
Aśmagīta: Janaka’s Inquiry on Loss, Kāla, and the Limits of Control (अश्मगीता)
Upa-parva: Rājadharmānushāsana Upa-parva (Kingship and Governance Instructions)
Vaiśaṃpāyana frames Yudhiṣṭhira as overwhelmed by kin-sorrow and inclined toward self-abandonment, whereupon Vyāsa dispels despair by introducing an ancient exemplum, the Aśmagīta. Vyāsa recounts how King Janaka, distressed by the possible gain or loss of relatives and wealth, questions the sage-brāhmaṇa Aśman regarding the proper orientation for one who seeks well-being. Aśman answers with a structured reflection on the human condition: pleasures and pains recur after birth; fixation on any one condition can carry the mind away, producing delusion and unethical drift. The teaching emphasizes kāla (time) as the regulating horizon: aging and death are inescapable; outcomes such as health, vigor, fortune, and even family continuities appear contingent and unstable. The chapter catalogues ordinary vulnerabilities (disease, accident, hunger, violence, hazards) to demonstrate that neither ritual, medicine, learning, nor austerity can fully override mortality. It recommends disciplined reflection—questioning identity, attachment, and the premise of permanent possession—while still endorsing socially stabilizing duties: honoring ancestors, practicing dharma, and pursuing the triad of aims (trivarga) within lawful bounds. The exemplum concludes with Janaka returning home with pacified grief, and Vyāsa applying the lesson to Yudhiṣṭhira: relinquish sorrow, stand up, and rule the earth won through kṣātra-dharma without despondency.
Chapter Arc: वैशम्पायन के वचन से शोकाकुल युधिष्ठिर के सामने व्यास एक ‘पुरातन इतिहास’ खोलते हैं—अश्मगीत—जिसमें प्रारब्ध की अटलता का रहस्य छिपा है। → व्यास जनक और एक प्राज्ञ ब्राह्मण ‘अश्मा’ का संवाद सुनाते हैं। दुःख-शोक से ग्रस्त जनक पूछते हैं: जब कुटुम्ब, धन, और राज्य का आगमन-विनाश अनिश्चित है, तब कल्याण चाहने वाला मनुष्य किस आधार पर आचरण करे? उत्तर में जीवन की क्षणभंगुरता, युवावस्था में भी पतन, और परलोक की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्षता पर तीखे तर्क आते हैं—और यह तनाव बढ़ता है कि यदि सब कुछ प्रारब्ध-नियत है तो पुरुषार्थ का स्थान कहाँ है। → अश्मगीत का निर्णायक स्वर उभरता है: कोई भी ‘सेतु’—नियत विधान—का उल्लंघन करता दिखाई नहीं देता; रोग, अग्नि, जल, शस्त्र, भूख-प्यास, विष, ज्वर, गिरना आदि मृत्यु-निमित्त भी उसी दिष्ट मार्ग से जीव को ले जाते हैं। इसी के साथ यह भी कहा जाता है कि तप, स्वाध्याय, दान, यज्ञशीलता भी जरा-मृत्यु को नहीं लाँघती—अर्थात् देह-धर्म पर प्रारब्ध की प्रबलता अटल है। → व्यास इस दृष्टान्त को युधिष्ठिर पर लागू करते हैं: शोक छोड़ो, उठो; क्षात्रधर्म से जीती हुई पृथ्वी तुम्हारी है—उसे तुच्छ न समझो। प्रारब्ध को जानकर भी कर्तव्य-पालन ही राजधर्म है; शोक से नहीं, धर्मयुक्त कर्म से स्थैर्य आता है। → प्रारब्ध की अटलता स्वीकार कर भी मनुष्य के ‘उचित कर्म’ की सीमा क्या है—और शोक से मुक्त होकर युधिष्ठिर किस प्रकार राजधर्म में प्रवृत्त होंगे—यह प्रश्न अगले उपदेश की ओर संकेत करता है।
Verse 1
#<3८६>-> ह्नु # अष्टाविशोश् ध्याय: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना वैशम्पायन उवाच ज्ञातिशोकाभितप्तस्य प्राणानभ्युत्सिसृक्षत: । ज्येष्ठस्य पाण्डुपुत्रस्य व्यास: शोकमपानुदत्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भाई-बन्धुओं के शोकसे संतप्त हो अपने प्राणोंको त्याग देनेकी इच्छावाले ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरके शोकको महर्षि व्यासने इस प्रकार दूर किया
वैशम्पायनजी बोले—जनमेजय! अपने कुटुम्बियों के शोक से संतप्त, प्राण त्यागने की इच्छा करने वाले पाण्डुपुत्रों में ज्येष्ठ युधिष्ठिर का शोक महर्षि व्यास ने इस प्रकार दूर किया।
Verse 2
व्यास उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अश्मगीतं नरव्याप्र तन्निबोध युधिष्ठिर,व्यासजी बोले--पुरुषसिंह युधिष्ठिर! इस प्रसंगमें जानकार लोग अभ्मा ब्राह्मणके गीतसम्बन्धी इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, इसे सुनो
व्यासजी बोले—नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर! इस विषय में विद्वान लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं—‘अश्मा-गीत’। उसे सुनो।
Verse 3
अश्मानं ब्राद्माण्ं प्राज्ञ वेदेहो जनको नृपः । संशयं परिपप्रच्छ दुः:खशोकसमन्वित:,एक समयकी बात है, दुःख-शोकमें डूबे हुए विदेहगाज जनककने ज्ञानी ब्राह्मण अश्मासे अपने मनका संदेह इस प्रकार पूछा
व्यासजी बोले—एक समय दुःख-शोक से व्याकुल विदेह-नरेश जनक ने बुद्धिमान ब्राह्मण अश्मा के पास जाकर अपने मन का संदेह विस्तार से पूछा।
Verse 4
जनक उवाच आगमे यदि वापाये ज्ञातीनां द्रविणस्य च । नरेण प्रतिपत्तव्यं कल्याणं कथमिच्छता,जनक बोले--ब्रह्मन्! कुटुम्बीजन और धनकी उत्पत्ति या विनाश होनेपर कल्याण चाहनेवाले पुरुषको कैसा निश्चय करना चाहिये?
जनक बोले— हे ब्राह्मण! जब कुटुम्बीजन और धन की वृद्धि या हानि हो, तब जो पुरुष सच्चा कल्याण चाहता है, उसे कौन-सा दृढ़ निश्चय और आचरण अपनाना चाहिए?
