
Cosmic Time, Cycles of Creation and Dissolution, and the Varāha Uplift of Earth
भीष्म पूछते हैं कि निर्गुण ब्रह्म को सृष्टि का कर्ता कैसे कहा जा सकता है। पुलस्त्य बताते हैं कि परमात्मा की अचिन्त्य शक्तियों के कारण वही सगुण रूप धारण कर सृष्टि, स्थिति और संहार का विधान करता है। फिर अध्याय पवित्र काल-गणना को क्रम से रखता है—निमेष से वर्ष तक, सन्ध्या-सन्ध्यांश सहित चारों युग, मन्वन्तर, तथा ब्रह्मा के दिन-रात्रि; और इसी के साथ नैमित्तिक प्रलय के आवर्तन का संकेत देता है। इसके बाद वराह-प्रसंग आता है: प्रलय-जल में डूबी पृथ्वी स्तुति करती है, तब विष्णु यज्ञ-पुरुष और सर्वव्यापी रूप में प्रकट होकर वराह बनते हैं और अपने दाँत पर पृथ्वी को उठाकर स्थिर करते हैं। आगे अनेक सर्गों का वर्गीकरण (प्राकृत, वैक्रत, कौमार), ब्रह्मा की सृष्टियाँ, वेद-यज्ञरूपों की उत्पत्ति, वर्णों की उत्पत्ति, कर्मानुसार पुनर्जन्म-चक्र, तथा रुद्र की उत्पत्ति और नामकरण सहित वंश-विस्तार का वर्णन किया गया है।
Verse 1
भीष्म उवाच । निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याथ महात्मनः । कथं सर्गादिकर्त्तृत्वं ब्रह्मणो ह्युपपद्यते
भीष्म बोले—जो निर्गुण, अप्रमेय, शुद्ध और महात्मा ब्रह्म है, उसमें सृष्टि आदि का कर्तृत्व कैसे युक्तिसंगत माना जाए?
Verse 2
पुलस्त्य उवाच । शक्तयः सर्वभावानामचिंत्या ज्ञानगोचराः । यत्ततो ब्रह्मणस्तास्तुसर्गाद्या भावशक्तयः
पुलस्त्य बोले—समस्त भावों की शक्तियाँ अचिन्त्य हैं, पर ज्ञान के द्वारा ग्राह्य हैं; उसी परम ब्रह्म से वे शक्तियाँ—सृष्टि आदि रूप भाव-शक्तियाँ—प्रकट होती हैं।
Verse 3
उत्पन्नः प्रोच्यते विद्वान्नित्य एवोपचारतः । निजेन तस्य मानेन आयुर्वर्षशतं स्मृतम्
विद्वान उसे ‘उत्पन्न’ केवल उपचार से कहते हैं; वास्तव में वह नित्य ही है। उसके अपने मान से उसकी आयु सौ वर्ष स्मरण की गई है।
Verse 4
तत्पराख्यं परार्द्धं च तदर्द्धं परिकीर्त्तितम् । काष्ठा पंचदशाख्या ता निमेषा नृपसत्तम
वह मान ‘तत्पर’ कहलाता है, और उसे ‘परार्ध’ भी कहा गया है; उसका आधा भी उसी प्रकार प्रसिद्ध है। हे नृपश्रेष्ठ, पंद्रह काष्ठाएँ मिलकर एक निमेष होती हैं।
Verse 5
काष्ठा स्त्रिंशत्कला त्रिंशत्कला मौहूर्त्तिको विधिः । तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्त्तैर्मानुषं स्मृतम्
तीस कलाएँ मिलकर एक काष्ठा होती हैं; और तीस कलाओं से ही मुहूर्त का विधान है। उतने ही मुहूर्तों की गणना से मनुष्यों का अहोरात्र (दिन-रात) माना गया है।
Verse 6
अहोरात्राणि तावंति मासः पक्षद्वयात्मकः । तैष्षड्भिरयनं वर्षमयने दक्षिणोत्तरे
उतने ही अहोरात्रों से एक मास बनता है, जो दो पक्षों से युक्त है। ऐसे छह मासों से एक अयन होता है; और वर्ष दो अयनों—दक्षिण और उत्तर—से बना माना गया है।
Verse 7
अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम् । दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम्
देवताओं के लिए दक्षिणायन रात्रि है और उत्तरायण दिन है। दिव्य वर्षों के सहस्रों से मापे गए ये काल कृत, त्रेता आदि युगों के नाम से प्रसिद्ध हैं।
Verse 8
चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोध मे । चत्वारि त्रीणिद्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम्
मुझसे चतुर्युग के बारह भागों का विभाग समझो। कृत (सत्य) आदि के क्रम में वे क्रमशः चार, तीन, दो और एक भाग हैं।
Verse 9
दिव्याब्दानां सहस्राणि युगेष्वाहुः पुराविदः । तत्प्रमाणैः शतैः संध्या पूर्वा तत्राभिधीयते
पुरातन परंपरा के ज्ञाता मुनि कहते हैं कि युग दिव्य वर्षों के सहस्रों से मापे जाते हैं; और उसी मान के शत-भाग से पूर्व-संध्या (संध्याकाल) भी वहाँ कही गई है।
Verse 10
संध्यांशकश्च तत्तुल्यो युगस्यानंतरो हि यः । संध्यासंध्यांशयोरंतः कालो यो नृपसत्तम
उसी के समान ‘संध्यांशक’ भी होता है, जो युग के तुरंत बाद आता है; अर्थात संध्या और संध्यांश के बीच का जो अंतराल-काल है, हे नृपश्रेष्ठ।
Verse 11
युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादिसंज्ञितः । कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चैव चतुर्युगम्
इसे ही ‘युग’ समझना चाहिए, जो कृत, त्रेता आदि नामों से प्रसिद्ध है। कृत, त्रेता, द्वापर और कलि—यही चतुर्युग है।
Verse 12
प्रोच्यते तत्सहस्रं तु ब्रह्मणो दिवसं नृप । ब्रह्मणो दिवसे राजन्मनवश्च चतुर्दश
हे नृप, उन (चतुर्युगों) का एक सहस्र ब्रह्मा का एक दिन कहा जाता है। और हे राजन्, ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं।
Verse 13
भवंति परिमाणं च तेषां कालकृतं शृणु । सप्तर्षयः सुराः शक्रो मनुस्तत्सूनवो नृप
हे नृप, उनके समय-नियत परिमाण को सुनो—सप्तर्षि, देवगण, शक्र (इन्द्र), मनु और उनके पुत्र।
Verse 14
एककाले हि सृज्यंते संह्रियंते च पूर्ववत् । चतर्युगानां संख्याता साधिका ह्येकसप्ततिः
एक ही समय में सृष्टि उत्पन्न भी होती है और पूर्ववत् लीन भी हो जाती है। चतुर्युगों की संख्या इकहत्तर (और अधिक) कही गई है।
Verse 15
मन्वंतरं मनोः कालः सुरादीनां च पार्थिव । अष्टौ शतसहस्राणि दिव्यया संख्यया स्मृतः
हे राजन्, मन्वन्तर मनु का काल है और देवताओं आदि का भी। दिव्य गणना से यह आठ लाख (वर्ष) स्मरण किया गया है।
Verse 16
द्विपंचाशत्तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि च । त्रिंशत्कोट्यस्तु संपूर्णाः संख्याताः संख्यया नृप
और बावन हजार (वर्ष) अधिक भी; तथा हे नृप, कुल पूर्ण गणना तीस करोड़ होती है—ऐसा संख्या से गिना गया है।
Verse 17
सप्तषष्टिस्तथान्यानि नियुतानि महामते । विंशतिश्च सहस्राणि कालोयमधिकं विना
हे महामते, यह काल-संख्या सड़सठ नियुत और उसके अतिरिक्त बीस हजार है; इससे अधिक कुछ नहीं।
Verse 18
मन्वंतरस्य संख्येयं मानुषैरिह वत्सरैः । चतुर्द्दशगुणो ह्येष कालो ब्राह्ममहः स्मृतम्
मन्वन्तर की अवधि यहाँ मनुष्य-वर्षों से गिनी जाती है। और यही काल चौदह गुना होकर ‘ब्रह्मा का दिन’ (ब्राह्ममहः) कहलाता है।
Verse 19
ब्राह्मो नैमित्तिको नाम तस्यांते प्रतिसंचरः । तदाहि दह्यते सर्वं त्रैलोक्यं भूर्भुवादिकम्
उस प्रलय को ‘ब्राह्म’ तथा ‘नैमित्तिक’ कहा गया है; उसके अंत में जगत् का प्रतिसंचार होता है। तब भूः-भुवः आदि सहित समस्त त्रैलोक्य दग्ध हो जाता है।
Verse 20
जनं प्रयांति तापार्त्ता महर्लोकनिवासिनः । एकार्णवे तु त्रैलोक्ये ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः
दाह की तपन से पीड़ित महर्लोकवासी जनलोक की ओर चले जाते हैं। जब त्रैलोक्य एक ही महासागर बन जाता है, तब ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ ब्रह्मा वहाँ स्थित रहता है।
Verse 21
भोगिशय्यागतः शेते त्रैलोक्यग्रासबृंहितः । जनस्थैर्योगिभिर्द्देवश्चिंत्यमानो जगद्विभुः
वह शेषनाग की शय्या पर शयन करता है, मानो त्रैलोक्य को ग्रसकर विशाल हो गया हो। जगद्विभु वह देव, जनलोक के स्थिर योगियों द्वारा निरंतर ध्येय है।
Verse 22
