Mahabharata Adhyaya 36
Drona ParvaAdhyaya 3651 Versesक्षणिक रूप से पाण्डव पक्ष के लिए अनुकूल—अभिमन्यु के धावे से द्रोणानीक में अव्यवस्था और भारी क्षति।

Adhyaya 36

अभिमन्यु-परिवेष्टनम् (Encirclement and Counterassault of Abhimanyu)

Upa-parva: Abhimanyu-saṃgrāma (Saubhadra-yuddha) Episode

Saṃjaya reports that, seeing their ranks disrupted by Abhimanyu’s force, Duryodhana advances in anger. Droṇa instructs allied warriors to quickly surround the king’s adversary and stabilize Kaurava lines. A coalition of senior chariot-warriors—Droṇa, Aśvatthāmā, Kṛpa, Karṇa, Kṛtavarmā, Śakuni, Śalya, Bhūriśravas, and others—launches dense arrow volleys and forms a chariot-ring (koṣṭhakī-kṛtya) to constrain Abhimanyu’s mobility. Abhimanyu responds by cutting missiles midair, counter-wounding key opponents, and forcing momentary withdrawals; his roar is described as leonine, intensifying adversaries’ resolve. The text enumerates specific arrow-count exchanges, emphasizing technical martial skill and the cumulative pressure of coordinated fire. Abhimanyu pierces Karṇa’s armor and body, staggers him, and strikes down additional named combatants; he also showers Śalya, causing temporary collapse on the chariot-platform. The chapter closes with a heightened, quasi-cosmic appraisal of Abhimanyu’s radiance and renown amid assembled superhuman witnesses, underscoring heroic perception as a narrative device alongside tactical description.

Chapter Arc: धर्मराज युधिष्ठिर के वचन सुनकर सौभद्र अभिमन्यु का रक्त खौल उठता है; वह रथ पर चढ़ते ही सारथि सुमित्र को बार-बार ‘चलो, चलो’ कहकर द्रोण की सेना की ओर हाँकने का आदेश देता है। → सारथि क्षणभर ठिठककर कहता है कि पाण्डवों ने उसके कंधों पर भारी भार रखा है—पहले विचार कर फिर युद्ध करना चाहिए। अभिमन्यु हँसकर उत्तर देता है कि द्रोण या समस्त क्षत्रबल भी उसे रोक नहीं सकता; वह अपने कुल-पराक्रम और कृष्ण-अर्जुन के आश्रय का स्मरण कर निर्भयता प्रकट करता है। → अभिमन्यु बीस पग भी आगे नहीं बढ़ता कि द्रोणानीक की ओर से घोर प्रतिघात उठता है—समुद्र-मंथन-सा आवर्त बनता है; फिर भी वह रथ, अश्व और पदाति-समूहों को चीरता हुआ द्रोण की सेना में घुसकर ‘असह्य पराक्रम’ से तुम्हारे (कौरव) पैदल दलों का सर्वथा संहार करता है। → सुमित्र स्वर्णाभूषणों से सजे, तीन वर्ष के वेगवान घोड़ों को आगे बढ़ाता है; अभिमन्यु का आक्रमण द्रोणानीक में क्षणिक भगदड़ और अव्यवस्था फैलाता है, और कौरव पक्ष को उसकी एकल-वीरता का दंश सहना पड़ता है। → द्रोण की विशाल व्यवस्था के बीच अभिमन्यु का यह निर्भीक प्रवेश आगे किस महायोद्धा को उसे रोकने के लिए खड़ा करेगा—यही प्रश्न युद्धभूमि पर लटक जाता है।

Shlokas

Verse 1

अड--#क+ षट्त्रिशो5ध्याय: अभिमन्युका उत्साह तथा उसके द्वारा कौरवोंकी चतुरंगिणी सेनाका संहार संजय उवाच सौभद्रस्तद्‌ वच: श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमत: । अचोदयत यन्तारं द्रोणानीकाय भारत

संजय ने कहा—भरतनन्दन! बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिर के पूर्वोक्त वचन सुनकर सुभद्राकुमार अभिमन्यु ने अपने सारथि को द्रोणाचार्य की सेना की ओर चलने का आदेश दिया।

Verse 2

तेन संचोद्यमानस्तु याहि याहीति सारथि: । प्रत्युवाच ततो राजन्नभिमन्युमिदं वच:,राजन्‌! “चलो, चलो” ऐसा कहकर अभिमन्युके बारंबार प्रेरित करनेपर सारथिने उससे इस प्रकार कहा--

