Ramayana Yuddha Kanda Sarga 105
Yuddha KandaSarga 10531 Verses

Sarga 105

रावणक्रोधः—रामस्य परुषवाक्यम् (Ravana’s Fury and Rama’s Harsh Admonition)

युद्धकाण्ड

इस सर्ग में द्वंद्वयुद्ध का एक मानसिक मोड़ दिखता है। काकुत्स्थ के बाणों से पीड़ित रणगर्वी रावण प्रचंड क्रोध में भरकर घने बाण-वर्षा से क्षणभर रणभूमि को अँधेरा कर देता है। पर राम अचल पर्वत-से अविचल रहते हैं; बाण-जाल को काटते हुए सूर्य-किरणों की तरह उस वर्षा को सह लेते हैं। राम के शरीर पर रक्त-चिह्न उभरते हैं तो वे पराजय नहीं, बल्कि खिले हुए किंशुक-वृक्ष की भाँति धैर्य और सहनशीलता का संकेत बनते हैं। फिर राम का रोष धर्म-न्याय के रूप में प्रकट होता है। वे रावण को ‘सच्चा वीर’ मानने से इंकार करते हैं, क्योंकि उसने असहाय सीता का चोर की तरह अपहरण किया—यह मर्यादा और स्वीकृत आचरण के विरुद्ध है। राम का वचन आगे चलकर युद्ध-भविष्यवाणी बन जाता है—कटे हुए सिर, गिद्ध, फटे हुए अंतड़ियों की छवि—जो मनोयुद्ध भी है और अधर्म पर निर्णय भी। राम का पराक्रम मानो दुगुना हो उठता है; आत्म-ज्ञान और शुभ-निमित्तों से अस्त्र उन्हें स्वतः उपलब्ध होते प्रतीत होते हैं, और वे आक्रमण तीव्र कर देते हैं। राम के बाण-वर्षा और वानरों की शिला-वृष्टि के संयुक्त दबाव में रावण मानसिक रूप से भ्रमित हो जाता है, ठीक से प्रत्युत्तर नहीं दे पाता; तब उसका सारथि उसे रणभूमि से हटा ले जाता है—उत्साह और कर्तृत्व का अस्थायी पतन सूचित होता है।

Shlokas

Verse 1

स तेनतुतदाक्रोधात्काकुत्स्थेनार्दितोरणे ।रावणस्समरश्लाघिमहाक्रोधामुपागमत् ।।।।

तब रण में क्रोध से उद्दीप्त काकुत्स्थ राम द्वारा आहत, युद्ध-पराक्रम का गर्व करने वाला रावण महान् क्रोध में डूब गया।

Verse 2

स दीप्तनयनोरोषाच्चापमायाम्यवीर्यवान् ।अभ्यर्दयत्सुसङ्कृद्धोराघवंपरमाहवे ।।।।बाणधारसहस्रैस्तैस्सतोयदइवाम्बरात् ।राघवंरावणोबाणैस्तटकमिवपूरयन् ।।।।

तब क्रोध से दीप्त नेत्रों वाला पराक्रमी रावण धनुष खींचकर, उस परम संग्राम में अत्यन्त क्रुद्ध होकर राघव पर टूट पड़ा। वह आकाश से जलधारा-सी बरसती सहस्रों बाण-वृष्टि से, मानो वर्षा से तालाब भरता हो, वैसे ही राम के चारों ओर बाणों से भरने लगा।

Verse 3

स दीप्तनयनोरोषाच्चापमायाम्यवीर्यवान् ।अभ्यर्दयत्सुसङ्कृद्धोराघवंपरमाहवे ।।6.105.2।।बाणधारसहस्रैस्तैस्सतोयदइवाम्बरात् ।राघवंरावणोबाणैस्तटकमिवपूरयन् ।।6.105.3।।

तब रावण ने आकाश से वर्षा-मेघों की जलधाराओं के समान, बाणों की सहस्र धाराएँ बरसाकर राघव के चारों ओर का आकाश-प्रदेश शरों से भर दिया—मानो जल से तालाब भर रहा हो।

