
Bhūta-guṇa-saṃkhyāna (Enumeration of the Properties of the Elements and Cognitive Faculties)
Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation Teachings) — Bhūta-guṇa-saṃkhyāna Context
Bhīṣma addresses Yudhiṣṭhira and resumes an authoritative enumeration of guṇas, presented as a respected doctrine associated with Dvaipāyana (Vyāsa). He lists properties of the five great elements: for earth—stability, extension, hardness, generativity, smell, heaviness, power, cohesion, support, and endurance; for water—coolness, taste, moisture, liquidity, unctuousness, softness, the tongue as the organ, and flow/oozing; for fire—irresistibility, brilliance, heat, transformation (cooking), illumination, purity, color/attachment, lightness, sharpness, and upward tendency; for wind—irregularity, touch, a basis of sound/vibration, autonomy, strength, speed, delusion, activity, and action-causing impulse; for space—sound, pervasiveness, porosity, non-support, non-attachment, unmanifestness, and invariability, with additional notes on non-obstruction and elemental status. The chapter then adds a psychological classification: nine properties of mind (including movement, manifestation, projection, imagination, forbearance, and rapid alternation of existence/non-existence), and five properties of intellect (preference/aversion discrimination, determination, concentration, doubt, and ascertainment). Yudhiṣṭhira queries how intellect is ‘fivefold’ and how the senses relate to guṇas; Bhīṣma notes variant enumerations (e.g., sixty elemental properties) and concludes by directing the listener toward calm intelligence (śānta-buddhi) through grasp of elemental reality (bhūtārtha-tattva).
Chapter Arc: व्यास शुकदेव के प्रश्न-प्रत्युप्रश्न की धारा में मनुष्य के भीतर चलने वाले सूक्ष्म युद्ध को सामने रखते हैं—मन भावों को उछालता है, बुद्धि निर्णय करती है, और हृदय प्रिय-अप्रिय के द्वन्द्व में डोलता है। → विषयों की खींच, इन्द्रियों की चंचलता और मन की प्रार्थना-लालसा एक साथ उठती है; साधक के लिए प्रश्न तीखा होता जाता है—किसे ‘मैं’ मानूँ: इन्द्रिय-प्रवाह को, मन की मांग को, या बुद्धि की निर्णायक सत्ता को? आत्मा इन्द्रिय-गोचर कामनाओं से पकड़ में नहीं आती, और अक्रतात्मा के लिए उसे देखना दुष्कर बताया जाता है। → उपनिषद-सदृश शिखर वाक्य-क्रम में क्रम-श्रेष्ठता स्थापित होती है—इन्द्रियों से परे विषय, विषयों से परे मन, मन से परे बुद्धि, और बुद्धि से परे आत्मा; साथ ही यह भी कि बुद्धि ही इन्द्रियों की अधिष्ठात्री होकर कभी मन बन जाती है (जब वह इच्छा/प्रार्थना करती है) और कभी निश्चय-स्वरूप रहती है—यहीं ‘प्रकृति-पुरुष विवेक’ का निर्णायक बिन्दु प्रकट होता है। → ज्ञानी का आचरण-निष्कर्ष दिया जाता है: जगत का स्वभाव परिवर्तनशील है—इसे जानकर वह न शोक करता है न हर्ष, नित्य विगत-मत्सर रहता है; गुणों और क्षेत्रज्ञ (पुरुष) के सूक्ष्म अन्तर को पहचानकर वह गुण-चक्र को ‘रथ-नेमि’ की भाँति घूमता देखता है और साक्षी-भाव में स्थित होता है।
