
Śānti Parva Adhyāya 43 — Yudhiṣṭhira’s Stuti of Kṛṣṇa (Assembly Hymn of Many Names)
Upa-parva: Kṛṣṇa-stuti and Royal Gratitude Episode (Śānti Parva context)
Vaiśaṃpāyana reports that after Yudhiṣṭhira’s consecration and accession, he addresses Kṛṣṇa with folded hands in a purified, formal posture. Yudhiṣṭhira attributes the recovery of the paternal and ancestral kingdom to Kṛṣṇa’s favor, policy, strength, intellect, and valor, thereby framing political restoration as a composite of strategy and grace. He then recites an extended stuti enumerating Kṛṣṇa/Vişṇu’s epithets and cosmic functions: creatorly agency, immanence as the world-self, protective and victorious aspects, and multiple mythic identifications (e.g., Varāha, Vāmana) alongside abstract titles (Puruṣottama, Viśvayonī). The chapter closes with Kṛṣṇa receiving the praise with satisfaction in the assembly and responding with affirming speech to the eldest Pāṇḍava, signaling mutual recognition and stabilizing the post-conflict court through devotional-theological articulation.
Chapter Arc: राज्याभिषेक के बाद पुनः प्राप्त पितृ-पैतामह राज्य को पाकर धर्मराज युधिष्ठिर, हाथ जोड़कर, कमलनयन श्रीकृष्ण के सम्मुख कृतज्ञता और विस्मय से भर उठते हैं—यह विजय का नहीं, कृपा का क्षण है। → युधिष्ठिर का मन राजधर्म की जटिलताओं (मन्त्रणा, सन्धि-विग्रह आदि) और युद्धोत्तर पाप-शोक की छाया से घिरा है; उसी भार को हल्का करने हेतु वे कृष्ण को एक-एक नाम से नहीं, समस्त जगत् के आधार-स्वरूप के रूप में पुकारते हुए स्तुति का विस्तार करते जाते हैं। → सभा-मध्य में युधिष्ठिर द्वारा विष्णु/कृष्ण के ‘नामशत’ का उत्कर्ष—‘विश्वकर्मन्, विश्वात्मन्… विष्णो, जिष्णो, हरे, कृष्ण, वैकुण्ठ, पुरुषोत्तम… सम्राट्, विराट्, स्वराट्…’—जहाँ कृष्ण को सृष्टि, यज्ञ, धर्म और राजसत्ता के परम स्रोत के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। → धर्मराज की स्तुति से प्रसन्न यादवाग्र्य श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को अभिनन्दित करते हैं; अध्याय का फलश्रुति-स्वरूप निष्कर्ष यह कि इस नामशत का पाठ/श्रवण सर्वपाप-नाशक है।
Verse 1
नम + () अआसजआन+- ३. राज-काजके सम्बन्धमें गुप्त सलाह देना--“मन्त्रणा' है। २. सन्दधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव तथा समाश्रय--ये छ: राजाके नीतिसम्बन्धी गुण हैं। त्रिचत्वारिशो 5 ध्याय: युधिष्ठिरद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति वैशम्पायन उवाच अभिषिक्तो महाप्राज्ञो राज्यं प्राप्प युधिष्ठिर: । दाशाहं पुण्डरीकाक्षमुवाच प्राञउ्जलि: शुचि:
वैशम्पायन बोले—राज्याभिषेक हो जाने पर राज्य प्राप्त करके महाप्राज्ञ युधिष्ठिर, शुद्ध आचरण वाले, दस दिनों तक हाथ जोड़कर कमलनयन श्रीकृष्ण से बोले।
Verse 2
वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! राज्याभिषेकके पश्चात् राज्य पाकर परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरने पवित्रभावसे हाथ जोड़कर कमलनयन दशार्हवंशी श्रीकृष्णसे कहा-- ।। तव कृष्ण प्रसादेन नयेन च बलेन च । बुद्धया च यदुशार्दूल तथा विक्रमणेन च,'यदुसिंह श्रीकृष्ण! आपकी ही कृपा, नीति, बल, बुद्धि और पराक्रमसे मुझे पुनः अपने बाप-दादोंका यह राज्य प्राप्त हुआ है। शत्रुओंका दमन करनेवाले कमलनयन! आपको बारंबार नमस्कार है
वैशम्पायन बोले—राजन्! राज्याभिषेक के पश्चात् राज्य पाकर परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर ने पवित्र भाव से हाथ जोड़कर कमलनयन दाशार्हवंशी श्रीकृष्ण से कहा—“हे कृष्ण! हे यदुशार्दूल! आपकी कृपा, नीति, बल, बुद्धि और पराक्रम से ही मैंने अपने पितृ-पैतामहों का यह राज्य फिर से प्राप्त किया है। शत्रुओं का दमन करने वाले कमलनयन! आपको बार-बार नमस्कार है।”
Verse 3
पुन: प्राप्तमिदं राज्यं पितृपैतामहं मया । नमस्ते पुण्डरीकाक्ष पुनः पुनररिंदम,'यदुसिंह श्रीकृष्ण! आपकी ही कृपा, नीति, बल, बुद्धि और पराक्रमसे मुझे पुनः अपने बाप-दादोंका यह राज्य प्राप्त हुआ है। शत्रुओंका दमन करनेवाले कमलनयन! आपको बारंबार नमस्कार है
मैंने अपने पितृ-पैतामहों का यह राज्य फिर से प्राप्त किया है। शत्रुओं का दमन करने वाले कमलनयन! आपको बार-बार नमस्कार है।
Verse 4
त्वामेकमाहु: पुरुष त्वामाहु: सात्वतां पतिम् । नामभि स्त्वां बहुविधै: स्तुवन्ति प्रयता द्विजा:,“अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाले द्विज एकमात्र आपको ही अन्तर्यामी पुरुष एवं उपासना करनेवाले भक्तोंका प्रतिपालक बताते हैं। साथ ही वे नाना प्रकारके नामोंद्वारा आपकी स्तुति करते हैं
संयमशील द्विज आपको ही एकमात्र अन्तर्यामी पुरुष और सात्वत-भक्तों के स्वामी-प्रतिपालक कहते हैं; और वे अनेक प्रकार के नामों से, एकाग्र चित्त होकर, आपकी स्तुति करते हैं।
Verse 5
विश्वकर्मन् नमस्ते<स्तु विश्वात्मन् विश्वसम्भव । विष्णो जिष्णो हरे कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम,“यह सम्पूर्ण विश्व आपकी लीलामयी सृष्टि है। आप इस विश्वके आत्मा हैं। आपहीसे इस जगत्की उत्पत्ति हुई है। आप ही व्यापक होनेके कारण “विष्णु', विजयी होनेसे 'जिष्णु', दुःख और पाप हर लेनेसे “हरि', अपनी ओर आकृष्ट करनेके कारण “कृष्ण', विकुण्ठ धामके अधिपति होनेसे “वैकुण्ठ” तथा क्षर-अक्षर पुरुषसे उत्तम होनेके कारण 'पुरुषोतम” कहलाते हैं। आपको नमस्कार है
हे विश्वकर्मन्! आपको नमस्कार है। हे विश्वात्मन्, हे विश्वसम्भव! हे विष्णो, हे जिष्णो, हे हरे, हे कृष्ण, हे वैकुण्ठ, हे पुरुषोत्तम! यह समस्त जगत् आपकी लीलामयी सृष्टि है; आप ही इसके अन्तरात्मा हैं और आप ही से इसकी उत्पत्ति होती है। सर्वव्यापक होने से आप ‘विष्णु’, सदा विजयी होने से ‘जिष्णु’, दुःख-पाप हरने से ‘हरि’, सबको अपनी ओर आकृष्ट करने से ‘कृष्ण’, वैकुण्ठधाम के अधिपति होने से ‘वैकुण्ठ’, और क्षर-अक्षर से परे होने से ‘पुरुषोत्तम’ कहलाते हैं।
Verse 6
अदित्या: सप्तधा त्वं तु पुराणो गर्भतां गत: । पृश्चिगर्भस्त्वमेवैकस्त्रियुगं त्वां वदन्त्यपि,“आप पुराणपुरुष परमात्माने ही सात प्रकारसे अदितिके गर्भमें अवतार लिया है। आप ही पृश्चिगर्भके नामसे प्रसिद्ध हैं। विद्वानूलोग तीनों युगोंमें प्रकट होनेके कारण आपको “तत्रियुग” कहते हैं
