Brāhmaṇa-kṛtya, Āśrama-niyama, and Dāna-prasaṃsā
Duties of the Brāhmaṇa, āśrama discipline, and praise of giving
यां यामवस्थां पुरुषो5धिगच्छेत् तस्यां रमेतापरितप्यमान: । एवं प्रवृद्धं प्रणुदन्मनोजं संतापनीयं सकल॑ शरीरात्
मनुष्य जिस-जिस अवस्था को प्राप्त हो, उसी में बिना संताप के रमण करे। इस प्रकार मन में बढ़े हुए, संताप देने वाले काम-वेग को शरीर और चित्त से पूर्णतः दूर कर दे।
भीष्म उवाच