
त्रिजटास्वप्नवर्णनम् (Trijata’s Dream-Omens and the Rakshasis’ Reversal)
सुन्दरकाण्ड
सीता के दृढ़ प्रतिवचन के बाद कुछ क्रुद्ध राक्षसियाँ रावण के पास जाकर समाचार देती हैं, और कुछ लौटकर उसे तत्काल हिंसा से डराने लगती हैं। तभी वृद्धा राक्षसी त्रिजटा बीच में पड़कर उन्हें रोकती है और एक भयानक किन्तु शुभसूचक स्वप्न सुनाकर उग्रता को शांत करती है। स्वप्न में राम और लक्ष्मण उज्ज्वल श्वेत रूप में दिव्य यानों से आते दिखते हैं—पहले हंसों से जुड़ी दंतमयी पालकी में, फिर पुष्पक विमान में। वैदेही सीता राम से पुनर्मिलित होकर महान हाथी पर आरूढ़ दिखाई देती है; चंद्र-सूर्य को स्पर्श करती-सी उसकी क्रीड़ा धर्म-व्यवस्था के पुनर्स्थापन का संकेत बनती है। फिर स्वप्न रावण के लिए अशुभ दृश्य दिखाता है—वह तेल से लिपटा, मदोन्मत्त, पुष्पक से गिरा हुआ, दक्षिण दिशा (यम-मार्ग) की ओर घसीटा जाता है; कभी वराह, कभी गधे जैसे नीच वाहनों पर बैठा, मल और अंधकार में डूबता प्रतीत होता है। यही अपशकुन कुम्भकर्ण और रावण के पुत्रों तक फैलता है; पर विभीषण अकेला श्वेत वस्त्र-आभूषणों से युक्त, चार-दंत वाले हाथी पर ऊँचा उठाया हुआ, वाद्य-घोष और मंगलध्वनि के बीच शुभ रूप में दिखता है। त्रिजटा इन निमित्तों का अर्थ बताती है—सीता का शीघ्र कल्याण, रावण का विनाश और राम की विजय; इसलिए वह राक्षसियों को क्रूरता छोड़कर क्षमा माँगने और मधुर, सान्त्वनापूर्ण वचन बोलने की सीख देती है। अध्याय के अंत में सीता के शरीर में शुभ संकेत प्रकट होते हैं—नेत्र/अंग का फड़कना, जंघा का कंपना—और एक पक्षी मधुर स्वर में बार-बार बोलकर मानो हर्ष का निमंत्रण देता है। इस प्रकार कथा बल-प्रयोग से हटकर, धर्म के निकट आते फल के दबाव में उत्तरदायित्व और प्रायश्चित्त की ओर मुड़ती है।
Verse 1
इत्युक्तास्सीतया घोरं राक्षस्यः क्रोधमूर्छिताः।काश्चिज्जग्मुस्तदाख्यातुं रावणस्य तरस्विनः।।5.27.1।।
सीता द्वारा इस प्रकार कठोर वचन कहे जाने पर वे भयानक राक्षसियाँ क्रोध से मूर्छित हो उठीं। उनमें से कुछ उस बात को शीघ्र-प्रवृत्त रावण को बताने चली गईं।
Verse 2
ततः सीतामुपागम्य राक्षस्यो घोरदर्शनाः।पुनः परुषमेकार्थमनर्थार्थमथाब्रुवन्।।5.27.2।।
तब भयानक रूप वाली राक्षसियाँ सीता के पास आकर फिर से कठोर वचन बोलीं—एक ही बात को लक्ष्य करके, अनर्थ का सूचक धमकी-भरा कथन।
Verse 3
अद्येदानीं तवानार्ये सीते पापविनिश्चये।राक्षस्यो भक्षयिष्यन्ति मांसमेतद्यथासुखम्।।5.27.3।।
अरे अनार्या सीते, पाप में दृढ़ निश्चय वाली! आज, अभी, ये राक्षसियाँ तेरे इस मांस को अपनी इच्छा से खा जाएँगी।
Verse 4
सीतां ताभिरनार्याभिर्दृष्टवा सन्तर्जितां तदा।राक्षसी त्रिजटा वृद्धा शयाना वाक्यमब्रवीत्।।5.27.4।।
तब उन अनार्य राक्षसियों द्वारा सीता को धमकाया जाता देख, वृद्धा राक्षसी त्रिजटा वहीं लेटी हुई ये वचन बोली।
Verse 5