तत्प्रमाणां हि तां रात्रिं तदंते सृजते पुनः । एवं तु ब्रह्मणो वर्षमेवं वर्षशतं च तत्
उसी प्रमाण की (दिन के बराबर) उसकी रात्रि होती है, और उसके अंत में वह फिर सृष्टि करता है। इसी प्रकार ब्रह्मा का एक वर्ष माना जाता है, और इसी प्रकार उसके सौ वर्ष भी।
Verse 23
शतं हि तस्य वर्षाणां परमायुर्महात्मनः । एकमस्य व्यतीतं तु परार्धं ब्रह्मणोनघ
उस महात्मा ब्रह्मा की परम आयु सौ वर्ष है। हे निष्पाप! उन में से एक परार्ध (आधा भाग) ब्रह्मा का व्यतीत हो चुका है।
Verse 24
तस्यान्तेभून्महाकल्पः पाद्म इत्यभिविश्रुतः । द्वितीयस्य परार्धस्य वर्तमानस्य वै नृप
उस काल के अंत में ‘पाद्म’ नाम से प्रसिद्ध महाकल्प हुआ, हे नृप; वह द्वितीय परार्ध के वर्तमान उत्तरार्ध का ही (कल्प) है।
Verse 25
वाराह इति कल्पोयं प्रथमः परिकल्पितः । ब्रह्मा नारायणाख्योसौ कल्पादौ भगवान्यथा
यह कल्प प्रथम माना गया है, जिसका नाम ‘वाराह कल्प’ है; और कल्प के आरंभ में नारायण-नाम से प्रसिद्ध भगवान् ब्रह्मा प्रकट होते हैं।
Verse 26
ससर्ज सर्वभूतानि तदाचक्ष्व महामुने । पुलस्त्य उवाच । प्रजाः ससर्ज भगवाननादिस्सर्वसंभवः
“उन्होंने समस्त भूतों की सृष्टि की—हे महामुने, वह बताइए।” पुलस्त्य बोले—“अनादि, सर्वसम्भव भगवान् ने प्रजाओं की रचना की।”
Verse 27
अतीतकल्पावसाने निशासुप्तोत्थितः प्रभुः । सत्वोद्रिक्तस्तथा ब्रह्मा शून्यं लोकमवैक्षत
पूर्व कल्प के अंत में रात्रि-निद्रा से जागे हुए प्रभु ब्रह्मा, सत्त्व-प्रधान होकर, जगत् को शून्य देख रहे थे।
Verse 28
तोयान्तस्स महीं ज्ञात्वा निमग्नां वारिसंप्लवे । प्रविचिंत्य तदुद्धारं कर्तुकामः प्रजापतिः
महाप्रलय के जल में पृथ्वी को गहराइयों तक डूबी जानकर, प्रजापति उसे उठाने की इच्छा से, उसके उद्धार का उपाय सोचने लगे।
Verse 29
विष्णुरूपं तदा ज्ञात्वा पृथ्वीं वोढुं स्वतेजसा । मत्स्यकूर्मादिकां चान्यां वाराहीं तनुमाविशत्
तब विष्णु-स्वरूप की आवश्यकता जानकर, अपने दिव्य तेज से पृथ्वी को उठाने हेतु, उसने मत्स्य-कूर्म आदि की भाँति अन्य देह—वाराह-तनु—में प्रवेश किया।
Verse 30
वेदयज्ञमयं रूपमाश्रित्य जगतः स्थितौ । स्थितः स्थिरात्मा सर्वात्मा परमात्मा प्रजापतिः
वेद और यज्ञमय रूप धारण कर, जगत् की स्थिति-रक्षा के लिए प्रजापति स्थित हैं—स्थिरचित्त, सर्वात्मा, परमात्मा।
Verse 31
प्रविवेशे तदा तोयं तोयाधारे धराधरः । निरीक्ष्य तं तदा देवी पातालतलमागतम्
तब धराधर (गिरिधर) जल में प्रविष्ट हुए—उस जलाधार में। उन्हें पाताल-तल पर पहुँचा देख देवी ने तब दृष्टि डाली।
Verse 32
तुष्टाव प्रणता भूत्वा भक्तिनम्रा वसुंधरा । पृथिव्युवाच । नमस्ते सर्वभूताय नमस्ते परमात्मने
तब भक्तिभाव से नम्र होकर, प्रणाम कर वसुंधरा ने स्तुति की। पृथ्वी बोली—“आपको नमस्कार, जो समस्त भूतों के आधार हैं; आपको नमस्कार, हे परमात्मन्।”
Verse 33
मामुद्धरास्मादद्य त्वं त्वत्तोहं पूर्वमुत्थिता । परमात्मन्नमस्तेस्तु पुरुषात्मन्नमोस्तु ते
आज मुझे इससे उबारिए—क्योंकि मैं पहले आप ही से उत्पन्न हुई हूँ। हे परमात्मन्, आपको नमस्कार; हे पुरुषात्मन्, आपको नमस्कार।
Verse 34
प्रधानव्यक्तरूपाय कालभूताय ते नमः । त्वं कर्त्तासर्वभूतानां त्वं पाता त्वं विनाशकृत्
प्रधान और व्यक्त जगत्-स्वरूप, तथा काल-रूप आप को नमस्कार है। आप ही समस्त प्राणियों के कर्ता, आप ही पालक, और आप ही संहारकर्ता हैं।
Verse 35
सर्गादौ यः परोब्रह्मा विष्णुरुद्रात्मरूपधृक् । भक्षयित्वा च सकलं जगत्येकार्णवीकृते
सृष्टि के आरम्भ में जो परम ब्रह्म विष्णु और रुद्र के रूप धारण करता है, उसने सब कुछ भक्षण करके समस्त जगत् को एक ही महासागर-रूप कर दिया।
Verse 36
शेषे त्वमेव गोविन्द चिन्त्यमानो मनीषिभिः । भवतो यत्परं रूपं तन्न जानाति कश्चन
हे गोविन्द! अन्त में केवल आप ही शेष रहते हैं, जिनका मनस्वीजन चिन्तन करते हैं। आपके उस परम स्वरूप को कोई भी यथार्थतः नहीं जानता।
Verse 37
अवतारेषु यद्रूपं तदर्चन्ति दिवौकसः । त्वामाराध्य परं ब्रह्म याता मुक्तिं मुमुक्षवः
आपके अवतारों में जो-जो रूप होता है, देवगण उसी की अर्चना करते हैं। हे परब्रह्म! आपकी आराधना करके मोक्ष के इच्छुक जन मुक्ति को प्राप्त होते हैं।
Verse 38
वासुदेवमनाराध्य को हि मोक्षमवाप्स्यति । यद्रूपं मनसा ग्राह्यं यद्ग्राह्यं चक्षुरादिभिः
वासुदेव की आराधना किए बिना भला कौन मोक्ष पा सकता है?—जिसका रूप मन से ग्रहण होता है और नेत्र आदि इन्द्रियों से भी अनुभूत होता है।
Verse 39
बुद्ध्या च यत्परिछेद्यं तद्रूपमखिलं तव । त्वन्मय्यहं त्वदाधारात्वत्सृष्टा त्वामुपाश्रिता
बुद्धि से जिसका भी परिमाण किया जा सकता है, वह समस्त रूप तुम्हारा ही रूप है। मैं तुमसे व्याप्त हूँ, तुम पर आश्रित हूँ, तुमसे उत्पन्न हूँ; मैं तुम्हीं की शरण लेता हूँ।
Verse 40
माधवीमिति लोकोयमभिधत्ते ततो हि माम् । एवं संस्तूयमानस्तु पृथिव्या पृथिवीधरः
इसी कारण यह लोक मुझे ‘माधवी’ कहकर पुकारता है। पृथ्वी द्वारा इस प्रकार स्तुत होकर वह पृथ्वीधर (वराह) वहीं स्थित रहा।
Verse 41
सामस्वरध्वनिः श्रीमान्जगर्ज परिघर्घरम् । ततः समुत्क्षिप्य धरां स्वदंष्ट्रया महावराहः स्फुटपद्मलोचनः । रसातलादुत्पलपत्रसन्निभः समुत्थितो नील इवाचलो महान्
सामगान के स्वर-सा दिव्य नाद करते हुए वह श्रीमान् गम्भीर गर्जना करने लगा। फिर स्फुट कमल-नेत्र महावराह ने अपनी दंष्ट्रा पर पृथ्वी को उठाया; रसातल से नील कमल-पत्र के समान श्याम होकर वह विशाल नील पर्वत-सा प्रकट हुआ।
Verse 42
उत्तिष्ठता तेन मुखानिलाहतं तदाप्लवांभो जनलोक संश्रयान् । सनंदनादीनपकल्मषान्मुनींश्चकार भूयोपि पवित्रतास्पदम्
उसके उठते ही मुख-वायु के आघात से वे प्रलय-जल आंदोलित हो उठे; और जनलोक में निवास करने वाले, सनंदन आदि निष्पाप मुनि फिर से पवित्रता के आश्रय-स्थान बन गए।
Verse 43
प्रयांति तोयानि खुराग्रविक्षते रसातलेऽधकृतशब्दसंततिः । बलाहकानां च तति स्तुतस्य श्वासानिलास्ता परितः प्रयाति
खुरों के अग्रभाग से आहत होकर जल रसातल की ओर बह चले; वहाँ निरन्तर गम्भीर शब्द-धारा उठने लगी। और स्तुत्य उस प्रभु के श्वास-वायु के साथ मेघों की पंक्तियाँ चारों ओर विचरने लगीं।
Verse 44
उत्तिष्ठतस्तस्य जलार्द्रकुक्षेर्महावराहस्य महीं विदार्य । विधून्वतो वेदमयं शरीरं रोमांतरस्था मुनयो जुषंति
जब महावराह जल से भीगे उदर सहित उठे, पृथ्वी को विदीर्ण कर, और अपने वेदमय शरीर को झटकने लगे—तब उनके रोमकूपों में निवास करने वाले मुनि हर्षित होकर उन्हें नमस्कार करने लगे।
Verse 45
जनेश्वराणां परमेश केशव प्रभुर्गदा शंखदरासिचक्रधृक् । प्रभूति नाश स्थिति हेतुरीश्वरस्त्वमेव नान्यत्परमं च यत्पदम्
हे जनेश्वरों के परमेश्वर, हे केशव! गदा, शंख, धनुष, तलवार और चक्र धारण करने वाले प्रभु आप ही हैं। सृष्टि, नाश और स्थिति के कारण ईश्वर आप ही हैं; आपसे परे कोई नहीं—आपके चरण ही परम पद हैं।
Verse 46
पादेषु वेदास्तव यूपदंष्ट्रा दंतेषु यज्ञाः श्रुतयश्च वक्त्रे । हुताश जिह्वोसि तनूरुहाणि दर्भाः प्रभो यज्ञपुमांस्त्वमेव
