
Brāhmaṇa-kṛtya, Āśrama-niyama, and Dāna-prasaṃsā (Duties of the Brāhmaṇa, āśrama discipline, and praise of giving)
Upa-parva: Dāna-dharma and Brāhmaṇa-kṛtya (Instruction on gifts, study, and āśrama duties)
Vyāsa outlines a structured account of brāhmaṇa obligations. The chapter begins by distinguishing the brāhmaṇa’s prescribed duties from general social assignments, then describes the completion of Vedic education: initiation-linked rites (e.g., jātakarma onward), study of the Vedas, disciplined service to the teacher, and ‘return’ (samāvartana) after becoming free of debt to the guru. With the teacher’s permission, one adopts one of the four āśramas and maintains its discipline throughout life; householdership is described as the practical foundation supporting the others. The text then links learning, austerity, sacrifice, and gifting to the growth of reputation (yaśas) and beneficial posthumous outcomes. A key regulatory ethic is stated: teach and study, officiate and perform sacrifice, but do not accept gifts without purpose and do not give improperly; if wealth arrives through pupils, ritual patrons, or marriage connections, it should be redirected through sacrifice and giving rather than hoarded for solitary consumption. The latter half supplies exempla—figures such as Rantideva, Śibi, Pratardana, Ambarīṣa, and others—whose notable donations (including extraordinary personal sacrifices) are presented as models of dharmic generosity, culminating in the claim that enduring fame is sustained by dāna, yajña, and progeny.
Chapter Arc: वैवस्वत मन्वन्तर के काल-चक्र का संकेत देकर कथा मन को विराट नियति की ओर उठाती है—और उसी पृष्ठभूमि में एक अपराजेय दैत्यराज नमुचि का वैभव-भंग दिखाया जाता है। → राजलक्ष्मी से च्युत, शत्रुओं के वश में, पाशों से बँधा नमुचि—फिर भी शांत—इन्द्र (पुरंदर) को विस्मित करता है। इन्द्र प्रश्न करता है: ‘इतनी विपत्ति में भी तू शोक क्यों नहीं करता?’ नमुचि प्रत्युत्तर देता है कि शोक शरीर को जलाता है, शत्रुओं को हर्ष देता है, और उसमें कोई सहायता नहीं। → नमुचि का निर्णायक उपदेश: जीव बार-बार धाता द्वारा जिस-जिस गर्भ में संयुक्त किया जाता है, वहीं रहता है—अपनी इच्छा से नहीं; अतः जो अवस्था आई है, उसे ‘होनी’ मानकर जो मन को स्थिर रखता है, वह मोह से नहीं डगमगाता। वही धीर पुरुष अर्थ-सिद्धि, व्यसन, सुख-दुःख और मध्यम अवस्था—सबमें समभाव रखता है। → संवाद का निष्कर्ष वैराग्य-युक्त विवेक में उतरता है: वैमनस्य/दुःख के कारणों को काटकर बुद्धिमान पुरुष को मन-ही-मन हृदयस्थ कल्याणमय परमात्मा का चिंतन करना चाहिए; शोक नहीं, आत्म-चिन्तन और समत्व ही मुक्ति-पथ का आधार है।
Verse 1
- वैवस्वत मन्वन्तरको आठ भागोंमें विभक्त करके जब अन्तिम आठवाँ भाग व्यतीत होने लगेगा
भीष्मजी बोले—युधिष्ठिर! इसी प्रसंग में विद्वान लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं—अर्थात् शतक्रतु (इन्द्र) और नमुचि का संवाद।
Verse 2
श्रिया विहीनमासीनमक्षो भ्यामिव सागरम् | भवाभवज्ञं भूतानामित्युवाच पुरंदर:
एक समय दैत्यराज नमुचि राजलक्ष्मी से वंचित होकर भी क्षोभरहित—मानो अचल महासागर—बैठे थे; क्योंकि वे कालक्रम से प्राणियों के उत्थान-पतन का रहस्य जानते थे। तब देवराज पुरन्दर (इन्द्र) उनके पास जाकर इस प्रकार बोले।
Verse 3
बद्धः पाशैशच्युत: स्थानाद् द्विषतां वशमागतः । श्रिया विहीनो नमुचे शोचस्यथाहो न शोचसि
“नमुचे! तुम रस्सियों से बाँधे गए, पद से च्युत हुए, शत्रुओं के वश में पड़े और श्री-सम्पत्ति से वंचित हो गए। क्या तुम अपनी इस दुर्दशा पर शोक करते हो—या आश्चर्य है कि शोक नहीं करते?”
