
Gārhasthya-Śreṣṭhatā and Kṣatriya-Daṇḍadhāraṇa (Householder Primacy and the Royal Duty of Punishment)
Upa-parva: Rājadharmānuśāsana Upa-Parva (राजधर्मानुशासन उपपर्व)
Vaiśaṃpāyana reports that after Arjuna’s counsel, Yudhiṣṭhira remains silent, whereupon the authoritative teacher-voice (Dvaipāyana/Vyāsa) intervenes. The discourse asserts that the gārhasthya āśrama is a śāstra-grounded ‘higher dharma’ for sustaining the world: gods, ancestors, sages, and dependents are said to live supported by householders, and broader life-forms are maintained through the householder economy. Yudhiṣṭhira is instructed to practice svadharma according to rule and method, and not to abandon household-based governance for forest life. The chapter then outlines disciplines associated with brāhmaṇas (tapas, yajña, vidyā, alms, sense-restraint, meditation, solitude, contentment, and giving) and articulates kṣatriya functions (yajña, learning, energetic initiative, non-complacency toward prosperity, rigorous bearing of daṇḍa, and protection of subjects). Among royal duties, daṇḍadhāraṇa is elevated as paramount because force capacity is structurally tied to kṣatriya identity; a supporting gāthā attributed to Bṛhaspati warns that the earth ‘swallows’ a non-resisting king and a non-resident brāhmaṇa, and exemplary figures (e.g., Sudyumna) are cited as attaining success through disciplined exercise of punishment and rule.
Chapter Arc: अर्जुन के कथन का स्मरण कराते हुए व्यास युधिष्ठिर से कहते हैं कि शास्त्र-दृष्ट ‘परो धर्म’ गृहस्थाश्रम में स्थित है—राजा को वन की ओर नहीं, प्रजा-पालन की ओर देखना चाहिए। → युधिष्ठिर के मन में संन्यास-प्रवृत्ति और राज्य-धर्म के बीच द्वंद्व उठता है। व्यास उसे स्वधर्म-पालन का आग्रह करते हुए उदाहरणों और आख्यानों से समझाते हैं कि दण्ड-धारण, प्रजा-रक्षा और विधि-पालन ही क्षत्रिय का मार्ग है। इसी क्रम में ‘लिखित–शंख’ तथा ‘सुद्युम्न’ से जुड़ा प्रसंग उभरता है, जहाँ अल्प-सा अपराध (गुरु की अनुमति बिना फल-भक्षण) भी धर्म-न्याय की कसौटी बन जाता है। → लिखित का स्वीकार—“गुरु की अनुमति बिना फल खा लिये; मुझे दण्ड दो”—और उसके साथ यह कठोर सत्य कि राजधर्म में ‘दूसरा काम’ (प्रजा-पालन से हटकर) कुमार्ग के तुल्य है। यहाँ करुणा बनाम विधि, और व्यक्तिगत शुचिता बनाम सार्वजनिक अनुशासन का टकराव तीव्र होता है। → व्यास निष्कर्ष देते हैं कि गृहस्थ-धर्म और राजधर्म ही लोक-धारण का आधार हैं; क्षत्रिय का मुख्य धर्म प्रजा का पूर्ण पालन है। ब्राह्मण-धर्म की चेष्टाएँ (तप, यज्ञ, विद्या, भिक्षा, इन्द्रिय-संयम, ध्यान, एकान्त, संतोष, शास्त्र-ज्ञान) अलग स्वभाव की हैं—अतः युधिष्ठिर को अपने वर्ण-आश्रम के अनुरूप कर्म में स्थिर होना चाहिए। → युधिष्ठिर के भीतर उठता प्रश्न बना रहता है—यदि धर्म का पालन कठोर दण्ड माँगे, तो करुणा की सीमा कहाँ तक है?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमनुशासनपर्वमें अजुनवाक्यविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २२ ॥। अपन क्राता बछ। अर: त्रयोविशो<् ध्याय: व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा कर वर्बिडिरको राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युविष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु कौन्तेयो गुडाकेशेन पाण्डव: । नोवाच किंचित् कौरव्यस्ततो द्वैपायनो5ब्रवीत्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! निद्राविजयी अर्जुके ऐसा कहनेपर भी कुरुकुलनन्दन पाण्डुपुत्र कुन्तीकुमार युधिष्ठिर जब कुछ न बोले, तब द्वैपायन व्यासजीने इस प्रकार कहा