Verse 4

पूरितःशरजालेनधनुर्मुक्तेनसम्युगे ।महागिरिरिवाकम्प्यःकाकुत्स्थो न प्रकम्पते ।।।।

युद्ध में धनुष से छोड़े गए बाणों के जाल से ढँक जाने पर भी काकुत्स्थ नहीं डिगे; वे महान पर्वत की भाँति अचल रहे।

Verse 5

स शरैश्शरजालानिवारयन् समरेस्थितः ।गभस्तीनिवसूर्यस्यप्रतिजग्राहवीर्यवान् ।।।।

वह वीर्यवान् योद्धा रण में अडिग खड़ा, अपने बाणों से उन बाण-जालों को रोकता रहा और उन्हें सूर्य की किरणों की भाँति सहता रहा।

Verse 6

ततश्शरसहस्राणिक्षिप्रहस्तोनिशाचरः ।निजघानोरसिक्रुद्धोराघवस्यमहात्मनः ।।।।

तब शीघ्र-हस्त निशाचर क्रोध से भरकर महात्मा राघव के वक्षस्थल पर सहस्रों बाणों से प्रहार करने लगा।

Verse 7

स शोणितसमादिग्धस्समरेलक्ष्मणाग्रजः ।दृष्टःफुल्लइवारण्येसुमहान् किंशुकद्रुमः ।।।।

उस संग्राम में रक्त से लथपथ लक्ष्मण के अग्रज ऐसे दीख पड़े, मानो वन में पूर्ण पुष्पित विशाल किंशुक-वृक्ष हो।

Verse 8

शराभिघातसम्रब्दःसोऽभिजग्राहसायकान् ।काकुत्स्थ: सुमहातेजायुगान्तादित्यतेजसः ।।।।

बाणों के आघात से क्रुद्ध होकर सुमहातेजस्वी काकुत्स्थ ने युगान्त-सूर्य के समान दहकते अपने बाणों को उठा लिया।

Verse 9

ततोऽन्योन्यंसुसम्रब्धौतावुभौरामरावणौ ।शरान्धकारेसमरेनोपलक्ष्यतांतदा ।।।।

फिर युद्ध में बाणों के अन्धकार छा जाने पर अत्यन्त उग्र राम और रावण उस समय एक-दूसरे को देख न सके।

Verse 10

ततःक्रोधसमाविष्टोरामोदशरथात्मजः ।उवाचरावणंवीरःप्रहस्यपरुषंवचः ।।।।

तब क्रोध से आविष्ट दशरथनन्दन वीर राम हँसकर रावण से कठोर वचन बोले।

Verse 11

ममभार्याजनस्थानादज्ञानाद्राक्षसाधम ।हृतातेविवशायस्मात्तस्मात्त्वंनासिवीर्यवान् ।।।।

अधम राक्षस! जनस्थान से मेरी पत्नी को, जो विवश और अनजान थी, तूने हर लिया; इसलिए तू वास्तव में वीर कहलाने योग्य नहीं है।

Verse 12

मयाविरहितांदीनांवर्तमानांमहावने ।वैदेहींप्रसभंहृत्वाशूरोऽहमितिमन्यसे ।।।।

मुझसे बिछुड़ी, दीन होकर महावन में रहने वाली वैदेही को बलपूर्वक हरकर क्या तू यह मानता है कि ‘मैं शूरवीर हूँ’?

Verse 13

स्त्रीषुशूरविनाथासुपरदाराभिमर्शक ।कृत्वाकापुरुषंकर्मशूरोऽहमितिमन्यसे ।।।।

रक्षक-विहीन स्त्रियों पर धावा बोलने वाले, पर-स्त्री का स्पर्श करने वाले! कायरों जैसा कर्म करके भी तू ‘मैं शूर हूँ’ ऐसा मानता है?

