
महिषासुरसैन्यवधः (Mahiṣāsurasainyavadhaḥ)
Narayani Stuti
इस अध्याय में देवी दुर्गा महिषासुर की विशाल सेना का संहार करती हैं। अपने शूल, चक्र आदि दिव्य आयुधों से वे दैत्य-रथ, अश्व, गज और पदाति दलों को नष्ट कर देती हैं। अंत में महिषासुर अनेक रूप धारण कर मायायुद्ध करता है, पर देवी उसका अभिमान तोड़कर उसे रणभूमि में मार देती हैं और देवताओं व जगत को भयमुक्त करती हैं।
Verse 1
इति श्रीमार्कण्डेयमहापुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये महिषासुरसैन्यवधो नाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः । ऋषिरुवाच— निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः । सेनानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्धुमथाम्बिकाम् ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय महापुराण के सावर्णि मन्वन्तर के देवी-माहात्म्य में ‘महिषासुर की सेना-वध’ नामक बयासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ। ऋषि बोले—अपनी सेना को मारा जाता देखकर महान असुर, सेनापति चिक्षुर, क्रोध से भरकर अम्बिका से युद्ध करने निकल पड़ा।
Verse 2
स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः । यथा मेरुगिरेः शृङ्गं तोयवर्षेण तोयदः ॥
युद्ध में उस असुर ने देवी पर बाणों की वर्षा की—जैसे वर्षा-मेघ मेरु पर्वत की चोटी पर जल-वृष्टि करता है।
Verse 3
तस्य छित्त्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान् । जघान तुरगान् बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम् ॥
तब देवी ने उसके बाणों के समूह को मानो खेल-खेल में काट डाला; और अपने बाणों से घोड़ों को गिरा दिया तथा उन अश्वों के सारथी को भी मार गिराया।
Verse 4
चिच्छेद च धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छ्रितम् । विव्याध चैव गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः ॥
उसने तुरंत उसका धनुष काट दिया और ऊँचा उठा हुआ ध्वज भी। फिर जिसका धनुष कट चुका था, उसके अंगों को तीव्र बाणों से बेध दिया।
Verse 5
स छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । अभ्यधावत तां देवीं खड्गचर्मधरोऽसुरः ॥
उसका धनुष टूट गया, रथ चूर हो गया, घोड़े मारे गए और सारथी भी मारा गया। तब वह असुर तलवार और ढाल धारण कर देवी पर सीधा टूट पड़ा।
Verse 6
सिंहमाहत्य खड्गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि । आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान् ॥
उस अत्यन्त वेगवान ने तीक्ष्ण धार वाली तलवार से सिंह के सिर पर प्रहार किया और देवी के बाएँ भुजादण्ड पर भी आघात किया।
Verse 7
तस्याः खड्गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन । ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः ॥
हे राजानन्दिनी! देवी की तलवार उसके भुजा तक पहुँचकर उसे चीर गई। तब वह क्रोध से लाल नेत्रों वाला होकर त्रिशूल उठा लाया।
Verse 8
चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः । जाज्वल्यमानं तेजोभी रविबिम्बमिवाम्बरात् ॥
तब उस महाअसुर ने तेज से दहकता त्रिशूल भद्रकाली पर ऐसा फेंका मानो आकाश से सूर्य-मण्डल गिर पड़ा हो।
Verse 9
दृष्ट्वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुंचत । तच्छूलं शतधा तेन नीतं स च महासुरः ॥
उस त्रिशूल को अपनी ओर आते देखकर देवी ने अपना त्रिशूल छोड़ा। उससे वह त्रिशूल सौ टुकड़ों में टूट गया और वह महाअसुर भी वहीं निहत हो गया।
Verse 10
हते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ । आजगाम गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः ॥