Verse 5
अश्मोवाच उत्पन्नमिममात्मानं नरस्यानन्तरं ततः । तानि तान्यनुवर्तन्ते दु:खानि च सुखानि च,अश्माने कहा--राजन्! मनुष्यका यह शरीर जब जन्म ग्रहण करता है, तब उसके साथ ही सुख और दुःख भी उसके पीछे लग जाते हैं
अश्मा बोले— राजन्! मनुष्य का यह देहधारी आत्मा जब जन्म लेता है, तब उसके तुरंत बाद सुख और दुःख—एक-एक करके—उसके पीछे-पीछे लग जाते हैं।
Verse 6
तेषामन्यतरापत्ताौ यद् यदेवोपपद्यते । तदस्य चेतनामाशु हरत्यभ्रमिवानिल:,इन दोनोंमेंसे एक-न-एककी प्राप्ति तो होती ही है; अतः जो भी सुख या दुःख उपस्थित होता है, वही मनुष्यके ज्ञानको उसी प्रकार हर लेता है, जैसे हवा बादलको उड़ा ले जाती है
इन दोनों में से किसी एक का आ पड़ना तो अवश्यंभावी है; इसलिए जो भी सुख या दुःख उपस्थित होता है, वह मनुष्य की चेतना को शीघ्र ही वैसे हर लेता है, जैसे वायु बादल को उड़ा ले जाती है।
Verse 7
अभिजातो<स्मि सिद्धो5स्मि नास्मि केवलमानुष: । इत्येभिहेतुभिस्तस्य त्रिभिक्षित्तं प्रसिच्यते,इसीसे “मैं कुलीन हूँ, सिद्ध हूँ और कोई साधारण मनुष्य नहीं हूँ” ये अहंकारकी तीन धाराएँ मनुष्यके चित्तको सींचने लगती हैं
“मैं कुलीन हूँ, मैं सिद्ध हूँ, मैं कोई साधारण मनुष्य नहीं”—इन तीन कारणों से उसका चित्त सींचा जाता है; अर्थात् अहंकार की तीन धाराएँ भीतर की चेतना को पोषित करने लगती हैं।
Verse 8
सम्प्रसक्तमना भोगान् विसृज्य पितृसंचितान् । परिक्षीण: परस्वानामादानं साधु मन्यते,फिर वह मनुष्य भोगोंमें आसक्तचित्त होकर क्रमश: बाप-दादोंकी रखी हुई कमाईको उड़ाकर कंगाल हो जाता है और दूसरोंके धनको हड़प लेना अच्छा मानने लगता है
फिर वह मनुष्य भोगों में आसक्त होकर पितरों द्वारा संचित धन को क्रमशः उड़ा देता है। जब वह दरिद्र होकर टूट जाता है, तब दूसरों के धन को लेना भी उसे उचित प्रतीत होने लगता है।
Verse 9
तमतिक्रान्तमर्यादमाददानमसाम्प्रतम् । प्रतिषेधन्ति राजानो लुब्धा मृगमिवेषुभि:,जैसे व्याधे अपने बाणोंद्वारा मृगोंको आगे बढ़नेसे रोकते हैं, उसी प्रकार मर्यादा लाँघकर अनुचितरूपसे दूसरोंके धनका अपहरण करनेवाले उस मनुष्यको राजालोग दण्डद्वारा वैसे कुमार्गपर चलनेसे रोकते हैं
जैसे व्याध अपने बाणों से मृग को आगे बढ़ने से रोक देता है, वैसे ही जो मनुष्य मर्यादा लाँघकर अनुचित और असमय दूसरों के धन का अपहरण करता है, उसे राजा लोग दण्ड द्वारा कुमार्ग पर चलने से रोकते हैं।
Verse 10
ये च विंशतिवर्षा वा त्रिंशद्वर्षाश्न मानवा: । परेण ते वर्षशतान्न भविष्यन्ति पार्थिव,राजन! जो बीस या तीस वर्षकी उम्रवाले मनुष्य चोरी आदि कुकर्मोमें लग जाते हैं, वे सौ वर्षतक जीवित नहीं रह पाते
हे राजन्! जो मनुष्य बीस या तीस वर्ष की अवस्था में ही चोरी आदि कुकर्मों में लग जाते हैं, वे सौ वर्ष तक जीवित नहीं रह पाते।
Verse 11
तेषां परमदु:खानां बुद्धा भैषज्यमाचरेत् । सर्वप्राणभृतां वृत्तं प्रेक्षमाणस्ततस्तत:,जहाँ-तहाँ समस्त प्राणियोंके दुःखद बर्तावसे उनपर जो कुछ बीतता है उसे देखता हुआ मनुष्य दरिद्रतासे प्राप्त होनेवाले उन महान् दुःखोंका निवारण करनेके लिये बुद्धिके द्वारा औषध करे (अर्थात् विचारद्वारा अपने-आपको कुमार्गपर जानेसे रोके)
उन महान् दुःखों के निवारण के लिए बुद्धिमान को चाहिए कि वह विवेक को औषधि बनाकर उपाय करे। समस्त प्राणियों के आचरण को यहाँ-वहाँ देखकर, और यह समझकर कि उनके दुःखद व्यवहार से उन पर क्या-क्या बीतता है, मनुष्य विचार द्वारा अपने-आप को कुमार्ग पर जाने से रोके।
Verse 12
मानसानां पुनर्योनिर्दु:खानां चित्तविभ्रम: | अनिष्टोपनिपातो वा तृतीयं नोपपद्यते,मनुष्योंको बार-बार मानसिक दुःखोंकी प्राप्तिके कारण दो ही हैं--चित्तका भ्रम और अनिष्टकी प्राप्ति। तीसरा कोई कारण सम्भव नहीं है
मनुष्यों के मानसिक दुःखों की पुनः-पुनः उत्पत्ति के कारण केवल दो हैं—चित्त का भ्रम (विक्षेप) और अनिष्ट का आ पड़ना। तीसरा कोई कारण संभव नहीं।
Verse 13
एवमेतानि दु:ःखानि तानि तानीह मानवम् | विविधान्युपवर्तन्ते तथा संस्पर्शजान्यपि,इस प्रकार मनुष्यको इन्हीं दो कारणोंसे ये भिन्न-भिन्न प्रकारके दु:ख प्राप्त होते हैं। विषयोंकी आसक्तिसे भी ये दु:ख प्राप्त होते हैं
इस प्रकार इन्हीं कारणों से मनुष्य को यहाँ ये दुःख बार-बार अनेक रूपों में प्राप्त होते हैं; और विषय-संस्पर्श से उत्पन्न दुःख भी इसी प्रकार उठते हैं।
Verse 14
जरामृत्यू हि भूतानां खादितारी वृकाविव । बलिनां दुर्बलानां च हस्वानां महतामपि,बुढ़ापा और मृत्यु--ये दोनों दो भेड़ियोंके समान हैं, जो बलवान् दुर्बल, छोटे और बड़े सभी प्राणियोंको खा जाते हैं