आपके चरणों में वेद हैं, आपकी दंष्ट्राएँ यूप-स्तंभ हैं; आपके दाँतों में यज्ञ हैं और आपके मुख में श्रुतियाँ। आपकी जिह्वा हुताशन है, आपके रोम दर्भा हैं; हे प्रभो, यज्ञपुरुष आप ही हैं।
Verse 47
द्यावापृथिव्योरतुलप्रभाव यदंतरं तद्वपुषा तवैव । व्याप्तं जगद्वापि समस्तमेतद्धिताय विश्वस्य विभो भवत्वम्
हे अतुल प्रभाव वाले प्रभु! द्यावा और पृथ्वी के बीच का अंतर आपके ही स्वरूप से व्याप्त है; यह समस्त जगत भी व्याप्त है। हे विभो, आपका अस्तित्व समस्त विश्व के कल्याण हेतु हो।
Verse 48
परमात्मा त्वमेवैको नान्योस्ति जगतः पते
हे जगत्पते, परमात्मा आप ही एक हैं; आपके सिवा कोई दूसरा नहीं।
Verse 49
तवैष महिमा येन व्याप्तमेतच्चराचरं । ज्ञानस्वरूपमखिलं जगदेतदबुद्धयः
यह आपका ही महिमा है, जिससे यह समस्त चराचर जगत् व्याप्त है। परंतु अविवेकी नहीं जानते कि यह पूरा संसार मूलतः ज्ञान-स्वरूप है।
Verse 50
अर्थस्वरूपं पश्यंतो भ्राम्यंते तमसः प्लवे । ये तु ज्ञानविदश्शुद्धचेतसस्तेऽखिलं जगत्
जो केवल पदार्थों के बाह्य रूप को देखते हैं, वे अंधकार की नौका पर भटकते रहते हैं। पर जो सत्य-ज्ञान के ज्ञाता और शुद्ध-चित्त हैं, वे समस्त जगत् को यथार्थ रूप में देखते हैं।
Verse 51
ज्ञानात्मकं प्रपश्यंति त्वद्रूपं परमेश्वर । प्रसीद सर्वभूतात्मन्भवाय जगतस्त्विमाम्
हे परमेश्वर! वे आपके रूप को ज्ञान-स्वरूप ही देखते हैं। हे सर्वभूतों के आत्मन्! प्रसन्न होइए; इस जगत् के कल्याण का कारण बनिए।
Verse 52
उद्धरोर्वीममेयात्मन्निमग्नामब्जलोचन । सत्वोद्रिक्तोसि भगवन्गोविंद पृथिवीमिमाम्
हे अमेय आत्मन्, कमल-नेत्र प्रभो! जो पृथ्वी डूब गई है, उसे उठाइए। हे भगवन् गोविन्द! आप सत्त्व से परिपूर्ण हैं; इस पृथ्वी का उद्धार कीजिए।
Verse 53
समुद्धर भवायेश कुरु सर्वजगद्धितं । एवं संस्तूयमानश्च परमात्मा महीधरः
हे भवायेश! (पृथ्वी को) उठाइए और समस्त जगत् का हित कीजिए। इस प्रकार स्तुति किए जाने पर परमात्मा—महीधर, पृथ्वी-धारक—ने (कार्य आरंभ किया)।
Verse 54
उज्जहार क्षितिं क्षिप्रं न्यस्तवान्स महार्णवे । तस्योपरि जलौघेस्य महती नौरिवस्थिता
उस प्रभु ने शीघ्र ही पृथ्वी को उठाकर महा-समुद्र में स्थापित किया; और जलराशि के ऊपर वह विशाल नौका के समान तैरती हुई स्थित हुई।
Verse 55
ततः क्षितिं समां कृत्वा पृथिव्यामचिनोद्गिरीन् । यथाविभागं भगवाननादिः पुरुषोत्तमः
फिर भूमि को समतल करके, अनादि भगवान पुरुषोत्तम ने पृथ्वी पर पर्वतों को उनके-उनके विभाग के अनुसार स्थापित किया।
Verse 56
भूविभागं ततः कृत्वा सप्तद्वीपान्यथातथं । भूताद्यांश्चतुरोलोकान्पूर्ववत्समकल्पयत्
तदनंतर पृथ्वी का विभाग करके उसने यथोचित रूप से सात द्वीपों की व्यवस्था की, और पूर्ववत् भूरादि चारों लोकों को भी क्रम में स्थापित किया।
Verse 57
ब्रह्मणे विष्णुना पूर्वमेतदेव प्रदर्शितं । तुष्टेन देवदेवेन त्वं देवः पुरुषोत्तमः
पूर्वकाल में विष्णु ने ब्रह्मा को यही तत्त्व दिखाया था। प्रसन्न देवाधिदेव ने कहा—“तुम ही पुरुषोत्तम हो।”
Verse 58
त्वया मया जगच्चेदं धार्यं पाल्यं च यत्नतः । येषां त्वसुरमुख्यानां वरो दत्तो मयाधुना
यह जगत् तुम्हारे और मेरे द्वारा यत्नपूर्वक धारण और पालन किया जाना चाहिए, क्योंकि मैंने अभी असुरों के प्रमुखों को वरदान दे दिया है।
Verse 59
देवानां हितकामेन हंतव्यास्ते त्वया विभो । अहं सृष्टिं करिष्यामि सा च पाल्या त्वया विभो
देवों के हित की कामना से, हे विभो, तुम्हें उनका वध करना चाहिए। मैं सृष्टि का कार्य करूँगा, और उस सृष्टि की रक्षा तुम्हें करनी है, हे प्रभु।
Verse 60
एवमुक्तो गतो विष्णुर्देवादीनसृजद्विभुः । अबुद्धिपूर्वकस्तस्य प्रादुर्भूतस्तमोमयः
ऐसा कहे जाने पर विष्णु चले गए; तब सर्वशक्तिमान प्रभु ने देवों आदि की सृष्टि की। उसी से, बिना विचार के, पहले तमोमय तत्त्व प्रकट हुआ।
Verse 61
तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो ह्यन्धसंज्ञकः । पंचधावस्थितः सर्गो ध्यायतस्तु महात्मनः
तम, मोह, महामोह, तामिस्र और ‘अन्ध’ नामक—महात्मा के ध्यान करते ही सृष्टि पाँच प्रकार से व्यवस्थित हो गई।
Verse 62
बहिरंतश्चाप्रकाशः संवृतात्मा नगात्मकः । मुख्यानागायतश्चोक्ता मुख्यसर्गस्ततस्त्वयं
बाहर और भीतर दोनों ओर से अप्रकाशित, जिसका स्वरूप आवृत है और जो पर्वत-स्वभाव वाला है—इसे ‘मुख्य नागायत’ कहा गया; इसलिए तुम ही मुख्य सर्ग हो।
Verse 63
तं दृष्ट्वा साधकं सर्गममन्यदपरं प्रभुः । तस्याभिध्यायतस्सर्गस्तिर्यक्स्रोतोभ्यवर्तत
उस सर्ग को सफल और साधक देखकर प्रभु ने एक और सृष्टि का विचार किया; और ध्यान करते ही तिर्यक्-स्रोत (पशु-योनि) की सृष्टि प्रकट हो गई।
Verse 64
यस्मात्तिर्यक्प्रवृत्तिः स्यात्तिर्यक्स्रोतस्ततः स्मृतः । पश्वादयस्ते विख्यातास्तमः प्राया ह्यवेदिनः
चूंकि उनकी प्रवृत्ति तिरछी (क्षैतिज) होती है, इसलिए वे 'तिर्यक्स्रोत' कहलाते हैं। वे पशु आदि के रूप में प्रसिद्ध हैं, जो तमस प्रधान और अज्ञानी होते हैं।
Verse 65
उत्पथग्राहिणश्चैव ते ज्ञाने ज्ञानमानिनः । अहंकृतास्त्वहंमाना अष्टाविंशद्विधात्मकाः । अंतःप्रकाशास्ते सर्व आवृतास्ते परस्परम्
वे गलत मार्ग पर चलने वाले और अज्ञानी होकर भी स्वयं को ज्ञानी मानने वाले हैं। अहंकार से युक्त और अभिमानी, वे अट्ठाईस प्रकार के हैं। वे भीतर से प्रकाशमान होते हुए भी परस्पर ढके हुए हैं।
Verse 66
तमप्यसाधकं मत्वा ध्यायतोन्यस्ततोभवत् । ऊर्द्ध्वस्रोतस्तृतीयस्तु सात्विकोर्ध्वमवर्तत
उस सृष्टि को भी उद्देश्य-सिद्धि में असमर्थ मानकर, ध्यान करते हुए ब्रह्मा जी से एक अन्य सृष्टि उत्पन्न हुई। यह तीसरी सृष्टि 'ऊर्ध्वस्रोत' थी, जो सात्त्विक थी और ऊपर की ओर प्रवृत्त हुई।
Verse 67
ते सुखप्रीतिबहुला बहिरंतरनावृताः । प्रकाशा बहिरंतश्च ऊर्द्ध्वस्रोतास्ततः स्मृताः
वे सुख और प्रीति से परिपूर्ण हैं, तथा बाहर और भीतर से अनावृत (खुले) हैं। वे बाहर और भीतर प्रकाशमान हैं, इसलिए उन्हें 'ऊर्ध्वस्रोत' कहा जाता है।
Verse 68
तुष्टात्मनस्तृतीयस्तु देवसर्गस्तु संस्मृतः । तस्मिन्सर्गे भवत्प्रीतिर्निष्पन्ने ब्रह्मणस्तदा
तुष्ट आत्मा वाले ब्रह्मा जी का यह तीसरा सर्ग 'देवसर्ग' माना गया है। उस सृष्टि के उत्पन्न होने पर ब्रह्मा जी को अत्यंत प्रसन्नता हुई।
Verse 69
ततोन्यं स तदा दध्यौ साधकं सर्गमुत्तमम् । असाधकांस्तुतान्ज्ञात्वा मुख्यसर्गादिसंभवान्
तब उन्होंने एक अन्य—उत्तम और साधक सृष्टि-प्रकार—का ध्यान किया। मुख्य सर्ग और उसके आदि-विभागों से उत्पन्न पूर्व प्राणियों को असाधक जानकर (उन्होंने भिन्न सृष्टि का संकल्प किया)।
Verse 70
तथाभिध्यायतस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्ततः । प्रादुर्भूतस्तदाव्यक्तादर्वाक्स्रोतस्तु साधकः
इस प्रकार सत्य के अनुरूप ध्यान करते हुए, उनके ध्यान से तब उस अव्यक्त से ‘अर्वाक्स्रोतस्’—साधक सृष्टि—प्रकट हुई।
Verse 71
यस्मादर्वाक्प्रवर्तंते ततोऽवाक्स्रोतसस्तु ते । ते च प्रकाशबहुलास्तमोद्रिक्ता रजोधिकाः
क्योंकि वे नीचे की ओर प्रवृत्त होते हैं, इसलिए वे ‘अवाक्स्रोतस्’ (अधोमुख प्रवाह) कहलाते हैं। वे प्रकाश से परिपूर्ण, तम से अल्प, और रजोगुण से अधिक हैं।