आत्मानं खादतानार्या न सीतां भक्षयिष्यथ।जनकस्य सुतामिष्टां स्नुषां दशरथस्य च।।5.27.5।।
हे अनार्यो! यदि खाना ही है तो अपने-अपने को खा लो; पर जनक की प्रिय पुत्री और दशरथ की वधू सीता को तुम नहीं खा सकोगे।
Verse 6
स्वप्नो ह्यद्य मया दृष्टो दारुणो रोमहर्षणः।राक्षसानामभावाय भर्तुरस्या भवाय च।।5.27.6।।
आज मैंने एक भयानक, रोमांचकारी स्वप्न देखा है—जो राक्षसों के विनाश और इसके पति के कल्याण-विजय का सूचक है।
Verse 7
एवमुक्तास्त्रिजटया राक्षस्यः क्रोधमूर्छिताः। सर्वा एवाब्रुवन्भीतास्त्रिजटां तामिदं वचः।।5.27.7।।
त्रिजटा के ऐसा कहने पर वे राक्षसियाँ क्रोध से मूर्छित-सी हो उठीं; फिर भी भयभीत होकर सबने त्रिजटा से ये वचन कहे।
Verse 8
कथयस्व त्वया दृष्टः स्वप्नोऽयं कीदृशो निशि।तासां श्रुत्वा तु वचनं राक्षसीनां मुखाच्युतम्।।5.27.8।।उवच वचनं काले त्रिजटा स्वप्नसंश्रितम्।
“बताओ, तुमने रात में कैसा स्वप्न देखा?” राक्षसियों के मुख से निकले ये वचन सुनकर त्रिजटा ने उचित समय पर स्वप्न-आधारित वचन कहे।
Verse 9
गजदन्तमयीं दिव्यां शिबिकामन्तरिक्षगाम्।।5.27.9।।युक्तां हंससहस्रेण स्वयमास्थाय राघवः।शुक्लमाल्याम्बरधरो लक्ष्मणेन सहागतः।।5.27.10।।
राघव (श्रीराम) स्वयं गजदन्त-निर्मित दिव्य, आकाशगामी शिबिका पर आरूढ़ हुए, जो सहस्र हंसों से युक्त थी; श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण किए वे लक्ष्मण सहित आए।
Verse 10
गजदन्तमयीं दिव्यां शिबिकामन्तरिक्षगाम्।।5.27.9।।युक्तां हंससहस्रेण स्वयमास्थाय राघवः।शुक्लमाल्याम्बरधरो लक्ष्मणेन सहागतः।।5.27.10।।
हज़ार हंसों से युक्त पालकी पर स्वयं आरूढ़ होकर राघव आए—श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण किए हुए—और उनके साथ लक्ष्मण भी थे।
Verse 11
स्वप्ने चाद्य मया दृष्टा सीता शुक्लाम्बरावृता।सागरेण परिक्षिप्तं श्वेतं पर्वतमास्थिता।।5.27.11।।
आज स्वप्न में मैंने सीता को श्वेत वस्त्रों से आवृत देखा—वे समुद्र से परिक्षिप्त श्वेत पर्वत पर आरूढ़ थीं।
Verse 12
रामेण सङ्गता सीता भास्करेण प्रभा यथा।राघवश्च मया दृष्टश्चतुर्दष्ट्रं महागजम्।।5.27.12।।आरूढ श्शैलसङ्काशं चचार सहलक्ष्मणः।
जैसे सूर्य के साथ प्रभा संयुक्त रहती है, वैसे ही सीता राम के साथ संयुक्त थीं। मैंने राघव को भी लक्ष्मण सहित देखा—वे पर्वत-सदृश, चार दाँतों वाले महागज पर आरूढ़ होकर आगे बढ़ रहे थे।
Verse 13
ततस्तौ नरशार्दूलौ दीप्यमानौ स्वतेजसा।।5.27.13।।शुक्लमाल्याम्बरधरौ जानकीं पर्युपस्थितौ।
तब वे दोनों नर-शार्दूल, अपने तेज से दीप्त, श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण किए, जानकी के निकट उपस्थित हुए।
Verse 14
ततस्तस्य नगस्याग्रे ह्याकाशस्थस्य दन्तिनः।।5.27.14।।भर्त्रा परिगृहीतस्य जानकी स्कन्धमाश्रिता।
तब उस पर्वत के अग्रभाग में, आकाश में स्थित उस गज के—जिसे पति ने संभाल रखा था—जानकी उसके स्कंध का आश्रय लेकर बैठ गईं।