बार-बार “चलो, चलो” कहकर प्रेरित किए जाने पर सारथि ने, हे राजन्, अभिमन्यु से इस प्रकार कहा।

Verse 3

अतिभारोथयमायुष्मन्नाहितस्त्वयि पाण्डवै: । सम्प्रधार्य क्षणं बुद्धा ततस्त्वं योद्धुमहसि

आयुष्मन्! पाण्डवों ने आपके ऊपर यह अत्यन्त भारी भार रख दिया है। क्षणभर ठहरकर बुद्धिपूर्वक विचार कीजिए, फिर निश्चय करके युद्ध कीजिए।

Verse 4

आचार्यो हि कृती द्रोण: परमास्त्रे कृतश्रम: । अत्यन्तसुखसंवृद्धस्त्वं चायुद्धविशारद:

द्रोणाचार्य तो सिद्धहस्त हैं; परमास्त्रों के अभ्यास में उन्होंने बड़ा परिश्रम किया है। और तुम अत्यन्त सुख-सुविधा में पले हो; युद्ध-कौशल में तुम उनके समान निपुण नहीं हो।

Verse 5

! ४ है उस पक * हि ० ततो$भिमन्यु: प्रहसन्‌ सारथिं वाक्यमत्रवीत्‌ । सारथे को न्वयं द्रोण: समग्रं क्षत्रमेव वा

तब अभिमन्यु हँसते हुए सारथि से बोला—“सारथे! मेरे लिए द्रोण क्या हैं, या समस्त क्षत्रिय-समूह ही क्या है?”

Verse 6

ऐरावतगतं शक्रं सहामरगणैरहम्‌ | अथवा रुद्रमीशानं सर्वभूतगणार्चितम्‌ । योधयेयं रणमुखे न मे क्षत्रेड्द्य विस्मय:

मैं रणभूमि में ऐरावत पर आरूढ़ देवगणों सहित शक्र (इन्द्र) से भी युद्ध कर सकता हूँ; अथवा समस्त भूतगणों द्वारा पूजित ईशान रुद्र से भी। इसलिए आज इस क्षत्रिय-समूह से युद्ध करने में मुझे कोई विस्मय नहीं।

Verse 7

न ममैतद्‌ द्विषत्सैन्यं कलामहति षोडशीम्‌ | अपि विश्वजितं विष्णु मातुलं प्राप्प सूतज

संजय बोले—यह शत्रु-सेना मेरी शक्ति के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं है। फिर भी, हे सूतपुत्र, विश्वजित् मेरे मातुल विष्णु इस संग्राम में आ पहुँचे हैं।

Verse 8

अभिमन्युश्व तां वाचं कदर्थीकृत्य सारथे:

संजय बोले—अभिमन्यु ने उस वचन को अनुचित मानकर तिरस्कृत किया और रणभूमि की तात्कालिकता तथा धर्मबुद्धि के साथ सारथि से कहा।

Verse 9

ततः संनोदयामास हयानाशु त्रिहायनान्‌

तब उसने तीन वर्ष के घोड़ों को शीघ्रता से उकसाया और रथ को नए वेग से आगे बढ़ाया।

Verse 10

ते प्रेषिता: सुमित्रेण द्रोणानीकाय वाजिन:

संजय बोले—सुमित्र के भेजे हुए अश्वारोही द्रोण की व्यूह-रचना की ओर वेग से बढ़े, मानो बाणों की वर्षा हो।

Verse 11

तमुदीक्ष्य तथा<<यान्तं सर्वे द्रोणपुरोगमा: । अभ्यवर्तन्त कौरव्या: पाण्डवाश्व तमन्वयु:

संजय बोले—उसे इस प्रकार आते देख द्रोण के अग्रणी सभी कौरव-वीर उसके सामने बढ़कर आ डटे; और पाण्डव-योद्धा उसके पीछे-पीछे चल पड़े, उसे बल देने लगे।

Verse 12

स कर्णिकारप्रवरोच्छित ध्वज: सुवर्णवर्मार्जुनिरर्जुनादू वर: । युयुत्सया द्रोणमुखान्‌ महारथान्‌ समासदत्‌ सिंहशिशुर्यथा द्विपान्‌