Verse 72
तस्मात्ते दुःखबहुला भूयोभूयश्च कारिणः । प्रकाशा बहिरंतश्च मनुष्याः साधकाश्च ते
इसलिए वे मनुष्य दुःख से बहुत युक्त हैं और बार-बार कर्म में प्रवृत्त होते हैं; फिर भी वे बाहर और भीतर से प्रकाशमान हैं, और वे साधक हैं।
Verse 73
पंचमोनुग्रहः सर्गः स चतुर्द्धा व्यवस्थितः । विपर्ययेण सिद्ध्या च शक्त्या तुष्ट्या तथैव च
पाँचवाँ सर्ग ‘अनुग्रह-सर्ग’ है। वह चार प्रकार से व्यवस्थित है—विपर्यय से, सिद्धि से, शक्ति से, तथा तुष्टि (संतोष) से।
Verse 74
विवृत्तं वर्त्तमानं च ते न जानंति वै पुनः । भूतादिकानां भूतानां षष्ठः सर्गः स उच्यते
वे न तो भूत में जो प्रकट हो चुका है, उसे यथार्थ जानते हैं, न ही वर्तमान में जो हो रहा है। भूतों के आदि—पंचभूतादि से लेकर समस्त प्राणियों तक—यह ‘षष्ठ सर्ग’ कहलाता है।
Verse 75
ते परिग्राहिणः सर्वे सविभागतरास्तु ते । चोदना जाप्यशीलाश्च ज्ञेया भूतादिकास्तु ते
वे सब परिग्राही हैं, और प्रत्येक का अपना-अपना भाग नियत है। प्रेरणा से प्रवृत्त होकर जप में रत रहने वाले—ये भूतादि (तत्त्व-प्रभृति) ही समझने योग्य हैं।
Verse 76
इत्येते कथिताः सर्गाः षडत्र नृपसत्तम । प्रथमो महतस्सर्गो द्वितीयो ब्रह्मणस्तु यः
हे नृपश्रेष्ठ, यहाँ इस प्रकार छह सर्ग कहे गए। पहला महत् का सर्ग है, और दूसरा ब्रह्मा का (ब्रह्मणः) सर्ग माना गया है।
Verse 77
तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गोहि स स्मृतः । वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्गश्चैंद्रियकः स्मृतः
दूसरा सर्ग तन्मात्राओं का है, और वही भूतसर्ग (स्थूल भूतों की सृष्टि) के रूप में स्मृत है। तीसरा वैकारिक सर्ग है, और वही ऐन्द्रियक—इन्द्रियों की सृष्टि—कहलाता है।
Verse 78
इत्येष प्राकृतः सर्गः संभूतो बुद्धिपूर्वकः । मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः
इस प्रकार यह प्राकृत (भौतिक) सर्ग बुद्धि के पूर्वगामी होकर उत्पन्न होता है। चौथा ‘मुख्यसर्ग’ कहलाता है; और उसमें स्थावर (अचल) प्राणी ही प्रधान माने गए हैं।
Verse 79
तिर्यक्स्रोतश्च यः प्रोक्तस्तिर्यग्योन्यस्स उच्यते । ततोर्ध्वस्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु स स्मृतः
जो सृष्टि ‘तिर्यक्स्रोतस्’ कही गई है, वही तिर्यग्योनि अर्थात् पशुओं की उत्पत्ति है। इसके बाद ऊर्ध्वस्रोत प्राणियों में छठी सृष्टि देवसर्ग के नाम से स्मरण की जाती है।
Verse 80
ततोर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः । अष्टमोनुग्रहः सर्गः सात्विकस्तामसस्तु सः
फिर ‘वाक्स्रोतस्’ की सातवीं सृष्टि आती है—वही मानुष सृष्टि है। आठवीं सृष्टि ‘अनुग्रह’ की है; वह सात्त्विक भी है और तामस भी कही गई है।
Verse 81
पंचैते वैकृताः सर्गाः प्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः । प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः
इनमें पाँच सृष्टियाँ ‘वैकृत’ (परिवर्तित/द्वितीय) कही गई हैं और तीन ‘प्राकृत’ (मूल) स्मरण की गई हैं। प्राकृत और वैकृत को साथ गिनकर ‘कौमार’ सृष्टि नवमी मानी गई है।
Verse 82
एते तव समाख्याता नवसर्गाः प्रजापतेः । प्राकृता वैकृताश्चैव जगतो मूलहेतवः
हे प्रजापति! ये नौ सर्ग मैंने तुम्हें बताए—प्राकृत भी और वैकृत भी। यही जगत् के मूल कारण कहे गए हैं।
Verse 83
सृजतो जगदीशस्य किमन्यच्छ्रोतुमर्हसि । भीष्म उवाच । संक्षेपात्कथिताः सर्गा देवादीनां गुरोस्तथा
जगत् के ईश्वर के सृजन-विधान में तुम और क्या सुनना चाहते हो? भीष्म बोले—देवों आदि के तथा उनके आचार्य के सर्ग संक्षेप में कहे गए हैं।
Verse 84
विस्तराच्छ्रोतुमिच्छामि त्वत्तो मुनिवरोत्तम । पुलस्त्य उवाच । कर्मभिर्भाविताः सर्वेकुशलाकुशलैस्तु ते
हे मुनिवरों में श्रेष्ठ! मैं आपसे इसे विस्तार से सुनना चाहता हूँ। पुलस्त्य बोले—सभी प्राणी शुभ और अशुभ कर्मों से ही संस्कारित व निर्मित होते हैं।
Verse 85
ख्यात्या तया ह्यनिर्मुक्ताः संहारे ह्युपसंहृताः । स्थावरान्तास्सुराद्यास्तु प्रजा राजंश्चतुर्विधाः
हे राजन्! उस प्रकटता से मुक्त न होने के कारण वे प्रलय के समय पुनः समेट लिए जाते हैं। देवों से आरम्भ होकर स्थावरों तक—यह चतुर्विध प्रजा प्रलय में लीन हो जाती है।
Verse 86
ब्रह्मणः कुर्वतः सृष्टिं जज्ञिरे मानसाः स्मृताः । ततो देवासुरपितॄन्मानुषांस्तु चतुष्टयं
ब्रह्मा जब सृष्टि-कार्य कर रहे थे, तब ‘मानस’ कहे जाने वाले मनोज प्राणी उत्पन्न हुए। उनसे देव, असुर, पितृ और मनुष्य—ये चार समुदाय प्रकट हुए।
Verse 87
सिसृक्षुरंभांस्येतानि स्वमात्मानमयूयुजत् । मुक्तात्मनस्ततो जाता दुरात्मानः प्रजापतेः
सृष्टि की इच्छा से उसने इन जलों को अपने आत्मस्वरूप से युक्त किया। उस मुक्तात्मा प्रजापति से तब दुरात्मा प्राणी उत्पन्न हुए।
Verse 88
सिसृक्षोर्जघनात्पूर्वं जज्ञिरे त्वसुरास्ततः । तत्याज तां ततो दुष्टान्तमोमात्रात्मिकां तनुं
उस स्रष्टा के अग्रभाग के प्रकट होने से पहले ही उसके पृष्ठभाग से असुर उत्पन्न हुए। तब उसने उस तमोमय, दुष्ट-स्वभाव वाली देह को त्याग दिया।
Verse 89
सा तु त्यक्ता तनुस्तेन राजेंद्राभूद्विभावरी । सिसृक्षुरन्यदेहस्थः प्रीतिमापुस्ततः सुराः
हे राजेन्द्र! जब उसने उस देह का त्याग किया, वह रात्रि बन गई। फिर वह अन्य देह में स्थित होकर पुनः सृष्टि की इच्छा करने लगा, तब देवगण हर्षित हो उठे।
Verse 90
सत्वोद्रिक्ताः समुद्भूता मुखतो ब्रह्मणो नृप । त्यक्ता सापि तनुस्तेन सत्वप्रायमभूद्दिनं
हे नृप! ब्रह्मा के मुख से सत्त्व-प्रधान प्राणी उत्पन्न हुए। जब उसने उस देह का भी त्याग किया, तब दिन सत्त्व-स्वरूप, अर्थात् पवित्रता और प्रकाश से युक्त हो गया।
Verse 91
ततो हि बलिनो रात्रावसुरा देवतादि वा । सत्वमात्रात्मिकां चैव ततोन्यां जगृहे तनुम्
तदनंतर रात्रि में वे बलवान् प्राणी—असुर हों या देवता आदि—सत्त्वमात्र से युक्त, शुद्ध-प्रकाशमयी एक अन्य देह धारण करने लगे।
Verse 92
पितृवन्मन्यमानस्य पितरस्तस्य जज्ञिरे । उत्ससर्ज पितॄन्कृत्वा ततस्तामपि स प्रभुः
जब उसने उन्हें पितृवत् मान लिया, तब उससे पितृगण उत्पन्न हुए। पितरों की सृष्टि करके वह प्रभु फिर उसे भी (अगली सत्ता को) प्रकट करने लगा।
Verse 93
सा चोत्सृष्टा भवत्संध्या दिननक्तांतरा स्थितिः । रजोमात्रात्मिकामन्यां जगृहे स तनुं ततः
और वह उत्सृष्ट संध्या दिन और रात्रि के बीच की स्थिति बन गई। तब उसने रजोमात्र से युक्त, क्रिया-उत्साहमयी एक अन्य देह धारण की।
Verse 94
रजोमात्रोत्कटा जाता मनुष्याः कुरुसत्तम । तामप्याशु स तत्याज तनुमाद्यां प्रजापतिः
हे कुरुश्रेष्ठ! मनुष्य केवल रजोगुण से प्रबल होकर उत्पन्न हुए। तब प्रजापति ने उस अपनी आद्य देह को भी शीघ्र ही त्याग दिया।
Verse 95
ज्योत्स्ना समभवच्चापि प्राक्संध्या याभिधीयते । ज्योत्स्नागमे तु बलिनो मनुष्याः पितरस्तथा
ज्योत्स्ना भी उत्पन्न हुई, जिसे ‘प्राक्संध्या’ कहा जाता है। और ज्योत्स्ना के आगमन पर मनुष्य बलवान होते हैं तथा पितृगण भी।