हे पुराणपुरुष! आपने अदिति के गर्भ में सात प्रकार से अवतार लिया; आप ही एकमात्र ‘पृश्चिगर्भ’ के नाम से प्रसिद्ध हैं; और तीनों युगों में प्रकट होने के कारण विद्वान आपको ‘त्रियुग’ भी कहते हैं।
Verse 7
शुचिश्रवा हृषीकेशो घृतार्चिहँस उच्यते । त्रिचक्षु: शम्भुरेकस्त्वं विभुर्दामोदरोडपि च,“आपकी कीर्ति परम पवित्र है। आप सम्पूर्ण इन्द्रियोंके प्रेरक हैं। घृत ही जिसकी ज्वाला है--वह यज्ञपुरुष आप ही हैं। आप ही हंस (विशुद्ध परमात्मा) कहे जाते हैं। त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर और आप एक ही हैं। आप सर्वव्यापी होनेके साथ ही दामोदर (यशोदा मैयाके द्वारा बाँध जानेवाले नटवरनागर) भी हैं
आपकी कीर्ति परम पवित्र है; आप हृषीकेश—समस्त इन्द्रियों के प्रेरक—हैं। घृत ही जिसकी ज्वाला है, वह यज्ञपुरुष भी आप ही हैं; और आप ‘हंस’—निर्मल परमात्मा—कहे जाते हैं। त्रिनेत्रधारी शम्भु और आप एक ही हैं। आप सर्वव्यापी विभु होकर भी दामोदर हैं—जो यशोदा के बन्धन को स्वीकार करते हैं।
Verse 8
वराहो<न्निर्बहद्धानुर्वषभस्ताक्ष्यलक्षण: । अनीकसाह: पुरुष: शिपिविष्ट उरुक्रम:,“वराह, अग्नि, बृहद्धानु (सूर्य), वृषभ (धर्म), गरुडध्वज, अनीकसाह (शत्रुसेनाका वेग सह सकनेवाले), पुरुष (अन्तर्यामी), शिपिविष्ट (सबके शरीरमें आत्मारूपसे प्रविष्ट) और उरुक्रम (वामन)--ये सभी आपके ही नाम और रूप हैं
वराह, अग्नि, बृहद्धानु (सूर्य), वृषभ (धर्म), गरुडध्वज, अनीकसाह, अन्तर्यामी पुरुष, शिपिविष्ट (सब देहों में आत्मरूप से प्रविष्ट) और उरुक्रम (वामन)—ये सब आपके ही नाम और रूप हैं।
Verse 9
वरिष्ठ उग्रसेनानी: सत्यो वाजसनिर्गुह: । अच्युतश्न्यावनो<रीणां संस्कृतो विकृतिर्वष:,'सबसे श्रेष्ठ, भयंकर सेनापति, सत्यस्वरूप, अन्नदाता तथा स्वामी कार्तिकिय भी आप ही हैं। आप स्वयं कभी युद्धसे विचलित न होकर शत्रुओंको पीछे हटा देते हैं। संस्कार- सम्पन्न द्विज और संस्कारशून्य वर्णसंकर भी आपके ही स्वरूप हैं। आप कामनाओंकी वर्षा करनेवाले वृष (धर्म) हैं
वैशम्पायन बोले— आप ही सर्वश्रेष्ठ, उग्र सेनापति, सत्यस्वरूप और अन्नदाता हैं; आप ही स्वामी कार्त्तिकेय भी हैं। युद्ध में अच्युत रहकर आप शत्रुओं को पीछे हटा देते हैं। संस्कार-संपन्न द्विज और संस्कारहीन वर्णसंकर—दोनों आपके ही रूप हैं। आप धर्मरूपी वृष हैं, जो कामनाओं की वर्षा करते हैं।
Verse 10
कृष्णधर्मस्त्वमेवादिर्वृषदर्भो वृषाकपि: । सिन्धुर्विधर्मस्त्रिककुप् त्रिधामा त्रिदिवाच्युत:,“कृष्णधर्म (यज्ञस्वरूप) और सबके आदिकारण आप ही हैं। वृषदर्भ (इन्द्रके दर्पका दलन करनेवाले) और वृषाकपि (हरिहर) भी आप ही हैं। आप ही सिन्धु (समुद्र), विधर्म (निर्मुण परमात्मा), त्रिककुप् (ऊपर-नीचे और मध्य--ये तीन दिशाएँ), त्रिधामा (सूर्य, चन्द्र और अग्नि ये त्रिविध तेज) तथा वैकुण्ठधामसे नीचे अवतीर्ण होनेवाले भी हैं
वैशम्पायन बोले— कृष्णधर्म (यज्ञस्वरूप) और सबके आदिकारण आप ही हैं। वृषदर्भ—इन्द्र के दर्प का दमन करनेवाले—और वृषाकपि—हरि-हर का ऐक्य—भी आप ही हैं। आप ही सिन्धु (समुद्र) हैं; आप ही विधर्म—निर्गुण, नियमों से परे परमात्मा—हैं। आप ही त्रिककुप् (ऊपर, मध्य और नीचे की त्रिविध दिशा-विस्तार) और त्रिधामा (सूर्य, चन्द्र, अग्नि का त्रिविध तेज) हैं। आप ही अच्युत हैं, जो स्वर्ग में स्तुत्य होकर भी लोकहित के लिए परम धाम से अवतरित होते हैं।
