Adhyaya 219
Shanti ParvaAdhyaya 21953 Verses

Adhyaya 219

Śakra–Namuci-saṃvāda: Śoka-nivāraṇa and Daiva-vicāra (Indra and Namuci on grief, composure, and inevitability)

Upa-parva: Mokṣadharma Parva (within Śānti-parva)

Bhīṣma introduces an ancient itihāsa to Yudhiṣṭhira: Śakra (Puraṃdara/Indra) addresses Namuci, who is bound, displaced, and under hostile control, asking why he does or does not grieve. Namuci replies with a diagnostic of grief: sorrow cannot recover what is lost, it harms the body, and it gives adversaries satisfaction; therefore it is strategically and ethically unhelpful. He recommends mental redirection—deliberately contemplating what is wholesome (kalyāṇa) to settle the mind—asserting that as attention stabilizes, practical aims become clearer. The chapter then expands into a doctrine of governance by a single ‘Śāstā’ (cosmic regulator): embodied beings are guided even from the womb; outcomes unfold as they must, and rebirth-residence occurs where the ordainer places one, not where one prefers. Namuci articulates a tension between knowing the better and failing to enact it, attributing human motion to an appointed course (‘yathā niyukto’smi tathā vahāmi’). The text praises the paṇḍita’s emotional non-reactivity—neither elated by success nor collapsed by adversity—likened to Himālaya’s immovability. It concludes that understanding this totality yields competence in both pleasure and pain, a form of inner sovereignty surpassing external wealth.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर को जनक–पञ्चशिख संवाद का सूत्र पकड़ाते हैं—‘जन्म के गर्भवास-जन्य क्लेश को देख कर देह-वैराग्य (जातिनिर्वेद) कैसे जागता है’—और राजा जनक का तीखा प्रश्न उठता है: यदि मृत्यु के बाद कोई संज्ञा ही नहीं, तो ज्ञान-अज्ञान का प्रयोजन क्या? → जनक ‘उच्छेद’ (मृत्यु के साथ सर्वनाश) की शंका को आगे बढ़ाते हैं—यदि सब कुछ कट जाता है तो प्रमत्त-अप्रमत्त में भेद क्या? पञ्चशिख इन्द्रिय-समूह, चित्त और गुणों की पृथक्-प्रवृत्ति का विश्लेषण करते हैं: श्रवण-त्वक्-जिह्वा-नेत्र-नासिका और उनके विषय-गुण चित्त के आगे-आगे चलते हैं; देह-इन्द्रिय-मन का यह ‘समाहार’ कर्म में परस्पर आश्रित होकर भी मूलतः असंग है। → निर्णायक बोध यह उभरता है कि जो ‘गुण-समाहार’ (देह-इन्द्रिय-चित्त) को ही आत्मा मानता है, वह असम्यग्दर्शन से अनन्त दुःख में पड़ता है; और जैसे नदियाँ समुद्र में मिलकर नाम-रूप खो देती हैं, वैसे ही सत्त्व-क्षय/अहंभाव-क्षय में व्यक्तित्व का आग्रह गल जाता है—यहीं मोक्ष-निश्चय का शिखर है। → पञ्चशिख के भाष्य को सुनकर जनक सम्यक् दृष्टि से निःशेष अर्थ का निरीक्षण करते हैं; शोक-रहित होकर परमसुख में विहार करते हैं—भीष्म इसे ‘अमृतपद’ की उपलब्धि कहते हैं। → भीष्म आगे संकेत करते हैं कि ‘पूर्वकाल में जिस उद्देश्य से (अग्नि/वल्वलि-प्रसंग द्वारा) मिथिला का प्रसंग उठाया गया था, वह अब सुनो’—अर्थात अगले खंड में किसी पुरातन दृष्टान्त/कथा-प्रवेश का द्वार खुलता है।

Shlokas

Verse 1

क्ा-...0.:--. ०-2 ३. जन्मके समय गर्भवास आदिके कारण जो कष्ट होता है

भीष्मजी बोले—राजन्! परमर्षि द्वारा उपदेश पाकर जनक, जो जनदेव कहलाते थे, ने फिर उनसे परलोक में आत्मा के होने या न होने के विषय में प्रश्न किया।

Verse 2

जनक उवाच भगवन्‌ यदि न प्रेत्य संज्ञा भवति कस्यचित्‌ | एवं सति किमज्ञानं ज्ञानं वा कि करिष्यति

जनक ने कहा—भगवन्! यदि मृत्यु के बाद किसी की कोई विशेष संज्ञा (पहचान/चेतना) नहीं रहती, तो ऐसी दशा में अज्ञान या ज्ञान क्या कर सकेगा?