Verse 1
: डि अष्टचत्वारिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक व्यास उवाच मनो विसृजते भावं बुद्धिरध्यवसायिनी । हृदयं प्रियाप्रिये वेद त्रिविधा कर्मचोदना,व्यासजी कहते हैं--पुत्र! कर्म करनेमें तीन प्रकारसे प्रेरणा प्राप्त होती है। पहले तो मन संकल्पमात्रसे नाना प्रकारके भावकी सृष्टि करता है, बुद्धि उसका निश्चय करती है। तत्पश्चात् हृदय उनकी अनुकूलता और प्रतिकूलताका अनुभव करता है। (इसके बाद कर्ममें प्रवृत्ति होती है)
व्यासजी बोले—पुत्र! कर्म में प्रवृत्ति तीन प्रकार से होती है। पहले मन संकल्पमात्र से नाना भावों की सृष्टि करता है; बुद्धि उसका निश्चय करती है; फिर हृदय उसे प्रिय या अप्रिय रूप में अनुभव करता है। इसी त्रिविध प्रेरणा से मनुष्य कर्म में प्रवृत्त होता है।
Verse 2
इन्द्रियेभ्य: परा हार्था अर्थेभ्य: परमं मन: । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा परो मत:,इन्द्रियोंसे उनके विषय बलवान हैं (क्योंकि वे बलात् इन्द्रियोंकोी अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं), उन विषयोंसे मन बलवान है (क्योंकि वह इन्द्रियोंको उनसे हटानेमें समर्थ है)। मनसे बुद्धि बलवान् है (क्योंकि वह मनको वशमें रख सकती है) और बुद्धिसे आत्मा बलवान माना गया है (क्योंकि वह बुद्धिको सम बनाकर स्वाधीन कर सकता है)
व्यासजी बोले—इन्द्रियों से विषय अधिक बलवान हैं, क्योंकि वे बलपूर्वक इन्द्रियों को अपनी ओर खींच लेते हैं। उन विषयों से मन अधिक बलवान है, क्योंकि वह इन्द्रियों को उनसे हटा सकता है। मन से बुद्धि अधिक बलवान है, क्योंकि वह मन को वश में रख सकती है। और बुद्धि से भी आत्मा श्रेष्ठ मानी गई है, क्योंकि वह बुद्धि को सम करके स्वाधीन कर देती है।
Verse 3
बुद्धिरात्मा मनुष्यस्य बुद्धिरेवात्मना55त्मनि । यदा विकुरुते भावं तदा भवति सा मन:,बुद्धि प्राणियोंकी समस्त इन्द्रियोंकी अधिष्ठात्री है, इसलिये वह जीवात्माके समान ही उनकी आत्मा मानी गयी है। बुद्धि ही स्वयं अपने भीतर जब भिन्न-भिन्न विषयोंको ग्रहण करनेके लिये विकृत हो नाना प्रकारके रूप धारण करती है, तब वही मन बन जाती है
व्यास ने कहा— मनुष्य की बुद्धि ही उसका आत्मस्वरूप है; वही बुद्धि आत्मा के भीतर आत्मा के समान है। जब वही बुद्धि विविध विषयों को ग्रहण करने के लिए भिन्न-भिन्न रूपों में विकृत होती है, तब वही ‘मन’ कहलाती है।
Verse 4