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! निद्राविजयी गुडाकेश अर्जुन के ऐसा कहने पर भी कुरुनन्दन कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने कुछ भी उत्तर न दिया। तब द्वैपायन व्यासजी ने इस प्रकार कहा।
Verse 2
व्यास उवाच बीभत्सोर्वचनं सौम्य सत्यमेतद् युधिष्ठिर । शास्त्रदृष्ट: परो धर्म: स्थितो गार्हस्थ्यमाश्रित:,व्यासजी बोले--सौम्य युधिष्ठिर! अर्जुनने जो बात कही है, वह ठीक है। शास्त्रोक्त परमधर्म गृहस्थ-आश्रमका ही आश्रय लेकर टिका हुआ है
व्यासजी बोले— सौम्य युधिष्ठिर! बीभत्सु (अर्जुन) ने जो कहा है, वह सत्य है। शास्त्रों में प्रतिपादित परम धर्म गृहस्थ-आश्रम के आश्रय से ही स्थिर रहता है।
Verse 3
स्वधर्म चर धर्मज्ञ यथाशास्त्रं यथाविधि । न हि गार्हस्थ्यमुत्सृज्य तवारण्यं विधीयते,धर्मज्ञ युधिष्ठिर! तुम शास्त्रके कथनानुसार विधिपूर्वक स्वधर्मका ही आचरण करो। तुम्हारे लिये गृहस्थ-आश्रमको छोड़कर वनमें जानेका विधान नहीं है
धर्मज्ञ युधिष्ठिर! शास्त्रानुसार विधिपूर्वक अपने स्वधर्म का ही आचरण करो। तुम्हारे लिए गृहस्थ-आश्रम छोड़कर वन में जाने का कोई विधान नहीं है।
Verse 4
गृहस्थं हि सदा देवा: पितरोडतिथयस्तथा । भृत्याश्वैवोपजीवन्ति तान् भरस्व महीपते,पृथ्वीनाथ! देवता, पितर, अतिथि और भृत्यगण सदा गृहस्थका ही आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं; अतः तुम उनका भरण-पोषण करो
पृथ्वीनाथ! देवता, पितर, अतिथि तथा भृत्य-जन सदा गृहस्थ का ही आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं; अतः हे महीपते, तुम उनका भरण-पोषण करो।
Verse 5
वयांसि पशवश्चैव भूतानि च जनाधिप । गृहस्थैरेव धार्यन्ते तस्माच्छेष्ठो गृहाअश्रमी,जनेश्वर! पशु, पक्षी तथा अन्य प्राणी भी गृहस्थोंसे ही पालित होते हैं; अतः गृहस्थ ही सबसे श्रेष्ठ है
जनेश्वर! पक्षी, पशु तथा अन्य प्राणी भी गृहस्थों से ही पालित होते हैं; इसलिए गृहस्थ-आश्रम ही सबसे श्रेष्ठ है।
Verse 6
सो<यं चतुर्णामेतेषामाश्रमाणां दुराचर: । तं चराद्य विधिं पार्थ दुश्नरं दुर्बलेन्द्रिये:,युधिष्ठिर! चारों आश्रमोंमें यह गृहस्थाश्रम ही ऐसा है, जिसका ठीक-ठीक पालन करना बहुत कठिन है। जिनकी इन्द्रियाँ दुर्बल हैं, उनके द्वारा गृहस्थ-धर्मका आचरण दुष्कर है। तुम अब उसी दुष्कर धर्मका पालन करो
युधिष्ठिर! चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम का ठीक-ठीक पालन करना अत्यन्त कठिन है। जिनकी इन्द्रियाँ दुर्बल हैं, उनके लिए गृहस्थ-धर्म का आचरण विशेष दुष्कर होता है। अतः हे पार्थ, अब तुम उसी दुष्कर विधि का पालन करो।
Verse 7
वेदज्ञानं च ते कृत्स्नं तपश्चाचरितं महत् । पितृपैतामहं राज्यं धुर्यवद् वोढुमरहसि,तुम्हें वेदका पूरा-पूरा ज्ञान है, तुमने बड़ी भारी तपस्या की है। इसलिये अपने पिता- पितामहोंके इस राज्यका भार तुम्हें एक धुरन्धर पुरुषकी भाँति वहन करना चाहिये
तुम्हें वेदों का पूर्ण ज्ञान है और तुमने महान तपस्या की है। इसलिए पिता‑पितामहों से प्राप्त इस राज्य का भार तुम्हें एक धुरंधर पुरुष की भाँति वहन करना चाहिए।
Verse 8
तपो यज्ञस्तथा विद्या भैक्ष्यमिन्द्रियसंयम: । ध्यानमेकान्तशीलव्वं तुष्टिज्ञानं च शक्तित:
तप, यज्ञ और विद्या; भिक्षा पर जीवन और इन्द्रिय‑संयम; ध्यान, एकान्त‑शीलता, तथा संतोष और यथार्थ ज्ञान—इन सबका अभ्यास अपनी शक्ति के अनुसार करना चाहिए।
Verse 9