Verse 3

सर्वमुच्छेदनिष्ठं स्थात्‌ पश्य चैतद्‌ द्विजोत्तम | अप्रमत्त: प्रमत्तो वा कि विशेषं करिष्यति

हे द्विजश्रेष्ठ! देखिए, सब कुछ उच्छेद (विनाश) में ही समाप्त होता है। मृत्यु के साथ ही मनुष्य के सारे साधन कट जाते हैं; तब वह सावधान रहा हो या प्रमत्त—क्या विशेष कर सकेगा?

Verse 4

असंसर्गो हि भूतेषु संसग्गों वा विनाशिषु । कस्मै क्रियेत कल्प्येत निश्चय: को<त्र तत्त्वतः

मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा का विनाशशील पंचमहाभूतों से कोई संसर्ग रहता है या नहीं? यदि रहता है तो किस हेतु रहता है? इस विषय में तत्त्वतः क्या निश्चय किया जा सकता है?

Verse 5

भीष्म उवाच तमसा हि प्रतिच्छन्न॑ विभ्रान्तमिव चातुरम्‌ । पुन: प्रशमयन्‌ वाक्यै: कवि: पठचशिखोडब्रवीत्‌

भीष्मजी बोले—राजन्! राजा जनक की बुद्धि को अज्ञान-तम से आच्छादित, आत्मा के नाश की आशंका से भ्रान्त और भीतर से व्याकुल जानकर, ज्ञानी महात्मा पंचशिख ने फिर मधुर वचनों से उन्हें शान्त करते हुए कहा।

Verse 6

उच्छेदनिष्ठा नेहास्ति भावनिष्ठा न विद्यते । अयं हापि समाहार: शरीरेन्द्रियचेतसाम्‌ । वर्तते पृथगन्योन्यमप्यपाश्रित्य कर्मसु

राजन्! यहाँ न तो आत्मा के उच्छेद (पूर्ण विनाश) की कोई निष्ठा है, न केवल ‘भाव’ (किसी विशेष रूप में परिणति) की ही निष्ठा। यह जो प्रत्यक्ष संघात है, वह भी शरीर, इन्द्रिय और चित्त का समाहार मात्र है। ये सब परस्पर पृथक् होते हुए भी एक-दूसरे का आश्रय लेकर कर्मों में प्रवृत्त होते हैं।

Verse 7

धातव: पज्च भूतेषु खं वायुज्योतिषो धरा । ते स्वभावेन तिष्ठन्ति वियुज्यन्ते स्वभावत:

प्राणियों के शरीर में उपादानरूप से आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये पाँच धातु हैं। ये स्वभाव से ही एकत्र होकर टिकते हैं और स्वभाव से ही पृथक् हो जाते हैं।

Verse 8

आकाशोवायुरूष्मा च स्नेहो यश्चापि पार्थिव: । एष पजञ्चसमाहार: शरीरमपि नैकधा,आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी--इन पाँच तत्त्वोंके समाहारसे ही अनेक प्रकारके शरीरोंका निर्माण हुआ है

आकाश, वायु, ऊष्मा (अग्नि), स्नेह (जल) और पार्थिव (पृथ्वी)—इन पाँचों के समाहार से ही अनेक प्रकार के शरीर बनते हैं।

Verse 9

ज्ञानमूष्मा च वायुश्च त्रिविध: कार्यसंग्रह: । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्व॒ स्‍्वभावश्लेतना मन: । प्राणापानौ विकारश्न धातवश्चात्र निःसृता:

भीष्म ने कहा—ज्ञान (विवेक-बुद्धि), ऊष्मा (जठराग्नि) और वायु (प्राण) — ये तीनों मिलकर समस्त कर्म-व्यापार का त्रिविध संग्राहक-समुदाय हैं। इन्हीं से इन्द्रियाँ और उनके विषय, स्वभाव, चेतना, मन, प्राण-अपान, विकार तथा धातु प्रकट होते हैं।

Verse 10

श्रवर्णं स्पर्शनं जिह्दा दृष्टिनासा तथैव च । इन्द्रियाणीति पज्चैते चित्तपूर्व गता गुणा:

भीष्म ने कहा—श्रवण, स्पर्श, जिह्वा, दृष्टि और नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। शब्द आदि गुण पहले चित्त (मन) से संयुक्त होकर, फिर इन्हीं इन्द्रियों के विषय बनते हैं।