Verse 96
राजेंद्र संध्यासमये तस्मात्ते प्रभवंति वै । ज्योत्स्ना रात्र्यहनी सन्ध्या चत्वार्येतानि वै विभोः
हे राजेन्द्र! संध्या-समय में उससे ये ही उत्पन्न होते हैं—ज्योत्स्ना, रात्रि और दिन, तथा संध्या; ये चारों प्रभु के ही हैं।
Verse 97
ब्रह्मणस्तु शरीराणि त्रिगुणोपाश्रयाणि च । रजोमात्रात्मिकामेव ततोन्यां जगृहे तनुं
ब्रह्मा के शरीर त्रिगुणों पर ही आश्रित हैं। इसलिए उन्होंने दूसरी देह धारण की, जो केवल रजोगुण-स्वरूप थी।
Verse 98
ततः क्षुद्ब्रह्मणोजाता जज्ञे कोपस्तया कृतः । क्षुत्क्षामो ह्यंधकारे तु सोसृजद्भगवांस्ततः
तब ब्रह्मा से ‘क्षुधा’ उत्पन्न हुई; उसी से उत्पन्न क्रोध भी जाग उठा। अंधकार में क्षुधा से व्याकुल होकर भगवान ने तब सृष्टि का प्रसव किया।
Verse 99
विरूपा अत्तुकामास्ते समधावंत तं प्रभुम् । रक्षतामेष यैरुक्तं राक्षसास्ते ततोभवन्
वे विकृत-रूप, भक्षण-लोलुप प्राणी उस प्रभु की ओर दौड़े। जिनसे उसने कहा—“रक्षा करो”, वे तभी राक्षस कहलाए।
Verse 100
ऊचुः खादाम इत्यन्ये ये ते यक्षास्तु तेभवन् । अतिभीतस्य तान्दृष्ट्वा केशाः शीर्यन्ति वेधसः
कुछ बोले—“इसे खा लें”; वे ही यक्ष बन गए। उन्हें देखकर अत्यन्त भयभीत विधाता ब्रह्मा के केश झड़ने लगे।
Verse 101
हीनाश्च शिरसो भूयः समारोहंति ते शिरः । सर्पणात्तेभवन्सर्पा हीनत्वादहयः स्मृताः
जो सिर से वंचित थे, उनके सिर फिर उग आए। रेंगने के कारण वे ‘सर्प’ कहलाए, और हीन अवस्था से ‘अहयः’ (अहि) कहे गए।
Verse 102
ततः क्रुद्धेन वै स्रष्ट्रा क्रोधात्मानो विनिर्मिताः । वर्णेन कपिशेनोग्रा भूतास्ते पिशिताशिनः
तदनन्तर स्रष्टा के क्रुद्ध होने पर क्रोध-स्वभाव वाले प्राणी उत्पन्न हुए। कपिश वर्ण के, उग्र वे भूत मांसभक्षी थे।
Verse 103
धयतो गां समुद्भूता गंधर्वास्तस्य तत्क्षणात् । पिबंतो जज्ञिरे वाचं गंधर्वास्तेन तेऽभवन्
गाय का दुग्ध पीते हुए उससे उसी क्षण गन्धर्व उत्पन्न हुए। और वाणी का पान करते हुए जन्म लेने से वे ‘गन्धर्व’ कहलाए।
Verse 104
एतानि सृष्ट्वा भगवान्ब्रह्मा तच्छक्तिचोदितः । ततः स्वच्छंदतोऽन्यानि वयांसि वयसोऽसृजत्
इनको रचकर भगवान् ब्रह्मा अपनी ही शक्ति से प्रेरित हुए; फिर स्वेच्छा से उन्होंने विविध प्रकार के अन्य पक्षियों की भी सृष्टि की।
Verse 105
अवयो वक्षसश्चक्रे मुखतोजांश्च सृष्टवान् । सृष्टवानुदराद्गाश्च महिषांश्च प्रजापतिः
प्रजापति ने अपने वक्ष से भेड़ें, मुख से बकरियाँ; और उदर से गौएँ तथा महिष भी उत्पन्न किए।
Verse 106
पद्भ्यां चाश्वान्स मातंगान्रासभान्गवयान्मृगान् । उष्ट्रानश्वतरांश्चैव न्यंकूनन्याश्च जातयः
और चरणों से घोड़े, हाथी, गधे, गवय (वन्य गौ), मृग; तथा ऊँट, खच्चर, नीलगाय और अन्य जातियाँ उत्पन्न हुईं।
Verse 107
ओषध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे । त्रेतायुगमुखे ब्रह्मा कल्पस्यादौ नृपोत्तम
उसके रोमों से फल-मूल वाली औषधियाँ और वनस्पतियाँ उत्पन्न हुईं। हे नृपोत्तम, कल्प के आरम्भ में त्रेता-युग के मुख पर ब्रह्मा ने (सृष्टि-कार्य का) प्रवर्तन किया।
Verse 108
सृष्ट्वा पश्वोषधीस्सम्यक्युयोज स तदाध्वरे । गामजं महिषम्मेषमश्वाश्वतरगर्दभान्
पशुओं और औषधियों को सम्यक् रचकर, उसने उन्हें उस यज्ञ में नियोजित किया—गौ, अज, महिष, मेष, अश्व, अश्वतर और गर्दभ।
Verse 109
एतान्ग्राम्यपशूनाहुरारण्यांश्च निबोधमे । श्वापदो द्विखुरो हस्ती वानरः पञ्चमः खगः
ये ग्राम्य पशु कहे गए हैं; अब मुझसे वन्य पशुओं को जानो—हिंस्र श्वापद, द्विखुर पशु, हाथी, वानर और पाँचवाँ खग (पक्षी)।
Verse 110
उष्ट्रकाः पशवष्षष्ठास्सप्तमास्तु सरीसृपाः । गायत्रं च ऋचश्चैव त्रिवृत्सोमं रथन्तरम्
ऊँट छठे पशु हैं और सरीसृप सातवें; इसी प्रकार गायत्र (साम), ऋचाएँ, त्रिवृत्-सोम स्तोत्र और रथन्तर (साम) भी (उत्पन्न हुए)।
Verse 111
अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात् । यजूंषि त्रैष्टुभं छन्दः स्तोमं पञ्चदशं तथा
अपने प्रथम मुख से उसने यज्ञों में अग्निष्टोम की रचना की; तथा यजुः-मंत्र, त्रैष्टुभ छन्द और पन्द्रह-स्तॊम (स्तोत्र-रचना) भी।
Verse 112
बृहत्साम तथोक्थं च दक्षिणादसृजन्मुखात् । सामानि जगतीच्छन्दः स्तोमं सप्तदशं तथा
दक्षिण मुख से उसने बृहत्साम और उक्थ को उत्पन्न किया; तथा साम-गान, जगती छन्द और सत्रह-स्तॊम भी।
Verse 113
वैरूपमतिरात्रं च पश्चिमादसृजन्मुखात् । एकविंशमथर्वाणमप्तोर्यामाणमेव च
पश्चिम मुख से उसने वैरूप-अतिरात्र याग की सृष्टि की; तथा एकविंश अथर्व-क्रतु और अप्तोर्याम याग भी।
Verse 114
आनुष्टुभं सवैराजमुत्तरादसृजन्मुखात् । उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे
उसने अपने उत्तरमुख से वैराज सहित अनुष्टुभ छन्द की सृष्टि की; और उसके अंगों से ऊँचे-नीचे अनेक प्रकार के प्राणी उत्पन्न हुए।
Verse 115
सुरासुरपितॄन्सृष्ट्वा मनुष्यांश्च प्रजापतिः । ततः पुनः ससर्जासौ स कल्पादौ पितामहः
देवों, असुरों, पितरों और मनुष्यों की रचना करके प्रजापति—कल्प के आरम्भ में वह पितामह—फिर से आगे की सृष्टि करने लगे।
Verse 116
यक्षान्पिशाचान्गंधर्वांस्तथैवाप्सरसां गणान् । सिद्धकिन्नररक्षांसि सिंहान्पक्षिमृगोरगान्
यक्ष, पिशाच, गन्धर्व तथा अप्सराओं के गण; सिद्ध, किन्नर और राक्षस; सिंह, पक्षी, मृग और सर्प—इन सबको उसने रचा।
Verse 117
अव्ययं च व्ययं चैव यदिदं स्थाणुजंगमम् । तत्ससर्ज तदा ब्रह्मा भगवानादिकृद्विभुः
तब भगवान् ब्रह्मा—सर्वव्यापी आदिकर्ता—ने इस समस्त जगत् को रचा, जो अविनाशी और विनाशी, स्थावर और जङ्गम रूपों से युक्त है।
Verse 118
तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे । तान्येव प्रतिपद्यंते सृज्यमानाः पुनः पुनः
पूर्व सृष्टि में उन्होंने जो-जो कर्म अपनाए थे, सृजित होते हुए वे वही कर्म बार-बार फिर से अपनाते हैं।
Verse 119
हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते । तद्भाविताः प्रपद्यंते तस्मात्तत्तस्य रोचते
हिंसा-अहिंसा, मृदुता-क्रूरता, धर्म-अधर्म और सत्य-असत्य में—जिस स्वभाव का संस्कार मनुष्य ने किया है, वही उसे प्राप्त होता है; इसलिए वही उसे प्रिय लगता है।
Verse 120
इंद्रियार्थेषु भूतेषु शरीरेषु च स प्रभुः । नानात्त्वं विनियोगं च धातैव व्यसृजत्स्वयं
इन्द्रियों के विषयों में, भूत-तत्त्वों में और देहधारियों के शरीरों में—वही प्रभु धाता ने स्वयं विविधता और भिन्न-भिन्न नियोजन रचा।
Verse 121
नामरूपं च भूतानां कृत्यानां च प्रपंचनम् । वेदशब्देभ्य एवादौ देवादीनां चकार सः
आदि में उसने वेद-वचनों से ही प्राणियों के नाम-रूप और कर्मों/विधानों का विस्तार रचा; और देवताओं आदि को भी उसी से प्रकट किया।
Verse 122
ऋषीणां नामधेयानि यथा वेदे श्रुतानि वै । यथानियोगं योग्यानि अन्येषामपि सोकरोत्
ऋषियों के नाम उसने वैसे ही नियत किए जैसे वेद में सुने जाते हैं; और नियोग के अनुसार दूसरों के लिए भी जो-जो योग्य था, वैसा ही उसने ठहराया।
Verse 123
यथर्तावृतुलिंगानि नानारूपाणि पर्यये । दृश्यंते तानितान्येव तथा भावा युगादिषु