Verse 15
भर्तुरङ्कात्समुत्पत्य ततः कमललोचना।।5.27.15।।चन्द्रसूर्यौ मया दृष्टा पाणिना परिमार्जती।
तब कमल-नेत्री देवी अपने पति की गोद से उठ खड़ी हुईं और हाथ से सहलाती हुई-सी मुझे चन्द्र और सूर्य दिखाई पड़े।
Verse 16
ततस्ताभ्यां कुमाराभ्यामास्थित: स गजोत्तमः।।5.27.16।।सीतया च विशालाक्ष्या लङ्काया उपरिस्थितः।
फिर वे श्रेष्ठ गजराज, दोनों कुमारों तथा विशाल-नेत्री सीता द्वारा आरूढ़ होकर, लंका के ऊपर स्थित हो गए।
Verse 17
पाण्डुरर्षभयुक्तेन रथेनाष्टयुजा स्वयम्।।5.27.17।।इहोपयातः काकुत्स्थ स्सीतया सह भार्यया।
आठ श्वेत वृषभों से जुते रथ पर आरूढ़ होकर काकुत्स्थ स्वयं अपनी भार्या सीता के साथ यहाँ पधारे।
Verse 18
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह वीर्यवान्।।5.27.18।।आरुह्य पुष्पकं दिव्यं विमानं सूर्यसन्निभम्।उत्तरां दिशमालोक्य जगाम पुरुषोत्तमः।।5.27.19।।
पराक्रमी पुरुषोत्तम श्रीराम, भ्राता लक्ष्मण और सीता के साथ, सूर्य-सम तेजस्वी दिव्य पुष्पक-विमान पर आरूढ़ हुए और उत्तर दिशा की ओर दृष्टि करके प्रस्थान कर गए।
Verse 19
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह वीर्यवान्।।5.27.18।।आरुह्य पुष्पकं दिव्यं विमानं सूर्यसन्निभम्।उत्तरां दिशमालोक्य जगाम पुरुषोत्तमः।।5.27.19।।
पराक्रमी पुरुषोत्तम श्रीराम, भ्राता लक्ष्मण और सीता के साथ, सूर्य-सम तेजस्वी दिव्य पुष्पक-विमान पर आरूढ़ हुए और उत्तर दिशा की ओर दृष्टि करके प्रस्थान कर गए।
Verse 20
एवं स्वप्ने मया दृष्टो रामो विष्णुपराक्रमः।लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह राघवः।।5.27.20।।
इस प्रकार स्वप्न में मैंने राघव श्रीराम को—विष्णु के समान पराक्रमी—भ्राता लक्ष्मण और सीता के साथ देखा।
Verse 21
न हि रामो महातेजाश्शक्यो जेतुं सुरासुरैः।राक्षसैर्वापि चान्यैर्वा स्वर्गः पापजनैरिव।।5.27.21।।
महातेजस्वी श्रीराम को देव-दानव भी, न राक्षस और न कोई अन्य जीत सकता है; जैसे पापियों को स्वर्ग प्राप्त नहीं होता।
Verse 22
रावणश्च मया दृष्टः क्षितौ तैलसमुक्षितः।रक्तवासाः पिबन्मत्तः करवीरकृतस्रजः।।5.27.22।।
मैंने रावण को भूमि पर तेल से लिपटा हुआ देखा—लाल वस्त्र धारण किए, मदिरापान से मतवाला, और करवीर-फूलों की माला पहने हुए।
Verse 23
विमानात्पुष्पकादद्य रावणः पतितो भुवि।कृष्यमाणः स्त्रिया दृष्टो मुण्डः कृष्णाम्बरः पुनः।।5.27.23।।
फिर आज मैंने रावण को पुष्पक विमान से पृथ्वी पर गिरा हुआ देखा—एक स्त्री द्वारा घसीटा जाता, मुंडा हुआ सिर, और काले वस्त्र पहने हुए।
Verse 24
रथेन खरयुक्तेन रक्तमाल्यानुलेपनः।पिपंस्तैलं हसन्नृत्यन् भ्रान्तचित्ताकुलेन्द्रियः।।5.27.24।।
वह गधों से जुते रथ पर था, लाल मालाओं और लेप से सुसज्जित। तेल पीता, हँसता और नाचता हुआ—चित्त से भ्रमित और इन्द्रियों से व्याकुल था।
Verse 25
