युधिष्ठिरस्य धनंजय-प्रति गर्हा
Yudhiṣṭhira’s Reproach to Dhanaṃjaya
शिरोभिरययुद्धशौण्डानां सर्वतः संवृता मही | यथा भुवि तथा व्योम्नि निःस्वनं शुश्रुवुर्जना:
śirobhir ayayuddhaśauṇḍānāṁ sarvataḥ saṁvṛtā mahī | yathā bhuvi tathā vyomni niḥsvanaṁ śuśruvur janāḥ ||
संजय ने कहा—युद्ध में टूट पड़े रणधीरों के कटे हुए सिरों से पृथ्वी चारों ओर ढँक गई थी। जैसे धरती पर कोलाहल गूँज रहा था, वैसे ही आकाश में भी प्रतिध्वनित हो रहा था—लोगों ने हर ओर युद्ध का वह भयानक नाद सुना।
संजय उवाच