इन्द्रियाणां पृथग्भावाद् बुद्धिर्विक्रियते हृतः । शृण्वती भवति श्रोत्रं स्मृशती स्पर्श उच्यते,इन्द्रियाँ पृथक्-पृथक् हैं, इसलिये उनकी क्रियाएँ भी पृथक्-पृथक् हैं। अतः उन्हींके लिये बुद्धि नाना प्रकारके रूप धारण करती है। वही जब सुनती है तो श्रोत्र कहलाती है और स्पर्श करते समय स्पर्शेन्द्रिय (त्वचा) के नामसे पुकारी जाती है
व्यास ने कहा— इन्द्रियाँ पृथक्-पृथक् होने से उनकी क्रियाएँ भी भिन्न-भिन्न हैं; अतः उन्हीं के द्वारा बाहर की ओर खिंची हुई बुद्धि अनेक प्रकार के रूप धारण करती है। वही जब सुनने का कार्य करती है तो ‘श्रोत्र’ कहलाती है और जब स्पर्श करती है तो ‘स्पर्शेन्द्रिय’ कही जाती है।
Verse 5
पश्यती भवते दृष्ठी रसती रसन॑ भवेत् | जिप्रती भवति प्राणं बुद्धिर्विक्रियते पृथक्,वही देखते समय दृष्टि और रसास्वादनके समय रसना हो जाती है। जब वह गन्धको ग्रहण करती है, तब वही प्राणेन्द्रिय कहलाती है। इस प्रकार बुद्धि ही पृथक्-पृथक् विकृत होती है
व्यास ने समझाया— वही एक अंतःशक्ति कार्यभेद से अनेक इन्द्रिय-शक्तियों के रूप में प्रकट होती है: रूपों को ग्रहण करते समय वह ‘दृष्टि’ कहलाती है; रस का आस्वादन करते समय ‘रसना’ बनती है; और गन्ध को ग्रहण करते समय ‘घ्राण’ कही जाती है। इस प्रकार बुद्धि ही पृथक्-पृथक् विकारों में कही जाती है, यद्यपि तत्त्वतः एक ही है।
Verse 6
इन्द्रियाणि तु तान्याहुस्तेष्वदृश्यो5धितिष्ठति । तिष्ठती पुरुषे बुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते,बुद्धिके इन विकारोंको ही इन्द्रियाँ कहते हैं। अदृश्य जीवात्मा उन सबमें अधिष्ठित है। बुद्धि उस जीवात्मामें ही स्थित हो सात्विक आदि तीनों भावोंमें रहती है
व्यास ने कहा— बुद्धि के ये ही विकार ‘इन्द्रियाँ’ कहलाते हैं; उन सबमें अदृश्य आत्मा अधिष्ठाता होकर स्थित है। बुद्धि उस पुरुष (देहधारी आत्मा) में स्थित रहकर भी सत्त्व, रज और तम—इन तीनों भावों में विचरती रहती है।
Verse 7
कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदपि शोचति । न सुखेन न दुःखेन कदाचिदिह युज्यते,इसी हेतुसे वह कभी प्रेम और प्रसन्नता लाभ करती है (यह उसका सात््विक भाव है)। कभी शोकमें डूबती है (यह उसका राजस भाव है)। और कभी न तो सुखसे युक्त होती है एवं न दुःखसे ही; उसपर मोह छाया रहता है (यही उसका तामस भाव है)
व्यास ने कहा— कभी वह प्रीति और प्रसन्नता प्राप्त करती है, कभी शोक में डूब जाती है; और कभी इस लोक में न सुख से युक्त होती है, न दुःख से—मोह के अन्धकार में जड़-सी पड़ी रहती है।
Verse 8
सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतानतिवर्तते । सरितां सागरो भर्ता महावेलामिवोर्मिमान्,जैसे उत्ताल तरंगोंसे युक्त सरिताओंका स्वामी समुद्र कभी-कभी अपनी विशाल तटभूमिको भी लाँघ जाता है, उसी प्रकार यह भावात्तमिका बुद्धि चित्तवृत्तियोंके निरोधरूप योगमें स्थित होनेपर इन तीनों भावोंको लाँघ जाती है