Verse 11

तत्र विज्ञानसंयुक्ता त्रिविधा चेतना ध्रुवा । सुखदु:खेति यामाहुरदुः:खामसुखेति च

भीष्म ने कहा—इस विषय में विज्ञान (विवेक) से संयुक्त चेतना निश्चय ही तीन प्रकार की होती है। उसे (१) सुख-दुःखयुक्त, (२) अदुःखा और (३) असुखा—ऐसा कहते हैं।

Verse 12

शब्द: स्पर्श च रूप॑ं च रसो गन्धश्न मूर्तय: । एते ह्यामरणात्‌ पञज्च षड्गुणा ज्ञानसिद्धये

भीष्म ने कहा—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध तथा मूर्त-भाव (स्थूल द्रव्य)—ये गुण इन्द्रियजन्य ज्ञान की सिद्धि के साधन हैं और जीव के मरण-पर्यन्त कार्य करते हैं। इन्द्रियों का इनके साथ संयोग होने पर ही विविध विषयों का भिन्न-भिन्न ज्ञान उत्पन्न होता है।

Verse 13

तेषु कर्मविसर्गश्न सर्वतत्त्वार्थनिश्चय:ः । तमाहु: परम॑ शुक्र बुद्धिरित्यव्ययं महत्‌

भीष्म ने कहा—इन्द्रियों और उनके विषयों में प्रवृत्त कर्म-प्रवाह का विसर्जन (त्याग) करने से समस्त तत्त्वों के अर्थ का यथार्थ निश्चय उत्पन्न होता है। उसी निश्चय को परम शुद्ध, उत्तम ज्ञान कहते हैं; वही अविनाशी महान् तत्त्व—परम बुद्धि, ब्रह्मपद—है, जो मोक्ष की ओर ले जाता है।

Verse 14

इमं गुणसमाहारमात्म भावेन पश्यत: । असम्यग्दर्शनैर्द:खमनन्तं नोपशाम्यति

जो लोग गुणों के संघातरूप इस शरीर को ही आत्मा समझ लेते हैं, उन्हें मिथ्या ज्ञान के कारण अनन्त दुःख की प्राप्ति होती है; उनका दुःख कभी शांत नहीं होता और क्लेश-परम्परा का अंत नहीं आता।

Verse 15

अनात्मेति च यद्‌ दृष्टं तेनाहं न ममेत्यपि । वर्तते किमधिष्ठानात्‌ प्रसक्ता दुः:खसंसृति:

इसके विपरीत जिनकी दृष्टि में यह दृश्य प्रपंच अनात्मा सिद्ध हो चुका है, उनकी इसमें न ‘अहं’ रहती है न ‘मम’; फिर उन्हें दुःख-परम्परा कैसे प्राप्त हो? उन दुःखों के लिए आधार ही क्या रह जाता है?

Verse 16

अत्र सम्यग्वधो नाम त्यागशास्त्रमनुत्तमम्‌ । शृणु यत्‌ तव मोक्षाय भाष्यमाणं भविष्यति

अब मैं ‘सम्यग्वध’ नामक परम उत्तम त्याग-शास्त्र का वर्णन करता हूँ—जो सम्यक् ज्ञान और वैराग्य से दुःखों का पूर्ण नाश करता है। ध्यान देकर सुनो; जो कहा जाएगा, वह तुम्हारे लिए मोक्षदायक होगा।

Verse 17

त्याग एव हि सर्वेषां युक्तानामपि कर्मणाम्‌ | नित्यं मिथ्याविनीतानां क्लेशो दुः:खवहो मतः

मुक्ति के लिए यत्नशील साधकों के लिए समस्त कर्मों में त्याग ही सार है। पर जो अहंता, ममता, आसक्ति और कामना छोड़े बिना ही विनय और संयम का मिथ्या दावा करते हैं, उन्हें अविद्या आदि क्लेश प्राप्त होते हैं—जो दुःख के वाहक माने गए हैं।

Verse 18

द्रव्यत्यागे तु कर्माणि भोगत्यागे व्रतान्यपि । सुखत्यागे तपो योगं सर्वत्यागे समापना

शास्त्रों में द्रव्य-त्याग के लिए यज्ञादि कर्म, भोग-त्याग के लिए व्रत, देह-सुख-त्याग के लिए तप, और सर्व-त्याग—अहंता, ममता, आसक्ति, कामना आदि के परित्याग—के लिए योग का विधान किया गया है। यही त्याग की परम सीमा है।