जब महिष की सेना का वह महाबली नायक, सेनापति, मारा गया, तब देवों का मर्दक चामर हाथी पर आरूढ़ होकर आ पहुँचा।
Verse 11
सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम् । हुङ्काराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम् ॥
उसने भी देवी पर शक्ति (भाला) छोड़ी; पर अम्बिका ने तुरंत अपने हुंकार से उसे गिरा दिया, और वह तेजहीन होकर भूमि पर पड़ गई।
Verse 12
भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः । चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत् ॥
अपनी शक्ति को टूटी और गिरी देखकर चामर क्रोध से भर उठा और त्रिशूल फेंका; उसे भी देवी ने बाणों से काट डाला।
Verse 13
ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः । बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा ॥
तब सिंह उछलकर हाथी के कुम्भस्थलों के बीच जा खड़ा हुआ और देवों के उस उन्नत शत्रु चामर से बाहुयुद्ध करने लगा।
Verse 14
युधायमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ । युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः ॥
युद्ध करते-करते वे दोनों उस हाथी से उतरकर भूमि पर आ गए और परम क्रोध में अत्यन्त भयानक प्रहारों से घोर संग्राम करने लगे।
Verse 15
ततो वेगात्खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा । करप्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक्कृतम् ॥
तब सिंह वेग से आकाश में उछलकर नीचे झपटा और अपने पंजे के प्रहार से चामर का सिर काट गिराया।
Verse 16
उदग्रश्च रणे देव्याः शिलावृक्षादिभिर्हतः । दन्तमुष्टितलैश्चैव करालश्च निपातितः ॥
और उदग्र देवी की सेनाओं द्वारा शिलाओं, वृक्षों आदि से युद्ध में मारा गया; तथा कराल भी दाँतों, मुक्कों और हथेलियों के प्रहार से गिर पड़ा।
Verse 17
देवी क्रुद्धा गदापातैश्चूर्णयामास चोद्धतम् । वाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्ताम्रं तथान्धकम् ॥
देवी क्रुद्ध होकर गदा के प्रहारों से उस दर्पी को कुचलने लगी। वाष्कल को भिन्दिपाल से चीर दिया और ताम्र तथा अन्धक को बाणों से मार गिराया।
Verse 18
उग्रास्यमुग्रवीर्यञ्च तथैव च महाहनुम् । त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी ॥
त्रिनेत्री परमेश्वरी देवी ने अपने त्रिशूल से उग्रास्य, उग्रवीर्य और महाहनु का वध किया।
Verse 19
बिडालस्यासिना कायात् पातयामास वै शिरः । दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम् । कालं च कालदण्डेन कालरात्रिरपातयत् ॥
बिडाल का सिर देवी ने खड्ग से धड़ से अलग कर दिया। दुर्धर और दुर्मुख—दोनों को बाणों से यमलोक भेज दिया। और काल को भी कालरात्रि ने कालदण्ड से मार गिराया।
Verse 20
अग्रदर्शनमत्युग्रैः खड्गपातैरताडयत् । असिनैवासिलोमानमच्छिदत् सा रणोत्सवे । गणैः सिंहॆन देव्याः च जयक्ष्वेडाकृतोत्सवैः ॥
देवी ने अत्यन्त भयानक तलवार-प्रहारों से अग्रदर्शन का वध किया और उस रणोत्सव में तलवार से ही असिलोमा को भी काट गिराया; तब देवी के गण और उनका सिंह जय-जयकार करते हुए उत्सव मनाने लगे।
Verse 21
एवं संक्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः । माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान् ॥
अपनी सेना को इस प्रकार नष्ट होते देखकर महिषासुर ने भैंसे का रूप धारण किया और उन गणों को भयभीत करने लगा।
Verse 22
कांश्चित्तुण्डप्रिहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान् । लाङ्गूलताडितांश्चान्यान् शृङ्गाभ्याञ्च विदारितान् ॥