क्षत्रियाणां तु वक्ष्यामि तवापि विदितं पुन:,प्रजानाथ! अब मैं पुनः क्षत्रियोंके धर्म बता रहा हूँ, यद्यपि वह तुम्हें भी ज्ञात है। यज्ञ, विद्याभ्यास, शत्रुओंपर चढ़ाई करना, राजलक्ष्मीकी प्राप्तिसे कभी संतुष्ट न होना, दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत रहना, क्षत्रियतेजसे सम्पन्न रहना, प्रजाकी सब ओरसे रक्षा करना, समस्त वेदोंका ज्ञान प्राप्त करना, तप, सदाचार, अधिक द्रव्योपार्जन और सत्पात्रको दान देना--ये सब राजाओंके कर्म हैं, जो सुन्दर ढंगसे किये जानेपर उनके इहलोक और परलोक दोनोंको सफल बनाते हैं, ऐसा हमने सुना है
हे प्रजानाथ! अब मैं फिर क्षत्रियों के धर्म का वर्णन करता हूँ, यद्यपि वह तुम्हें भी ज्ञात है।
Verse 10
यज्ञो विद्या समुत्थानमसंतोष: श्रयं प्रति । दण्डधारणमुग्रत्वं प्रजानां परिपालनम्,प्रजानाथ! अब मैं पुनः क्षत्रियोंके धर्म बता रहा हूँ, यद्यपि वह तुम्हें भी ज्ञात है। यज्ञ, विद्याभ्यास, शत्रुओंपर चढ़ाई करना, राजलक्ष्मीकी प्राप्तिसे कभी संतुष्ट न होना, दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत रहना, क्षत्रियतेजसे सम्पन्न रहना, प्रजाकी सब ओरसे रक्षा करना, समस्त वेदोंका ज्ञान प्राप्त करना, तप, सदाचार, अधिक द्रव्योपार्जन और सत्पात्रको दान देना--ये सब राजाओंके कर्म हैं, जो सुन्दर ढंगसे किये जानेपर उनके इहलोक और परलोक दोनोंको सफल बनाते हैं, ऐसा हमने सुना है
यज्ञ, विद्याभ्यास, उद्यम (शत्रुओं पर चढ़ाई सहित), राजलक्ष्मी पाकर भी असंतोष—अर्थात् शिथिल न पड़ना—दण्ड धारण करने की तत्परता, उग्र पराक्रम, और प्रजाओं का पालन‑रक्षण—ये राजधर्म के लक्षण हैं।
Verse 11
वेदज्ञानं तथा कृत्स्नं तप: सुचरितं तथा । द्रविणोपार्जनं भूरि पात्रे च प्रतिपादनम्,प्रजानाथ! अब मैं पुनः क्षत्रियोंके धर्म बता रहा हूँ, यद्यपि वह तुम्हें भी ज्ञात है। यज्ञ, विद्याभ्यास, शत्रुओंपर चढ़ाई करना, राजलक्ष्मीकी प्राप्तिसे कभी संतुष्ट न होना, दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत रहना, क्षत्रियतेजसे सम्पन्न रहना, प्रजाकी सब ओरसे रक्षा करना, समस्त वेदोंका ज्ञान प्राप्त करना, तप, सदाचार, अधिक द्रव्योपार्जन और सत्पात्रको दान देना--ये सब राजाओंके कर्म हैं, जो सुन्दर ढंगसे किये जानेपर उनके इहलोक और परलोक दोनोंको सफल बनाते हैं, ऐसा हमने सुना है
समस्त वेदों का पूर्ण ज्ञान, सुचरित तप और सदाचार; बहुत-सा धन उपार्जित करने का पराक्रम, और योग्य पात्रों को विधिपूर्वक दान देना—ये भी राजा के कर्तव्य हैं।
Verse 12
एतानि राज्ञां कर्माणि सुकृतानि विशाम्पते । इमं लोकममुं चैव साधयन्तीति न: श्रुतम्,प्रजानाथ! अब मैं पुनः क्षत्रियोंके धर्म बता रहा हूँ, यद्यपि वह तुम्हें भी ज्ञात है। यज्ञ, विद्याभ्यास, शत्रुओंपर चढ़ाई करना, राजलक्ष्मीकी प्राप्तिसे कभी संतुष्ट न होना, दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत रहना, क्षत्रियतेजसे सम्पन्न रहना, प्रजाकी सब ओरसे रक्षा करना, समस्त वेदोंका ज्ञान प्राप्त करना, तप, सदाचार, अधिक द्रव्योपार्जन और सत्पात्रको दान देना--ये सब राजाओंके कर्म हैं, जो सुन्दर ढंगसे किये जानेपर उनके इहलोक और परलोक दोनोंको सफल बनाते हैं, ऐसा हमने सुना है
व्यासजी बोले—हे प्रजानाथ! हमने सुना है कि राजाओं के ये सुचारु रूप से किए हुए पुण्यकर्म इस लोक और परलोक—दोनों को सिद्ध करते हैं।
Verse 13
एषां ज्यायस्तु कौन्तेय दण्डधारणमुच्यते । बल हि क्षत्रिये नित्यं बले दण्ड: समाहित:,कुन्तीनन्दन! इनमें भी दण्ड धारण करना राजाका प्रधान धर्म बताया जाता है; क्योंकि क्षत्रियमें बलकी नित्य स्थिति है और बलमें ही दण्ड प्रतिष्ठित होता है
कुन्तीनन्दन! इन कर्तव्यों में दण्ड धारण करना ही सर्वोच्च कहा गया है; क्योंकि क्षत्रिय में बल सदा स्थित रहता है और दण्ड की प्रतिष्ठा उसी बल पर अवलम्बित होती है।
Verse 14