Verse 14

भिन्नमर्यादनिर्लज्ज चारित्रेष्वनवस्थित ।दर्पान्मृत्युमुपादायशूरोऽहमितिमन्यसे ।।।।

मर्यादा-भंग करने वाले, निर्लज्ज, सदाचार में अस्थिर! अहंकार से मृत्यु की ओर बढ़कर भी तू ‘मैं शूर हूँ’ ऐसा मानता है?

Verse 15

शूरेणधनदभ्रात्राबलैःसमुदितेन च ।श्लाघनीयंमहत्कर्मयशस्यं च कृतंत्वया ।।।।

धनद (कुबेर) के शूरवीर भ्राता, बल और सामर्थ्य से सम्पन्न तूने निश्चय ही प्रशंसनीय, महान और यश देने वाला कर्म किया है।

Verse 16

उत्सेकानाभिपन्नस्यगर्हितस्याहितस्य च ।कर्मणःप्राप्नुहीदानांतस्याद्यसुमहत्फलम् ।।।।

अहंकार से अभिभूत होकर तूने निंदनीय और अहितकारी कर्म किया है; अब आज ही उस कर्म का अत्यन्त महान फल भोग।

Verse 17

शूरोऽहमितिचात्मानमवगच्छसिदुर्मते ।नैवलज्जास्तितेसीतांचौरवद्वृपकर्षतः ।।।।

दुर्बुद्धि! तू अपने को शूरवीर समझता है; पर जब तूने चोर की भाँति सीता को बलपूर्वक घसीटकर हर लिया, तब तुझे तनिक भी लज्जा न हुई।

Verse 18

यदिमत्सन्निधौसीताधर्षितास्यात्त्वयाबलात् ।भ्रातरंतुखरंपश्येस्तदामत्सायकैर्हतः ।।।।

यदि मेरी ही उपस्थिति में तूने सीता का बलपूर्वक अपमान किया होता, तो मेरे बाणों से मारा जाकर तू अपने भाई खर के पास जा पहुँचता।

Verse 19

दिष्ट्यासिममदुष्टात्मश्चक्षुर्विषयमागतः ।अद्यत्वांसायकैस्तीक्ष्णैर्नयामियमसादनम् ।।।।

सौभाग्य से, दुष्टात्मा, तू मेरी दृष्टि के सामने आ गया है; आज मैं अपने तीक्ष्ण बाणों से तुझे यमलोक भेज दूँगा।

Verse 20

अद्यतेमच्छरैश्चिन्नंशिरोज्वलितकुण्डलम् ।क्रव्यादाव्यपकर्षन्तुविकीर्णंरणपांसुषु ।।।।

आज मेरे बाणों से कटा हुआ तुम्हारा ज्वलित कुण्डलों से युक्त सिर रण की धूल में बिखर जाए; मांसभक्षी जीव उसे घसीटकर ले जाएँ।

Verse 21

निपत्योरसिगृध्रास्तेक्षितौक्षिप्तस्यरावण ।पिबन्तुरुधिरंतर्षाद्बाणशल्यान्तरोत्थितम् ।।।।

हे रावण, जब तू भूमि पर गिराकर पटक दिया जाएगा, तब गिद्ध तेरे वक्ष पर उतरें और बाणों के घावों से उफनते रक्त को प्यास से पी जाएँ।

Verse 22

अद्यमद्बाणभिन्नस्यगतासोःपतितस्यते ।कर्षन्त्वन्त्राणिपतगागरुत्मन्तइवोरगान् ।।।।

आज मेरे बाणों से विदीर्ण होकर निर्जीव पड़े हुए तेरे शरीर की आँतें पक्षी खींच निकालें—जैसे गरुड़ सर्पों को चीरकर खींच लेता है।

Verse 23

इत्येवं स वदन्वीरोरामश्शत्रुनिबर्हणः ।राक्षसेन्द्रंसमीपस्थंशरवर्षैरवाकिरत् ।।।।

ऐसा कहकर शत्रुओं का संहारक वीर राम ने पास खड़े राक्षसराज पर बाणों की वर्षा कर दी।

