युधिष्ठिरस्य धनंजय-प्रति गर्हा
Yudhiṣṭhira’s Reproach to Dhanaṃjaya
प्रतिवीरैश्व॒ सम्मर्दे पत्तिसंघा: सहस्रश: । उस संघर्षमें विपक्षी वीरों, हाथियों, घोड़ों तथा रथोंद्वारा मारे गये सहस्रों पैदल योद्धाओंके समुदाय रणभूमिमें सो रहे थे। उनके अस्त्र-शस्त्र और शरीरके अवयव क्षत- विक्षत होकर बिखर गये थे || ७३ ई ।। विशालायतताग्राक्षै: पद्मेन्दुसद्शाननै:,विमानैरप्सर:सज्जैरगीतवादित्रनि:स्वनै: | युद्धकुशल वीरोंके विशाल, विस्तृत एवं लाल-लाल आँखों और कमल तथा चन्द्रमाके समान मुखवाले मस्तकोंसे सारी युद्धभूमि सब ओरसे ढक गयी थी। भूतलपर जैसा कोलाहल हो रहा था, वैसा ही आकाशमें भी लोगोंको सुनायी देता था। वहाँ विमानोंपर बैठी हुई झुंड-की-झुंड अप्सराएँ गीत और वाद्योंकी मधुर ध्वनि फैला रही भी
sañjaya uvāca | prativīraiś ca sammarḍe pattisaṅghāḥ sahasraśaḥ |
संजय बोले—उस घोर संघर्ष में विपक्षी वीरों तथा हाथियों, घोड़ों और रथों के आघात से मारे गए सहस्रों पैदल सैनिकों के समूह रणभूमि में पड़े थे, मानो वहीं सो गए हों। उनके अस्त्र-शस्त्र और कटे-फटे अंग क्षत-विक्षत होकर चारों ओर बिखर गए थे। यह दृश्य बताता है कि प्रसिद्ध योद्धाओं द्वारा लड़ा गया युद्ध भी तत्काल फल में असंख्य साधारण जनों का नामरहित विनाश ही देता है।
संजय उवाच