एता विद्या: क्षत्रियाणां राजन् संसिद्धिकारिका: । अपि गाथामिमां चापि बृहस्पतिरगायत,राजन! ये विद्याएँ (धार्मिक क्रियाएँ) क्षत्रियोंको सदा सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं। इस विषयमें बृहस्पतिजीने इस गाथाका भी गान किया है
राजन्! ये विद्याएँ और धर्मकर्म क्षत्रियों को सदा सिद्धि देनेवाले हैं। इसी विषय में बृहस्पति ने भी यह गाथा गाई थी।
Verse 15
भूमिरेतौ निगिरति सर्पे बिलशयानिव । राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम्,'जैसे साँप बिलमें रहनेवाले चूहे आदि जीवोंको निगल जाता है, उसी प्रकार विरोध न करनेवाले राजा और परदेशमें न जानेवाले ब्राह्मण--इन दो व्यक्तियोंको भूमि निगल जाती है
जैसे सर्प बिल में रहनेवाले जीवों को निगल जाता है, वैसे ही भूमि इन दो को निगल लेती है—जो राजा विरोध नहीं करता और जो ब्राह्मण प्रवास (धर्मानुष्ठान हेतु गमन) नहीं करता।
Verse 16
सुद्युम्नश्षापि राजर्षि: श्रूयते दण्डधारणात् । प्राप्तवान् परमां सिद्धि दक्ष: प्राचेतसो यथा
यह भी सुना जाता है कि राजर्षि सुद्युम्न ने दण्डधारण के द्वारा परम सिद्धि प्राप्त की—जैसे प्राचेतसपुत्र दक्ष ने की थी।
Verse 17
सुना जाता है कि राजर्षि सुद्युम्नने दण्डधारणके द्वारा ही प्रचेताकुमार दक्षके समान परम सिद्धि प्राप्त कर ली ।। युधिछिर उवाच भगवन् कर्मणा केन सुद्युम्नो वसुधाधिप: । संसिद्धि परमां प्राप्त: श्रोतुमिच्छामि तं नृपम्,युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! पृथिवीपति सुद्युम्नने किस कर्मसे परम सिद्धि प्राप्त कर ली थी। मैं उन नरेशका चरित्र सुनना चाहता हूँ
युधिष्ठिर ने कहा— भगवन्! पृथ्वीपति राजा सुद्युम्न ने किस कर्म के द्वारा परम सिद्धि प्राप्त की? मैं उस नरेश का चरित्र सुनना चाहता हूँ।
Verse 18
व्यास उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शंखक्ष लिखितश्षास्तां भ्रातरौ संशितव्रतो,व्यासजीने कहा--युधिष्ठिर! इस विषयमें लोग इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं--शंख और लिखित नामवाले दो भाई थे। दोनों ही कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी थे
व्यासजी ने कहा— युधिष्ठिर! इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं। शंख और लिखित नाम के दो भाई थे; दोनों ही कठोर व्रतों में दृढ़ तपस्वी थे।
Verse 19
तयोरावसथावास्तां रमणीयौ पृथक् पृथक् । नित्यपुष्पफलैवक्षैरुपेती बाहुदामनु,बाहुदा नदीके तटपर उन दोनोंके अलग-अलग परम सुन्दर आश्रम थे, जो सदा फल- फूलोंसे लदे रहनेवाले वृक्षोंसे सुशोभित थे
उन दोनों के अलग-अलग आश्रम थे, जो अत्यन्त रमणीय थे। वे बाहुदा नदी के तट पर स्थित थे और सदा फूल-फलों से लदे वृक्षों से सुशोभित रहते थे।
Verse 20
तत:ः कदाचिल्लिखित: शंखस्याश्रममागत: । यद्च्छयाथ शंखो<पि निष्क्रान्तो5$भवदाश्रमात्
फिर एक बार लिखित शंख के आश्रम पर आए। संयोगवश उसी समय शंख भी आश्रम से बाहर निकल आए।
Verse 21
एक दिन लिखित शंखके आश्रमपर आये। दैवेच्छासे शंख भी उसी समय आश्रमसे बाहर निकल गये थे ।। सो5भिगम्याश्रमं भ्रातु: शंखस्य लिखितस्तदा । फलानि पातयामास सम्यक्परिणतान्युत
तब लिखित अपने भाई शंख के आश्रम में पहुँचे। उसी समय उन्होंने भली-भाँति पके हुए फलों को (वृक्षों से) गिरा लिया।
Verse 22
तस्मिंश्न भक्षयत्येव शंखो5प्याश्रममागत:,वे खा ही रहे थे कि शंख भी आश्रमपर लौट आये। भाईको फल खाते देख शंखने उनसे पूछा--“तुमने ये फल कहाँसे प्राप्त किये हैं और किसलिये तुम इन्हें खा रहे हो?”
उसी समय जब वह फल खा रहा था, शंख भी आश्रम लौट आया। भाई को फल खाते देखकर शंख ने पूछा— “ये फल तुम्हें कहाँ से मिले हैं, और तुम इन्हें किस कारण से खा रहे हो?”