बुढ़ापा और मृत्यु—ये दोनों दो भेड़ियों के समान हैं, जो बलवान और दुर्बल, छोटे और बड़े—सभी प्राणियों को खा जाते हैं।
Verse 15
न कश्रिज्जात्वतिक्रामेज्जरामृत्यू हि मानव: । अपि सागरपर्यन्तां विजित्येमां वसुन्धराम्,कोई भी मनुष्य कभी बुढ़ापे और मौतको लाँघ नहीं सकता। भले ही वह समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीपर विजय पा चुका हो
कोई भी मनुष्य कभी बुढ़ापे और मृत्यु को लाँघ नहीं सकता, चाहे वह समुद्र-पर्यन्त इस सारी पृथ्वी को जीत ही क्यों न चुका हो।
Verse 16
सुखं वा यदि वा दु:खं भूतानां पर्युपस्थितम् । प्राप्तव्यमवशै: सर्व परिहारो न विद्यते,प्राणियोंके निकट जो सुख या दुःख उपस्थित होता है, वह सब उन्हें विवश होकर सहना ही पड़ता है, क्योंकि उसके टालनेका कोई उपाय नहीं है
प्राणियों के निकट जो सुख या दुःख उपस्थित होता है, वह सब उन्हें विवश होकर भोगना ही पड़ता है; क्योंकि जो आ पहुँचा है, उसे टालने का कोई उपाय नहीं।
Verse 17
पूर्वे वयसि मध्ये वाप्युत्तरे वा नराधिप । अवर्जनीयास्ते<र्था वै कांक्षिता ये ततो5न्यथा,नरेश्वर! पूर्वावस्था, मध्यावस्था अथवा उत्तरावस्थामें कभी-न-कभी वे क्लेश अनिवार्यरूपसे प्राप्त होते ही हैं, जिन्हें मनुष्य उनके विपरीतरूपमें चाहता है (अर्थात् सुख- ही-सुखकी इच्छा करता है; परंतु उसे कष्ट भी प्राप्त होते ही हैं)
नरेश्वर! युवावस्था, मध्यावस्था अथवा वृद्धावस्था—किसी न किसी समय वे क्लेश अनिवार्य रूप से आ ही जाते हैं, जिन्हें मनुष्य उनके विपरीत रूप में चाहता है; वह तो केवल सुख चाहता है, पर दुःख भी अवश्य आता है।
Verse 18
अप्रियैः सह संयोगो विप्रयोगश्न सुप्रियै: । अर्थानर्थो सुखं दुःखं विधानमनुवर्तते,अप्रिय वस्तुओंके साथ संयोग, अत्यन्त प्रिय वस्तुओंका वियोग, अर्थ, अनर्थ, सुख और दुःख--इन सबकी प्राप्ति प्रारब्धके विधानके अनुसार होती है
अप्रिय वस्तुओं के साथ संयोग, अत्यन्त प्रिय वस्तुओं का वियोग, लाभ-हानि, सुख-दुःख—ये सब प्रारब्ध के विधान के अनुसार ही प्राप्त होते हैं।
Verse 19
प्रादुर्भावश्व भूतानां देहत्यागस्तथैव च । प्राप्तिव्यायामयोगश्च सर्वमेतत् प्रतिष्ठितम्,प्राणियोंकी उत्पत्ति, देहावसान, लाभ” और हानि--ये सब प्रारब्धके ही आधारपर स्थित हैं
जनक बोले—प्राणियों का प्रकट होना और फिर देह का त्याग; लाभ-हानि तथा फल-प्राप्ति के लिए किया जाने वाला प्रयत्न—यह सब पूर्वकर्म से प्रवाहित प्रारब्ध पर ही प्रतिष्ठित है।
Verse 20
गन्धवर्णरसस्पर्शा निवर्तन्ते स्वभावत: । तथैव सुखदुःखानि विधानमनुवर्तते,जैसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध स्वभावत: आते-जाते रहते हैं, उसी प्रकार मनुष्य सुख और दु:खोंको प्रारब्धानुसार पाता रहता है
जनक बोले—जैसे गन्ध, वर्ण, रस और स्पर्श स्वभाव से ही आते-जाते रहते हैं, वैसे ही सुख-दुःख भी मनुष्य को विधानानुसार, अर्थात् प्रारब्ध के क्रम से, प्राप्त होते रहते हैं।
Verse 21
आसन शयनं यानमुत्थानं पानभोजनम् । नियतं सर्वभूतानां कालेनैव भवत्युत,सभी प्राणियोंके लिये बैठना, सोना, चलना-फिरना, उठना और खाना-पीना--ये सभी कार्य समयके अनुसार ही नियत रूपसे होते रहते हैं
जनक कहते हैं—सब प्राणियों के लिए बैठना, सोना, चलना-फिरना, उठना तथा खाना-पीना—ये सब कर्म निश्चित रूप से केवल काल के अधीन होकर होते हैं।
Verse 22
वैद्याश्नाप्पातुरा: सन्ति बलवन्तश्न दुर्बला: | श्रीमन्तक्षापरे षण्ढा विचित्र: कालपर्यय:,कभी-कभी वैद्य भी रोगी, बलवान् भी दुर्बल और श्रीमान् भी असमर्थ हो जाते हैं, यह समयका उलट-फेर बड़ा अदभुत है
जनक बोले—कभी वैद्य भी रोगी हो जाते हैं, बलवान भी दुर्बल हो जाते हैं, और श्रीमान भी क्षीण होकर असमर्थ हो जाते हैं; काल का यह विचित्र उलट-फेर सचमुच अद्भुत है।
Verse 23
कुले जन्म तथा वीर्यमारोग्यं रूपमेव च । सौभाग्यमुपभोगश्व भवितव्येन लभ्यते,उत्तम कुलमें जन्म, बल-पराक्रम, आरोग्य, रूप, सौभाग्य और उपभोग-सामग्री--ये सब होनहारके अनुसार ही प्राप्त होते हैं
जनक बोले—उत्तम कुल में जन्म, बल-पराक्रम, आरोग्य, रूप, सौभाग्य और उपभोग के साधन—ये सब भवितव्य, अर्थात् नियति के अनुसार ही प्राप्त होते हैं।
Verse 24
सन्ति पुत्रा: सुबहवो दरिद्राणामनिच्छताम् । नास्ति पुत्र: समृद्धानां विचित्र विधिचेष्टितम्,जो दरिद्र हैं और संतानकी इच्छा नहीं रखते हैं, उनके तो बहुत-से पुत्र हो जाते हैं और जो धनवान हैं, उनमेंसे किसी-किसीको एक पुत्र भी नहीं प्राप्त होता। विधाताकी चेष्टा बड़ी विचित्र है
जो दरिद्र हैं और संतान की इच्छा भी नहीं रखते, उनके तो बहुत-से पुत्र हो जाते हैं; और जो समृद्ध हैं, उनमें से किसी-किसी को एक पुत्र भी नहीं मिलता। विधाता की चेष्टा सचमुच विचित्र है।