यह भावात्मिका बुद्धि इन तीनों भावों का अतिक्रमण कर जाती है। जैसे उत्ताल तरंगों से युक्त नदियों का स्वामी समुद्र कभी-कभी अपनी विशाल तट-सीमा को भी लाँघ जाता है, उसी प्रकार चित्तवृत्तियों के निरोधरूप योग में स्थित होने पर यह भावाधिष्ठित बुद्धि उन तीनों अवस्थाओं से परे चली जाती है।
Verse 9
यदा प्रार्थयते किंचित् तदा भवति सा मनः । अधिष्ठानानि वै बुद्धयां पृथगेतानि संस्मरेत् । इन्द्रियाण्येव मेध्यानि विजेतव्यानि कृत्स्नश:,मनुष्य जब किसी वस्तुकी इच्छा करता है, तब उसकी बुद्धि मनके रूपमें परिणत हो जाती है। ये जो एक दूसरेसे पृथक्-पृथक् इन्द्रियोंके भाव हैं, इन्हें बुद्धिके ही अन्तर्गत समझना चाहिये। “मेधा' कहते हैं रूप आदिके ज्ञानको, उसमें हितकर या सहायक होनेके कारण इन्द्रियाँ 'मेध्य” कही गयी हैं। योगीको सम्पूर्ण इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करनी चाहिये
मनुष्य जब किसी वस्तु की इच्छा करता है, तब वही बुद्धि मन बनकर काम का आसन हो जाती है। जो अनुभव के आधार अलग-अलग प्रतीत होते हैं, उन्हें बुद्धि के ही अंतर्गत समझना चाहिए। इसलिए ‘मेध्या’—मेधा की सहायक—इन्द्रियों पर योगी को पूर्ण विजय प्राप्त करनी चाहिए।
Verse 10
सर्वाण्येवानुपूर्व्येण यद् यदानुविधीयते । अविभागगता बुद्धिर्भावे मनसि वर्तते,बुद्धि सम्पूर्ण इन्द्रियोंमेंसे जब जिस इन्द्रियके साथ हो जाती है, उस समय पहले अलग न होनेपर भी वह बुद्धि संकल्पात्मक मन एवं घटादि पदार्थोमें उपस्थित होती है अर्थात् बुद्धिसे अनुगृहीत होनेपर ही कोई भी इन्द्रिय संकल्पजनित घट-पटादिको क्रमशः ग्रहण करती है
जो कुछ भी प्रवृत्त होता है, वह क्रम से ही आगे बढ़ता है। बुद्धि स्वयं अविभक्त है, पर वह भाव-क्षेत्र में मन के रूप में और विषय-क्षेत्र में क्रियाशील हो जाती है। जब बुद्धि किसी विशेष इन्द्रिय के साथ जुड़ती है, तब वही इन्द्रिय मन के संकल्प के सहारे घट-पट आदि विषयों को क्रमशः ग्रहण करती है। अतः बुद्धि के अनुग्रह से ही ज्ञान और इन्द्रिय-ग्रहण की प्रवृत्ति होती है।
Verse 12
जगत्में जो भी नाना भाव हैं, वे सब-के-सब सात्त्विक, राजस और तामस--इन तीनों भावोंके ही अन्तर्गत हैं। जैसे अरे रथकी नेमिसे जुड़े होते हैं, उसी प्रकार सभी भाव सात्विक आदि गुणोंके अनुगामी हैं ।। प्रदीपार्थ मन: कुर्यादिन्द्रियैरबुद्धिसत्तमै: । निश्चरद्धिर्यथायोगमुदासीनैर्यद्च्छया,बुद्धिरूप अधिष्ठानमें स्थित हुई उदासीनभावसे स्वभावके अनुसार यथासम्भव विषयोंकी ओर जानेवाली इन्द्रियोंद्वारा मन दीपकका कार्य करता है अर्थात् जैसे दीपक अपनी प्रभाद्वारा घटादि वस्तुओंको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार मन नेत्र आदि इन्द्रियोंद्वारा घट-पट आदि वस्तुओंका दर्शन एवं ग्रहण कराता है
जगत में जितने भी नाना भाव हैं, वे सब सात्त्विक, राजस और तामस—इन तीनों के ही अंतर्गत हैं। जैसे रथ के अरे नेमि से जुड़े रहते हैं, वैसे ही सब भाव गुणों के अनुगामी हैं। बुद्धिरूप अधिष्ठान में स्थित मन दीपक का कार्य करता है; और इन्द्रियाँ स्वभाव तथा अवसर के अनुसार विषयों की ओर जाती हुई भी भीतर से उदासीन रहकर अनुभव को प्रकाशित करती हैं। जैसे दीपक अपने प्रकाश से घट आदि को प्रकट करता है, वैसे ही मन नेत्र आदि इन्द्रियों द्वारा घट-पट आदि का दर्शन और ग्रहण कराता है।
