
जयद्रथवधः — The Slaying of Jayadratha (Sunset Vow and Curse-Condition)
Upa-parva: Jayadratha-vadha Upaparva (Episode of Jayadratha’s Slaying)
Sañjaya depicts Arjuna as visually overwhelming in motion, projecting simultaneous missile-displays across directions (1–8), likened to the midday sun’s brilliance and to aerial rows of swans formed by arrow-flights. Arjuna drives toward Jayadratha, disrupting multiple chariot-warriors while pursuing the vow-bound target (9). Jayadratha counters with sharpened shafts, striking Gāṇḍīva and Arjuna, and attacking horses and standard; Arjuna neutralizes the incoming missiles and severs elements of Jayadratha’s chariot system, including the charioteer and the emblem (11–14). As the sun hastens toward setting, Kṛṣṇa urgently instructs Arjuna to decapitate Jayadratha but to prevent the head from falling to the ground because of Vṛddhakṣatra’s curse: whoever causes Jayadratha’s head to touch earth would have his own head split into a hundred parts (15–28). Kṛṣṇa explains the origin of the curse and provides the operational solution—use a divine, mantra-empowered missile to carry the head beyond Samantapañcaka and drop it into Vṛddhakṣatra’s lap (17–36). Arjuna releases the consecrated arrow; it removes Jayadratha’s head and deposits it as instructed, and when Vṛddhakṣatra rises, the head falls to earth, triggering the curse upon him (30–39). The battlefield registers astonishment; Kṛṣṇa commends Arjuna, the Pāṇḍavas infer success, and the engagement pivots back toward renewed combat against Droṇa as sunset approaches (40–49).
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं—द्रोणाचार्य की सेना रथ-घोड़े-हाथियों से भरी, शर-शक्ति की लहरों वाली महासागर-सी उमड़ती है; उसी के सामने सात्यकि अपने सारथि से युद्ध-मार्ग और लक्ष्य पर तीखा संवाद करता है। → सात्यकि द्रोण की व्यूहबद्ध भीड़ को ‘आयुधों का समुद्र’ मानकर भी भय नहीं मानता; वह घोषणा करता है कि आज कौरव-दल (दुर्योधन सहित) उसका पराक्रम देखेगा—वह चुन-चुनकर श्रेष्ठ वीरों को गिराएगा। यवन-काम्बोज आदि तेज़ हाथ चलाने वाले योद्धा उस पर शरवर्षा करते हैं, और रणभूमि वाद्यों के उग्र नाद से कांपती है। → सात्यकि क्रुद्ध-रूप धारण कर रथों, अश्वों, गजों और पैदल दलों के बीच घुसकर यवन-काम्बोजों की पंक्तियाँ तोड़ देता है; उसके प्रहारों से शिरस्त्राणयुक्त मुण्डित मस्तक और लंबी दाढ़ियों वाले शत्रु-शिर रणभूमि पर बिखरते हैं—भूमि ‘पंखहीन पक्षियों’ की तरह पड़े सिरों से ढँक जाती है। → यवनों का बड़ा भाग मारा जाता है; जो थोड़े शेष बचते हैं वे भय से चारों ओर भागते हैं, अपने समुदाय से टूटकर प्राण बचाने की चेष्टा करते हैं। सात्यकि की धावा-धार से कौरव-सेना में विराव और संताप फैलता है। → सात्यकि की विजय-धारा आगे किस बड़े कौरव-वीर से टकराएगी—और द्रोण की महासागर-सी सेना इस छेद को कैसे भरेगी—यह अगले प्रसंग में तीव्र होता है।
