
Chapter Arc: अतिथि के वचनों से संतुष्ट ब्राह्मण—जिसके मन में अभीष्ट कार्य की सिद्धि का संकल्प है—नागराज के गृह की ओर जाने की तैयारी करता है, और कथा का द्वार ‘अतिथि-धर्म’ की कसौटी पर खुलता है। → अतिथि-धर्म का सार सूत्रों में उभरता है: पथ-थके को शय्या, खड़े-खड़े थके को आसन, प्यासे को जल, भूखे को भोजन—और वह भी समय पर, जैसे वृद्ध को समय पर पुत्र का सहारा। ब्राह्मण के सामने प्रश्न है कि क्या वह इस धर्म को केवल सुनकर नहीं, जीकर भी दिखाएगा। → ब्राह्मण अतिथि के उपदेश को स्वीकार कर प्रतिज्ञा करता है—‘जैसा आप कहते हैं वैसा ही करूँगा’—और उसी क्षण अतिथि-धर्म का सिद्धान्त व्यवहार में उतरता है: वह अतिथि को उसी रात्रि अपने साथ ठहराता है। → रात्रि अतिथि-सत्कार में बीतती है; प्रातःकाल अतिथि पूजित होकर विदा होता है। ब्राह्मण, स्वजन से अनुमति लेकर, यथोपदेश नागराज के आश्रय की ओर नियत समय पर प्रस्थान करता है—धर्म और कर्तव्य दोनों को साधते हुए। → ब्राह्मण नागराज के घर की ओर चल पड़ा—अब वहाँ कौन-सी परीक्षा, कौन-सा वर या कौन-सा भय उसका प्रतीक्षा कर रहा है?
Verse 1
अपन क्ाा छा 2 षट्पज्चाशर्दाधेकत्रिशततमो< ध्याय: अतिथिके वचनोंसे संतुष्ट होकर ब्राह्मणका उसके कथनानुसार नागराजके घरकी ओर प्रस्थान ब्राह्मण उवाच अतिभारोड्द्य तस्यैव भारावतरणं महत् । पराश्चासकरं वाक्यमिदं मे भवतः श्रुतम्,ब्राह्मणने कहा--अतिथिदेव! मुझपर बड़ा भारी बोझ-सा लदा हुआ था, उसे आज आपने उतार दिया। यह बहुत बड़ा कार्य हो गया। आपकी यह बात जो मैंने सुनी है, दूसरोंको पूर्ण सान्त्वना प्रदान करनेवाली है
ब्राह्मण ने कहा—अतिथिदेव! मुझ पर जो भारी बोझ-सा पड़ा था, उसे आज आपने उतार दिया; यह सचमुच महान कार्य हुआ। आपके मुख से सुनी हुई यह वाणी दूसरों को भी पूर्ण सान्त्वना और धैर्य देने वाली है।
Verse 2
अध्वक्लान्तस्य शयनं स्थानक्लान्तस्थ चासनम् | तृषितस्य च पानीयं क्षुधार्तस्थ च भोजनम्,राह चलनेसे थके हुए बटोहीको शय्या, खड़े-खड़े जिसके पैर दुख रहे हों, उसके लिये बैठनेका आसन, प्यासेको पानी और भूखसे पीड़ित मनुष्यको भोजन मिलनेसे जितना संतोष होता है, उतनी ही प्रसन्नता मुझे आपकी यह बात सुनकर हुई है
ब्राह्मण ने कहा—जैसे मार्ग से थके हुए बटोही को शय्या, खड़े-खड़े थके हुए को आसन, प्यासे को जल और भूख से पीड़ित को भोजन मिलने पर संतोष होता है—वैसी ही प्रसन्नता मुझे आपके वचन सुनकर हुई है।
Verse 3
ईप्सितस्येव सम्प्राप्तिरन्नस्य समयेडतिथे: । एषितस्यात्मन: काले वृद्धस्यैव सुतो यथा,भोजनके समय मनोवाजञ्छित अन्नकी प्राप्ति होनेसे अतिथिको, समयपर अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होनेसे अपने मनको, पुत्रकी प्राप्ति होनेसे वृद्धको तथा मनसे जिसका चिन्तन हो रहा हो, उसी प्रेमी मित्रका दर्शन होनेसे मित्रको जितना आनन्द प्राप्त होता है, आज आपने जो बात कही है, वह मुझे उतना ही आनन्द दे रही है