Verse 11
सम्राड् विराट् स्वराट् चैव सुरराजो भवोद्धव: । विभुर्भूरतिभू: कृष्ण: कृष्णवर्त्मा त्वमेव च,“आप सम्राट, विराट, स्वराट् और देवराज इन्द्र हैं। यह संसार आपहीसे प्रकट हुआ है। आप सर्वत्र व्यापक, नित्य सत्तारूप और निराकार परमात्मा हैं। आप ही कृष्ण (सबको अपनी ओर खींचनेवाले) और कृष्णवर्त्मा (अग्नि) हैं
वैशम्पायन बोले— आप सम्राट, विराट, स्वराट और देवराज इन्द्र हैं; यह जगत आप ही से प्रकट हुआ और आप ही में स्थित है। आप सर्वत्र व्यापक, नित्य सत्तारूप, निराकार परमेश्वर हैं। आप ही कृष्ण—सबको अपनी ओर खींचनेवाले—और कृष्णवर्त्मा—अग्निरूप तेजस्वी पथ—भी हैं; वास्तव में यह सब आप ही हैं।
Verse 12
स्विष्टकृद् भिषजावर्त: कपिलस्त्वं च वामन: । यज्ञो ध्रुवः पतड्ञश्न यज्ञसेनस्त्वमुच्यसे,“आपहीको लोग अभीष्टसाधक, अश्विनीकुमारोंके पिता सूर्य, कपिल मुनि, वामन, यज्ञ, ध्रुव, गरुड़ तथा यज्ञसेन कहते हैं
वैशम्पायन बोले— आपको लोग स्विष्टकृत् (सुसंपन्न यज्ञ का फल देनेवाले), भिषज् (वैद्य), आवर्त (चक्रवत् प्रवाह), कपिल और वामन—इन नामों से भी पुकारते हैं। आप ही यज्ञ, ध्रुव, पतंग (सूर्य) और यज्ञसेन कहलाते हैं।
Verse 13
शिखण्डी नहुषो बश्रु्दिव:स्पृक् त्वं पुनर्वसु: सुबभू रुक्मयज्ञश्न सुषेणो दुन्दुभिस्तथा,“आप अपने मस्तकपर मोरका पंख धारण करते हैं। आप ही पूर्वकालमें राजा नहुष होकर प्रकट हुए थे। आप सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त करनेवाले महेश्वर तथा एक ही पैरमें आकाशको नाप लेनेवाले विराट हैं। आप ही पुनर्वसु नक्षत्रके रूपमें प्रकाशित हो रहे हैं। सुबधु (अत्यन्त पिड़्ल वर्ण), रुक्मयज्ञ (सुवर्णकी दक्षिणासे भरपूर यज्ञ), सुषेण (सुन्दर सेनासे सम्पन्न) तथा दुन्दुभिस्वरूप हैं
वैशम्पायन बोले— आप शिखण्डी हैं—मस्तक पर मोरपंख धारण करनेवाले; आप ही पूर्वकाल में राजा नहुष हुए थे; आप ही बभ्रु हैं और द्युलोक को स्पर्श करनेवाले विराट्-स्वरूप हैं। आप पुनर्वसु नक्षत्र के रूप में भी प्रकाशित होते हैं। आप ही सुबभ्रु, रुक्मयज्ञ, सुषेण तथा दुन्दुभि-स्वरूप भी हैं।
Verse 14
गभस्तिनेमि: श्रीपद्म: पुष्कर: पुष्पधारण: । ऋशभेुर्विभु: सर्वसूक्ष्मश्षारित्रं चैव पठ्यसे,“आप ही गभस्तिनेमि (कालचक्र), श्रीपद्, पुष्कर, पुष्पधारी, ऋभु, विभु, सर्वथा सूक्ष्म और सदाचार स्वरूप कहलाते हैं
वैशम्पायन बोले— आप ही गभस्तिनेमि (कालचक्र-सदृश तेजस्वी), श्रीपद, पुष्कर, पुष्पधारी, ऋभु, विभु, सर्वथा सूक्ष्म तथा सदाचार-स्वरूप कहलाकर स्तुत और पाठ किए जाते हैं।
Verse 15
अम्भोनिधिवस्त्वं ब्रह्मा त्वं पवित्र धाम धामवित् | हिरण्यगर्भ त्वामाहु: स्वधा स्वाहा च केशव,“आप ही जलनिधि समुद्र, आप ही ब्रह्मा तथा आप ही पवित्र धाम एवं धामके ज्ञाता हैं। केशव! विद्वान् पुरुष आपको ही हिरण्यगर्भ, स्वधा और स्वाहा आदि नामोंसे पुकारते हैं
आप ही जलनिधि समुद्र हैं, आप ही ब्रह्मा हैं; आप ही पवित्र धाम और धाम के ज्ञाता हैं। केशव! विद्वान पुरुष आपको हिरण्यगर्भ, स्वधा और स्वाहा भी कहते हैं।
Verse 16