किसी को उसने अपनी सूँड़ के प्रहारों से मारा, किसी को खुरों की लातों से उछाल दिया; किसी को पूँछ से पीटा और किसी को सींगों से फाड़ डाला।
Verse 23
वेगेन कांश्चिदपरान् नादेन भ्रमणेन च । निश्वासपवनेनान्यान् पातयामास भूतले ॥
कुछ को उसने केवल अपने वेग से गिरा दिया, कुछ को गर्जना और चक्करदार गतियों से; और कुछ को अपनी साँस की हवा से धरती पर पटक दिया।
Verse 24
निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः । सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका ॥
प्रमथों की सेना को गिराकर वह दैत्य महादेवी के सिंह को मारने के लिए दौड़ा; तब अम्बिका क्रोधित हो उठीं।
Verse 25
सोऽपि कोपान्महावीऱ्यः खुरक्षुण्णमहीतलः । शृङ्गाभ्यां पर्वतानुच्चैश्चिक्षेप च ननाद च ॥
वह भी महाबली और पराक्रमी, क्रोध से उन्मत्त होकर अपने खुरों से पृथ्वी को मथने लगा। अपने सींगों से ऊँचे पर्वतों को उछालकर उसने गर्जना की।
Verse 26
वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत । लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः ॥
उसकी तीव्र घूमती चाल से पृथ्वी विदीर्ण हो गई। और उसकी पूँछ के प्रहार से आहत समुद्र उफनकर चारों ओर फैल गया और सब जगह जल-प्लावन कर दिया।
Verse 27
धुतशृङ्गविभिन्नाश्च खण्डं खण्डं ययुर्घनाः । श्वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः ॥
उसके सींगों के झटकों से मेघ खंड-खंड होकर बिखर गए। और उसकी श्वास के वायु से प्रेरित होकर आकाश से सैकड़ों पर्वत गिर पड़े।
Verse 28
इति क्रोधसमाध्मातमापतान्तं महासुरम् । दृष्ट्वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत् ॥
उस महान असुर को, क्रोध से फूला हुआ और वेग से दौड़ता हुआ देखकर, चण्डिका ने तब उसे मारने के लिए अपना रोष धारण किया।
Verse 29
सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम् । तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे ॥
उस पर अपना पाश फेंककर उसने उस महान असुर को बाँध लिया। और वह महान युद्ध में बँधा हुआ भी, अपना महिष-रूप त्यागकर (अन्य रूप में) हो गया।
Verse 30
ततः सिंहोऽभवत् सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः । छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत ॥
वह तत्क्षण सिंह बन गया; और जब अम्बिका उसका सिर काटने ही वाली थीं, तभी हाथ में तलवार लिए एक पुरुष प्रकट हुआ।
Verse 31
तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः । तं खड्गचर्मणा सार्धं ततः सोऽभून्महागजः ॥
तभी देवी ने वेग से अपने बाणों द्वारा उस पुरुष को—उसकी तलवार और ढाल सहित—गिरा दिया; फिर वह महान हाथी बन गया।
Verse 32
करेण च महासींहं तं चकर्ष जगर्ज च । कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत ॥
वह अपनी सूँड़ से उस महान सिंह को घसीटता हुआ गरजा; पर घसीटते ही देवी ने अपनी तलवार से उसकी सूँड़ काट दी।
Verse 33
ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः । तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥
तब वह महान असुर फिर से महिष (भैंसे) का शरीर धारण कर बैठा; और चर-अचर सहित तीनों लोकों को कंपाता रहा।
Verse 34
ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम् । पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना ॥
तब जगन्माता चण्डिका क्रोध से भरकर बार-बार उत्तम मद्य पीने लगीं; और उनकी आँखें लाल हो उठीं, वे हँस पड़ीं।
Verse 35
ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः । विषाणाभ्यां चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान् ॥