Verse 23
भक्षयन्तं तु तं दृष्टवा शंखो भ्रातरमब्रवीत् । कुत: फलान्यवाप्तानि हेतुना केन खादसि,वे खा ही रहे थे कि शंख भी आश्रमपर लौट आये। भाईको फल खाते देख शंखने उनसे पूछा--“तुमने ये फल कहाँसे प्राप्त किये हैं और किसलिये तुम इन्हें खा रहे हो?” इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्ये त्रयोविंशो 5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्या भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमनुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ
भाई को फल खाते देखकर शंख ने कहा— “ये फल तुम्हें कहाँ से प्राप्त हुए हैं, और तुम इन्हें किस हेतु से खा रहे हो?”
Verse 24
सो<ब्रवीद् भ्रातरं ज्येष्ठमुपसृत्याभिवाद्य च । इत एव गृहीतानि मयेति प्रहसन्निव,लिखितने निकट जाकर बड़े भाईको प्रणाम किया और हँसते हुए-से इस प्रकार कहा --“भैया! मैंने ये फल यहींसे लिये हैं”
तब वह बड़े भाई के पास जाकर प्रणाम करके, मानो हल्की-सी मुस्कान के साथ बोला— “भैया, मैंने ये फल यहीं से लिये हैं।”
Verse 25
तमब्रवीत् तथा शंखस्तीव्ररोषसमन्वित: । स्तेयं त्वया कृतमिदं फलान्याददता स्वयम्,तब शंखने तीव्र रोषमें भरकर कहा--“तुमने मुझसे पूछे बिना स्वयं ही फल लेकर यह चोरी की है
तब शंख ने तीव्र क्रोध से कहा— “तुमने बिना पूछे स्वयं फल उठा लिये; यह चोरी है जो तुमने की है।”
Verse 26
गच्छ राजानमासाद्य स्वकर्म कथयस्व वै । अदत्तादानमेवं हि कृतं पार्थिवसत्तम
तब (व्यास ने) कहा— “जाओ, राजा के पास जाकर अपना कर्म स्पष्ट कहो। हे श्रेष्ठ नरेश, यह ‘अदत्त-दान’ ही हुआ है—जो दिया नहीं गया, उसे लेना/देना।”
Verse 27
स्तेन॑ मां त्वं विदित्वा च स्वधर्ममनुपालय । शीघ्रं धारय चौरस्थ मम दण्डं नराधिप
व्यास ने कहा— “मुझे चोर जानकर भी तुम अपना स्वधर्म निभाओ। हे नराधिप! चोर-दण्ड देने वाले के स्थान पर स्थित होकर शीघ्र ही मुझे दण्ड दो।”
Verse 28
“अतः तुम राजाके पास जाओ और अपनी करतूत उन्हें कह सुनाओ। उनसे कहना --नृपश्रेष्ठ! मैंने इस प्रकार बिना दिये हुए फल ले लिये हैं, अतः मुझे चोर समझकर अपने धर्मका पालन कीजिये। नरेश्वर! चोरके लिये जो नियत दण्ड हो, वह शीघ्र मुझे प्रदान कीजिये” ।। इत्युक्तस्तस्य वचनात् सुझ्युम्न॑ स नराधिपम् । अभ्यगच्छन्महाबाहो लिखित: संशितव्रत:,महाबाहो! बड़े भाईके ऐसा कहनेपर उनकी आज्ञासे कठोर व्रतका पालन करनेवाले लिखित मुनि राजा सुद्युम्नके पास गये
व्यास ने कहा— “अतः तुम राजा के पास जाओ और जो किया है उसे उन्हें निवेदित करो। उनसे कहना— ‘नृपश्रेष्ठ! मैंने इस प्रकार बिना दिये हुए फल ले लिये हैं; इसलिए मुझे चोर समझकर अपना राजधर्म निभाइये। नरेश्वर! चोर के लिये जो नियत दण्ड है, वह शीघ्र मुझे प्रदान कीजिये।’ बड़े भाई के इस वचन से उपदेशित, कठोर व्रतों में स्थित मुनि लिखित मनुष्यों के अधिपति राजा सुद्युम्न के पास गये।”
Verse 29
सुद्युम्नस्त्वन्तपाले भ्य: श्रुव्वा लिखितमागतम् । अभ्यगच्छत् सहामात्य: पद्भ्यामेव जनेश्वर:,सुद्युम्नने द्वारपालोंसे जब यह सुना कि लिखित मुनि आये हैं तो वे नरेश अपने मन्त्रियोंके साथ पैदल ही उनके निकट गये
द्वारपालों से यह सुनकर कि मुनि लिखित आये हैं, जनेश्वर राजा सुद्युम्न अपने मन्त्रियों सहित पैदल ही उनके निकट गये।
Verse 30