Verse 24

बभूवद्विगुणंवीर्यंबलंहर्षश्चसंयुगे ।रामस्यास्त्रबलंचैवशत्रोर्निधनकाङ्क्षिणः ।।।।

रण में शत्रु-वध की आकांक्षा रखने वाले राम का पराक्रम, बल और हर्ष—और साथ ही अस्त्रों की शक्ति—दुगुनी हो गई।

Verse 25

प्रादुर्भभूवुरस्त्राणिसर्वाणिविदितात्मनः ।प्रहर्षाच्चमहातेजाश्शीघ्रहस्ततरोऽभवत् ।।।।

आत्मज्ञ श्रीराम के लिए समस्त अस्त्र स्वयं प्रकट हो उठे। हर्ष से वह महातेजस्वी वीर और भी अधिक शीघ्र-हस्त हो गया॥

Verse 26

शुभान्येतानिचिह्नानिविज्ञायात्मगतानिसः ।भूयएवार्दयद्रामोरावणंराक्षसान्तकृत् ।।।।

अपने भीतर उत्पन्न हुए इन शुभ लक्षणों को जानकर, राक्षसों के संहारक राम ने रावण पर फिर से और भी अधिक प्रहार किया॥

Verse 27

हरीणांचाश्मनिकरैश्शरवर्षाच्चराघवात् ।हन्यमानोदशग्रीवोविघूर्णहृदयोऽभवत् ।।।।

वानरों के पत्थरों की वर्षा और राघव के बाण-वर्ष से आहत होकर दशग्रीव रावण का हृदय व्याकुल हो उठा॥

Verse 28

यदा च शस्त्रंनारेभे न चकर्षशरासनम् ।नास्यप्रत्यकरोवदीर्यंविक्लबेनान्तरात्मना ।।।।

तब भीतर से विचलित मन वाला वह न तो शस्त्र चला सका, न धनुष खींच सका। उसका पराक्रम भी साथ न दे सका; वह राम के तेज को सह न पाया॥

Verse 29

क्षिप्ताःश्चाशुशरास्तेनशस्त्राणिविविधानि च ।मरणार्थायवर्तन्तेमृत्युकालोऽभ्यवर्तत ।।।।

उसके द्वारा शीघ्र फेंके गए बाण और विविध शस्त्र सब निष्फल हो गए; क्योंकि वे मृत्यु के हेतु बन गए थे, और मृत्यु का नियत समय निकट आ पहुँचा था॥

Verse 30

सूतस्तुरथनेतास्यतदवस्थंनिरीक्ष्यतम् ।शनैर्युद्धासम्भ्रान्तोरथंतस्यापवाहयत् ।।।।

उसे उस अवस्था में देखकर उसका सारथि—युद्ध से घबराया हुआ—धीरे-धीरे उसका रथ रणभूमि से पीछे हटा ले गया।

Verse 31

रथं च तस्याथजवेनसाथिर्निवार्यभीमंजलदस्वनंतदा ।जगामभीत्यासमरान्महीपतिंनिरस्तवीर्यंपतितंसमीक्ष्य ।।।।

तब सारथि ने वेग से उस भयानक, मेघ-गर्जन-सा शब्द करने वाले रथ को संभालकर, राजा को गिरा हुआ और जिसका पराक्रम क्षीण हो चुका था—ऐसा देखकर—भय से रणभूमि से भागकर चला गया।

Frequently Asked Questions

The pivotal ethical claim is Rāma’s denial of Rāvaṇa’s ‘heroism’: abducting Sītā when she was helpless and separated is framed as theft-like coercion, violating maryādā and disqualifying the act from kṣātra valor.

Power and skill in war are not sufficient for legitimacy; conduct determines moral status. Pride (darpā/utseka) and predatory action generate their own consequences, while steadiness and self-knowledge are portrayed as force-multipliers for righteous action.

No named locale within Laṅkā is foregrounded; instead, the Sarga emphasizes battlefield culture—chariot warfare, astras, omen-language (auspicious signs), and funerary imagery (vultures, Yama’s abode) as markers of epic martial ethos.

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