संजय बोले—कर्णिकार-चिह्न से सुशोभित ऊँचे श्रेष्ठ ध्वज वाला, सुवर्ण कवचधारी अर्जुनकुमार अभिमन्यु, पराक्रम में अपने पिता अर्जुन से भी बढ़कर था। युद्ध की उत्कट इच्छा से वह द्रोण आदि महारथियों पर वैसे ही टूट पड़ा जैसे सिंह का शावक हाथियों पर झपटता है।

Verse 13

ते विंशतिपदे यत्ता: सम्प्रहारं प्रचक्रिरे । आसीद्‌ गाज् इवावर्तो मुहूर्तमुदधाविव

संजय बोले—अभिमन्यु के बीस पग आगे बढ़ते ही, द्रोणाचार्य आदि योद्धा सामना करने को उद्यत होकर उस पर प्रहार करने लगे। उसके उस सैन्य-सागर में प्रवेश से कुछ समय तक वही दशा हुई, जैसी समुद्र में गंगा के भँवरयुक्त जल के मिल जाने से होती है।

Verse 14

शूराणां युध्यमानानां निघ्नतामितेरतरम्‌ । संग्रामस्तुमुलो राजन्‌ प्रावर्तत सुदारुण:,राजन! युद्धमें तत्पर हो एक-दूसरेपर घातक प्रहार करते हुए उन शूरवीरोंमें अत्यन्त दारुण एवं भयंकर संघर्ष होने लगा

संजय बोले—राजन्! युद्ध में प्रवृत्त उन शूरवीरों के परस्पर घातक प्रहारों से अत्यन्त तुमुल, दारुण और भयंकर संग्राम छिड़ गया।

Verse 15

प्रवर्तमाने संग्रामे तस्मिन्नतिभयंकरे । द्रोणस्य मिषतो व्यूहं भित्वा प्राविशदार्जुनि:,वह अति भयंकर संग्राम चल ही रहा था कि द्रोणाचार्यके देखते-देखते अर्जुनकुमार अभिमन्यु व्यूह तोड़कर भीतर घुस गया

संजय बोले—उस अति भयंकर संग्राम के चलते-चलते, द्रोणाचार्य के देखते-देखते अर्जुनकुमार अभिमन्यु व्यूह को भेदकर उसके भीतर प्रवेश कर गया।

Verse 16

(तदभेद्यमनाधृष्य॑ द्रोणानीकं सुदुर्जयम्‌ । भित्त्वा$<र्जुनिरसम्भ्रान्तो विवेशाचिन्त्यविक्रम: ।।

संजय बोले—अचिन्त्य पराक्रम वाले अभिमन्यु ने बिना घबराए द्रोणाचार्य के उस अभेद्य, अनाधृष्य और अत्यन्त दुर्जय सैन्य-व्यूह को भंग कर भीतर प्रवेश किया। भीतर घुसकर शत्रुसंघों का संहार करते हुए उस महाबली को हाथों में शस्त्र उठाए गजारोही, अश्वारोही, रथी और पैदल योद्धाओं की धाराएँ चारों ओर से घेरने लगीं।

Verse 17

नानावादित्रनिनदै: &्ष्वेडितोत्क्ुष्टगर्जितै: । हुंकारैः सिंहनादैश्व तिष्ठ तिछ्ठेति नि:स्वनै:

संजय बोले— नाना प्रकार के वाद्यों की ध्वनि, कोलाहल, तीखी सीटी, उन्मत्त गर्जना, ललकार, हुंकार और सिंहनाद के साथ, बार-बार “ठहरो, ठहरो” की पुकार करते हुए वे वीर योद्धा आगे बढ़े। हाथियों की चिग्घाड़, घुँघरुओं की रुनझुन, अट्टहास, हाथों की ताली और रथ-चक्रों की घर्घराहट से वे सारी वसुधा को गुंजाते हुए अर्जुन के पुत्र पर टूट पड़े—मानो शस्त्रों से पहले ही भय का प्रहार कर रहे हों।

Verse 18

घोरैहलहलाशब्दैर्मा गास्तिष्ठैह्ि मामिति । असावहममुत्रेति प्रवदन्तो मुहुर्मुहु:

संजय बोले— भयानक “हलहला” के शब्दों के बीच वे बार-बार चिल्लाते थे—“मत जाओ, ठहरो! मेरे पास आओ! मैं यहाँ हूँ—वह वहाँ है!” इस प्रकार निरंतर ललकारते हुए, हाथियों की चिग्घाड़, घुँघरुओं की रुनझुन, ऊँचे ठहाके, हाथों की ताली और रथ-चक्रों की घर्घराहट से धरती को गुंजाते हुए वे योद्धा अर्जुन के पुत्र पर टूट पड़े।

Verse 19

बंहितै: सिंजितैहासि: करनेमिस्वनैरपि । संनादयन्तो वसुधामभिदुद्रवुराजुनिम्‌

संजय बोले— वाद्यों के निनाद, आभूषणों की झंकार, ऊँचे ठहाके और रथ-चक्रों की गड़गड़ाहट से वे धरती को गुंजाते हुए सीधे अर्जुन के पुत्र पर दौड़ पड़े।

Verse 20

तेषामापततां वीर: शीघ्रयोधी महाबल: । क्षिप्रास्त्रो न्यवधीद्‌ राजन्‌ मर्मज्ञो मर्मभेदिभि:

संजय बोले— राजन्, उन पर टूट पड़ने वालों के सामने वह महाबली वीर (अभिमन्यु) शीघ्रयुद्ध में निपुण और त्वरित अस्त्र चलाने वाला था। मर्मस्थानों को जानने वाला वह मर्मभेदी बाणों से आते हुए शत्रुओं का संहार करने लगा।

Verse 21

ते हन्यमाना विवशा नानालिऊ्लेः शितै: शरै: । अभिपेतु: सुबहुश: शलभा इव पावकम्‌

संजय बोले— नाना चिह्नों से युक्त तीक्ष्ण बाणों से मारे जाकर वे कौरववीर विवश हो बहुत-से धरती पर गिर पड़े—मानो फतिंगों के झुंड जलती आग में जा पड़े हों।

Verse 22

ततस्तेषां शरीरैश्व॒ शरीरावयवैश्व सः । संतस्तार क्षितिं क्षिप्रं कुशै्वेदिमिवाध्वरे

तब उसने उनके शवों और कटे हुए अंगों से क्षणभर में धरती को ऐसे पाट दिया, जैसे यज्ञ में वेदी पर कुश बिछाए जाते हैं।

Verse 23

बद्धगोधाड्गुलित्राणानू सशरासनसायकान्‌ | सासिचर्माड्कुशाभीषून्‌ सतोमरपरश्चधान्‌

महाराज! अभिमन्यु ने आपके सहस्रों योद्धाओं की वे भुजाएँ क्षण में काट डालीं—जिनमें गोह-चर्म के अंगुलित्राण बँधे थे, धनुष-बाण शोभते थे; कहीं तलवार-ढाल, अंकुश और बागडोर थी, तो कहीं तोमर और फरसा।

Verse 24

सगदायोगुडप्रासान्‌ सर्ितोमरपट्टिशान्‌ | सभिन्दिपालपरिघान्‌ सशक्तिवरकम्पनान्‌

संजय बोले: महाराज! अभिमन्यु ने आपके सहस्रों सैनिकों की वे भुजाएँ काट डालीं जिनमें गदा, भारी मुद्गर, प्रास, ऋष्टि, तोमर, पट्टिश, भिन्दिपाल, परिघ, उत्तम शक्ति और ‘कम्पन’ नामक प्रसिद्ध अस्त्र थे।

Verse 25

सप्रतोदमहाशड्खान्‌ सकुन्तान्‌ सकचग्रहान्‌ । समुद्गरक्षेपणीयान्‌ सपाशपरिघोपलान्‌

संजय बोले: महाराज! उसने उन भुजाओं को भी काट डाला जिनमें प्रतोद, महाशंख, कुन्त, केश पकड़ने की पकड़, फेंकने योग्य मुद्गर, पाश, परिघ और शिलाखण्ड थे।

Verse 26

सकेयूराज्गदान्‌ बाहून्‌ हृद्यगगन्धानुलेपनान्‌ संचिच्छेदार्जुनिस्तूर्ण त्॒वदीयानां सहस्रश:

संजय बोले: महाराज! अर्जुनपुत्र अभिमन्यु ने आपके सहस्रों सैनिकों की वे भुजाएँ तुरंत काट डालीं, जो केयूरों से विभूषित थीं और मनोहर सुगन्धित लेप से सुशोभित थीं।