तमब्रवीत् समागम्य स राजा धर्मवित्तमम् | किमागमनमाचक्ष्व भगवन् कृतमेव तत्,राजाने उन धर्मज्ञ मुनिसे मिलकर पूछा--“भगवन्! आपका शुभागमन किस उद्देश्यसे हुआ है? यह बताइये और उसे पूरा हुआ ही समझिये”
उन धर्मवित्तम मुनि के पास जाकर राजा ने कहा— “भगवन्! आपका आगमन किस प्रयोजन से हुआ है? बताइये; उसे पूर्ण हुआ ही समझिये।”
Verse 31
एवमुक्त: स विदप्रर्षि: सुद्युम्नमिदमब्रवीत् । प्रतिश्रुत्य करिष्येति श्रुत्वा तत् कर्तुमहसि,उनके इस तरह कहनेपर विप्रर्षि लिखितने सुद्युम्नसे यों कहा--'राजन्! पहले यह प्रतिज्ञा कर लो कि “हम करेंगे” उसके बाद मेरा उद्देश्य सुनो और सुनकर उसे तत्काल पूरा करो
ऐसा कहे जाने पर विप्रर्षि लिखित ने सुद्युम्न से कहा— “राजन्! पहले यह प्रतिज्ञा करिये कि ‘हम करेंगे’; फिर मेरा प्रयोजन सुनकर उसे तत्क्षण पूरा कीजिये।”
Verse 32
अनिसृष्टानि गुरुणा फलानि मनुजर्षभ । भक्षितानि महाराज तत्र मां शाधि मा चिरम्,“नरश्रेष्ठ! मैंने बड़े भाईके दिये बिना ही उनके बगीचेसे फल लेकर खा लिये हैं; महाराज! इसके लिये मुझे शीघ्र दण्ड दीजिये”
व्यास ने कहा—नरश्रेष्ठ! महाराज! बड़े भाई की अनुमति के बिना ही मैंने उनके उपवन के वे फल खा लिये जो मुझे दिये नहीं गये थे। इस अपराध के लिये मुझे शीघ्र दण्ड दीजिये, विलम्ब न कीजिये।
Verse 33
सुद्युग्न उवाच प्रमाणं चेन्मतो राजा भवतो दण्डधारणे । अनुज्ञायामपि तथा हेतु: स्याद् ब्राह्मणर्षभ,सुद्युम्नने कहा--ब्राह्मणशिरोमणे! यदि आप दण्ड देनेमें राजाको प्रमाण मानते हैं तो वह क्षमा करके आपको लौट जानेकी आज्ञा दे दे, इसका भी उसे अधिकार है
सुद्युम्न ने कहा—ब्राह्मणश्रेष्ठ! यदि दण्ड धारण करने में आप राजा को प्रमाण मानते हैं, तो उसी अधिकार से वह क्षमा करके आपको लौट जाने की आज्ञा भी दे सकता है।
Verse 34
स भवानभ्यनुज्ञात: शुचिकर्मा महाव्रत: । ब्रूहि कामानतो<न््यांस्त्वं करिष्यामि हि ते वच:
आपको अनुमति दे दी गई है, हे पवित्र कर्म करनेवाले, हे महान् व्रतधारी। अब बताइये, आपकी और कौन-सी कामनाएँ हैं? मैं निश्चय ही आपके वचन का पालन करूँगा।
Verse 35
आप पवित्र कर्म करनेवाले और महान् व्रतधारी हैं। मैंने अपराधको क्षमा करके आपको जानेकी आज्ञा दे दी। इसके सिवा, यदि दूसरी कामनाएँ आपके मनमें हों तो उन्हें बताइये, मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा ।। व्यास उवाच संछन््द्यमानो ब्रद्म॒र्षि: पार्थिवेन महात्मना । नान््यं स वरयामास तस्माद् दण्डादृते वरम्,व्यासजीने कहा--महामना राजा सुद्युम्नके बारंबार आग्रह करनेपर भी ब्रह्मर्षि लिखितने उस दण्डके सिवा दूसरा कोई वर नहीं माँगा
व्यास ने कहा—महात्मा राजा के बार-बार आग्रह करने पर भी ब्रह्मर्षि ने उस दण्ड के अतिरिक्त कोई दूसरा वर नहीं माँगा।
Verse 36
ततः स पृथिवीपालो लिखितस्य महात्मन: । करी प्रच्छेदयामास धृतदण्डो जगाम स:,तब उन भूपालने महामना लिखितके दोनों हाथ कटवा दिये। दण्ड पाकर लिखित वहाँसे चले गये
तब उस पृथ्वीपाल ने महामना लिखित के दोनों हाथ कटवा दिये। दण्ड प्राप्त करके लिखित वहाँ से चले गये।
Verse 37
स गत्वा भ्रातरं शंखमार्तरूपो<ब्रवीदिदम् | धृतदण्डस्य दुर्बुद्धेर्भवांस्तत् क्षन्तुमहति,अपने भाई शंखके पास जाकर लिखितने आर्त होकर कहा--'भैया! मैंने दण्ड पा लिया। मुझ दुर्बुद्धिके उस अपराधको आप क्षमा कर दें”
वह अपने भाई शंख के पास जाकर अत्यन्त व्याकुल होकर बोला— “भैया! मुझे दण्ड मिल गया है। मेरी दुर्बुद्धि से जो अपराध हुआ, उसे आप क्षमा करें।”