गर्दभेन ययौ शीघ्रं दक्षिणां दिशमास्थितः।पुनरेव मया दृष्टो रावणो राक्षसेश्वरः।।5.27.25।।पतितोऽ वाक्चिरा रा भूमौ गर्दभाद्भयमोहितः।
फिर मैंने राक्षसों के स्वामी रावण को देखा—वह गधे पर चढ़कर शीघ्र दक्षिण दिशा की ओर गया। और उसी गधे के भय से मोहित होकर वह सिर झुकाए भूमि पर गिर पड़ा।
Verse 26
सहसोत्थाय संभ्रान्तो भयार्तो मदविह्वलः।।5.27.26।।उन्मत्त इव दिग्वासा दुर्वाक्यं प्रलपन्बहु।दुर्गन्धं दुस्सहं घोरं तिमिरं नरकोपमम्।।5.27.27।।मलपङ्कं प्रविश्याशु मग्नस्तत्र स रावणः।
रावण सहसा उठ खड़ा हुआ—घबराया, भय से पीड़ित और मद से व्याकुल। उन्मत्त के समान दिगम्बर होकर बहुत-से कटुवचन बकता रहा। फिर दुर्गन्धयुक्त, असह्य, भयानक, नरक-तुल्य अन्धकार में दौड़कर वह मल-पंक में घुस गया और वहीं धँस गया।
Verse 27
सहसोत्थाय संभ्रान्तो भयार्तो मदविह्वलः।।5.27.26।।उन्मत्त इव दिग्वासा दुर्वाक्यं प्रलपन्बहु।दुर्गन्धं दुस्सहं घोरं तिमिरं नरकोपमम्।।5.27.27।।मलपङ्कं प्रविश्याशु मग्नस्तत्र स रावणः।
रावण सहसा उठ खड़ा हुआ—घबराया, भय से पीड़ित और मद से व्याकुल। उन्मत्त के समान दिगम्बर होकर बहुत-से कटुवचन बकता रहा। फिर दुर्गन्धयुक्त, असह्य, भयानक, नरक-तुल्य अन्धकार में दौड़कर वह मल-पंक में घुस गया और वहीं धँस गया।
Verse 28
कण्ठे बद्ध्वा दशग्रीवं प्रमदा रक्तवासिनी।।5.27.28।। काली कर्दमलिप्ताङ्गी दिशं याम्यां प्रकर्षति।
लाल वस्त्र धारण किए एक स्त्री—श्यामवर्णा, कीचड़ से लिप्त अंगों वाली—दशग्रीव को गले से बाँधकर यम की दक्षिण दिशा की ओर घसीट रही थी।
Verse 29
एवं तत्र मया दृष्टः कुम्भकर्णो निशाचरः।।5.27.29।।रावणस्य सुतास्सर्वे दृष्टास्तैलसमुक्षिताः।
उसी प्रकार वहाँ मैंने निशाचर कुम्भकर्ण को देखा; और रावण के सभी पुत्रों को भी देखा—उनके शरीर तेल से लिप्त थे।
Verse 30
वराहेण दशग्रीवश्शिंशुमारेण चेन्द्रजित्।।5.27.30।।उष्ट्रेण कुम्भकर्णश्च प्रयाता दक्षिणां दिशम्।
दशग्रीव (रावण) वराह पर आरूढ़ हुआ, इन्द्रजित् शिंशुमार पर, और कुम्भकर्ण ऊँट पर—वे सब दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान कर गए।
Verse 31
एकस्तत्र मया दृष्टः श्वेतच्छत्रो विभीषणः।।5.27.31।।शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः।
वहाँ मैंने विभीषण को अकेला देखा—श्वेत छत्र की छाया में; वह श्वेत माला और वस्त्र धारण किए था, तथा श्वेत चन्दन-लेप से सुशोभित था।
Verse 32
शङ्खदुन्धुभिनिर्घोषैर्नृत्तगीतैरलङ्कृतः।।5.27.32।।आरुह्य शैलसङ्काशं मेघस्तनितनिस्स्वनम्।चतुर्दन्तं गजं दिव्यमास्ते तत्र विभीषणः।।5.27.33।।चतुर्भिस्सचिवैः सार्थं वैहायसमुपस्थितः।
वह शंख और दुन्दुभि के घोष से सत्कृत हुआ, तथा नृत्य-गीतों द्वारा अलंकृत (सम्मानित) किया गया।
Verse 33
शङ्खदुन्धुभिनिर्घोषैर्नृत्तगीतैरलङ्कृतः।।5.27.32।।आरुह्य शैलसङ्काशं मेघस्तनितनिस्स्वनम्।चतुर्दन्तं गजं दिव्यमास्ते तत्र विभीषणः।।5.27.33।।चतुर्भिस्सचिवैः सार्थं वैहायसमुपस्थितः।