Verse 27

तैः स्फुरद्धिर्महाराज शुशुभे भू: सुलोहितै: । पज्चास्यै: पन्नगैश्छिन्नैर्गरुडेनेव मारिष

आदरणीय महाराज! रक्त से लथपथ होकर तड़पती हुई उन भुजाओं से यह पृथ्वी ऐसी शोभा पा रही थी, मानो गरुड़ द्वारा छिन्न-भिन्न किए गए पाँच-फन वाले सर्पों के शरीरों से वसुधा आच्छादित होकर सुशोभित हो।

Verse 28

सुनासाननकेशान्तैरब्रणैश्वारुकुण्डलै: । संदष्टौष् पुटै: क्रोधात्‌ क्षरद्धि: शोणितं बहु

संजय बोले—जिन मस्तकों में सुन्दर नासिका, सुन्दर मुख और सुन्दर केशान्त की शोभा थी, जिन पर फोड़े-फुंसी या घाव के चिह्न न थे, जो मनोहर कुण्डलों से प्रकाशित थे, जिनके ओष्ठ क्रोध से दाँतों तले दबे थे और जिनसे बहुत-सा रक्त बह रहा था—ऐसे शत्रु-मस्तकों से अभिमन्यु ने वहाँ पृथ्वी को ढक दिया।

Verse 29

स चारुमुकुटोष्णीषैर्मणिरत्नविभूषितै: । विनालनलिनाकारैर्दिवाकरशशिप्रभै:

संजय बोले—और उन शत्रु-मस्तकों से—जिन पर सुन्दर मुकुट और पगड़ियाँ थीं, जो मणि-रत्नों से विभूषित थे, जो बिना नाल के खिले कमल के समान प्रतीत होते थे और जिनकी प्रभा सूर्य-चन्द्रमा के समान थी—अभिमन्यु ने वहाँ पृथ्वी को मानो पाट दिया।

Verse 30

हितप्रियंवदैः काले बहुभि: पुण्यगन्धिभि: । द्विषच्छिरोभि: पृथिवीं स वै तस्तार फाल्गुनि:

संजय बोले—उस समय हित और प्रिय वचन उचित अवसर पर कहने वाले, पवित्र सुगन्ध से सुवासित, ऐसे बहुत-से शत्रु-मस्तकों से फाल्गुनि (अभिमन्यु) ने वहाँ पृथ्वी को बिछा दिया।

Verse 31

अभिमन्युके द्वारा कौरव-सेनाके प्रमुख वीरोंका संहार गन्धर्वनगराकारान्‌ विधिवत्‌ कल्पितान्‌ रथान्‌ । वीषामुखान द्वित्रिवेणून्‌ न्यस्तदण्डकबन्धुरान्‌

संजय बोले—अभिमन्यु ने कौरव-सेना के प्रमुख वीरों का संहार करके, गन्धर्व-नगर के समान विशाल और विधिपूर्वक सुसज्जित असंख्य रथों को अपने बाणों से टुकड़े-टुकड़े कर दिया। उन रथों के प्रधान ईषादण्ड टूट गए, द्वि-त्रिवेणु चूर-चूर हो गए, स्तम्भ और आधार उखड़ गए, बन्धन छूट गए, जंघा और कूबर फट गए, पहियों के कंगूरे और अरे कुचल दिए गए; आभूषण, आसन और समस्त सामग्री नष्ट हो गई। छत्र और आवरण गिरा दिए गए और उन पर स्थित योद्धा मारे गए। इस प्रकार, अभिमन्यु के शर-प्रहार से सहस्रों रथ चारों दिशाओं में ध्वस्त हो गए।

Verse 32

विजड्घाकूबरांस्तत्र विनेमिदशनानपि | विचक्रोपस्करोपस्थान्‌ भग्नोपकरणानपि

संजय बोले—वहाँ अभिमन्यु अपने बाणों से शत्रुओं के गन्धर्व-नगर के समान विशाल, विधिपूर्वक सुसज्जित असंख्य रथों को चूर-चूर करता हुआ सब दिशाओं में दिखाई दे रहा था। उन रथों के ईषादण्ड टूट गए, त्रिवेणु चूर्ण हो गए, स्तम्भदण्ड उखड़ गए, बन्धन टूट गए; जंघा और कूबर खण्डित हो गए; पहियों के ऊपरी भाग और अरे चौपट कर दिए गए; सजावट, बैठकें और समस्त उपकरण नष्ट हो गए। छत्र और आवरण गिरा दिए गए और उन रथों के सब योद्धा मारे गए—इस प्रकार सहस्रों रथों की धज्जियाँ उड़ गईं।

