बाण छोड़ते रहे; भयानक बाणों से उन्होंने आकाश को मानो निःश्वास-रहित कर दिया, कहीं भी खाली स्थान न रहा।
Verse 27
रावणस्यहयान्रामोहयान्रामस्यरावणः ।।6.109.27।।जघ्नतुस्तौतदान्योन्यंकृतानुकृतकारिणौ ।
राम ने रावण के घोड़ों को मार गिराया और रावण ने राम के घोड़ों को—दोनों एक-दूसरे के प्रहार का वैसा ही प्रत्युत्तर देने वाले थे।
Verse 28
एवंतुतौसुसङ्क्रुद्धौचक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ।।6.109.28।।मुहूर्तमभवद्युद्धंतुमुलंरोमहर्षणम् ।
इस प्रकार वे दोनों अत्यन्त क्रुद्ध होकर परस्पर भिड़े और उत्तम द्वन्द्व-युद्ध करने लगे। कुछ समय तक वह संग्राम घोर कोलाहलपूर्ण और रोमांचकारी रहा॥
Verse 29
तीक्ष्ण बाणों से युद्ध करते हुए बलवान् रावण और लक्ष्मण के अग्रज (श्रीराम) के संग्राम में, जब राक्षसाधिपति का ध्वज-दण्ड गिर पड़ा, तब वह रघुकुल-शिरोमणि श्रीराम पर अत्यन्त क्रोधित हो उठा॥
The pivotal action is symbolic and strategic: Rama targets and severs Ravana’s dhvaja/ketu (battle standard). This is not mere spectacle; it functions as a controlled, morale-breaking strike that provokes Ravana’s rage while marking a visible turning of prestige within the dharmic framework of decisive combat.
The chapter teaches that righteous resolve must govern wrath: Rama’s anger is depicted as disciplined and purposive (aimed action), whereas Ravana’s response expands into excessive, māyā-driven saturation violence. The contrast frames victory as the product of steadied mind and proportionate force rather than uncontrolled fury.
No new geographic landmark is foregrounded; the ‘landmark’ is martial-cultural: chariot warfare (dvairatha-yuddha), the battlefield standard (dhvaja/ketu) as a sign of sovereignty, and the epic convention of armies pausing to witness a decisive duel.
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