ब्राह्मण ने कहा—जैसे भोजन के समय अतिथि को मनोवांछित अन्न मिल जाए, जैसे उचित समय पर अपने मन की अभीष्ट वस्तु प्राप्त हो, और जैसे वृद्ध को पुत्र-लाभ से परम आनन्द होता है—वैसा ही आनन्द आज आपके वचन मुझे दे रहे हैं।
Verse 4
मनसा चिन्तितस्येव प्रीतिस्निग्धस्य दर्शनम् । प्रह्नमादयति मां वाक्यं भवता यदुदीरितम्,भोजनके समय मनोवाजञ्छित अन्नकी प्राप्ति होनेसे अतिथिको, समयपर अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होनेसे अपने मनको, पुत्रकी प्राप्ति होनेसे वृद्धको तथा मनसे जिसका चिन्तन हो रहा हो, उसी प्रेमी मित्रका दर्शन होनेसे मित्रको जितना आनन्द प्राप्त होता है, आज आपने जो बात कही है, वह मुझे उतना ही आनन्द दे रही है
ब्राह्मण ने कहा—जैसे मन में जिसकी अभिलाषा हो, उस स्नेहपूर्ण प्रिय मित्र का दर्शन हर्ष देता है, वैसे ही आपने जो वचन कहा है, वह मुझे आनन्दित कर रहा है।
Verse 5
दत्तचक्षुरिवाकाशे पश्यामि विमृशामि च । प्रज्ञानवचनाद्यो5यमुपदेशो हि मे कृत:,आपने मुझे यह उपदेश क्या दिया, अन्धेको आँख दे दी। आपके इस ज्ञानमय वचनको सुनकर मैं आकाशकी ओर देखता और कर्तव्यका विचार करता हूँ
ब्राह्मण ने कहा—मानो आपने अन्धे को आँखें दे दीं। आपके इस ज्ञानमय वचन से जो उपदेश मुझे मिला है, उसे सुनकर मैं आकाश की ओर देखता हुआ अपने कर्तव्य का विचार करता हूँ।
Verse 6
बाढमेवं करिष्यामि यथा मे भाषते भवान् | इमां हि रजनीं साधो निवसस्व मया सह,विद्वन! आप मुझे जैसी सलाह दे रहे हैं, अवश्य ऐसा ही करूँगा। साधो! वे भगवान् सूर्य अस्ताचलकी ओर जा रहे हैं। उनकी किरणें मन्द हो गयी हैं; अतः आप इस रातमें मेरे साथ यहीं रहिये और सुखपूर्वक विश्राम करके भलीभाँति अपनी थकावट दूर कीजिये; फिर सबेरे अपने अभीष्ट स्थानको चले जाइयेगा
ब्राह्मण बोला—जैसा आप कहते हैं, वैसा ही मैं करूँगा। हे साधो, हे विद्वन्! इस रात आप मेरे साथ यहीं ठहरिए। सुखपूर्वक विश्राम करके अपनी थकावट दूर कीजिए; फिर प्रातः अपने अभीष्ट स्थान को चले जाइएगा।
Verse 7
प्रभाते यास्यति भवानू् पर्याश्वस्त: सुखोषित: । असौ हि भगवान् सूर्यो मन्दरश्मिरवाड्मुख:,विद्वन! आप मुझे जैसी सलाह दे रहे हैं, अवश्य ऐसा ही करूँगा। साधो! वे भगवान् सूर्य अस्ताचलकी ओर जा रहे हैं। उनकी किरणें मन्द हो गयी हैं; अतः आप इस रातमें मेरे साथ यहीं रहिये और सुखपूर्वक विश्राम करके भलीभाँति अपनी थकावट दूर कीजिये; फिर सबेरे अपने अभीष्ट स्थानको चले जाइयेगा