Verse 38
शंख उवाच न कुप्ये तव धर्मज्ञ न त्वं दूषयसे मम । सुनिर्मलं कुल ब्रह्म॒न्नस्मिन् जगति विश्रुतम् । धर्मस्तु ते व्यतिक्रान्तस्ततस्ते निष्कृति: कृता,शंख बोले--धर्मज्ञ! मैं तुमपर कुपित नहीं हूँ। तुम मेरा कोई अपराध नहीं करते हो। ब्रह्मन! हम दोनोंका कुल इस जगत्में अत्यन्त निर्मल एवं निष्कलंक रूपमें विख्यात है। तुमने धर्मका उल्लंघन किया था, अतः उसीका प्रायश्रित्त किया है
शंख बोले— “धर्मज्ञ! मैं तुम पर क्रोधित नहीं हूँ; तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया। ब्राह्मण! हमारा कुल इस जगत में अत्यन्त निर्मल और निष्कलंक रूप से विख्यात है। तुमने धर्म का उल्लंघन किया था, इसलिए उसका प्रायश्चित्त हो गया।”
Verse 39
त्वं गत्वा बाहुदां शीघ्र तर्पयस्व यथाविधि । देवानृषीन् पितृश्चैवं मा चाधर्मे मनः कृथा:
तुम शीघ्र ही बाहुदा नदी पर जाकर विधिपूर्वक तर्पण करो— देवताओं, ऋषियों और पितरों का। और अपना मन अधर्म की ओर मत ले जाना।
Verse 40
अब तुम शीघ्र ही बाहुदा नदीके तटपर जाकर विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करो। भविष्यमें फिर कभी अधर्मकी ओर मन न ले जाना ।। तस्य तद् वचन श्रुत्वा शंखस्य लिखितस्तदा । अवगाह्वापगां पुण्यामुदकार्थ प्रचक्रमे
शंख ने कहा— “तुम शीघ्र ही बाहुदा नदी के तट पर जाकर विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण करो। और आगे कभी भी मन को अधर्म की ओर मत ले जाना।” शंख की यह बात सुनकर लिखित ने पवित्र नदी में स्नान किया और विधि के लिए जल लेने में लग गया।
Verse 41
प्रादुरास्तां ततस्तस्य करो जलजसंनिभौ । शंखकी वह बात सुनकर लिखितने उस समय पवित्र नदी बाहुदामें स्नान किया और पितरोंका तर्पण करनेके लिये चेष्टा आरम्भ की। इतनेहीमें उनके कमल-सदृश सुन्दर दो हाथ प्रकट हो गये || ४० $ ।। ततः स विस्मितो क्रातुर्दर्शयामास तौ करो,तदनन्तर लिखितने चकित होकर अपने भाईको वे दोनों हाथ दिखाये। तब शंखने उनसे कहा--'भाई! इस विषयमें तुम्हें शंका नहीं होनी चाहिये। मैंने तपस्यासे तुम्हारे हाथ उत्पन्न किये हैं। यहाँ दैवका विधान ही सफल हुआ है
तत्क्षण उसके लिए कमल-सदृश सुन्दर दो हाथ प्रकट हो गये। विस्मित होकर लिखित ने वे दोनों हाथ अपने भाई को दिखाये। तब शंख ने कहा— “भाई! इसमें शंका मत करो। मैंने तपस्या से तुम्हारे हाथ उत्पन्न किये हैं; यहाँ दैव का विधान ही सफल हुआ है।”
Verse 42
ततस्तमब्रवीच्छंखस्तपसेदं कृतं मया । मा च तेऊत्र विशंकाभूद् दैवमत्र विधीयते,तदनन्तर लिखितने चकित होकर अपने भाईको वे दोनों हाथ दिखाये। तब शंखने उनसे कहा--'भाई! इस विषयमें तुम्हें शंका नहीं होनी चाहिये। मैंने तपस्यासे तुम्हारे हाथ उत्पन्न किये हैं। यहाँ दैवका विधान ही सफल हुआ है
तब शंख ने उससे कहा—“यह सब मैंने तपस्या के बल से किया है। इस विषय में तुम्हारे मन में कोई शंका न रहे। यहाँ दैव का विधान ही पूर्ण हो रहा है।”
Verse 43
लिखित उवाच किं तु नाहं त्वया पूतः पूर्वमेव महाद्युते । यस्य ते तपसो वीर्यमीदृशं द्विजसत्तम,तब लिखितने पूछा--महातेजस्वी द्विजश्रेष्ठी] जब आपकी तपस्याका ऐसा बल है तो आपने पहले ही मुझे पवित्र क्यों नहीं कर दिया?
लिखित ने कहा—“परन्तु, महातेजस्वी! आपने मुझे पहले ही क्यों नहीं पवित्र कर दिया? हे द्विजश्रेष्ठ! यदि आपकी तपस्या का बल ऐसा ही है, तो आपने मुझे तत्काल शुद्ध क्यों न कर दिया?”