Verse 33

प्रपातितोपस्तरणान्‌ हतयोधान्‌ सहस्रश: । शरैविशकलीकुर्वन्‌ दिक्षु सर्वास्वदृश्यत

संजय बोले—अभिमन्यु अपने बाणों से शत्रुओं के रथों को टुकड़े-टुकड़े करता, उनकी बैठकें और उपकरण गिराता तथा सहस्रों योद्धाओं को मारता हुआ सब दिशाओं में दिखाई दे रहा था। गन्धर्व-नगर के समान विशाल और सुसज्जित वे रथ क्षणभर में ध्वस्त हो गए।

Verse 34

पुनर्दधिपान्‌ द्विपारोहान्‌ वैजयन्त्यड्कुशध्वजान्‌ । तूणान्‌ वर्माण्यथो कक्ष्या ग्रैवेयांश्व॒ सकम्बलान्‌

संजय बोले—फिर अभिमन्यु ने तीखी धार वाले बाणों से शत्रुओं के हाथियों, गजारोहियों और महावतों को, तथा उनकी वैजयन्ती पताकाओं, अंकुशों, ध्वजाओं के साथ-साथ तूणीरों, कवचों, कक्ष्याओं (पट्टों), कण्ठाभूषणों और हाथियों के झूल-आवरणों को भी काट डाला।

Verse 35

घण्टा:शुण्डाविषाणाग्रान्‌ छत्रमाला: पदानुगान्‌ । शरैरनिशितधाराग्रै: शात्रवाणामशातयत्‌

संजय बोले—अभिमन्यु ने अत्यन्त तीखी धार वाले बाणों से शत्रुओं की घंटियाँ, सूँड़ें, दाँतों के अग्रभाग, छत्र, मालाएँ और पग-पग पर साथ चलने वाले पादरक्षकों को भी काट गिराया; इस प्रकार रणभूमि में उनकी शोभा और रक्षा—दोनों को चूर कर दिया।

Verse 36

वनायुजानू्‌ पर्वतीयान्‌ काम्बोजानथ बाह्लिकान्‌ | स्थिरबालधिकर्णाक्षाञ्जवनान्‌ साधुवाहिन:,इति श्रीमहा भारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि अभिमन्युपराक्रमे षट्त्रिंशो5ध्याय:

संजय बोले—वहाँ वनायुज और पर्वतीय, काम्बोज और बाह्लिक, तथा यवन भी थे—स्थिर बल वाले, बड़े कान और नेत्रों वाले, और उत्तम घोड़ों के लिए प्रसिद्ध। इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि अभिमन्युपराक्रमे छत्तीसवाँ अध्याय।

Verse 37

आरूढाज्गशिक्षितैर्योधै: शकक्‍्त्यृष्टिप्रासयोधिभि: । विध्वस्तचामरमुखान्‌ विप्रविद्धप्रकीर्णकान्‌

संजय बोले—घुड़सवारी में सुशिक्षित, शक्ति-ऋष्टि-प्रास आदि शस्त्रों के प्रयोग में निपुण योद्धाओं ने उन शत्रुओं को, जिनकी अग्रपंक्तियाँ और ध्वज-चामर टूट चुके थे, बेधकर तितर-बितर कर दिया; वे रणकोलाहल में घायल होकर भ्रमित-से इधर-उधर बिखर गए।

Verse 38

निरस्तजिद्दानयनान्‌ निष्कीर्णान्त्रयकृद्घनान्‌ । हतारोहांश्छिन्नघण्टान्‌ क्रव्यादगणमोदकान्‌

संजय बोले—वहाँ ऐसे योद्धा पड़े थे जिनका जय-गर्व चूर हो गया था, जिनकी आँखें निश्चल और निर्जीव थीं; जिनकी आँतें बाहर निकल पड़ी थीं और देह रक्त-भार से भारी हो गई थी। सवार मारे गए थे, उनके घोड़ों की घंटियाँ कटकर मौन हो गई थीं; और मांसभक्षी प्राणी प्रसन्न झुंडों में इकट्ठे हो रहे थे।