Verse 25
व्याधिरग्निर्जलं शस्त्र बुभुक्षाश्नापदो विषम् ज्वरश्ष मरणं जन्तोरुच्चाच्च पतनं तथा
जनक बोले—प्राणी के लिए व्याधि, अग्नि, जल, शस्त्र, भूख, हिंसक पशु, विष, ज्वर और मृत्यु—ये सब भय के कारण हैं; और ऊँचाई से गिरना भी वैसा ही संकट है। जब जीवन निरन्तर ऐसे उपद्रवों से घिरा है, तब सुरक्षा के मद में प्रमत्त न हो; जो धर्मोचित है उसे टाल न दे; सावधानी, संयम और तत्परता से जी।
Verse 26
दृश्यते नाप्यतिक्रामन्न निष्क्रान्तो5थवा पुनः
जनक बोले—वह न तो मर्यादा का अतिक्रमण करता दिखायी देता है, न ही पीछे हटता; और फिर वह अपने स्थान से विचलित होकर कहीं जाता भी नहीं।
Verse 27
इस प्रकार श्रीमह्या भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ,दृश्यते हि युवैवेह विनश्यन् वसुमान् नरः । दरिद्रश्न॒ परिक्लिष्ट: शतवर्षो जरान्वित: इस जगतमें धनवान् मनुष्य भी जवानीमें ही नष्ट होता दिखायी देता है और क्लेशमें पड़ा हुआ दरिद्र भी सौ वर्षोतक जीवित रहकर अत्यन्त वृद्धावस्थामें मरता देखा जाता है
इस जगत में धनवान मनुष्य भी युवावस्था में ही नष्ट होता दिखायी देता है; और क्लेश में पड़ा हुआ दरिद्र भी सौ वर्ष तक जीकर अत्यन्त वृद्धावस्था में मरता देखा जाता है।
Verse 28
अकिज्चनाश्र दृश्यन्ते पुरुषाश्चिरजीविन: । समृद्धे च कुले जाता विनश्यन्ति पतंगवत्,इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्येडष्टाविंशोडध्याय:
जनक बोले—अकिञ्चन, अर्थात् जिनके पास कुछ भी अपना नहीं और जो आसक्ति-आश्रय से मुक्त हैं, ऐसे पुरुष दीर्घजीवी देखे जाते हैं; परन्तु समृद्ध कुल में उत्पन्न लोग प्रायः पतंगों की भाँति शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
Verse 29
जिनके पास कुछ नहीं है, ऐसे दरिद्र भी दीर्घजीवी देखे जाते हैं और धनवान् कुलमें उत्पन्न हुए मनुष्य भी कीट-पतंगोंके समान नष्ट होते रहते हैं ।। प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते । काष्ठान्यपि हि जीर्यन्ते दरिद्राणां च सर्वश:,जगतमें प्रायः धनवानोंको खाने और पचानेकी शक्ति ही नहीं रहती है और दरिद्रोंके पेटमें काठ भी पच जाते हैं
जनक ने कहा—जिनके पास कुछ भी नहीं, ऐसे दरिद्र भी दीर्घजीवी देखे जाते हैं; और धनवान कुल में जन्मे मनुष्य कीट-पतंगों के समान नष्ट होते रहते हैं। जगत में प्रायः धनवानों में भोगने और पचाने की शक्ति नहीं रहती, पर दरिद्रों के पेट में तो काठ भी सर्वथा पच जाता है।
Verse 30
अहमेतत् करोमीति मन्यते कालनोदित: । यद् यदिष्टमसंतोषाद् दुरात्मा पापमाचरेत्,दुरात्मा मनुष्य कालसे प्रेरित होकर यह अभिमान करने लगता है कि मैं यह करूँगा। तत्पश्चात् असंतोषवश उसे जो-जो अभीष्ट होता है, उस पापपूर्ण कृत्यको भी वह करने लगता है
जनक ने कहा—काल से प्रेरित होकर मनुष्य यह मान बैठता है कि ‘मैं ही यह कर रहा हूँ।’ फिर असंतोष के वशीभूत होकर जो-जो उसे अभीष्ट होता है, उसे पाने के लिए वह दुरात्मा पापकर्म तक करने लग जाता है।
Verse 31
मृगयाक्षा: स्त्रिय: पान॑ प्रसंगा निन्दिता बुधैः । दृश्यन्ते पुरुषाश्चात्र सम्प्रयुक्ता बहुश्ुता:
जनक ने कहा—शिकार की दृष्टि वाली स्त्रियाँ और मद्यपान के प्रसंग बुद्धिमानों द्वारा निंदित हैं। तथापि यहाँ पुरुष भी—यहाँ तक कि बहुश्रुत कहलाने वाले—इनमें आसक्त और बँधे हुए देखे जाते हैं।
Verse 32
विद्वान् पुरुष शिकार करने, जूआ खेलने, स्त्रियोंके संसर्गमें रहने और मदिरा पीनेके प्रसंगोंकी बड़ी निन््दा करते हैं, परंतु इन पापकर्मोमें अनेक शास्त्रोंके श्रवण और अध्ययनसे सम्पन्न पुरुष भी संलग्न देखे जाते हैं ।। इति कालेन सर्वार्थनीप्सितानीप्सितानिह । स्पृशन्ति सर्वभूतानि निमित्तं नोपलभ्यते,इस प्रकार कालके प्रभावसे समस्त प्राणी इष्ट और अनिष्ट पदार्थोंको प्राप्त करते रहते हैं, इस इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिका अदृष्टके सिवा दूसरा कोई कारण नहीं दिखायी देता
जनक ने कहा—विद्वान पुरुष शिकार, जूआ, स्त्री-संसर्ग और मदिरापान के प्रसंगों की बड़ी निंदा करते हैं; परंतु इन पापकर्मों में अनेक शास्त्रों के श्रवण-अध्ययन से सम्पन्न पुरुष भी संलग्न देखे जाते हैं। इस प्रकार काल के प्रभाव से समस्त प्राणी इष्ट और अनिष्ट पदार्थों को प्राप्त करते रहते हैं; इस प्राप्ति में अदृष्ट के सिवा दूसरा कोई कारण दिखाई नहीं देता।
Verse 33
वायुमाकाशमनग्निं च चन्द्रादित्यावह:क्षपे । ज्योतींषि सरित: शैलान् क: करोति बिभर्ति च,वायु, आकाश, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, दिन, रात, नक्षत्र, नदी और पर्वतोंको कालके सिवा कौन बनाता और धारण करता है?