ब्राह्मण बोला—प्रातःकाल आप सुखपूर्वक विश्राम करके तृप्त-प्रसन्न होकर आगे चले जाइएगा। देखिए, भगवान् सूर्य अस्त हो रहे हैं; उनकी किरणें मन्द हो गयी हैं और वे नीचे की ओर झुक गए हैं। इसलिए इस रात मेरे साथ ठहरिए, आराम से विश्राम करके थकावट दूर कीजिए; फिर सुबह अपने अभीष्ट स्थान को चले जाइएगा।
Verse 8
भीष्म उवाच ततस्तेन कृतातिथ्य: सो$तिथि: शत्रुसूदन | उवास किल तां रात्रि सह तेन द्विजेन वै,भीष्मजी कहते हैं--शत्रुसूदन! तदनन्तर वह अतिथि उस ब्राह्मणका आतिथ्य ग्रहण करके रातभर वहीं उस ब्राह्मणके साथ रहा
भीष्मजी बोले—हे शत्रुसूदन! तत्पश्चात् उस द्विज द्वारा किए गए आतिथ्य को स्वीकार करके वह अतिथि निश्चय ही उस ब्राह्मण के साथ वहीं सारी रात रहा।
Verse 9
चतुर्थधर्मसंयुक्ते तयो: कथयतोस्तदा । व्यतीता सा निशा कृत्स्ना सुखेन दिवसोपमा,मोक्षधर्मके सम्बन्धमें बातें करते हुए उन दोनोंकी वह सारी रात दिनके समान ही बड़े सुखसे बीत गयी
मोक्षधर्म से संयुक्त धर्म के चतुर्थ विभाग का वर्णन करते हुए उन दोनों की वह पूरी रात सुखपूर्वक दिन के समान बीत गई।
Verse 10
ततः प्रभातसमये सो$तिथिस्तेन पूजित: । ब्राह्मणेन यथाशकक्त्या स्वकार्यमभिकाड्क्षता,फिर सबेरा होनेपर अपने कार्यकी सिद्धि चाहने-वाले उस ब्राह्मणद्वारा यथाशक्ति सम्मानित हो वह अतिथि चला गया
फिर प्रभात होने पर, अपने कार्य की सिद्धि चाहने वाले उस ब्राह्मण ने यथाशक्ति उस अतिथि का सम्मान किया; और वह अतिथि पूजित होकर वहाँ से विदा हो गया।
Verse 11
ततः स विप्र: कृतकर्मनिश्चय: कृताभ्यनुज्ञ: स्वजनेन धर्मकृत् । यथोपदिष्टं भुजगेन्द्रसंश्रयं जगाम काले सुकृतैकनिश्चय:,तत्पश्चात् वह धर्मात्मा ब्राह्मण अपने अभीष्ट कार्यको पूर्ण करनेका निश्चय करके स्वजनोंकी अनुमति ले अतिथिके बताये अनुसार यथासमय नागराजके घरकी ओर चल दिया। उसने अपने शुभ कार्यको सिद्ध करनेका एक दृढ़ निश्चय कर लिया था
तब वह धर्मात्मा ब्राह्मण अपने अभीष्ट कर्तव्य को पूर्ण करने का दृढ़ निश्चय करके और स्वजनों की अनुमति प्राप्त कर, अतिथि के बताए अनुसार उचित समय पर नागराज के निवास की ओर चल पड़ा। पुण्यकार्य की सिद्धि में स्थिरचित्त होकर वह धर्मानुसार आगे बढ़ा।
Verse 356
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उज्छवृत्त्युपाख्याने षट्पञज्चाशदधिकत्रिशततमो<ध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में ‘उच्छवृत्ति-उपाख्यान’ नामक प्रसंग का तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 3515
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें उज्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में उच्छवृत्तिका-उपाख्यानविषयक तीन सौ पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।