Bhṛgu–Bharadvāja-saṃvāda: Vānaprastha-parivrājaka-ācāra, Abhaya-dharma, and Lokānāṃ Vibhāga (Śānti-parva 185)
आपोडग्निर्मारुतश्वैव नित्यं जाग्रति देहिषु । मूलमेते शरीरस्य व्याप्य प्राणानिह स्थिता:
āpo 'gnir mārutaś caiva nityaṁ jāgrati dehiṣu | mūlam ete śarīrasya vyāpya prāṇān iha sthitāḥ ||
भरद्वाज ने कहा—जल, अग्नि और वायु—ये तीन तत्त्व देहधारियों में सदा जाग्रत रहते हैं। यही शरीर के मूल हैं; प्राणों में व्याप्त होकर ये इसी देह में स्थित रहते हैं।
भरद्वाज उवाच