Verse 1
ऑपन--माज छा जि: एकोनविशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: सात्यकि और उनके सारथिका संवाद तथा सात्यकिद्धारा काम्बोजों और यवन आदिकी सेनाकी पराजय संजय उवाच ततः स सात्यकिर्धीमान् महात्मा वृष्णिपुड्भव: । सुदर्शन निहत्याजौ यन्तारं पुनरब्रवीत्
संजय बोले—राजन्! तत्पश्चात् वृष्णिवंश-शिरोमणि बुद्धिमान् महामनस्वी सात्यकि ने रण में सुदर्शन का वध करके अपने सारथि से फिर कहा।
Verse 2
रथाश्वनागकलिलं शरशक्त्यूमिमालिनम् । खड्गमत्स्यं गदाग्राहं शूरायुधभहास्वनम्
“तात! रथ, घोड़े और हाथियों से भरी द्रोणाचार्य की सेना महासागर के समान थी। उसमें बाण और शक्ति आदि अस्त्र-शस्त्र तरंगों की माला-से जान पड़ते थे; खड्ग मछलियों के समान और गदा ग्राह के तुल्य थी। शूरवीरों के आयुध-प्रहार से उठने वाला महान् शब्द मानो समुद्र का भयानक गर्जन था।”
Verse 3
प्राणापहारिणं रौद्रं वादित्रोत्क़ुष्टनादितम् । योधानामसुखस्पर्श दुर्धर्षमजयैषिणाम्
“वह प्राणहर, रौद्र और भयानक था; बाजों के ऊँचे नाद और वीरों की ललकार से उसका गर्जन और बढ़ जाता था। योद्धाओं के लिये उसका स्पर्श दुःखदायक था, और जो विजय की अभिलाषा नहीं रखते, उनके लिये वह दुर्धर्ष आतंक था।”
Verse 4
तीर्णा: सम दुस्तरं तात द्रोणानीकमहार्णवम् । जलसंधबलेनाजोौ पुरुषादैरिवावृतम्
“तात! हम उस दुस्तर द्रोण-सेना रूपी महासागर को पार कर गये हैं, जो रण में जलसंध की सेना से—मानो राक्षसों से—घिरा हुआ था और इसलिए और भी दुर्गम प्रतीत होता था।”
Verse 5
अतोथचन््यत् पृतनाशेषं मन्ये कुनदिकामिव । तर्तव्यामल्पसलिलां चोदयाश्वानसम्भ्रमम्
उससे भिन्न जो शेष सेना है, उसे मैं अल्प जलवाली छोटी नदी के समान सहज ही लाँघने योग्य समझता हूँ। अतः तुम निर्भय होकर घोड़ों को आगे बढ़ाओ।
Verse 6
हस्तप्राप्तमहं मन्ये साम्प्रतं सव्यसाचिनम् । निर्जित्य दुर्धरं द्रोणं सपदानुगमाहवे
सेवकोंसहित दुर्धर्ष वीर द्रोणाचार्य को रणभूमि में जीतकर मैं मानता हूँ कि इस समय सव्यसाची अर्जुन हमारे हाथ में ही आ गया है; क्योंकि वह तत्क्षण पीछा करते हुए आगे बढ़ गया है।
Verse 7
हार्दिक्यं योधवर्य च मन्ये प्राप्त धनंजयम् । न हि मे जायते त्रासो दृष्टवा सैन्यान्यनेकश:
मैं मानता हूँ कि हार्दिक्य और वह श्रेष्ठ योद्धा धनंजय के निकट पहुँच गए हैं। तथापि अनेक विभागों में एकत्रित सेनाओं को देखकर भी मेरे मन में भय नहीं उत्पन्न होता।
Verse 8
वल्लेरिव प्रदीप्तस्य वने शुष्कतृणोलपे । 'योद्धाओंमें श्रेष्ठ कृतवर्माको पराजित करके मैं ऐसा समझता हूँ कि अर्जुन मुझे मिल गये। जैसे सूखे तृण और लतावाले वनमें प्रज्वलित हुई अग्निके लिये कहीं कोई बाधा नहीं रहती, उसी प्रकार मुझे इन अनेक सेनाओंको देखकर तनिक भी त्रास नहीं हो रहा है ।।
योद्धाओं में श्रेष्ठ कृतवर्मा को पराजित करके मैं मानता हूँ कि अर्जुन अब मेरे हाथ आ गया है। जैसे सूखे तृण और लताओं वाले वन में प्रज्वलित अग्नि के लिए कहीं कोई बाधा नहीं रहती, वैसे ही इन अनेक सेनाओं को देखकर भी मुझे तनिक भी त्रास नहीं होता। पाण्डवों के मुख्य, किरीटधारी के द्वारा रौंदी गई भूमि को देखो।