Verse 13
एवं स्वभावमेवेदमिति विद्वान् न मुहृति । अशोचचन्नप्रहृष्यन् हि नित्यं विगतमत्सर:,इस जगतका ऐसा ही परिवर्तनस्वभाव है, ऐसा जाननेवाला ज्ञानी पुरुष कभी मोहमें नहीं पड़ता, हर्ष और शोक नहीं करता तथा ईर्ष्या-द्वेष आदिसे रहित रहता है
“यह जगत् ऐसा ही स्वभाव वाला है—सदा परिवर्तनशील,” ऐसा जाननेवाला विद्वान् क्षणभर भी मोह में नहीं पड़ता। वह न शोक करता है, न हर्ष; और ईर्ष्या-द्वेष से रहित होकर सदा समभाव में स्थित रहता है।
Verse 14
न चात्मा शक््यते द्रष्टमिन्द्रिये: कामगोचरै: । प्रवर्तमानैरनये दुष्करैरकृतात्मभि:
व्यास ने कहा—इन्द्रियाँ कामनाओं के क्षेत्र में विचरती हैं; इसलिए उनके द्वारा आत्मा का यथार्थ दर्शन नहीं हो सकता। वे जब प्रमाद के मार्ग पर दौड़ती हैं—चंचल, दमन में कठिन—विशेषतः असंयमी पुरुषों के लिए, तब अन्तःसत्य का प्रत्यक्ष बोध असम्भव हो जाता है।
Verse 15
जो दुष्कर्मपरायण और अशुद्ध अन्तःकरणवाले हैं, वे अज्ञानी पुरुष अन्यायपूर्वक मनोवाञ्छित विषयोंमें विचरनेवाली इन्ट्रियोंद्वारा आत्माका दर्शन नहीं कर सकते ।। तेषां तु मनसा रश्मीन् यदा सम्यड्नियच्छति । तदा प्रकाशते<स्यात्मा दीपदीप्ता यथा55कृति:,परंतु जब मनुष्य अपने मनके द्वारा इन्द्रियरूपी अश्वोंकी बागडोरको सदा पकड़े रहकर उन्हें अच्छी तरह काबूमें कर लेता है, तब उसे ज्ञानके प्रकाशमें आत्माका दर्शन उसी प्रकार होता है जिस प्रकार दीपकके प्रकाशमें किसी वस्तुकी आकृति स्पष्ट दिखायी देती है
जो दुष्कर्म में रत, अशुद्ध अन्तःकरणवाले और विवेकहीन हैं, वे मनोवाञ्छित विषयों में अन्यायपूर्वक विचरने वाली इन्द्रियों के द्वारा आत्मा का दर्शन नहीं कर सकते। परन्तु जब मनुष्य मन के द्वारा इन्द्रियरूपी अश्वों की बागडोर को दृढ़ता से थामकर उन्हें सम्यक् वश में कर लेता है, तब ज्ञान के प्रकाश में आत्मा उसी प्रकार प्रकट होती है जैसे दीपक के प्रकाश में किसी वस्तु की आकृति स्पष्ट दिखाई देती है।
Verse 16
सर्वेषामेव भूतानां तमस्यपगते यथा । प्रकाशं भवते सर्व तथेदमुपधार्यताम्,जैसे अन्धकार दूर हो जानेपर सभी प्राणियोंके सामने प्रकाश छा जाता है, उसी प्रकार यह निश्चितरूपसे समझ लो कि अज्ञानका नाश होनेपर ही ज्ञानस्वरूप आत्माका साक्षात्कार होता है
व्यास ने कहा—जैसे अन्धकार के दूर हो जाने पर सब प्राणियों के सामने प्रकाश फैल जाता है, वैसे ही यह निश्चयपूर्वक समझो कि अज्ञान के नाश होने पर ही ज्ञानस्वरूप आत्मा का साक्षात्कार होता है।
Verse 17
यथा वारिचर: पक्षी न लिप्यति जले चरन् । विमुक्तात्मा तथा योगी गुणदोषैर्न लिप्यते,जैसे जलचर पक्षी जलमें विचरता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार मुक्तात्मा योगी संसारमें रहकर भी उसके गुण और दोषोंसे लिपायमान नहीं होता