पर्वत-सम विशाल, मेघ-गर्जन-सा निनाद करने वाले दिव्य चतुर्दन्त गज पर आरूढ़ होकर विभीषण चार मंत्रियों सहित वहाँ उपस्थित हुआ और आकाश में उठ चला।
Verse 34
समाजश्च मया दृष्टो गीतवादित्रनिःस्वनः।।5.27.34।। पिबतां रक्तमाल्यानां रक्षसां रक्तवाससाम्।
मैंने गीत और वाद्यों के कोलाहल से गूँजती राक्षसों की भीड़ देखी—जो लाल मालाएँ और लाल वस्त्र धारण किए हुए पी रहे थे।
Verse 35
लङ्का चेयं पुरी रम्या सवाजिरथकुञ्जराः।।5.27.35।।सागरे पतिता दृष्टा भग्नगोपुरतोरणा।
घोड़ों, रथों और हाथियों से समृद्ध यह रमणीय लंका-नगरी मैंने समुद्र में गिरी हुई देखी, जिसके गोपुर और तोरण टूटे पड़े थे।
Verse 36
लङ्का दृष्टा मया स्वप्ने रावणेनाभिरक्षिता।।5.27.36।। दग्धा रामस्य दूतेन वानरेण तरस्विना।
स्वप्न में मैंने लंका को देखा—रावण द्वारा रक्षित होते हुए भी—राम के दूत, पराक्रमी वानर द्वारा जलाई हुई।
Verse 37
पीत्वा तैलं प्रनृत्ताश्च प्रहसन्त्यो महास्वनाः।।5.27.37।। लङ्कायां भस्मरूक्षायां सर्वा राक्षसस्त्रियः।
लंका में सब राक्षसी-स्त्रियाँ—भस्म-सी रूखी हो चुकी—तेल पीकर ऊँचे स्वर से हँसती, चिल्लाती और नाचती हुई दिखाई दीं।
Verse 39
अपगच्छत नश्यध्वं सीतामाप्नोति राघवः।।5.27.39।।घातयेत्परमामर्षी युष्मान्सार्थं हि राक्षसैः।
तुम लोग तुरंत हट जाओ, नहीं तो नष्ट हो जाओगे। राघव अवश्य सीता को प्राप्त करेंगे; और परम क्रोध में वे राक्षसों सहित तुम सबका संहार कर देंगे।
Verse 40
प्रियां बहुमतां भार्यां वनवासमनुव्रताम्।।5.27.40।।भर्त्सितां तर्जितां वापि नानुमंस्यति राघवः।
अपनी प्रिय, अत्यन्त सम्मानित पत्नी—जो वनवास में भी उनके साथ रही—उसका अपमान या धमकी भी राघव सहन नहीं करेंगे।
Verse 41
तदलं क्रूरवाक्यैश्च सान्त्वमेवाभिधीयताम्।।5.27.41।।अभियाचाम वैदेहीमेतद्धि मम रोचते।
अब क्रूर वचनों का बस; केवल सांत्वनापूर्ण वचन कहे जाएँ। वैदेही से क्षमा याचना करें—मुझे यही उपाय उचित लगता है।
Verse 42
यस्यामेवंविधः स्वप्नो दुःखितायां प्रदृश्यते।।5.27.42।।सा दुःखैर्विविधैर्मुक्ता प्रियं प्राप्नोत्यनुत्तमम्।
जो स्त्री दुःख में हो और उसे ऐसा स्वप्न दिखाई दे, वह अनेक प्रकार के दुःखों से मुक्त होकर परम उत्तम प्रिय सुख को प्राप्त करती है।
Verse 43
भर्त्सितामपि याचध्वं राक्षस्यः किं विवक्षया।।5.27.43।।राघवाद्धि भयं घोरं राक्षसानामुपस्थितम्।
हे राक्षसियों, चाहे तुमने उसे डाँटा हो, अब उससे याचना करो—हिचक किस बात की? क्योंकि राघव से राक्षसों पर भयंकर भय आ पड़ा है।
Verse 44
प्रणिपातप्रसन्ना हि मैथिली जनकात्मजा।।5.27.44।।अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात्।
मैथिली जनकनन्दिनी प्रणाम से प्रसन्न हो जाती हैं; हे राक्षसियो, यह तुम्हें महान् भय से भी बचाने में समर्थ हैं।
Verse 45
अपि चास्या विशालाक्ष्या न किंचिदुपलक्षये।।5.27.45।।विरूपमपि चाङ्गेषु सुसूक्ष्ममपि लक्षणम्।