Verse 4
नमुचिर्वाच अनिवार्येण शोकेन शरीरं चोपतप्यते । अमित्राश्ष प्रह्ृष्यन्ति शोके नास्ति सहायता
नमुचि ने कहा—देवराज! यदि शोक को रोका न जा सके तो उससे शरीर संतप्त हो उठता है और शत्रु प्रसन्न होते हैं। शोक से विपत्ति दूर करने में भी कोई सहायता नहीं मिलती।
Verse 5
तस्माच्छक्र न शोचामि सर्व होवेदमन्तवत् । संतापाद् भ्रश्यते रूप॑ संतापाद् भ्रश्यते श्रिय:
इसलिए, हे शक्र! मैं शोक नहीं करता; यह सब निश्चय ही अंतवान् है। संताप से रूप नष्ट होता है और संताप से श्री (समृद्धि) भी क्षीण हो जाती है।
Verse 6
संतापाद् भ्रश्यते चायुर्धर्मश्वैव सुरेश्वर । इन्द्र! इसीलिये मैं शोक नहीं करता; क्योंकि यह सम्पूर्ण वैभव नाशवान् है। संताप करनेसे रूपका नाश होता है। संतापसे कान्ति फीकी पड़ जाती है और सुरेश्वर! संतापसे आयु तथा धर्मका भी नाश होता है ।।
हे सुरेश्वर! संताप से आयु और धर्म भी नष्ट होते हैं। इसलिए वैमनस्य से उत्पन्न उस दुःख को अवश्य वश में करना चाहिए।
Verse 7
यदा यदा हि पुरुष: कल्याणे कुरुते मन: । तदा तस्य प्रसिध्यन्ति सर्वार्था नात्र संशय:,पुरुष जब-जब कल्याणस्वरूप परमात्माके चिन्तनमें मन लगाता है, तब-तब उसके सारे मनोरथ सिद्ध होते हैं, इसमें संशय नहीं है
जब-जब पुरुष कल्याण में मन लगाता है, तब-तब उसके सब प्रयोजन सिद्ध होते हैं—इसमें संशय नहीं।
Verse 8
एक: शास्ता न द्वितीयो<5स्ति शास्ता गर्भ शयानं पुरुषं शास्ति शास्ता । तेनानुयुक्त: प्रवणादिवोदकं यथा नियुक्तोडस्मि तथा वहामि
शासन करने वाला एक ही है, दूसरा नहीं। वही शासक गर्भ में शयन करने वाले जीव का भी शासन करता है। जैसे जल ढलान की ओर बहता है, वैसे ही प्राणी उस नियन्ता की प्रेरणा से उसी दिशा में चलता है; और जैसे मुझे नियुक्त किया गया है, वैसे ही मैं अपना भार वहन करता हूँ।
Verse 9
भवाभवीो त्वभिजानन् गरीयो ज्ञानाच्छेयो न तु तद् वै करोमि । आशासु धर्म्यासु परासु कुर्वन् यथा नियुक्तोडस्मि तथा वहामि
भीष्म बोले—मैं प्राणियों के उत्थान और पतन को जानता हूँ; श्रेष्ठ कल्याण को भी पहचानता हूँ और यह भी समझता हूँ कि ज्ञान से ही सच्चा हित होता है। फिर भी मैं उस ज्ञान का आचरण नहीं करता। धर्मसम्मत और अधर्मयुक्त—ऐसी आशाएँ मन में लेकर, जैसा अन्तर्यामी प्रेरित करता है, वैसा ही मैं अपने कर्तव्य-भार को वहन करता हूँ।
Verse 10
यथा यथास्थय प्राप्तव्यं प्राप्नोत्येव तथा तथा । भवितव्यं यथा यच्च भवत्येव तथा तथा
भीष्म बोले—मनुष्य को जो वस्तु जिस प्रकार मिलनी होती है, वह उसी प्रकार मिल ही जाती है। और जो जैसा होनेवाला होता है—जो कुछ भी—वह वैसा ही होकर रहता है।
Verse 11
यत्र यत्रैव संयुक्तो धात्रा गर्भे पुन: पुनः । तत्र तत्रैव वसति न यत्र स्वयमिच्छति
भीष्म बोले—विधाता जीव को जिस-जिस गर्भ में बार-बार नियुक्त करते हैं, वह उसी-उसी गर्भ में निवास करता है; जहाँ वह स्वयं रहना चाहता है, वहाँ वह नहीं रह पाता।
Verse 12
भावो यो<यमनुप्राप्तो भवितव्यमिदं मम । इति यस्य सदा भावो न स मुहोत् कदाचन,मुझे जो यह अवस्था प्राप्त हुई है, ऐसी ही होनहार थी। जिसके हृदयमें सदा इस तरहकी भावना होती है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता है
भीष्म बोले—मुझ पर जो यह अवस्था आई है, यही मेरी होनहार थी। जिसके मन में सदा ऐसी ही भावना रहती है, वह कभी भी मोह में नहीं पड़ता।
