धर्मद्वारबहुत्वविमर्शः — Reflection on the Many ‘Doors’ of Dharma (Śānti-parva 342)
सर्वेषामग्रणीर्विष्णु: सेव्य: पूज्यश्न नित्यश: । भरतनन्दन! भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंमें होनेवाले समस्त पुरुषोंके भगवान् विष्णु ही अग्रगण्य हैं; अतः सबको सदा उन्हींकी सेवा-पूजा करनी चाहिये ।। ३१ कल नमस्व हव्यदं विष्णुं तथा शरणदं नम
sarveṣām agraṇīr viṣṇuḥ sevyaḥ pūjyaś ca nityaśaḥ | bharatanandana! bhūta-bhaviṣya-vartamāna-tri-kāleṣu bhaviṣyatāṃ sarva-puruṣāṇāṃ bhagavān viṣṇur eva agraṇīḥ; ataḥ sarvair nityaṃ tasyaiva sevā-pūjā kartavyā ||
अर्जुन ने कहा—“सबके अग्रणी भगवान् विष्णु हैं; वे सदा सेवनीय और पूजनीय हैं। हे भरतनन्दन! भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालों में होनेवाले समस्त पुरुषों में विष्णु ही अग्रगण्य हैं; इसलिए सबको नित्य उनकी सेवा-पूजा करनी चाहिए।”
अर्जुन उवाच