नारद–शुक संवादः (Nārada–Śuka Dialogue): Tyāga, Saṃyama, and Vyakta–Avyakta Viveka
निशाया: प्रथमे यामे चोदना द्वादश स्मृता: । मध्ये स्वप्नात् परे यामे द्वादशैव तु चोदना:
रात्रि के प्रथम प्रहर में प्राणवायु-धारण की बारह प्रेरणाएँ कही गई हैं। मध्य रात्रि में (बीच के पहरों में) शयन करना चाहिए, और फिर अंतिम प्रहर में उन्हीं बारह प्रेरणाओं का ही अभ्यास करना चाहिए।
याज़्ञवल्क्य उवाच