जनक ने कहा—वायु, आकाश, अग्नि, चन्द्रमा और सूर्य, दिन और रात, नक्षत्र, नदियाँ और पर्वत—इनको काल के सिवा कौन बनाता और धारण करता है?
Verse 34
शीतमुष्णं तथा वर्ष कालेन परिवर्तते | एवमेव मनुष्याणां सुखदु:खे नरर्षभ,सर्दी, गर्मी और वर्षाका चक्र भी कालसे ही चलता है। नरश्रेष्ठ! इसी प्रकार मनुष्योंके सुख-दुःख भी कालसे ही प्राप्त होते हैं
जनक बोले—सर्दी, गर्मी और वर्षा काल के अनुसार बदलते रहते हैं। उसी प्रकार, हे नरश्रेष्ठ, मनुष्यों के सुख-दुःख भी काल से ही प्राप्त होते हैं।
Verse 35
नौषधानि न मन्त्राश्न न होमा न पुनर्जपा: | त्रायन्ते मृत्युनोपेतं जरया चापि मानवम्
जनक बोले—न औषधियाँ, न मन्त्र, न होम, और न ही बार-बार का जप—मृत्यु से ग्रस्त तथा जरा से आक्रान्त मनुष्य को वास्तव में बचा सकते हैं।
Verse 36
वृद्धावस्था और मृत्युके वशमें पड़े हुए मनुष्यको औषध, मन्त्र, होम और जप भी नहीं बचा पाते हैं ।। यथा काष्ठ च काष्ठ॑ च समेयातां महोदधौ । समेत्य च व्यपेयातां तद्गधद् भूतसमागम:,जैसे महासागरमें एक काठ एक ओरसे और दूसरा दूसरी ओरसे आकर दोनों थोड़ी देरके लिये मिल जाते हैं तथा मिलकर फिर बिछुड़ भी जाते हैं, इसी प्रकार यहाँ प्राणियोंके संयोग-वियोग होते रहते हैं
जनक बोले—जो मनुष्य जरा और मृत्यु के वश में पड़ गया है, उसे औषध, मन्त्र, होम और जप भी नहीं बचा पाते। जैसे महासागर में एक काठ एक ओर से और दूसरा दूसरी ओर से बहकर आकर थोड़ी देर मिलते हैं और फिर अलग हो जाते हैं, वैसे ही इस संसार में प्राणियों का संयोग-वियोग निरन्तर होता रहता है।
Verse 37
ये चैव पुरुषा: स्त्रीभिर्गीतवाद्यैरुपस्थिता: । ये चानाथा: परान्नादा: कालस्तेषु समक्रिय:,जगत्में जिन धनवान पुरुषोंकी सेवामें बहुत-सी सुन्दरियाँ गीत और वाद्योंके साथ उपस्थित हुआ करती हैं और जो अनाथ मनुष्य दूसरोंके अन्नपर जीवन-निर्वाह करते हैं, उन सबके प्रति कालकी समान चेष्टा होती है
जनक बोले—जिन धनवान पुरुषों की सेवा में स्त्रियाँ गीत और वाद्यों सहित उपस्थित रहती हैं, और जो अनाथ जन दूसरों के अन्न पर जीते हैं—उन सब पर काल समान रूप से क्रिया करता है।
Verse 38
मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च । संसारेष्वनुभूतानि कस्य ते कस्य वा वयम्,हमने संसारमें अनेक बार जन्म लेकर सहस्रों माता-पिता और सैकड़ों स्त्री-पुत्रोंके सुखका अनुभव किया है; परंतु अब वे किसके हैं अथवा हम उनमेंसे किसके हैं?
जनक बोले—संसार-चक्र में हमने सहस्रों माता-पिता और सैकड़ों पुत्र तथा पत्नियों का अनुभव किया है; पर अब वे किसके हैं, अथवा हम किसके हैं?