Verse 39

निकृत्तचर्मकवचान्‌ शकृन्मूत्रासृगाप्लुतान्‌ । निपातयजन्नश्ववरांस्तावकान्‌ स व्यरोचत

संजय बोले—आपके श्रेष्ठ घोड़ों को—जिनका चर्म और कवच कट-फट गया था, जो मल-मूत्र और रक्त से सने थे—वह निरन्तर गिराता चला गया; और उस भयावह कर्म में भी वह तेजस्वी-सा दीख पड़ा।

Verse 40

एको विष्णुरिवाचिन्त्यं कृत्वा कर्म सुदुष्करम्‌ | राजन्‌! आपके वनायुज

संजय बोले—राजन्, अकेला वीर अभिमन्यु मानो भगवान् विष्णु के समान अचिन्त्य और अत्यन्त दुष्कर कर्म करके शोभा पा रहा था; उसने आपके रथ-हाथी-घोड़े—इन तीन अंगों से युक्त विशाल बल को मथ डाला।

Verse 41

यथासुरबल घोरें त्रयम्बकेण महौजसा । जैसे महान्‌ तेजस्वी त्रिनेत्रधारी भगवान्‌ रुद्रने असुरोंकी सेनाको मथ डाला था

संजय बोले—जैसे महौजस्वी त्र्यम्बक (रुद्र) ने घोर संग्राम में असुर-सेना को मथ डाला था, वैसे ही अर्जुनपुत्र अभिमन्यु ने रण में शत्रुओं के लिए असह्य कर्म करके रथ-हाथी-घोड़े से युक्त आपकी सेना को रौंद डाला।

Verse 42

एवमेकेन तां सेनां सौभद्रेण शितै: शरै:

संजय बोले—जैसे कभी कार्तिकेय ने असुरों की सेना को चूर-चूर कर दिया था, वैसे ही अकेले सुभद्राकुमार अभिमन्यु ने अपने तीखे बाणों से समस्त कौरव-सेना को विदीर्ण कर डाला। यह देखकर आपके पुत्र और उनके सैनिक भय से व्याकुल होकर दसों दिशाओं की ओर देखने लगे। उनके मुख सूख गए, नेत्र चंचल हो उठे, अंग-अंग में पसीना छा गया और रोंगटे खड़े हो गए। अब उनका उत्साह युद्ध में नहीं, पलायन में लग गया; शत्रु-विजय के लिए उनके हृदय में तनिक भी उमंग न रही।

Verse 43

भृशं विप्रहतां दृष्टवा स्कन्देनेवासुरीं चमूम्‌ । त्वदीयास्तव पुत्राश्न॒ वीक्षमाणा दिशो दश

संजय बोले—स्कन्द ने जैसे असुरों की सेना को बुरी तरह रौंद डाला था, वैसे ही उस सेना को अत्यन्त विदीर्ण देखकर आपके लोग—आपके पुत्रों सहित—दसों दिशाओं की ओर देखने लगे। भय से अभिभूत होकर उनका धैर्य और विजय-आशा टूट गई; धर्मयुद्ध में स्थिर रहने के स्थान पर उनका मन पलायन की ओर झुक गया।

Verse 44

संशुष्कास्याश्षलन्नेत्रा: प्रस्विन्ना रोमहर्षिण: । पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये

संजय बोले—उनके मुख सूख गए थे, नेत्र डगमगा रहे थे; वे पसीने से तर थे और रोंगटे खड़े हो रहे थे। उनका उत्साह पलायन में लग गया था और शत्रु-विजय के लिए वे सर्वथा निरुत्साह हो गए थे।

Verse 45

गोत्रनामभिरन्योन्यं क्रन्दन्तो जीवितैषिण: । हतान्‌ पुत्रान्‌ पितृन्‌ भ्रातृन्‌ बन्धून्‌ सम्बन्धिनस्तथा

संजय बोले—जीवन की लालसा से वे एक-दूसरे को गोत्र और नाम लेकर पुकारते हुए करुण क्रन्दन करने लगे। वे अपने मारे गए पुत्रों, पिताओं, भाइयों, बन्धुओं तथा अन्य सम्बन्धियों के लिए विलाप कर रहे थे।