व्यास ने समझाया—जैसे जलचर पक्षी जल में विचरता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता, वैसे ही मुक्तात्मा योगी संसार में रहकर भी उसके गुण-दोषों से लिप्त नहीं होता।
Verse 18
एवमेव कृतप्रज्ञो न दोषैरविंषयां श्वरन् । असज्जमान: सर्वेषु कथंचन न लिप्यते,इसी प्रकार जिसकी बुद्धि शुद्ध है, वह स्त्री, पुत्र आदि सम्बन्धियोंमें आसक्त न होनेके कारण विषयोंका सेवन करता हुआ भी किसी प्रकार उनके दोषोंसे लिप्त नहीं होता है
इसी प्रकार जिसकी प्रज्ञा सिद्ध और शुद्ध है, वह विषयों में विचरता हुआ भी—उनमें आसक्त न होकर—किसी प्रकार दोषों से लिप्त नहीं होता।
Verse 19
त्यक्त्वा पूर्वकृतं कर्म रतिर्यस्थ सदा55त्मनि । सर्वभूतात्मभूतस्य गुणवर्गेष्वसज्जत:,जो अपने पूर्वकृत कर्मोके संस्कारोंका त्याग करके सदा परमात्मामें ही अनुराग रखता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा हो जाता है और विषयोंमें कभी आसक्त नहीं होता
जो अपने पूर्वकृत कर्मों के संस्कारों का त्याग करके सदा परमात्मा में ही अनुराग रखता है, वह मानो समस्त प्राणियों का आत्मा हो जाता है और विषय-गुणों के समूहों में कभी आसक्त नहीं होता।
Verse 20
सत्त्वमात्मा प्रसरति गुणान् वापि कदाचन । न गुणा विदुरात्मानं गुणान् वेद स सर्वदा
सत्त्व में स्थित आत्मा कभी-कभी गुणों की ओर (उनकी प्रवृत्तियों और विषयों की ओर) फैलती-सी प्रतीत होती है; पर गुण आत्मा को नहीं जानते—आत्मा ही सदा गुणों को जानती है।
Verse 21
परिद्रष्टा गुणानां च परिस््रष्टा यथातथम् । सत्त्वक्षेत्रज्योरेतदन्तरं विद्धि सूक्ष्मयो:,जीवात्मा कभी बुद्धिकी ओर झुकता है और कभी गुणोंकी ओर। गुण आत्माको नहीं जानते, किंतु आत्मा गुणोंको सदा जानता रहता है, क्योंकि वह गुणोंका द्रष्टा और यथावत्रूपसे स्रष्टा भी है। यद्यपि बुद्धि और क्षेत्रज्ञ दोनों ही सूक्ष्म वस्तु हैं, किंतु उन दोनोंमें यही अन्तर समझो कि बुद्धि दृश्य है और आत्मा द्रष्टा है
आत्मा गुणों का द्रष्टा है और यथार्थ के अनुसार उनका नियामक/विन्यासकर्ता भी है। सत्त्व (बुद्धि) और क्षेत्रज्ञ—इन दोनों सूक्ष्म तत्त्वों में यह भेद जानो: बुद्धि दृश्य है, और आत्मा द्रष्टा।
Verse 22
सृजते<त्र गुणानेक एको न सृजते गुणान् । पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ सम्प्रयुक्तो च सर्वदा,इन दोनोंमेंसे एक (बुद्धि) तो गुणोंकी सृष्टि करती है और दूसरा (आत्मा) गुणोंकी सृष्टि नहीं करता है। वे दोनों स्वरूपत: एक दूसरेसे पृथक हैं; परंतु सदा संयुक्त रहते हैं
इन दोनों में से एक—बुद्धि—अनेक प्रकार के गुणों की सृष्टि करती है; दूसरा—आत्मा—गुणों की सृष्टि नहीं करता। स्वभाव से वे दोनों पृथक हैं, पर सदा संयुक्त रहते हैं।
Verse 23
यथा मत्स्योडद्धिरन्य: स्यात् सम्प्रयुक्तो तथैव तौ । मशकोदुम्बरौ वापि सम्प्रयुक्तो यथा सह
