Śakra–Namuci-saṃvāda: Śoka-nivāraṇa and Daiva-vicāra
Indra and Namuci on grief, composure, and inevitability
अनात्मेति च यद् दृष्टं तेनाहं न ममेत्यपि । वर्तते किमधिष्ठानात् प्रसक्ता दुः:खसंसृति:
इसके विपरीत जिनकी दृष्टि में यह दृश्य प्रपंच अनात्मा सिद्ध हो चुका है, उनकी इसमें न ‘अहं’ रहती है न ‘मम’; फिर उन्हें दुःख-परम्परा कैसे प्राप्त हो? उन दुःखों के लिए आधार ही क्या रह जाता है?
भीष्म उवाच