Verse 39
नैवास्य कश्चिद् भविता नायं भवति कस्यचित् । पथि संगतमेवेदं दारबन्धुसुह्ृज्जनै:,इस जीवका न तो कोई सम्बन्धी होगा और न यह किसीका सम्बन्धी है। जैसे मार्ममें चलनेवालोंको दूसरे राहगीरोंका साथ मिल जाता है, उसी प्रकार यहाँ भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र और सुहृदोंका समागम होता है
इस जीव का न तो कोई अपना सम्बन्धी होता है और न यह किसी का सम्बन्धी है। जैसे मार्ग में चलते हुए यात्रियों को अन्य राहगीरों का साथ मिल जाता है, वैसे ही यहाँ स्त्री, पुत्र, बन्धु और सुहृदों का संयोग होता है।
Verse 40
क्वासे क्व च गमिष्यामि को न्वहं किमिहास्थित: । कस्मात् किमनुशोचेयमित्येवं स्थापयेन्मन:
जनक ने कहा—“मैं कहाँ हूँ और कहाँ जाऊँगा? मैं वास्तव में कौन हूँ, और इस दशा में यहाँ क्यों खड़ा हूँ? किस कारण से, और किसके लिए, मैं शोक करूँ?”—इस प्रकार बार-बार ऐसी जिज्ञासा में मन को स्थिर करना चाहिए।
Verse 41
अतः विवेकी पुरुषको अपने मनमें यह विचार करना चाहिये कि “मैं कहाँ हूँ, कहाँ जाऊँगा, कौन हूँ, यहाँ किसलिये आया हूँ और किसलिये किसका शोक करूँ?” ।। अनित्ये प्रियसंवासे संसारे चक्रवद्गतौ । पथि संगतमेवैतद् भ्राता माता पिता सखा,यह संसार चक्रके समान घूमता रहता है। इसमें प्रियजनोंका सहवास अनित्य है। यहाँ भ्राता, मित्र, पिता और माता आदिका साथ रास्तेमें मिले हुए बटोहियोंके समान ही है
अतः विवेकी पुरुष को मन में यह विचार करना चाहिए—“मैं कहाँ हूँ, कहाँ जाऊँगा, कौन हूँ, यहाँ किसलिए आया हूँ, और किसके लिए, क्यों शोक करूँ?” यह संसार चक्र के समान घूमता रहता है; इसमें प्रियजनों का सहवास अनित्य है। यहाँ भ्राता, माता, पिता और सखा का साथ भी मार्ग में मिले हुए बटोहियों के समान ही है।
Verse 42
न दृष्टपूर्व प्रत्यक्ष परलोकं विदुर्बुधा: । आगरमांस्त्वनतिक्रम्य श्रद्धातव्यं बुभूषता,यद्यपि विद्वान पुरुष कहते हैं कि परलोक न तो आँखोंके सामने है और न पहलेका ही देखा हुआ है, तथापि अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लंघन न करके उसकी बातोंपर विश्वास करना चाहिये
जनक ने कहा—बुद्धिमान जानते हैं कि परलोक न तो इन्द्रियों के प्रत्यक्ष है, न पहले देखा हुआ। तथापि जो अपना परम कल्याण चाहता है, उसे शास्त्र-आज्ञाओं का उल्लंघन न करके, उनके वचनों में श्रद्धा रखनी चाहिए।
Verse 43
कुर्वीत पितृदैवत्यं धर्माणि च समाचरेत् । यजेच्च विद्वान् विधिवत त्रिवर्ग चाप्युपाचरेत्,विज्ञ पुरुष पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका यजन करे। धर्मानुकूल कार्योंका अनुष्ठान और यज्ञ करे तथा विधिपूर्वक धर्म, अर्थ और कामका भी सेवन करे
जनक ने कहा—विज्ञ पुरुष पितरों के लिए श्राद्ध और देवताओं का यजन करे। धर्मानुकूल कर्मों का आचरण करे और विधिपूर्वक यज्ञ करे; तथा धर्म, अर्थ और काम—इन त्रिवर्ग का भी नियमपूर्वक सेवन करे।
Verse 44
संनिमज्जेज्जगदिदं गम्भीरे कालसागरे | जरामृत्युमहाग्राहे न कश्चिदवबुध्यते,जिसमें जरा और मृत्युरूपी बड़े-बड़े ग्राह पड़े हुए हैं, उस गम्भीर कालसमुद्रमें यह सारा संसार डूब रहा है, किंतु कोई इस बातको समझ नहीं पाता है
जनक बोले—यह सारा जगत गम्भीर काल-समुद्र में डूब रहा है, जहाँ जरा और मृत्यु रूपी महाग्राह घात लगाए बैठे हैं; पर कोई इस सत्य को सचमुच नहीं समझता।
Verse 45
आयुर्वेदमधीयाना: केवलं सपरिग्रहा: | दृश्यन्ते बहवो वैद्या व्याधिभि: समभिप्लुता:
जनक बोले—आयुर्वेद का अध्ययन करनेवाले बहुत-से वैद्य केवल संग्रह-परिग्रह में लगे रहते हैं; और वे स्वयं भी रोगों से अभिभूत दिखाई देते हैं।
Verse 46
केवल आयुर्वेदका अध्ययन करनेवाले बहुत-से वैद्य भी परिवारसहित रोगोंके शिकार हुए देखे जाते हैं ।। ते पिबन्त: कषायांश्र सर्पीषि विविधानि च । न मृत्युमतिवर्तन्ते वेलामिव महोदधि:
जनक बोले—केवल आयुर्वेद का अध्ययन करनेवाले बहुत-से वैद्य भी परिवारसहित रोगों के शिकार देखे जाते हैं। वे कड़वे काढ़े और नाना प्रकार के घृत पीते रहते हैं, फिर भी मृत्यु को पार नहीं कर पाते—जैसे महासागर अपनी ही तट-रेखा को नहीं लाँघता।
Verse 47
वे कड़वे-कड़वे काढ़े और नाना प्रकारके घृत पीते रहते हैं तो भी जैसे महासागर अपनी तट-भूमिसे आगे नहीं बढ़ता, उसी प्रकार वे मौतको लाँघ नहीं पाते हैं ।। रसायनविदश्चैव सुप्रयुक्तरसायना: । दृश्यन्ते जरया भग्ना नगा नागैरिवोत्तमै:,रसायन जाननेवाले वैद्य अपने लिये रसायनोंका अच्छी तरह प्रयोग करके भी वृद्धावस्थाद्वारा वैसे ही जर्जर हुए दिखायी देते हैं, जैसे श्रेष्ठ हाथियोंके आघातसे टूटे हुए वृक्ष दृष्टिगोचर होते हैं