Verse 13
पययिह्न्यमानानामभियोक्ता न विद्यते | दुःखमेतत् तु यद् द्वेष्टा कर्ताहमिति मन्यते
भीष्म बोले—कालक्रम से आने वाले सुख-दुःखों से जो लोग बार-बार आहत होते हैं, उनके दुःख का कोई दूसरा अभियोगकर्ता नहीं—कोई बाहरी दोषी नहीं। वास्तविक दुःख तो यह है कि मनुष्य वर्तमान पीड़ा से द्वेष करके ‘मैं ही इसका कर्ता हूँ’ ऐसा मान लेता है।
Verse 14
ऋषींश्व देवांश्व महासुरांश्न त्रैविद्यवृद्धांश्व वने मुनींश्व । कान्नापदो नोपनमन्ति लोके परावरज्ञास्तु न सम्भ्रमन्ति
भीष्म बोले—ऋषि, देवता, महाबली असुर, त्रिवेद-विद्या में प्रवीण पण्डित और वनवासी मुनि—इनमें ऐसा कौन है जिस पर इस लोक में आपत्तियाँ नहीं आतीं? परन्तु जो पर-अपरा, सत्-असत् का विवेक रखते हैं, वे विपत्ति आने पर भी मोह और भ्रम में नहीं पड़ते।
Verse 15
न पण्डित: क्रुद्धयति नाभिपद्यते न चापि संसीदति न प्रहृष्यति । न चार्थकृच्छुव्यसनेषु शोचते स्थित: प्रकृत्या हिमवानिवाचल:
भीष्म बोले—सच्चा पण्डित न क्रोध करता है, न आसक्ति में दौड़ पड़ता है। अप्रिय के आ जाने पर वह शोक से टूटता नहीं और प्रिय की प्राप्ति पर उन्मत्त हर्ष भी नहीं करता। धन-हानि, कठिनाई या संकट में भी वह विलाप नहीं करता; अपने स्वभाव से हिमालय के समान अचल रहता है।
Verse 16
यमर्थसिद्धि: परमा न मोहयेत् तथैव काले व्यसनं न मोहयेत् । सुखं च दुःखं च तथैव मध्यमं निषेवते यः स धुरंधरो नर:
भीष्म बोले—जिसे परम अर्थसिद्धि भी मोह में न डाले और समय आने पर विपत्ति भी विचलित न करे; जो सुख, दुःख और दोनों के बीच की अवस्था को समान भाव से स्वीकार करता है—वही धुरंधर पुरुष है, जो महान् कर्तव्यों का भार उठा सकता है।
Verse 17
यां यामवस्थां पुरुषो5धिगच्छेत् तस्यां रमेतापरितप्यमान: । एवं प्रवृद्धं प्रणुदन्मनोजं संतापनीयं सकल॑ शरीरात्
मनुष्य जिस-जिस अवस्था को प्राप्त हो, उसी में बिना संताप के रमण करे। इस प्रकार मन में बढ़े हुए, संताप देने वाले काम-वेग को शरीर और चित्त से पूर्णतः दूर कर दे।
Verse 18
न तत्सद:सत्परिषत् सभा च सा प्राप्प यां न कुरुते सदा भयम् । धर्मतत्त्वमवगाहा बुद्धिमान् यो<भ्युपैति स धुरंधर: पुमान्
भीष्म बोले—ऐसी कोई सभा, सत्पुरुषों की कोई परिषद् या कोई जनसमूह नहीं है, जिसे पाकर मनुष्य सदा निडर हो जाए। जो बुद्धिमान धर्म-तत्त्व में गहरे उतरकर उसे समझता है और उसी का आश्रय लेता है, वही धुरंधर पुरुष माना गया है।
Verse 19
प्राज्लस्थ कर्माणि दुरन्वयानि न वै प्राज्ञो मुह्ति मोहकाले । स्थानाच्च्युतश्नेन्न मुमोह गौतम- स्तावत् कृच्छामापदं प्राप्य वृद्धः
भीष्म बोले— विद्वान् पुरुषों के कर्म और उनकी गति साधारण जनों के लिए न तो सहज अनुसरणीय होती है, न ही सहज बोधगम्य। मोह का अवसर आने पर भी बुद्धिमान मोहित नहीं होता। जैसे वृद्ध गौतम मुनि पदच्युत होकर अत्यन्त कष्टदायक विपत्ति में पड़ने पर भी भ्रमित नहीं हुए।
Verse 20
न मन्त्रबलवीर्येण प्रज्ञया पौरुषेण च | न शीलेन न वृत्तेन तथा नैवार्थसम्पदा । अलभ्यं लभते मर्त्यस्तत्र का परिदेवना
भीष्म बोले— जो वस्तु अलभ्य है, उसे कोई मनुष्य न मन्त्रबल से, न शारीरिक बल और पराक्रम से, न बुद्धि और पुरुषार्थ से पा सकता है; न शील, न सदाचार, और न ही धन-सम्पदा से। जो मिल ही नहीं सकती, उसके लिए शोक किस बात का?