Verse 19

तस्य मार्गोडयमद्दैध: सर्वत्यागस्य दर्शित: । विप्रहाणाय दुःखस्य दुर्गतिस्त्वन्यथा भवेत्‌

यह पूर्ण त्याग का अडिग मार्ग बताया गया है। दुःख के परित्याग के लिए इसे ही श्रेष्ठ साधन कहा गया है; पर जो इसके विपरीत चलता है, उसके लिए दुर्गति बताई गई है।

Verse 20

पज्चज्ञानेन्द्रियाण्युक्त्वा मन:षष्ठानि चेतसि । बलषष्ठानि वक्ष्यामि पञ्चकर्मेन्द्रियाणि तु

बुद्धि में स्थित मन सहित पाँच ज्ञानेन्द्रियों का वर्णन करके अब मैं पाँच कर्मेन्द्रियों का वर्णन करूँगा, जिनके साथ प्राण-शक्ति छठी कही गई है।

Verse 21

हस्तौ कर्मेन्द्रियं ज्ेयमथ पादौ गतीन्द्रियम्‌ । प्रजनानन्दयो: शेफो निसर्ग पायुरिन्द्रियम्‌

दोनों हाथों को कर्म करने वाली इन्द्रिय जानना चाहिए और दोनों पैरों को गमन की इन्द्रिय। लिंग संतानोत्पत्ति तथा मैथुनजनित आनन्द के लिए है; और गुदा मल-विसर्जन की इन्द्रिय है।

Verse 22

वाक्‌ च शब्दविशेषार्थमिति पज्चान्वितं विदु: । एवमेकादशैतानि बुद्धया55शु विसृजेन्मन:

वाक्-इन्द्रिय शब्द के विशेष अर्थों के उच्चारण के लिए है—ऐसा जानना चाहिए। इस प्रकार पाँच कर्मेन्द्रियाँ अपने-अपने पाँच विषयों से युक्त मानी गई हैं। मन सहित इन एकादश इन्द्रियों के विषयों को बुद्धि द्वारा शीघ्र त्याग देना चाहिए।

Verse 23

कर्णो शब्दक्ष॒ चित्तं च त्रयः श्रवणसंग्रहे । तथा स्पर्शे तथा रूपे तथैव रसगन्धयो:

श्रवण के समय श्रोत्र-इन्द्रिय, शब्द-विषय और चित्त—इन तीनों का संयोग होता है। इसी प्रकार स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के अनुभव में भी इन्द्रिय, विषय और मन का संयोग अपेक्षित है।

Verse 24

एवं पज्चत्रिका होते गुणास्तदुपलब्धये । येनायं त्रिविधो भाव: पर्यायात्‌ समुपस्थित:

इस प्रकार तीन-तीन के पाँच समुदाय हैं; ये सब ‘गुण’ कहलाते हैं, क्योंकि इन्हीं के द्वारा शब्दादि विषयों का ग्रहण होता है। इनके प्रवर्तन से कर्ता, कर्म और करण—यह त्रिविध भाव क्रमशः एक-एक करके प्रकट होता है।

Verse 25

साच्चिको राजसशक्षापि तामसक्षापि ते त्रयः । त्रिविधा वेदना येषु प्रसूता: सर्वसाधना:

भीष्म ने कहा—ये तीनों ही सात्त्विक, राजस और तामस—ऐसे तीन-तीन प्रकार के हैं। इनके द्वारा उत्पन्न होनेवाले अनुभव भी त्रिविध ही होते हैं; और उन्हीं से हर्ष, प्रीति आदि समस्त भाव उत्पन्न होते हैं, जो सब प्रयत्नों के साधन बनते हैं।

Verse 26

प्रहर्ष: प्रीतिरानन्द: सुखं संशान्तचित्तता । अकुततश्रित्‌ कुतश्चिद्‌ वा चिन्तित: सात््विको गुण:

हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख और चित्त की शान्ति—ये भाव चाहे अकारण स्वयं उत्पन्न हों अथवा किसी कारण से (भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सत्संग आदि के निमित्त) उत्पन्न हों—सात्त्विक गुण माने गए हैं।

Verse 27

अतुष्टि: परितापश्च शोको लोभस्तथा<क्षमा | लिज्जानि रजसस्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुत:

अतुष्टि, परिताप, शोक, लोभ, असहिष्णुता तथा लज्जा—ये रजोगुण के लक्षण हैं; ये कभी कारण से और कभी अकारण भी दिखाई देते हैं।