जैसे ऋतुओं के लक्षण चक्र के फेर में नाना रूपों से दिखाई देते हैं और वही-के-वही फिर लौट आते हैं—वैसे ही युगों आदि में भाव/स्थितियाँ भी पुनः-पुनः प्रकट होती हैं।
Verse 124
करोत्येवंविधां सृष्टिं कल्पादौ स पुनःपुनः । सिसृक्षुश्शक्तियुक्तोसौ सृज्य शक्तिप्रचोदितः
कल्प के आरम्भ में वह बार-बार इसी प्रकार की सृष्टि करता है। सृजन की इच्छा से युक्त वह शक्ति-सम्पन्न स्रष्टा उसी शक्ति से प्रेरित होकर रचता है॥
Verse 125
भीष्म उवाच । अर्वाक्स्रोतास्तु कथितो भवता यस्तु मानुषः । ब्रह्मन्विस्तरतो ब्रूहि ब्रह्मा तमसृजद्यथा
भीष्म बोले—आपने मनुष्य को ‘अर्वाक्स्रोतस्’ (जिसकी धारा नीचे की ओर बहती है) कहा है। हे ब्रह्मन्, विस्तार से बताइए कि ब्रह्मा ने उसे कैसे रचा॥
Verse 126
यथा सवर्णानसृजद्गुणांश्च स महामुने । यच्च तेषां स्मृतं कर्म विप्रादीनां तदुच्यताम्
हे महामुने, बताइए कि उसने गुणों सहित वर्णों की रचना कैसे की; और ब्राह्मण आदि के जो कर्तव्य स्मृति में प्रसिद्ध हैं, वे भी कहिए॥
Verse 127
पुलस्त्य उवाच । सत्वाभिध्यायिनः पूर्वं सिसृक्षोर्ब्रह्मणः प्रजाः । अजायंत कुरुश्रेष्ठ सत्वोद्रिक्ता मुखात्प्रजाः
पुलस्त्य बोले—हे कुरुश्रेष्ठ, जब ब्रह्मा ने पहले सृजन की इच्छा की, तब सत्त्व-चिन्तनशील प्रजाएँ उत्पन्न हुईं; सत्त्व-प्रधान संतति उसके मुख से जन्मी॥
Verse 128
वक्षसो रजसोद्रिक्तास्तथान्या ब्रह्मणोभवन् । रजसस्तमसश्चैव समुद्रिक्तास्तथोरुतः
ब्रह्मा के वक्षःस्थल से वे अन्य उत्पन्न हुए जिनमें रजोगुण प्रधान था; और उसकी ऊरुओं से वे उत्पन्न हुए जिनमें रजस और तमस दोनों का प्रबल मिश्रण था॥
Verse 129
पद्भ्यामन्याः प्रजा ब्रह्मा ससर्ज कुरुसत्तम । तमःप्रधानास्ताः सर्वाश्चातुर्वर्ण्यमिदं ततः
हे कुरुश्रेष्ठ! ब्रह्मा ने अपने चरणों से अन्य प्रजाओं की सृष्टि की। वे सब तमोगुण-प्रधान थीं; उन्हीं से यह चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था उत्पन्न हुई।
Verse 130
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम । पादोरुवक्षस्थलतो मुखतश्च समुद्गताः
हे नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्रमशः मुख, वक्षस्थल, ऊरु और चरणों से उत्पन्न हुए।
Verse 131
यज्ञनिष्पत्तये सर्वमेतद्ब्रह्मा चकार ह । चातुर्वर्ण्यं महाराज यज्ञसाधनमुत्तमम्
यज्ञ की सिद्धि के लिए ब्रह्मा ने यह सब व्यवस्था की। हे महाराज! चातुर्वर्ण्य यज्ञ-कार्य की सर्वोत्तम साधना है।
Verse 132
यज्ञेनाप्यायिता देवा वृष्ट्युत्सर्गेण मानवाः । आप्यायंते धर्मयज्ञा यतः कल्याणहेतवः
यज्ञ से देवता तृप्त होते हैं और वर्षा के प्रवाह से मनुष्य पोषित होते हैं। इसलिए धर्मयुक्त यज्ञ बढ़ाए जाते हैं, क्योंकि वे कल्याण के कारण हैं।
Verse 133
निष्पद्यंते नरैस्ते तु सुकर्मनिरतैः सदा । विरुद्धाचरणापेतैः सद्भिः सन्मार्गगामिभिः
ये फल सदा सत्कर्म में लगे मनुष्यों द्वारा ही प्राप्त होते हैं—उन सज्जनों द्वारा, जिन्होंने विपरीत आचरण त्याग दिया है और जो सन्मार्ग पर चलते हैं।
Verse 134
स्वर्गापवर्गं मानुष्यात्प्राप्नुवंति नरा नृप । यच्चाभिरुचितं स्थानं तद्यांति मनुजा विभो
हे नृप! मनुष्य-जीवन से लोग स्वर्ग या मोक्ष प्राप्त करते हैं; और हे प्रभो! मनुष्य जिस लोक को हृदय से चाहता है, उसी स्थान को प्राप्त होता है।
Verse 135
प्रजास्ता ब्रह्मणा सृष्टाश्चातुर्वर्ण्यव्यवस्थितौ । सम्यक्शुद्धाः समाचारा चरणा नृपसत्तम
हे नृपश्रेष्ठ! वे प्रजाएँ ब्रह्मा द्वारा सृजित होकर चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था में विधिवत् स्थित थीं; वे पूर्णतः शुद्ध, सदाचारी और धर्माचरण में प्रतिष्ठित थीं।
Verse 136
यथेच्छावासनिरताः सर्वबाधाविवर्जिताः । शुद्धांतःकरणाः शुद्धा धर्मानुष्ठाननिर्मलाः
वे अपनी इच्छानुसार वासनाओं में प्रवृत्त होते हुए भी समस्त बाधाओं से रहित थे; उनका अन्तःकरण शुद्ध था, वे स्वयं पवित्र थे और धर्मानुष्ठान से निर्मल बने थे।
Verse 137
शुद्धे च तासां मनसि शुद्धांतःसंस्थिते हरौ । शुद्धज्ञानं प्रपश्यंति ब्रह्माख्यं येन तत्पदं
जब उनका मन शुद्ध हो जाता है और शुद्ध अन्तःकरण में हरि विराजमान होते हैं, तब वे उस शुद्ध ज्ञान—जिसे ब्रह्म कहा जाता है—का साक्षात्कार करते हैं, जिससे परम पद प्राप्त होता है।
Verse 138
ततः कालात्मको योसौ विरिंचा वा स उच्यते । संसारपातमत्यर्थं घोरमल्पाल्पसारवत्
तदनन्तर जो कालस्वरूप है, वही विरिञ्च (ब्रह्मा) भी कहा जाता है; और संसार में गिरना अत्यन्त भयानक है, मानो उसमें सार बहुत ही अल्प-अल्प हो।
Verse 139
अधर्मबीजभूतं तत्तमोलोभसमुद्गतम् । प्रजासु तासु राजेंद्र रागादिक्रमसाधनम्
वह प्रवृत्ति अधर्म का बीज बनती है, जो तम और लोभ से उत्पन्न होती है; हे राजेन्द्र, उन्हीं प्रजाओं में वही राग आदि विकारों की क्रमिक प्रवृत्ति का साधन बन जाती है।
Verse 140
ततः सा सहजासिद्धिस्तेषां नातीव जायते । राजन्वश्यादयश्चान्याः सिद्धयोष्टौ भवंति याः
इस कारण उनमें वह सहज सिद्धि अत्यधिक प्रबल होकर प्रकट नहीं होती। हे राजन्, वश्य आदि अन्य सिद्धियाँ भी होती हैं—जो प्रसिद्ध आठ सिद्धियाँ कही गई हैं।
Verse 141
तासु क्षीणास्वशेषासु वर्द्धमाने च पातके । द्वंद्वाभिभवदुःखार्तास्ता भवंति ततः प्रजाः
जब वे (सत्-स्थितियाँ) पूर्णतः क्षीण हो जाती हैं और पाप बढ़ने लगता है, तब द्वन्द्वों से अभिभूत होकर उत्पन्न दुःख से पीड़ित प्रजाएँ जन्म लेती हैं।
Verse 142
ततो दुर्गाणि ताश्चक्रुर्वार्क्षं पार्वतमौदकम् । धान्वनं च तथा दुर्गं पुरं खार्वटकादि यत्
तब उन्होंने दुर्ग बनाए—वन-दुर्ग, पर्वत-दुर्ग, जल-दुर्ग और मरु-दुर्ग; तथा खार्वटक आदि नगर भी निर्मित किए।
Verse 143
गृहाणि च यथान्यायं तेषु चक्रुः पुरादिषु । शीततापादिबाधानां प्रशमाय महामते
और उन्होंने नगरों आदि में विधिपूर्वक घर बनाए, हे महामते, ताकि शीत-ताप आदि बाधाओं का शमन हो सके।
Verse 144
प्रतिहारमिमं कृत्वा शीतादेस्ताः प्रजाः पुनः । वार्तोपायं ततश्चक्रुर्हस्तसिद्धिं च कर्मजाम्
इस प्रकार शीत आदि कष्टों से रक्षा का उपाय करके वे प्रजाएँ फिर से जीविका के साधन बनाने लगीं और कर्म से उत्पन्न हस्तकौशल भी प्राप्त करने लगीं।
Verse 145
व्रीहयश्च यवाश्चैव गोधूमा अणवस्तिलाः । प्रियंगुकोविदाराश्च कोरदूषाः सचीनकाः
धान, जौ, गेहूँ, अणु (कंगनी/मिलेट) और तिल; तथा प्रियंगु, कोविदार, कोरदूष और सचीनेक—ये अन्न-भेद कहे गए हैं।
Verse 146
माषा मुद्गा मसूराश्च निष्पावाः सकुलत्थकाः । अढकाश्चणकाश्चैव शणास्सप्तदश स्मृताः
माष, मुद्ग, मसूर, निष्पाव और कुलत्थ; तथा अढका, चणक और शण—ये सत्रह प्रकार स्मरण किए गए हैं।
Verse 147
इत्येता ओषधीनां तु ग्राम्याणां जातयो नृप । ओषध्यो यज्ञियाश्चैव ग्राम्यावन्याश्चतुर्दश
हे नृप! इस प्रकार ये ग्राम्य (कृषि-उत्पन्न) औषधियों की जातियाँ कही गईं। यज्ञोपयोगी औषधियाँ तथा ग्राम्य और वन्य—ये मिलकर चौदह हैं।
Verse 148
व्रीहयः सयवा माषा गोधूमा अणवस्तिलाः । प्रियंगुसप्तमा ह्येता अष्टमास्तु कुलुत्थकाः
धान, जौ, माष, गेहूँ, अणु और तिल—ये; इनमें प्रियंगु सातवाँ है, और आठवाँ कुलत्थ कहा गया है।