Verse 44
शंख उवाच एवमेतन्मया कार्य नाहं दण्डधरस्तव । सच पूतो नरपतिस्त्वं चापि पितृभि: सह,शंख बोले--भाई! यह ठीक है, मैं ऐसा कर सकता था; परंतु मुझे तुम्हें दण्ड देनेका अधिकार नहीं है। दण्ड देनेका कार्य तो राजाका ही है। इस प्रकार दण्ड देकर राजा सुद्युम्न और उस दण्डको स्वीकार करके तुम पितरोंसहित पवित्र हो गये
शंख बोले—“हाँ, यह ठीक है; मैं ऐसा कर सकता था। परन्तु तुम्हें दण्ड देने का अधिकारी मैं नहीं हूँ। दण्ड धारण करने वाला तो राजा ही है। उस दण्ड को देकर राजा (सुद्युम्न) पवित्र हुआ और उसे स्वीकार करके तुम भी अपने पितरों सहित पवित्र हो गए।”
Verse 45
व्यास उवाच स राजा पाण्डवश्रेष्ठ श्रेयान् वै तेन कर्मणा । प्राप्तवान् परमां सिद्धि दक्ष: प्राचेतसो यथा,व्यासजी कहते हैं--पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिर! उस दण्ड-प्रदानरूपी कर्मसे राजा सुद्युम्न उच्चतम पदको प्राप्त हुए। उन्होंने प्रचेताओंके पुत्र दक्षकी भाँति परम सिद्धि प्राप्त की थी
व्यास ने कहा—“हे पाण्डवश्रेष्ठ! उस दण्ड-प्रदानरूपी कर्म से वह राजा निश्चय ही श्रेष्ठ हुआ। उसने परम सिद्धि प्राप्त की—जैसे प्रचेताओं के पुत्र दक्ष ने परम सिद्धि पाई थी।”
Verse 46
एष धर्म: क्षत्रियाणां प्रजानां परिपालनम् । उत्पथो<न्यो महाराज मा सम शोके मन: कृथा:
व्यास ने कहा—“हे महाराज! क्षत्रियों का यही धर्म है कि वे प्रजा का पालन-रक्षण करें। इसके अतिरिक्त दूसरा मार्ग कुमार्ग है। इसलिए अपने मन को शोक में न डुबोओ।”
Verse 47
महाराज! प्रजाजनोंका पूर्णरूपसे पालन करना ही क्षत्रियोंका मुख्य धर्म है। दूसरा काम उसके लिये कुमार्गके तुल्य है; अत: तुम मनको शोकमें न डुबाओ ।। भ्रातुरस्य हित॑ वाक््यं शृणु धर्मज्ञ सत्तम । दण्ड एव हि राजेन्द्र क्षत्रधर्मो न मुण्डनम्,धर्मके ज्ञाता सत्पुरुष! तुम अपने भाईकी हितकर बात सुनो। राजेन्द्र! दण्ड-धारण ही क्षत्रिय-धर्मके अन्तर्गत है, मूँड़ मुड़ाकर संन्यासी बनना नहीं
व्यासजी बोले—महाराज! प्रजा का पूर्ण रूप से पालन और संरक्षण ही क्षत्रिय का प्रधान धर्म है। उसके लिए दूसरा मार्ग कुमार्ग के समान है; इसलिए अपने मन को शोक में मत डुबाओ। धर्मज्ञ सत्पुरुष! अपने भाई की हितकर बात सुनो। राजेन्द्र! क्षत्रिय-धर्म दण्ड-धारण—शासन और अनुशासन—ही है; सिर मुँड़ाकर संन्यासी बनना नहीं।
Verse 83
ब्राह्मणानां महाराज चेष्टा संसिद्धिकारिका | महाराज! तप, यज्ञ, विद्या, भिक्षा, इन्द्रियसंयम, ध्यान, एकान्तवासका स्वभाव, संतोष और यथाशक्ति शास्त्रज्ञान-ये सब गुण तथा चेष्टाएँ ब्राह्मणोंके लिये सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं
व्यासजी बोले—महाराज! ब्राह्मणों की साधनाएँ ही सिद्धि देने वाली हैं। तप, यज्ञ, विद्या, भिक्षा, इन्द्रिय-संयम, ध्यान, एकान्तवास की स्वाभाविक प्रवृत्ति, संतोष और यथाशक्ति शास्त्र-ज्ञान—ये सब गुण और चेष्टाएँ ब्राह्मणों को धर्म-पथ में सफलता देती हैं।
Verse 216
तान्युपादाय विस्रब्धो भक्षयामास स द्विज: । भाई शंखके आश्रममें जाकर लिखितने खूब पके हुए बहुत-से फल तोड़कर गिराये और उन सबको लेकर वे ब्रह्मर्षि बड़ी निश्चिन्तताके साथ खाने लगे
उन फलों को बटोरकर वह द्विज निश्चिन्त और निडर होकर उन्हें खाने लगा।
The chapter negotiates whether a ruler burdened by suffering may renounce governance for forest life; it argues that abandonment of gārhasthya-linked responsibilities is not prescribed for Yudhiṣṭhira, whose svadharma is to sustain order and welfare.
Practice svadharma according to śāstra and procedure: uphold the householder-based social support system and execute kṣatriya functions—especially protection of subjects and ethically constrained daṇḍa—so that social roles and welfare remain viable.
No explicit phalaśruti formula is presented in these verses; the meta-justification is functional and normative—gārhasthya sustains all beings and daṇḍa sustains polity—positioning the teaching as a governance-ethics necessity rather than a merit-recitation promise.