योनिस्त्वमस्य प्रलयश्न कृष्ण त्वमेवेदं सृजसे विश्वमग्रे | विश्व चेद॑ त्वद्वशे विश्वयोने नमोस्तु ते शार्डचक्रासिपाणे,'श्रीकृष्णण आप ही इस जगत्के आदि कारण हैं और आप ही इसके प्रलयस्थान। कल्पके आरम्भमें आप ही इस विश्वकी सृष्टि करते हैं। विश्वके कारण! यह सम्पूर्ण विश्व आपके ही अधीन है। हाथोंमें धनुष, चक्र और खड्ग धारण करनेवाले परमात्मन्! आपको नमस्कार है”
हे कृष्ण! आप ही इस जगत् के कारण और आप ही इसके प्रलय-स्थान हैं। कल्प के आरम्भ में आप ही इस समस्त विश्व की सृष्टि करते हैं। विश्वयोनि! यह पूरा जगत् आपके ही वश में है। शार्ङ्ग धनुष, चक्र और खड्ग धारण करने वाले परमात्मन्! आपको नमस्कार है।
Verse 17
एवं स्तुतो धर्मराजेन कृष्ण: सभामध्ये प्रीतिमान् पुष्कराक्ष: । तमभ्यनन्दद् भारतं पुष्कलाभि- वम्भिज्येष्ठं पाण्डवं यादवाग्र्य:,इस प्रकार जब धर्मराज युधिष्ठिरने सभामें यदुकुल-शिरोमणि कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति की, तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर भरतभूषण ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरका उत्तम वचनोंद्वारा अभिनन्दन किया
इस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा सभा में स्तुत किए जाने पर कमलनयन श्रीकृष्ण अत्यन्त प्रसन्न हुए। यदुकुल-श्रेष्ठ भगवान् ने भरतभूषण ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर का उत्तम और प्रचुर वचनों से अभिनन्दन किया।
Verse 42
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमनिशासनपर्वमें श्राद्धकर्मीवेषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में श्राद्धकर्म-विषयक बयालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 43
(एतन्नामशतं विष्णोर्धर्मराजेन कीर्तितम् | य: पठेच्छृणुयाद् वापि सर्वपापै: प्रमुच्यते ।।) जो धर्मराज युधिष्ठिरद्वारा वर्णित भगवान् श्रीकृष्णके इन सौ नामोंका पाठ या श्रवण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वासुदेवस्तुतौ त्रिचत्वारिंशो 5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमानुशासनपर्वें भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुतिविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
वैशम्पायन बोले—धर्मराज ने विष्णु के इन सौ नामों का कीर्तन किया है। जो इसका पाठ करता है या इसे सुनता भी है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में वासुदेव-स्तुति का तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
The emphasis is on moral accountability in rulership: Yudhiṣṭhira does not present sovereignty as self-generated but as contingent upon counsel, alliance, and ethical recognition of enabling causes, thereby moderating triumphalism with responsibility.
The stuti encodes a theological synthesis: the divine is described as both transcendent (Puruṣottama, Vaikuṇṭha) and immanent (Viśvātman, Viśvayoni), allowing political order to be interpreted within a cosmological and moral horizon.
A formal phalaśruti is not stated here; the meta-commentary is narrative: Kṛṣṇa’s pleased reception and affirming response function as the chapter’s validation marker, indicating the stuti’s appropriateness within the epic’s post-conflict restoration frame.