और इस विशालनेत्री में मैं कोई भी अशुभ चिह्न नहीं देखता; उसके अंगों में विकृति का, या अत्यन्त सूक्ष्म भी, कोई अपलक्षण नहीं है।
Verse 46
छायावैगुण्यमात्रं तु शङ्के दुःखमुपस्थितम्।।5.27.46।। अदुःखार्हामिमां देवीं वैहायसमुपस्थिताम्।
मुझे केवल कान्ति में थोड़ा-सा क्षय दिखता है; इससे प्रतीत होता है कि दुःख आ पहुँचा है—यह देवी तो दुःख के योग्य नहीं, फिर भी क्लेश से उसका वर्ण म्लान हो गया है।
Verse 47
अर्थसिद्धिं तु वैदेह्याः पश्याम्यहमुपस्थिताम्।।5.27.47।।राक्षसेन्द्रविनाशं च विजयं राघवस्य च।
मैं वैदेही के प्रयोजन की सिद्धि निकट देखता हूँ; और राक्षसेन्द्र का विनाश तथा राघव की विजय भी स्पष्ट देखता हूँ।
Verse 48
निमित्तभूतमेतत्तु श्रोतुमस्या महत्प्रियम्।।5.27.48।।दृश्यते च स्फुरच्चक्षुः पद्मपत्रमिवायतम्।
यह तो इस बात का शुभ निमित्त है कि वह महान् प्रिय समाचार सुनेगी; और उसका नेत्र—कमल-पत्र के समान दीर्घ—स्फुरित होता दिखाई देता है।
Verse 49
ईषच्छ हृषितो वास्या दक्षिणाया ह्यदक्षिणः।।5.27.49।।अकस्मादेव वैदेह्या बाहुरेकः प्रकम्पते।
मानो किंचित् प्रसन्न हुई वैदेही का बायाँ भुजदण्ड—यद्यपि वह सौभाग्यवती है—अकस्मात् ही काँप उठता है।
Verse 50
करेणुहस्तप्रतिम स्सव्यश्चोरुरनुत्तमः।।5.27.50।।वेपमानः सूचयति राघवं पुरतः स्थितम्।
हथिनी की सूँड़ के समान उसकी उत्तम बायीं जाँघ काँपती हुई मानो सामने खड़े राघव (राम) का संकेत कर रही हो।
Verse 51
पक्षी च शाखानिलयं प्रविष्टःपुनः पुनश्चोत्तमसान्त्ववादी।सुस्वागतां वाचमुदीरयानः पुनःपुनश्चोदयतीव हृष्टः।।5.27.51।।
और एक पक्षी शाखाओं के पर्णमय आश्रय में बार-बार प्रवेश कर, उत्तम सांत्वनापूर्ण स्वर में ‘सुस्वागतम्’ कहता हुआ, हर्षित होकर मानो उसे बार-बार धैर्य बँधाता है।
The rākṣasīs face a dharma-crisis: whether to execute coercive violence against a captive (Sītā) or restrain themselves. Trijaṭā’s intervention redirects them from cruelty to conciliation and seeking pardon, framing violence as self-destructive under approaching moral consequence.
Nimitta (omens) functions as ethical cognition: signs are meaningful when they prompt right action—restraint, accountability, and alignment with dharma. Even antagonists are urged to choose repentance over escalation when confronted with the inevitability of just outcomes.
Laṅkā and the sāgara (ocean) appear as key spatial markers; the southern direction (Yama-dik) operates as a cultural map of inauspicious destiny. Iconic objects—Puṣpaka vimāna, ivory palanquin, four-tusked elephant, conches and drums—encode royal legitimacy and its reversal.
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