Verse 21
यदेवमनुजातस्य धातारो विदधु: पुरा । तदेवानुचरिष्यामि किं मे मृत्यु: करिष्यति
भीष्म बोले— जन्म के आरम्भ में विधाताओं ने मेरे लिए जैसा विधान रचा था, मैं जन्म से अब तक उसी का अनुसरण करता आया हूँ और आगे भी करूँगा। फिर मृत्यु मेरा क्या बिगाड़ लेगी?
Verse 22
लब्धव्यान्येव लभते गन्तव्यान्येव गच्छति । प्राप्तव्यान्येव चाप्रोति दुःखानि च सुखानि च
भीष्म बोले— मनुष्य वही पाता है जो उसके लिए प्राप्तव्य है; वही जाता है जहाँ उसके लिए जाना निश्चित है; और जो सुख-दुःख उसके भाग में लिखे हैं, वही उसे प्राप्त होते हैं।
Verse 23
एतद् विदित्वा कार्त्स्न्येन यो न मुह्ति मानव: । कुशली सर्वदु:खेषु स वै सर्वधनो नर:
भीष्म बोले— जो मनुष्य इस सत्य को पूर्ण रूप से जानकर कभी मोहित नहीं होता, वह सब प्रकार के दुःखों के बीच भी कुशल रहता है; वही वास्तव में सर्वधनवान् है।
Verse 66
ध्यातव्यं मनसा हृ॒द्यं कल्याणं संविजानता । अतः समझदार पुरुषको वैमनस्यके कारण प्राप्त हुए दुःखका निवारण करके मन-ही- मन हृदयस्थित कल्याणमय परमात्माका चिन्तन करना चाहिये
जो यथार्थ को समझता है, उसे मन से उस हृदयस्थ, प्रिय और शुभ परम तत्त्व का ध्यान करना चाहिए। इसलिए विवेकी पुरुष को पहले वैमनस्य और अंतर्द्वन्द्व से उत्पन्न दुःख का निवारण करके, फिर मन-ही-मन हृदय में स्थित परम कल्याणमय परमात्मा का चिन्तन करना चाहिए।
Verse 225
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें श्रीयंनिधाननामक दो सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में ‘श्रीयंनिधान’ नामक दो सौ पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 226
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शक्रनमुचिसंवादो नाम षड्विंशत्यधिकद्धिशततमो<ध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के मोक्षधर्मपर्व में ‘शक्र-नमुचि संवाद’ नामक दो सौ छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
The chapter constrains both receipt and use of wealth: one should not accept gifts ‘in vain’ (without dharmic purpose), and if wealth is received through legitimate channels, it should be redirected toward sacrifice and giving; solitary consumption and purposeless accumulation are explicitly discouraged.
After completing Vedic study and teacher-service, one should adopt an āśrama with the teacher’s approval and sustain its discipline for life; householdership is presented as the enabling base that stabilizes and materially supports the other āśramas.
Yes: the text asserts that as long as one’s ethical reputation (kīrti/yaśas) endures in the world, one attains expansive beneficial outcomes; enduring fame is portrayed as grounded in dāna, yajña, and progeny, reinforced through historical exemplars.