Verse 149
श्यामाकस्त्वथ नीवारो वर्तुलस्स गवेधुकः । अथ वेणुयवाः प्रोक्तास्तद्वन्मर्कटका नृप
श्यामाक, फिर नीवार, वर्तुल और गवेधुक; तथा वेणुयव—ये सब कहे गए हैं; और वैसे ही मार्कटक नामक धान्य भी, हे नृप।
Verse 150
ग्राम्या वन्याः स्मृता ह्येता ओषध्यश्च चतुर्दश । यज्ञनिष्पत्तये तद्वत्तथासां हेतुरुत्तमः
ये औषधियाँ ग्राम्य और वन्य—ऐसी स्मरण की गई हैं; कुल चौदह हैं। यज्ञ की निष्पत्ति के लिए भी वे ही उत्तम कारण मानी गई हैं।
Verse 151
एताश्च सहयज्ञेन प्रजानां कारणं परम् । परापरविदः प्राज्ञास्ततो यज्ञान्वितन्वते
ये सब यज्ञ के साथ मिलकर प्रजा की उत्पत्ति का परम कारण हैं। इसलिए पर और अपर तत्त्व के ज्ञाता बुद्धिमान लोग यज्ञों का विस्तार करते हैं।
Verse 152
अहन्यहन्यनुष्ठानं यज्ञानां पार्थिवोत्तम । उपकारकरं पुंसां क्रियमाणं फलार्थिनाम्
हे राजश्रेष्ठ, यज्ञों का प्रतिदिन किया जाने वाला अनुष्ठान फल चाहने वाले मनुष्यों के लिए उपकारक होता है।
Verse 153
येषां चकालसृष्टोसौ पपाबिंदुर्महामते । मर्यादां स्थापयामास यथास्थानं यथागुणम्
हे महामते, जिन प्राणियों को उसने क्रम से रचा, उस पूज्य प्रजापति ने उनके लिए मर्यादा और व्यवस्था स्थापित की—उनके स्थान और गुण के अनुसार।
Verse 154
वर्णानामाश्रमाणां च धर्मान्धर्मभृतांवर । लोकांश्च सर्ववर्णानां सम्यग्धर्मानुपालिनाम्
हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ! मैं वर्णों और आश्रमों के धर्म तथा सम्यक् धर्म का पालन करने वाले सभी वर्णों के लोगों को प्राप्त होने वाले लोकों का वर्णन करता हूँ।
Verse 155
प्राजापत्यं ब्राह्मणानां स्मृतं स्थानं तु पार्थिव । स्थानमैंद्रं क्षत्रियाणां सङ्ग्रामेष्वनिवर्तिनाम्
हे पार्थिव! ब्राह्मणों का स्थान ‘प्राजापत्य’ कहा गया है; और संग्राम में न लौटने वाले क्षत्रियों का स्थान ‘ऐन्द्र’ (इन्द्रलोक) बताया गया है।
Verse 156
वैश्यानाम्मारुतं स्थानं स्वधर्ममनुवर्तिनाम् । गान्धर्वं शूद्रजातीनां परिचर्या सुवर्तिनाम्
स्वधर्म का अनुसरण करने वाले वैश्य ‘मारुत’ (वायुलोक) को प्राप्त होते हैं; और सुचरित्र शूद्र जातियाँ सेवा-परायण होकर ‘गान्धर्व’ लोक को प्राप्त करती हैं।
Verse 157
अष्टाशीतिसहस्राणां यतीनामूर्द्ध्वरेतसाम् । स्मृतं तेषां तु यत्स्थानं तदेव गुरुवासिनाम्
ऊर्ध्वरेतस् उन अट्ठासी हजार यतियों के लिए जो स्थान स्मृत है, वही स्थान गुरु के साथ निवास कर उनकी सेवा करने वालों का भी है।
Verse 158
सप्तर्षीणां च यत्स्थानं स्मृतं तद्वै वनौकसाम् । प्राजापत्यं गृहस्थानां न्यासिनां ब्राह्मसंज्ञितम्
सप्तर्षियों का जो स्थान स्मृत है, वही वनवासी (वानप्रस्थ) का है; गृहस्थों का ‘प्राजापत्य’ और संन्यासियों का ‘ब्राह्म’ नामक लोक कहा गया है।
Verse 159
योगिनाममृतं स्थानं ब्रह्मणः परमं पदं । एकांतिनः सदोद्युक्ता ध्यायिनो योगिनो हि ये
यह योगियों का अमृतमय धाम है—ब्रह्म का परम पद। जो एकाग्र-चित्त, सदा उद्यत ध्यानशील योगी हैं, वे ही उसे प्राप्त करते हैं।
Verse 160
तेषां तत्परमं स्थानं यत्तत्पश्यंति सूरयः । गतागतानि वर्त्तंते चंद्रादित्यादयो ग्रहाः
उनका वही परम धाम है, जिसे मुनि-ज्ञानी देखते हैं। वहाँ चन्द्र, सूर्य आदि ग्रह अपने आगमन-गमन के क्रम में निरन्तर चलते रहते हैं।
Verse 161
अद्यापि न निवर्तंते नारायणपरायणाः । तामिस्रमंधतामिस्रं महारौरव रौरवम्
आज भी जो नारायण-परायण हैं, वे उन अवस्थाओं में लौटते नहीं—तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव और रौरव में।
Verse 162
असिपत्रवनं घोरं कालसूत्रमवीचिमत् । विनिंदकानां वेदस्य यज्ञव्याघातकारिणाम्
जो वेद की निन्दा करते और यज्ञों में विघ्न डालते हैं, उनके लिए भयानक नरक हैं—असिपत्रवन, कालसूत्र और अवीचि।
Verse 163
स्थानमेतत्समाख्यातं स्वधर्मत्यागिनश्च ये । ततोभिध्यायतस्तस्य जज्ञिरे मानसाः प्रजाः
यह स्थान स्वधर्म का त्याग करने वालों के लिए बताया गया है। फिर उसके ध्यान करने पर उससे मानस-जन्य प्रजाएँ उत्पन्न हुईं।
Verse 164
तच्छरीरसमुत्पन्नैः कायस्थैः करणैः सह । क्षेत्रज्ञाः समवर्त्तंत गात्रेभ्यस्तस्य धीमतः
उस बुद्धिमान के शरीर से उत्पन्न देहस्थ इन्द्रियों के साथ, उसके ही अंगों से क्षेत्रज्ञ (चेतन जीवात्माएँ) प्रकट हुईं।
Verse 165
ते सर्वे समवर्तंत ये मया प्रागुदाहृताः । देवाद्याः स्थावरां ताश्च त्रैगुण्यविषयेस्थिताः
जिनका मैंने पहले वर्णन किया था, वे सब प्रकट हुए—देवों से आरम्भ करके स्थावर प्राणी भी—और वे त्रिगुणों के विषय-क्षेत्र में स्थित रहे।
Verse 166
एवं भूतानि सृष्टानि स्थावराणि चराणि च । यदास्य ताः प्रजाः सर्वानव्यवर्द्धंतधीमतः
इस प्रकार स्थावर और चर—दोनों प्रकार के भूत सृजित हुए; तब उस बुद्धिमान की वे सारी प्रजाएँ बढ़ीं नहीं (बहुगुणित न हुईं)।
Verse 167
अथान्यान्मानसान्पुत्रान्सदृशानात्मनोऽसृजत् । भृगुं मां पुलहं चैव क्रतुमंगिरसं तथा
फिर उसने अपने समान अन्य मानस-पुत्रों की सृष्टि की—भृगु, मरीचि, पुलह, क्रतु और अङ्गिरा भी।
Verse 168
मरीचिं दक्षमत्रिं चवसिष्ठंचैवमानसान् । नवब्रह्माण इत्येतेपुराणे निश्चयं गताः
मरीचि, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठ तथा ये मानस-पुत्र—पुराणों में निश्चय ही ये ‘नव ब्रह्मा’ (आदि-प्रजापति) कहे गए हैं।
Verse 169
सनंदनादयो ये च पूर्वं सृष्टास्तु वेधसा । न ते लोकेष्वसज्जंत निरपेक्षाः प्रजासुते
हे प्रजापते के पुत्र! सनंदन आदि, जिन्हें पहले विधाता ब्रह्मा ने रचा था, वे लोकों में आसक्त नहीं हुए; निरपेक्ष रहकर वे वैराग्य में स्थित रहे।
Verse 170
सर्वे ह्यागतविज्ञाना वीतरागा विमत्सराः । तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ महात्मनः
वे सब सत्य-ज्ञान को प्राप्त थे, रागरहित और मत्सररहित थे। ऐसे निरपेक्ष जनों के रहते महात्मा ने लोक-सृष्टि का प्रवर्तन किया।
Verse 171
ब्रह्मणोभून्महान्क्रोधस्त्रैलोक्यदहन क्षमः । तस्य क्रोधात्समुद्भूतं ज्वालामालावदीपितम्
ब्रह्मा में महान क्रोध उत्पन्न हुआ, जो त्रैलोक्य को दग्ध करने में समर्थ था; उस क्रोध से ज्वालामालाओं से दीप्त कोई प्रचंड तेज प्रकट हुआ।
Verse 172
ब्रह्मणस्तु तदा ज्योतिस्त्रैलोक्यमखिलं दहत् । भ्रकुटी कुटिलात्तस्य ललाटात्क्रोधदीपितात्
तब ब्रह्मा का तेज प्रज्वलित होकर समस्त त्रैलोक्य को दग्ध करने लगा; क्रोध से दीप्त, भृकुटि-वक्र हुए उनके ललाट से वह प्रकट हुआ।
Verse 173
समुत्पन्नस्तदा रुद्रो मध्याह्नार्कसमप्रभः । अर्द्धनारीनरवपुः प्रचण्डोति शरीरवान्
तब रुद्र प्रकट हुए—मध्याह्न के सूर्य के समान तेजस्वी; उनका स्वरूप अर्ध-नारी अर्ध-नर था, वे प्रचंड और महाकाय थे।
Verse 174
विभजात्मानमित्युक्त्वा तं ब्रह्मांतर्दधेः ततः । तथोक्तोसौ द्विधा स्त्रीत्वं पुरुषत्वं तथाकरोत्
“अपने को विभाजित करो” ऐसा कहकर ब्रह्मा तत्क्षण अंतर्धान हो गए। उस आदेश से वह द्विधा हो गया और स्त्री-रूप तथा पुरुष-रूप धारण कर लिया।
Verse 175