जनक बोले—वे कड़वे काढ़े और नाना प्रकार के घृत पीते रहते हैं, तो भी जैसे महासागर अपनी तट-भूमि से आगे नहीं बढ़ता, उसी प्रकार वे मृत्यु को लाँघ नहीं पाते। इसी तरह रसायन-विद्या में निपुण वैद्य, अपने लिए रसायनों का उत्तम प्रयोग करके भी, जरा से वैसे ही जर्जर दिखाई देते हैं जैसे श्रेष्ठ हाथियों के प्रहार से टूटे हुए वृक्ष।
Verse 48
तथैव तपसोपेता: स्वाध्यायाभ्यसने रता: । दातारो यज्ञशीलाश्न न तरन्ति जरान्तकौ,इसी प्रकार शास्त्रोंके स्वाध्याय और अभ्यासमें लगे हुए विद्वान, तपस्वी, दानी और यज्ञशील पुरुष भी जरा और मृत्युको पार नहीं कर पाते हैं
जनक बोले—इसी प्रकार तप से युक्त, शास्त्रों के स्वाध्याय और अनुशासनपूर्ण अभ्यास में रत, विद्वान तपस्वी, दानी और यज्ञशील पुरुष भी जरा और मृत्यु को पार नहीं कर पाते।
Verse 49
न हाहानि निवर्तन्ते न मासा न पुन: समा: | जातानां सर्वभूतानां न पक्षा न पुन: क्षपा:,संसारमें जन्म लेनेवाले सभी प्राणियोंके दिन-रात, वर्ष, मास और पक्ष एक बार बीतकर फिर वापस नहीं लौटते हैं
संसार में जन्म लेने वाले समस्त प्राणियों के लिए समय लौटकर नहीं आता। बीते हुए दिन फिर नहीं आते; न मास लौटते हैं, न वर्ष। वैसे ही पक्ष और रात्रियाँ भी, एक बार चली जाएँ तो पुनः नहीं आतीं।
Verse 50
सो<यं विपुलमध्वानं कालेन ध्रुवमश्चुव: । नरोडवश: समभ्येति सर्वभूतनिषेवितम्,मृत्युके इस विशाल मार्गका सेवन सभी प्राणियोंको करना पड़ता है। इस अनित्य मानवको भी कालसे विवश होकर कभी न टलनेवाले मृत्युके मार्गपर आना ही पड़ता है
यह मनुष्य काल के वश होकर उस विशाल मार्ग पर अवश्य चलता है, जो ध्रुव और अवश्यंभावी है। विवश होकर वह उसी मृत्यु के पथ पर पहुँचता है, जिसे समस्त प्राणी रौंदते आए हैं।
Verse 51
देहो वा जीवतो<भ्येति जीवो वाभ्येति देहत: । पथि संगममभ्येति दारैरन्यैश्व बन्धुभि:,(आस्तिक मतके अनुसार) जीव (चेतन) से शरीरकी उत्पत्ति हो या (नास्तिकोंकी मान्यताके अनुसार) शरीरसे जीवकी। सर्वथा स्त्री-पुत्र आदि या अन्य बन्धुओंके साथ जो समागम होता है, वह रास्तेमें मिलनेवाले राहगीरोंके समान ही है
चाहे कोई माने कि जीव से शरीर उत्पन्न होता है, या यह कि शरीर से जीव—दोनों ही मतों में, स्त्री-पुत्र आदि और अन्य बन्धुओं से जो मिलन होता है, वह मार्ग में मिलने वाले यात्रियों के संयोग के समान है।
Verse 52
नायमत्यन्तसंवासो लभ्यते जातु केनचित् । अपि स्वेन शरीरेण किमुतान्येन केनचित्,किसी भी पुरुषको कभी किसीके साथ भी सदा एक स्थानमें रहनेका सुयोग नहीं मिलता। जब अपने शरीरके साथ भी बहुत दिनोंतक सम्बन्ध नहीं रहता, तब दूसरे किसीके साथ कैसे रह सकता है?
किसी को भी कभी किसी के साथ नित्य और अखण्ड सहवास प्राप्त नहीं होता। जब अपने ही शरीर के साथ भी सम्बन्ध अधिक दिनों तक नहीं रहता, तब दूसरे किसी के साथ वह कैसे टिक सकता है?
Verse 53
क्व नु तेडद्य पिता राजन् क्व नु तेडद्य पितामहा: । न त्वं पश्यसि तानद्य न त्वां पश्यन्ति तेडनघ,राजन्! आज तुम्हारे पिता कहाँ हैं? आज तुम्हारे पितामह कहाँ गये? निष्पाप नरेश! आज न तो तुम उन्हें देख रहे हो और न वे तुम्हें देखते हैं
राजन्! आज तुम्हारे पिता कहाँ हैं? आज तुम्हारे पितामह कहाँ हैं? निष्पाप नरेश! आज न तुम उन्हें देखते हो, न वे तुम्हें देखते हैं।
Verse 54
न चैव पुरुषो द्रष्टा स्वर्गस्य नरकस्य च । आगमस्तु सतां चक्षुर्न॒पते तमिहाचर,कोई भी मनुष्य यहींसे इन स्थूल नेत्रोंद्वारा स्वर्ग और नरकको नहीं देख सकता। उन्हें देखनेके लिये सत्पुरुषोंके पास शास्त्र ही एकमात्र नेत्र हैं, अतः नरेश्वर! तुम यहाँ उस शास्त्रके अनुसार ही आचरण करो
जनक ने कहा—इस लोक में कोई भी मनुष्य इन स्थूल नेत्रों से स्वर्ग और नरक को प्रत्यक्ष नहीं देख सकता। सत्पुरुषों के लिए शास्त्र ही एकमात्र नेत्र है, जिससे अदृश्य फल का ज्ञान होता है। इसलिए, हे नरेश्वर, यहाँ शास्त्र के अनुसार ही आचरण करो।
Verse 55
चरितत्रह्मचर्यों हि प्रजायेत यजेत च । पितृदेवमनुष्याणानृण्यादनसूयक:,मनुष्य पहले ब्रह्मचर्यका पूर्णरूपसे पालन करके गृहस्थ-आश्रम स्वीकार करे और पितरों, देवताओं तथा मनुष्यों (अतिथियों) के ऋणसे मुक्त होनेके लिये संतानोत्पादन तथा यज्ञ करे, किसीके प्रति दोषदृष्टि न रखे
जनक का उपदेश है—मनुष्य पहले ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करे, फिर गृहस्थ-आश्रम में प्रवेश करे। पितरों, देवताओं और मनुष्यों (विशेषतः अतिथियों) के प्रति जो ऋण है, उससे मुक्त होने के लिए संतान उत्पन्न करे और यज्ञ करे; और किसी के प्रति दोषदृष्टि तथा ईर्ष्या न रखे।
Verse 56