Verse 28

असंतोष, संताप, शोक, लोभ और असहनशीलता--ये किसी कारणसे हों या अकारण -रजोगुणके चिह्न हैं |। अविवेकस्तथा मोह: प्रमाद: स्वप्नतन्द्रिता । कथंचिदपि वर्तन्ते विविधास्तामसा गुणा:

अविवेक, मोह, प्रमाद और स्वप्न-तन्द्रा—ये विविध तामस गुण किसी न किसी प्रकार से, कभी कारण से तो कभी अकारण भी, प्रकट होते रहते हैं।

Verse 29

अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्न और आलस्य--ये किसी तरह भी क्‍यों न हों, तमोगुणके ही विविध रूप हैं ।।

अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्न और आलस्य—ये जैसे भी प्रकट हों—तमोगुण के ही विविध रूप हैं। परन्तु शरीर या मन में जो अवस्था प्रीति और अन्तःसन्तोष के संयोग से उत्पन्न हो, उसे सात्त्विक भाव मानना चाहिए; उसे सत्त्वगुण की वृद्धि समझना चाहिए।

Verse 30

यत्‌ त्वसंतोषसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मन: । प्रवृत्त रज इत्येवं ततस्तदपि चिन्तयेत्‌,जो अपने लिये असंतोषजनक एवं अप्रीतिकर हो, उसको रजोगुणकी प्रवृत्ति एवं अभिवृद्धि समझनी चाहिये

जो अपने लिए असंतोषजनक और अप्रीतिकर हो, उसे रजोगुण की प्रवृत्ति और अभिवृद्धि समझना चाहिए; अतः उसी रूप में उस पर विचार करना चाहिए।

Verse 31

अथ यन्मोहसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत्‌ | अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत्‌,शरीर या मनमें जो अतर्क्य, अज्ञेय एवं मोह-संयुक्त भाव प्रादुर्भूत हो, उसको तमोगुणजनित जानना चाहिये

फिर शरीर या मन में जो अतर्क्य, अज्ञेय और मोह-संयुक्त भाव प्रकट हो, उसे तमोगुण से उत्पन्न जानना चाहिए।

Verse 32

श्रीत्रं व्योमाश्रितं भूतं शब्द: श्रोत्रं समाश्रित: । नोभयं शब्दविज्ञाने विज्ञानस्येतरस्य वा

श्रोत्रेन्द्रिय का आधार आकाश है और शब्द का आधार श्रोत्र है। इसलिए शब्द का ज्ञान करते समय आकाश और श्रोत्र—ये दोनों—न तो ज्ञान के विषय बनते हैं, न अज्ञान के; वे तो केवल आश्रय-कारण होकर स्थित रहते हैं।

Verse 33

एवं त्वक्चक्षुषी जिह्नला नासिका चेति पठचमी । स्पर्शे रूपे रसे गन्धे तानि चेतो मनश्न॒ तत्‌

इसी प्रकार त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये पाँचों—क्रमशः स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के आश्रय हैं। पर इन सबका मूल कारण मन है; इसलिए ये सब मन के अधीन और मनःस्वरूप ही समझे जाने चाहिए।

Verse 34

स्वकर्मयुगपद्धावो दशस्वेतेषु तिष्ठति । चित्तमेकादशं विद्धि बुद्धिद्धादिशमी भवेत्‌

भीष्म ने कहा—ये दसों इन्द्रियाँ अपने-अपने कर्म में स्थित रहती हैं और मिलकर अपने-अपने विषयों को एक साथ भी ग्रहण कर सकती हैं। मन को ग्यारहवाँ और बुद्धि को बारहवाँ जानो—ये दोनों इन्द्रियों के सहायक तथा नियामक हैं।

Verse 35

तेषामयुगपद्धाव उच्छेदो नास्ति तामसे । आस्थितो युगपद्धावो व्यवहार: स लौकिक:

भीष्म ने कहा—तमोगुण-प्रधान अवस्था, जैसे सुषुप्ति में, इन्द्रियाँ अपने कारण में लीन होकर विषयों को ग्रहण नहीं कर पातीं; पर उनका नाश नहीं होता। इन्द्रियों की जो एक साथ विषय-ग्रहण की शक्ति है, वह केवल लौकिक व्यवहार में प्रकट होती है, सुषुप्ति में नहीं।

Verse 36

इन्द्रियाण्यपि सूक्ष्माणि दृष्ट्‌्वा पूर्वश्रुतागमात्‌ । चिन्तयन्नानुपर्येति त्रिभिरेवान्वितो गुणै:

भीष्म ने कहा—पूर्वश्रुत आगम के प्रमाण से सूक्ष्म इन्द्रियों को भी जानकर, स्वप्न देखने वाला पुरुष विषयों का चिन्तन करता हुआ और सत्त्व-रजस्-तमस्—इन तीनों गुणों से युक्त होकर, शरीर के भीतर ही इच्छानुसार विचरता रहता है; क्योंकि जाग्रत में देखे-सुने आदि से उत्पन्न वासनाओं के बल पर उसे शब्दादि विषयों की प्रतीति होती है।

Verse 37

यत्‌ तमोपहतं चित्तमाशु संहारम ध्रुवम्‌ । करोत्युपरमं काये तदाहुस्तामसं बुधा:

भीष्म ने कहा—सुषुप्ति में जब चित्त तमोगुण से अभिभूत होकर शीघ्र ही अपने प्रकाश और प्रवृत्ति का संहार कर देता है और थोड़ी देर के लिए शरीर में इन्द्रियों के व्यापार को रोक देता है, तब जो सुख की प्रतीति होती है, उसे विद्वान पुरुष ‘तामस सुख’ कहते हैं।

Verse 38

यद्‌ यदागमसंयुक्त न कृच्छुमनुपश्यति । अथ तत्राप्युपादत्ते तमोडव्यक्तमिवानृतम्‌

भीष्म ने कहा—जो अवस्था पूर्वानुभव की वासनाओं से संयुक्त होती है, उसमें मनुष्य कष्ट को कष्ट की भाँति नहीं देखता; और वहीं वह तमोगुण से आच्छन्न, अव्यक्त-सा, असत्य सुख भी ग्रहण कर लेता है। इसीलिए सुषुप्ति में वह उपस्थित दुःख को प्रत्यक्ष की तरह नहीं अनुभव करता और वहाँ भी तमसजन्य मिथ्या सुख का अनुभव करता है।

Verse 39

एवमेष प्रसंख्यात: स्वकर्मप्रत्ययो गुण: । कथज्चिद्‌ वर्तते सम्यक्‌ केषांचिद्‌ वा निवर्तते

इस प्रकार यह गुण अपने-अपने कर्म के अनुसार उत्पन्न होनेवाला कहा गया है। कुछ में वह सम्यक् रूप से प्रवृत्त रहता है और कुछ में—विशेषतः जहाँ यथार्थ ज्ञान उदित हो गया हो—निवृत्त हो जाता है।

Verse 40

एतदाहुः समाहार क्षेत्रमध्यात्मचिन्तका: । स्थितो मनसि यो भाव: स वै क्षेत्रज्ञ उच्यते

अध्यात्मतत्त्व का चिन्तन करनेवाले विद्वान् इस शरीर और इन्द्रियों के संघात को ‘क्षेत्र’ कहते हैं। और मन में स्थित जो चेतन सत्ता है—जो भीतर से अनुभव को जानती और प्रकाशित करती है—वही ‘क्षेत्रज्ञ’ (जीवात्मा) कहलाती है।

Verse 41

एवं सति क उच्छेद: शाश्वतो वा कथं भवेत्‌ । स्वभावाद्‌ वर्तमानेषु सर्वभूतेषु हेतुत:

यदि ऐसा है, तो आत्मा का उच्छेद (विनाश) कैसे हो सकता है? और दूसरी ओर, भूततत्त्वों के साथ उसका शाश्वत, अविच्छिन्न संसर्ग कैसे रह सकता है? क्योंकि समस्त प्राणी अपने-अपने स्वभाव के अनुसार प्रवृत्त होते हैं और उनकी क्रियाएँ कारणों के द्वारा ही चलती हैं।

Verse 42

यथार्णवगता नद्यो व्यक्तीर्जदगति नाम च | नदाश्न ता नियच्छन्ति तादृश: सत्त्वसंक्षय:

जैसे नदियाँ समुद्र में पहुँचकर अपना नाम और पृथक् रूप छोड़ देती हैं, और जैसे बड़ी नदियाँ छोटी धाराओं को अपने में समाहित कर लेती हैं—उसी प्रकार, जब उपाधियाँ क्षीण हो जाती हैं, तब जीवात्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है। यही मोक्ष है।

Verse 43

एवं सति कुतः संज्ञा प्रेत्यभावे पुनर्भवेत्‌ । प्रतिसम्मिश्रिते जीवेडगृह्ममाणे च सर्वतः

यदि ऐसा है, तो मृत्यु के पश्चात् जीव की कोई संज्ञा (पृथक् पहचान) कहाँ से रहेगी, या फिर वह कैसे पुनः उत्पन्न होगी? जब जीव सर्वथा ब्रह्म में प्रतिसम्मिश्रित होकर सर्व ओर से ग्रहीत हो जाता है, तब उसका नाम-रूप किसी प्रकार भी ग्रहण नहीं किया जा सकता। ऐसी दशा में मृत्यु के बाद जीव की संज्ञा कैसे रह सकती है?