बिभेद पुरुषत्वं च दशधा चैकधा च सः । सौम्यासौम्यैस्तथा रूपैः शांतैः स्त्रीत्वं च स प्रभुः
उस प्रभु ने पुरुषत्व को दस प्रकार और एक प्रकार—दोनों रूपों में विभक्त किया। और उसी प्रकार सौम्य-असौम्य, किंतु शांत रूपों द्वारा स्त्रीत्व को भी विभाजित किया।
Verse 176
बिभेद बहुधा चैव स्वरूपैरसितैः सितैः । ततो ब्रह्मा स्वयंभूतं पूर्वं स्वायंभुवं प्रभुम्
उसने काले और उजले स्वरूपों को धारण कर सृष्टि को अनेक प्रकार से विभक्त किया। फिर ब्रह्मा ने स्वयंभू प्रभु—प्रथम स्वायंभुव (मनु) को प्रकट किया।
Verse 177
आत्मानमेव कृतवान्प्रजापत्ये मनुं नृप । शतरूपां च तां नारीं तपोनिर्द्धूतकल्मषाम्
हे नृप! स्रष्टा ने अपने ही अंश से प्रजापति मनु को रचा, और तप से कल्मष-रहित हुई उस नारी शतरूपा को भी उत्पन्न किया।
Verse 178
स्वायंभुवो मनुर्नाम पत्नीत्वे जगृहे प्रभुः । तस्माच्च पुरुषाद्देवी शतरूपा व्यजायत
स्वायंभुव नामक मनु को प्रभु ने पत्नी-रूप में ग्रहण किया; और उस पुरुष से देवी शतरूपा का जन्म हुआ।
Verse 179
प्रियव्रतोत्तातनपाद प्रसूत्याकूति संज्ञितम् । ददौ प्रसूतिं दक्षाय आकूतिं रुचये पुरा
प्रियव्रत और उत्तानपाद से उत्पन्न दो कन्याएँ थीं—प्रसूति और आकूति। प्राचीन काल में उसने प्रसूति को दक्ष को और आकूति को रुचि को प्रदान किया।
Verse 180
प्रजापतिः स जग्राह तयोर्जज्ञे स दक्षिणः । पुत्रो यज्ञो महाभाग दंपत्योर्मिथुनं ततः
उस प्रजापति ने उसे पत्नी रूप में ग्रहण किया; उन दोनों से दक्षिणा नाम की कन्या उत्पन्न हुई। हे महाभाग! फिर उस दंपति से यज्ञ नामक पुत्र भी हुआ।
Verse 181
यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे । यामा इति समाख्याता देवाः स्वायंभुवे मनौ
यज्ञ की पत्नी दक्षिणा से बारह पुत्र उत्पन्न हुए। स्वायंभुव मनु के युग में वे ‘याम’ नामक देवगण के रूप में प्रसिद्ध थे।
Verse 182
प्रसूत्यां च तथा दक्षश्चतस्रो विंशतिं तथा । ससर्ज कन्यास्तासां तु सम्यङ्नामानि मे शृणु
और प्रसूति के द्वारा दक्ष ने इसी प्रकार चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं। अब उनके नाम मुझसे यथाक्रम सुनो।
Verse 183
श्रद्धा लक्ष्सीर्धृतिः पुष्टिस्तुष्टिर्मेधा क्रिया तथा । बुद्धिर्लज्जावपुः शांतिरृद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी
श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, पुष्टि, तुष्टि, मेधा और क्रिया; बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, ऋद्धि और कीर्ति—ये तेरह (कन्याएँ/गुण) हैं।
Verse 184
पत्न्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायिणीः प्रभुः । ताभ्यः शिष्टा यवीयस्य एकादश सुलोचनाः
पत्नी-प्राप्ति के हेतु प्रभु धर्म ने दक्ष की कन्याओं को स्वीकार किया। उन पत्नियों से फिर कनिष्ठा की शेष ग्यारह सुलोचना कन्याएँ उत्पन्न हुईं।
Verse 185
ख्यातिः सत्यथ संभूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा । सन्नतिश्चानसूया च ऊर्ज्जा स्वाहा स्वधा तथा
ख्याति, सत्य, संभूति, स्मृति, प्रीति और क्षमा; तथा सन्नति और अनसूया; और इसी प्रकार ऊर्ज्जा, स्वाहा तथा स्वधा।
Verse 186
भृगुर्भवो मरीचिश्च तथा चैवांगिरा मुनिः । अहं च पुलहश्चैव क्रतुर्मुनिवरस्तथा
भृगु, भव, मरीचि तथा मुनि अंगिरा; और मैं, पुलह तथा श्रेष्ठ मुनि क्रतु भी (गिने गए)।
Verse 187
अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च पितरश्च यथाक्रमम् । ख्यात्याद्या जगृहुः कन्या मुनयो राजसत्तम
हे राजश्रेष्ठ! अत्रि, वसिष्ठ, वह्नि (अग्नि) और पितर—इन मुनियों ने क्रम से ख्याति आदि कन्याओं को पत्नी रूप में ग्रहण किया।
Verse 188
श्रद्धा कामं बलं लक्ष्मीर्नियमं धृतिरात्मजम् । संतोषं च तथा तुष्टिर्लोभं पुष्टिरसूयत
उसने श्रद्धा, काम, बल, लक्ष्मी, नियम और धृति—इन पुत्रों को जन्म दिया; तथा संतोष, तुष्टि, लोभ और पुष्टि को भी उत्पन्न किया।
Verse 189
मेधा श्रुतं क्रिया दण्डं नयं विनयमवे च । बोधं बुद्धिस्तथा लज्जा विनयं वपुरात्मजम्
मेधा, श्रुति-ज्ञान, सत्क्रिया, दण्ड-नियम, नीति और विनय; तथा बोध, बुद्धि, लज्जा और सदाचार—ये सब अपने ही स्वभाव और देह से उत्पन्न सच्ची संतानें हैं।
Verse 190
व्यवसायं प्रजज्ञे वै क्षेमं शान्तिरसूयत । सुखमृद्धिर्यशः कीर्तिरित्येते धर्मसूनवः
धर्म से निश्चय ही ‘व्यवसाय’ उत्पन्न हुआ; और शान्ति से ‘क्षेम’ जन्मा। सुख, समृद्धि, यश और कीर्ति—ये धर्म के पुत्र कहे जाते हैं।
Verse 191
कामान्नंदी सुतं हर्षं धर्मपौत्रमसूयत । हिंसा भार्यात्वधर्मस्य तस्य जज्ञे तदानृतं
काम से नन्दी ने ‘हर्ष’ नामक पुत्र को जन्म दिया, जो धर्म का पौत्र था। और अधर्म की पत्नी हिंसा से तब ‘अनृत’ (असत्य) उत्पन्न हुआ।
Verse 192
कन्या च निकृतिस्ताभ्यां भयं नरक एव च । माया च वेदना चैव मिथुनं द्वंद्वमेव च
और ‘कन्या’ तथा ‘निकृति’ उत्पन्न हुईं; उनसे ‘भय’ और ‘नरक’ भी। तथा ‘माया’ और ‘वेदना’—और ‘मिथुन’ तथा ‘द्वन्द्व’ का भी प्रादुर्भाव हुआ।
Verse 193
तयोर्जज्ञेथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम् । वेदनायास्ततश्चापि दुःखं जज्ञेथ रौरवात्
उन दोनों से निश्चय ही ‘माया’ और प्राणियों का अपहरण करने वाला ‘मृत्यु’ उत्पन्न हुआ। और ‘वेदना’ से फिर ‘रौरव’ से उद्भूत ‘दुःख’ जन्मा।
Verse 194
मृत्योर्व्याधिजराशोक तृष्णाक्रोधाश्च जज्ञिरे । दुःखोत्तराः स्मृता ह्येते सर्वे चाधर्मलक्षणाः
मृत्यु से रोग, जरा और शोक उत्पन्न हुए; तथा तृष्णा और क्रोध भी जन्मे। ये सब दुःख में परिणत होने वाले माने गए हैं और ये सभी अधर्म के लक्षण हैं।
Verse 195
नैषां भार्यास्ति पुत्रो वा ते सर्वे ह्यूर्द्ध्वरेतसः । रौद्राण्येतानि रूपाणि ब्रह्मणो नृवरात्मज
उनकी न पत्नी है, न पुत्र; क्योंकि वे सब ऊर्ध्वरेतस्, ब्रह्मचर्य-निष्ठ हैं। हे नरश्रेष्ठ के पुत्र, ये ब्रह्मा के रौद्र (उग्र) रूप हैं।
Verse 196
नित्यं प्रलयहेतुत्वं जगतोस्य प्रयांति वै । रुद्रसर्गं प्रवक्ष्यामि यथा ब्रह्मा चकार हा
वे कहते हैं कि यह जगत सदा प्रलय-हेतु की ओर ही प्रवृत्त होता रहता है। अब मैं रुद्र-सर्ग का वर्णन करूँगा, जैसा ब्रह्मा ने किया था।
Verse 197
कल्पादावात्मनस्तुल्यं सुतं प्रध्यायतस्ततः । प्रादुरासीत्प्रभोरंके कुमारो नीललोहितः
कल्प के आरम्भ में प्रभु ने अपने समान एक पुत्र का ध्यान किया; तब प्रभु की गोद में नीललोहित नामक कुमार प्रकट हुआ।
Verse 198
रुदन्वै सुस्वरं सोथ द्रवंश्च नृपसत्तम । किं रोदिषीति तं देवो रुदंतं प्रत्युवाच ह
तब, हे नृपश्रेष्ठ, वह मधुर-उच्च स्वर से रोने लगा और काँपने भी लगा। उसे रोते देखकर देव ने कहा—“तू क्यों रोता है?”
Verse 199
नामधेहीति तं सोथ प्रत्युवाच प्रजापतिम् । रोदनाद्रुद्रनामासि मा रोदीर्धैर्यमावह
जब उसने कहा, “मुझे नाम दीजिए,” तब प्रजापति ने उत्तर दिया—“रोने के कारण तेरा नाम ‘रुद्र’ है; मत रो, धैर्य धारण कर।”
Verse 200
एवमुक्तः पुनस्सोथ सप्तकृत्वो रुरोद ह । ततोन्यानि ददौ तस्मै सप्तनामानि वै प्रभुः
ऐसा कहे जाने पर वह फिर सात बार रो पड़ा; तब प्रभु ने उसे सात अन्य नाम भी प्रदान किए।