स यज्ञशील: प्रजने निविष्ट: प्राग् ब्रह्मचारी प्रविविक्तचक्षु: । आराधयेत् स्वर्गमिमं च लोक॑ परं च मुक्त्वा हृदयव्यलीकम्,मनुष्य पहले ब्रह्मचर्यका पालन करके संतानोत्पादनके लिये विवाह करे, नेत्र आदि इन्द्रियोंको पवित्र रखे और स्वर्गलोक तथा इहलोकके सुखकी आशा छोड़कर हृदयके शोक-संतापको दूर करके यज्ञपरायण हो परमात्माकी आराधना करता रहे
जनक ने कहा—मनुष्य पहले ब्रह्मचारी होकर इन्द्रियों को पवित्र और संयत रखे; फिर संतान के हेतु गृहस्थ-जीवन में स्थित होकर यज्ञपरायण बने। हृदय की वक्रता—शोक, उद्वेग और अंतःकपट—को त्यागकर, इस लोक और स्वर्गलोक के सुखों की आशा छोड़ दे; और परमात्मा की आराधना करता रहे।
Verse 57
समं हि धर्म चरतो नृपस्य द्रव्याणि चाभ्याहरतो यथावत् । प्रवृत्तधर्मस्य यशो 5भिवर्धते सर्वेषु लोकेषु चराचरेषु,राजा यदि नियमपूर्वक प्रजाके निकटसे करके रूपमें द्रव्य ग्रहण करे और राग-द्वेषसे रहित हो राजधर्मका पालन करता रहे तो उस धर्मपरायण नरेशका सुयश सम्पूर्ण चराचर लोकोंमें फैल जाता है
जनक ने कहा—जो राजा समभाव से धर्म का पालन करता है और नियमपूर्वक, विधिसम्मत रीति से प्रजा से कर-आदि द्रव्य ग्रहण करता है, उसका यश बढ़ता है। जो शासक धर्मयुक्त शासन में निरंतर प्रवृत्त रहता है, उसकी कीर्ति समस्त लोकों में—चर और अचर सबमें—फैल जाती है।
Verse 58
इत्येवमाज्ञाय विदेहराजो वाक््यं समग्रं परिपूर्णहेतु: । अश्मानमामन्त्रय विशुद्धबुद्धि- ययौ गृहं स्वं प्रति शान्तशोक:,निर्मल बुद्धिवाले विदेहहाज जनक अश्माका यह युक्तिपूर्ण सम्पूर्ण उपदेश सुनकर शोकरहित हो गये और उनकी आज्ञा ले अपने घरको लौट गये
इस प्रकार युक्तिपूर्ण और समग्र उपदेश को समझकर विदेहराज जनक की बुद्धि निर्मल हो गई और वे शोक से मुक्त हो गए। अश्मक से अनुमति लेकर वे अपने घर लौट गए; शिक्षा से उनका दुःख शांत हो चुका था।
Verse 59
तथा त्वमप्यच्युत मुड्च शोक- मुत्तिष्ठ शक्रोपम हर्षमेहि । क्षात्रेण धर्मेण मही जिता ते तां भुड़क्षय कुन्तीसुत मावमंस्था:,अपने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले इन्द्रतुल्य पराक्रमी कुन्तीकुमार युधिष्ठिर! तुम भी शोक छोड़कर उठो और हृदयमें हर्ष धारण करो। तुमने क्षत्रियधर्मके अनुसार इस पृथ्वीपर विजय पायी है; अत: इसे भोगो। इसकी अवहेलना न करो
हे अच्युत! तुम भी शोक त्यागो। इन्द्रतुल्य पराक्रमी होकर उठो और हृदय में हर्ष धारण करो। क्षात्रधर्म के अनुसार तुमने यह पृथ्वी जीती है; अतः इसका भोग करो और इसका शासन करो। हे कुन्तीपुत्र! इसकी अवहेलना मत करो।
Verse 253
निर्माणे यस्य यद् दिष्टं तेन गच्छति सेतुना । रोग, अग्नि, जल, शस्त्र, भूख, प्यास, विपत्ति, विष, ज्वर और ऊँचे स्थानसे गिरना--ये सब जीवकी मृत्युके निमित्त हैं। जन्मके समय जिसके लिये प्रारब्धवश जो निमित्त नियत कर दिया गया है, वही उसका सेतु है, अतः उसीके द्वारा वह जाता है अर्थात् परलोकमें गमन करता है
जनक बोले—प्राणी के जन्म के समय प्रारब्धवश जिसके लिए जो अंत-निमित्त नियत किया गया है, उसी ‘सेतु’ से वह जाता है। रोग, अग्नि, जल, शस्त्र, भूख, प्यास, विपत्ति, विष, ज्वर और ऊँचाई से गिरना—ये सब मृत्यु के अवसर मात्र हैं; परंतु जिस निमित्त का विधान जन्म के साथ हो चुका है, उसी के द्वारा वह परलोक को प्रस्थान करता है।
Verse 266
दृश्यते चाप्यतिक्रामन्ननिग्राह्मो5थवा पुनः । कोई इस सेतुका उल्लंघन करता दिखायी नहीं देता अथवा पहले भी किसीने इसका उल्लंघन किया हो, ऐसा देखनेमें नहीं आया। कोई-कोई पुरुष जो (तपस्या आदि प्रबल पुरुषार्थके द्वारा) दैवके नियन्त्रणमें रहनेयोग्य नहीं है, वह पूर्वोक्त सेतुका उल्लंघन करता भी दिखायी देता है
जनक कहते हैं—सामान्यतः कोई इस स्थापित सेतु का उल्लंघन करता दिखाई नहीं देता; न यह भी देखा-सुना गया है कि पूर्वकाल में किसी ने इसका अतिक्रमण किया हो। पर कभी-कभी कोई ऐसा पुरुष, जो दैव के नियंत्रण में रहने योग्य नहीं रहता—जो तपस्या आदि प्रबल पुरुषार्थ से भाग्य के बंधन को ढीला कर देता है—वह उस सेतु को लाँघता हुआ भी दिख जाता है।
How a ruler should remain ethically stable when confronted with the potential gain or loss of kin and wealth—whether grief or fear should determine conduct, or whether duty should be pursued with reflective restraint.
Recognize impermanence and the governance of kāla: attachment-driven fixation leads to mental disturbance and unethical action, while disciplined reflection enables fulfillment of social duties without being ruled by sorrow.
Yes: the exemplum ends with Janaka’s grief pacified, and Vyāsa explicitly applies the instruction to Yudhiṣṭhira—abandon despondency and administer the kingdom in accordance with kṣātra-dharma.