Verse 44

इमां च यो वेद विमोक्षबुद्धि- मात्मानमन्विच्छति चाप्रमत्त: । न लिप्यते कर्मफलैरनिष्टै: पत्रं बिसस्येव जलेन सिक्तम्‌

जो इस मोक्षविद्या को जानता है और अप्रमत्त होकर आत्मतत्त्व का अनुसंधान करता है, वह जल से सिक्त कमल-पत्र की भाँति कर्म के अनिष्ट फलों से कभी लिप्त नहीं होता।

Verse 45

दृढेहिं पाशैर्बहुभिविंमुक्त: प्रजानिमित्तैरपि दैवतैश्न । यदा हासौ सुखदुःखे जहाति मुक्तस्तदाग्र्यां गतिमेत्यलिज्र:

संतानों के प्रति आसक्ति तथा भिन्न-भिन्न देवताओं को प्रसन्न करने के लिए फल-इच्छा से किए गए कर्म—ये सब मनुष्य के लिए अनेक प्रकार के सुदृढ़ बन्धन हैं। जब वह इन बन्धनों से छूटकर सुख-दुःख की चिन्ता छोड़ देता है, तब सूक्ष्म-शरीर के अभिमान का त्याग करके वह अलिङ्ग, सर्वश्रेष्ठ गति को प्राप्त होता है।

Verse 46

श्रुतिप्रमाणागममड़लै श्व शेते जरामृत्युभयादभीत: । क्षीणे च पुण्ये विगते च पापे ततो निमित्ते च फले विनष्टे । अलेपमाकाशमलिड्मेव- मास्थाय पश्यन्ति महत्यसक्ता:

श्रुति-प्रतिपादित प्रमाणों का विचार और शास्त्रों में बताए गए मंगलमय साधनों का अनुष्ठान करने से मनुष्य जरा और मृत्यु के भय से रहित होकर शान्ति से रहता है। जब पुण्य क्षीण हो जाता है और पाप भी निवृत्त हो जाता है, तथा उनसे उत्पन्न होने वाले कारण और फल भी नष्ट हो जाते हैं, तब समस्त पदार्थों में सर्वथा आसक्ति-रहित महापुरुष आकाश के समान निर्लेप, अलिङ्ग परमात्मा में स्थित होकर उसका साक्षात्कार कर लेते हैं।

Verse 47

यथोर्णनाभि: परिवर्तमान- स्तन्तुक्षये तिष्ठति पात्यमान: । तथा विमुक्तः प्रजहाति दु:खं विध्वंसते लोष्ट इवाद्रिमृच्छन्‌

जैसे मकड़ी जाला तानकर उस पर घूमती रहती है, किंतु तन्तुओं के क्षय हो जाने पर एक स्थान पर स्थिर हो जाती है; उसी प्रकार जीव कर्म-जाल में भटकता है, पर विमुक्त होने पर दुःख का परित्याग कर देता है। और जैसे पर्वत पर फेंका हुआ मिट्टी का ढेला टकराकर चूर-चूर हो जाता है, वैसे ही उसके समस्त दुःखों का विध्वंस हो जाता है।

Verse 48

यथा रुरु: शृड्रमथो पुराणं हित्वा त्वचं वाप्युरगो यथा च । विहाय गच्छत्यनवेक्षमाण- स्तथा विमुक्तो विजहाति दुःखम्‌

जैसे रुरु नामक मृग अपने पुराने सींग को और जैसे सर्प अपनी केंचुल को त्यागकर उसकी ओर देखे बिना ही आगे बढ़ जाता है, उसी प्रकार ममता और अहंकार से रहित होकर विमुक्त पुरुष संसार-बन्धन छोड़कर अपने समस्त दुःखों का परित्याग कर देता है।

Verse 49

द्रुमं यथा वाप्युदके पतन्त- मुत्सृज्य पक्षी निपतत्यसक्त: । तथा हासौ सुखदु:खे विहाय मुक्त: परार्घ्या गतिमेत्यलिड्र:

Bhishma said: Just as a bird, seeing a tree fall into a pond, abandons attachment and leaves that tree behind, so too the liberated person relinquishes both pleasure and pain; freed from all marks of embodied identity, he attains the highest state.