जैसे मछली और समुद्र भिन्न-भिन्न हैं, फिर भी स्वाभाविक संबंध से जुड़े रहते हैं—वैसे ही वे दोनों हैं। या जैसे मच्छर और उदुम्बर (गूलर) साथ आ जाएँ तो जुड़े रहते हैं, यद्यपि सर्वथा असमान हैं।
Verse 24
जैसे मछली जलसे भिन्न है, फिर भी वे एक दूसरेसे संयुक्त रहते हैं। जैसे गूलर और उसके कीड़े एक दूसरेसे पृथक हैं तथापि परस्पर संयुक्त रहते हैं। उसी प्रकार बुद्धि और क्षेत्रञको भी समझना चाहिये ।। इषीका वा यथा मुज्जे पृथक् च सह चैव च । तथैव सहितावेतावन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितो,जैसे मूँजमें जो सींक है, वह उससे पृथक् है तो भी वे दोनों साथ ही रहते हैं, उसी प्रकार बुद्धि और क्षेत्रज्ञ सर्वथा एक दूसरेसे पृथक् होते हुए भी दोनों साथ-साथ और एक दूसरेके आश्रित रहते हैं
जैसे मुंज-घास के डंठल में भीतर की इषीका (सींक) उससे भिन्न होकर भी उसी के साथ रहती है, वैसे ही बुद्धि और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) स्वरूप से भिन्न होते हुए भी निकट संयोग में रहते हैं—अनुभव में एक-दूसरे के आश्रय से स्थित। यह दृष्टान्त विवेक को तीक्ष्ण करने के लिए कहा गया है।
Verse 131
ये चैव भावा वर्तन्ते सर्व एष्वेव ते त्रिषु । अन्वर्था: सम्प्रवर्तन्ते रथनेमिमरा इव
जगत में जो-जो भाव और अवस्थाएँ प्रकट होती हैं, वे सब इन्हीं तीन गुणों में ही पाई जाती हैं। वे अपने-अपने अर्थ और कार्य के अनुसार निरन्तर प्रवृत्त होती रहती हैं—जैसे रथ-चक्र की नेमि घूमती रहती है।
Verse 247
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ सैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में शुकदेव के अनुप्रश्न-विषयक दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 248
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने अष्टचत्वारिंशदधिकद्धिशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मीक्षधर्यपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ अड़़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में शुक के अनुप्रश्न-विषयक दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
The chapter targets cognitive instability and interpretive confusion: by mapping experience to elemental and mental functions, it provides a method for non-reactive understanding rather than a situational ‘choice’ dilemma.
Systematic discernment (viveka-like clarity) arises from understanding how embodied qualities and mental operations function; such knowledge supports composure (śānta-buddhi) and reduces misattribution of suffering.
Yes: Bhīṣma frames the teaching as authoritative and concludes that grasping bhūtārtha-tattva (the reality/meaning of the elements) enables mental calm, implying soteriological relevance within Mokṣa-dharma.