वह असुर भी अपने बल और पराक्रम के मद से उन्मत्त होकर गर्जना करने लगा और अपने सींगों से चण्डिका पर पर्वत फेंकने लगा।
Verse 36
सा च तान् प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः । उवाच तं मदोद्धूतमुखरागाकुलाक्षरम् ॥
और देवी ने उसके द्वारा फेंके गए उन पर्वतों को बाणों की वर्षा से चूर्ण कर दिया और मद से उच्छृंखल वाणी तथा भ्रमित शब्दों वाले उससे कहा।
Verse 37
देव्युवाच गरज गरज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम् । मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥
देवी बोलीं— “गर्ज, गर्ज थोड़ी देर, मूढ़! जब तक मैं यह मधु पी लूँ। जब तू यहीं मेरे द्वारा मारा जाएगा, तब देवता शीघ्र ही जय-गर्जना करेंगे।”
Verse 38
ऋषिरुवाच एवमुक्त्वा समुत्पत्य सारूढा तं महासुरम् । पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत् ॥
ऋषि बोले— ऐसा कहकर वह उछल पड़ी, उस महाअसुर पर चढ़ गई, उसे पाँव से दबाया और उसके गले में अपना शूल मार दिया।
Verse 39
ततः सोऽपि पदाक्रान्तस्तया निजमुखात्ततः । अर्धनिष्क्रान्त एवासीद् देव्याः वीर्येण संवृतः ॥
तब वह, देवी के पाँव से दबा हुआ होने पर भी, अपने ही मुख से बाहर निकलने लगा; पर देवी के प्रभाव से रोका और बाँधा जाकर वह आधा ही निकला रह गया।
Verse 40
अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः । तया महासिना देव्याः शिरश्छित्त्वा निपातितः ॥
अभी आधा ही प्रकट होकर युद्ध करते हुए उस महान असुर को देवी ने अपनी महाखड्ग से सिर काटकर गिरा दिया।
Verse 41
एवं स महिषो नाम ससैन्यः ससुहृद्गणः । त्रैलोक्यं मोहयित्वा तु तया देव्याः विनाशितः ॥
इस प्रकार तीनों लोकों को मोहित करने वाला ‘महिष’ नामक वह असुर देवी द्वारा—अपनी सेना और सहायक दल सहित—नष्ट कर दिया गया।
Verse 42
त्रैलोक्यस्थैस्तदा भूतैर्महिषे विनिपातिते । जयेत्युक्तं ततः सर्वैः सदेवासुरमानवैः ॥
फिर महिष के गिरते ही तीनों लोकों के समस्त प्राणियों ने—देव, असुर और मनुष्य सहित—‘जय!’ का उद्घोष किया।
Verse 43
ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत् । प्रहर्षं च परं जग्मुः सकला देवतागणाः ॥
तब ‘हाय! हाय!’ पुकारती हुई दैत्यों की समस्त सेना पराजित होकर नष्ट हो गई; और देवगणों के सभी समुदाय परम आनंद को प्राप्त हुए।
Verse 44
तुष्टुवुस्तां सुरा देवीṃ सह दिव्यैर्महर्षिभिः । जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥
देवताओं ने दिव्य महर्षियों सहित उस देवी की स्तुति की; गन्धर्वों के अधिपतियों ने गान किया, और अप्सराओं के समुदायों ने नृत्य किया।
The chapter frames dharma as cosmic stability and adharma as violent, shape-shifting disruption: Mahiṣāsura’s protean forms symbolize evasive, escalating disorder, while the Devī’s measured yet absolute force represents sovereign restoration of moral and cosmological balance.
As part of the Devīmāhātmya embedded in the Sāvarṇika Manvantara setting, this Adhyāya anchors Manvantara history in shaktic intervention: the Devī’s victory functions as a paradigmatic event ensuring the continuity of divine governance across the three worlds within that Manvantara frame.
It delivers the climactic iconography and theology of the Mahiṣāsuramardinī episode: Caṇḍikā binds the asura with a pāśa, pins him underfoot, pierces him with the śūla, and beheads him—followed by universal acclamation and praise—establishing the Devī as the decisive salvific power over cosmic crisis.