Verse 50

भीष्म उवाच अपि च भवति मैथिलेन गीत॑ नगरमुपाहितमग्निनाभिवीक्ष्य । न खलु मम हि दह्दातेअत्र किंचित्‌ स्वयमिदमाह किल सम भूमिपाल:

Bhishma said: “Moreover, there is this well-known utterance of the king of Mithilā. Seeing his city set ablaze by fire, he declared: ‘In truth, nothing of mine is being burned here.’ Thus, that ruler spoke—illustrating the stance of inner non-attachment even amid outward loss.”

Verse 51

इदममृतपदं निशम्य राजा स्वयमिह पज्चशिखेन भाष्यमाणम्‌ | निखिलमभिसमीक्ष्य निनश्षितार्थ: परमसुखी विजहार वीतशोक:ः

Bhishma said: O King, having personally heard here this deathless teaching as it was expounded by the teacher Panchashikha, King Janaka examined the matter in its entirety, arrived at a settled conviction, and—free from grief—lived in the highest ease. His inner state became altogether different. On one occasion, when the ruler of Mithila, King Janaka, saw the city of Mithila burning in a fire, he uttered the famous declaration that even if the city burns, nothing of his truly is burned—signifying his non-attachment and inner freedom.

Verse 52

इमं हि यः पठति विमोक्षनिश्चयं महीपते सततमवेक्षते तथा । उपद्रवान्‌ नानुभवत्यदु:खित: प्रमुच्यते कपिलमिवैत्य मैथिल:

Bhishma said: O king, the man who repeatedly studies and steadily contemplates this settled teaching on liberation does not suffer the assaults of adversity; remaining untroubled, sorrow cannot gain a foothold in him. Just as the Maithila king Janaka attained freedom by approaching Kapila and through association with Pañcaśikha, so too does such a seeker obtain mokṣa.

Verse 219

(श्रूयतां नृपशार्दूल यदर्थ दीपिता पुरा । वल्वलिना दीपिता सा तु तन्मे शूणु महामते ।।

Janaka said: “Listen, tiger among kings, to the reason for which Mithilā was once set ablaze—set ablaze by Valvala. Hear it from me, O great-minded one. In the Janaka line there was a king named Janadeva. Having placed all actions within the Self, and having attained the vision of the one Reality in all beings, he moved through the world established in that very awareness. Though he performed sacrifices, gave gifts, offered oblations, and protected the earth, he remained absorbed in inner knowledge, acting without possessiveness. The Lord, ruler of all worlds, wished to know the intention in his heart. Taking the form of a brāhmaṇa, He came to Mithilā and deliberately behaved in a way that appeared improper. The foremost brāhmaṇas seized him and presented him to the king. Pointing to the alleged offense, the king addressed him: ‘Brāhmaṇa, I will not punish you in any way. Leave my kingdom—go beyond the boundary of my realm.’ Thus spoken to, the brāhmaṇa replied to that great-souled king, surrounded by ministers: ‘You are ever devoted to Padmanābha, resting at His feet. Truly you are fulfilled. May you be well; I shall depart.’ Having said this, the brāhmaṇa—indeed the Lord Himself, testing him—went away and then set Mithilā on fire. Seeing Mithilā burning, the king did not tremble. When the people questioned him, he said: ‘My wealth is endless—the wealth of Self-knowledge. Nothing remains for me to gain. Though Mithilā burns, nothing of mine is burned.’ Hearing these words and understanding what was settled in his heart, the “brāhmaṇa” restored Mithilā to life and safety. He revealed His true form to the king and granted him a boon, saying: ‘Stand firm in dharma with a pure intention; let your intellect be steady in truth and in the highest meaning. Remain dispassionate, established in truth. May you be well; I depart.’ Having spoken thus, the Lord vanished there itself. ‘King, this has been told to you—what more do you wish to hear?’

Frequently Asked Questions

Whether grief is a justified response to loss of status and constraint, or an avoidable mental disturbance; Namuci argues that grief is non-instrumental, physically corrosive, and socially disadvantageous, thus to be regulated.

To consciously redirect attention away from agitating thoughts and contemplate what is ‘hṛdya’ and ‘kalyāṇa’ (wholesome and heart-settling), cultivating equanimity so that one can act without being driven by distress.

Yes: it frames experience as unfolding under a single cosmic ‘Śāstā,’ critiques the belief ‘I am the doer’ as a source of distress, and presents acceptance of what must occur as a safeguard against delusion.