Verse 46

प्रातिष्ठन्त समुत्सृज्य त्वरयन्तो हयद्विपान्‌

संजय बोले—सब कुछ छोड़कर वे उठ खड़े हुए और उतावली में घोड़ों तथा हाथियों को हाँकते हुए भाग चले। जीवन की लालसा से वे एक-दूसरे को गोत्र और नाम लेकर पुकारते रहे। उस समय आपके सैनिक भय से ऐसे काँप उठे कि वहाँ पड़े अपने मारे गए पुत्रों, पितृतुल्य बड़ों, भाइयों, बन्धुओं और अन्य सम्बन्धियों को भी छोड़कर रणभूमि से पलायन कर गए और घोड़ों-हाथियों को हड़बड़ी में आगे बढ़ाते रहे।

Verse 73

पितरं चार्जुनं युद्धे न भीर्मामुपयास्यति । 'शत्रुओंकी यह सारी सेना मेरी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। सूतनन्दन! विश्वविजयी विष्णुस्वरूप मामा श्रीकृष्णको तथा पिता अर्जुनको भी युद्धमें विपक्षीके रूपमें सामने पाकर मुझे भय नहीं होगा”

युद्ध में यदि पिता अर्जुन भी मेरे सामने आ जाएँ, तो भी मुझे भय नहीं होगा। सूतनन्दन! शत्रुओं की यह समूची सेना मेरी शक्ति की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं है। विश्वविजयी, विष्णुस्वरूप मेरे मामा श्रीकृष्ण और पिता अर्जुन को भी विपक्षी रूप में सामने पाकर भी मेरा मन नहीं डरेगा।

Verse 86

याहीत्येवाब्रवीदेनं द्रोणानीकाय मा चिरम्‌ | अभिमन्युने सारथिके पूर्वोक्त कथनकी अवहेलना करके उससे यही कहा--“तुम शीघ्र द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर चलो”

पूर्वोक्त बात की अवहेलना करके अभिमन्यु ने अपने सारथि से कठोर स्वर में यही कहा—“देर मत करो; शीघ्र द्रोणाचार्य की सेना की ओर चलो।”

Verse 96

नातिहृष्टमना: सूतो हेमभाण्डपरिच्छदान्‌ । तब सारथिने सुवर्णमय आभूषणोंसे भूषित तथा तीन वर्षकी अवस्थावाले घोड़ोंको शीघ्र आगे बढ़ाया। उस समय उसका मन अधिक प्रसन्न नहीं था

सारथि का मन अधिक प्रसन्न नहीं था; फिर भी उसने सुवर्णमय आभूषणों से भूषित, तीन वर्ष की अवस्था वाले घोड़ों को—जिनके साज-सामान भी स्वर्णमय थे—शीघ्र आगे बढ़ा दिया।

Verse 106

द्रोणमभ्यद्रवन्‌ राजन्‌ महावेगपराक्रमम्‌ । राजन! सारथि सुमित्रद्वारा द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर हाँके हुए वे घोड़े महान्‌ वेगशाली और पराक्रमी द्रोणकी ओर दौड़े

राजन्! सुमित्र नामक सारथि द्वारा द्रोणाचार्य की सेना की ओर हाँके गए वे घोड़े, महान वेग और पराक्रम से युक्त द्रोण की ओर सीधे दौड़े।

Verse 413

अभिनच्च पदात्योघांस्त्वदीयानेव सर्वश: । इस प्रकार अर्जुनकुमार अभिमन्युने रणक्षेत्रमें शत्रुओंके लिये असहा पराक्रम करके आपके पैदल योद्धाओंके समूहोंका सभी प्रकारसे विनाश आरम्भ किया

इस प्रकार अर्जुनकुमार अभिमन्यु ने रणभूमि में असह्य पराक्रम दिखाकर आपके पैदल योद्धाओं के समूहों का सब प्रकार से विनाश आरम्भ कर दिया।

Frequently Asked Questions

The chapter implicitly raises the tension between idealized single-combat heroics and the pragmatic ethics of collective containment: when a single warrior destabilizes an army, commanders choose coordinated suppression, challenging expectations of proportional and individually matched engagement.

Agency and excellence operate within systems: individual skill can temporarily offset numerical and hierarchical pressure, yet outcomes are shaped by coordinated institutions (command, alliances, and morale) as much as by personal valor.

No explicit phalaśruti appears; the closest meta-layer is the elevated descriptive closure portraying Abhimanyu’s fame and radiance witnessed by superhuman assemblies, reinforcing the epic’s theme that remembrance and moral evaluation are integral to the event’s meaning.

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