Verse 9
द्रवते तद् यथा सैन्यं तेन भग्नं महात्मना,'सारथे! उन्हीं महात्मा अर्जुनकी खदेड़ी हुई वह सेना इधर-उधर भाग रही है। दौड़ते हुए रथों, हाथियों और घोड़ोंसे लाल रेशमके समान यह धूल ऊपरको उठ रही है
सारथे! उस महात्मा अर्जुन द्वारा भगाई हुई वह सेना जैसे टूटकर बिखरती है, वैसे ही इधर-उधर भाग रही है। दौड़ते हुए रथों, हाथियों और घोड़ों से धूल ऊपर उठ रही है और लाल रेशम के समान चमक रही है।
Verse 10
रथैरविंपरिधावद्धिर्गजैरश्वैश्न॒ सारथे | कौशेयारुणसंकाशमेतदुद्धूयते रज:
संजय बोले—सारथे! रथों, हाथियों और घोड़ों के इधर-उधर दौड़ने से लाल रेशम-सी धूल ऊपर उछल रही है। महात्मा अर्जुन द्वारा खदेड़ी हुई वह सेना चारों दिशाओं में बिखरकर भाग रही है।
Verse 11
अभ्याशस्थमहं मन्ये श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् | स एष श्रुयते शब्दो गाण्डीवस्पामितौजस:
संजय बोले—मैं समझता हूँ कि श्वेत अश्वों वाले, जिनके सारथि श्रीकृष्ण हैं, वे अर्जुन अब बहुत निकट आ गए हैं; क्योंकि उसी अमित-पराक्रमी के गाण्डीव धनुष की गर्जन-सी टंकार सुनाई दे रही है।
Verse 12
यादृशानि निमित्तानि मम प्रादुर्भवन्ति वै अनस्तंगत आदित्ये हन्ता सैन्धवर्मर्जुन:
संजय बोले—मेरे सामने जैसे शुभ निमित्त प्रकट हो रहे हैं, उनसे प्रतीत होता है कि सूर्यास्त होने से पहले ही अर्जुन सैन्धव (जयद्रथ) का वध कर देंगे।
Verse 13
शनैर्विश्रम्भयन्नश्चान् याहि यत्रारिवाहिनी । यत्रैते सतलत्राणा: सुयोधनपुरोगमा:
संजय बोले—सूत! घोड़ों को धीरे-धीरे साधते और उन्हें विश्राम देते हुए वहाँ चलो, जहाँ शत्रु-सेना सजी है; जहाँ तलत्राण धारण किए ये योद्धा सुयोधन को आगे करके खड़े हैं।
Verse 14
४ 5 ६ ९ ऐ । दंशिता: क्रूरकर्माण: काम्बोजा युद्धदुर्मदा: । शरबाणासनधरा यवनाश्ष प्रहारिण:
संजय बोले—वहाँ कवचधारी, क्रूरकर्मा, युद्ध के मद से उन्मत्त काम्बोज खड़े हैं; और धनुष-बाण धारण किए प्रहार में निपुण यवन भी वहीं पंक्तिबद्ध हैं।
Verse 15
शका: किराता दरदा बर्बरास्ताम्रलिप्तका: | अन्ये च बहवो म्लेच्छा विविधायुधपाणय:
शक, किरात, दरद, बर्बर, ताम्रलिप्तक और अन्य बहुत-से म्लेच्छ विविध आयुध हाथों में लिये वहाँ खड़े हैं। वे रण में उन्मत्त, कर्म में कठोर हैं; दुर्योधन को अग्रणी बनाकर युद्ध की लालसा से हमारी ओर मुख किये हुए डटे हैं।
Verse 16
यत्रैते सतलत्राणा: सुयोधनपुरोगमा: । मामेवाभिमुखा: सर्वे तिष्ठन्ति समरार्थिन:
जहाँ ये सब कवच-रक्षित योद्धा—सुयोधन (दुर्योधन) को अग्रणी बनाकर—मेरी ही ओर मुख किये, समर की अभिलाषा से खड़े हैं, उसी स्थान को चलो।
Verse 17
एतान् सरथनागाश्चान् निहत्याजौ सपत्तिन: । इदं दुर्ग महाघोरं तीर्णमेवोपधारय
इन शत्रुओं को रणभूमि में रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सहित मार गिराने पर निश्चय जानो कि यह अत्यन्त दुर्गम और महाभयंकर संकट हम पार कर चुके हैं।
Verse 18
सूत उवाच न सम्भ्रमो मे वार्ष्णेय विद्यते सत्यविक्रम । यद्यपि स्यात् तव क्रुद्धो जामदग्न्योडग्रत: स्थित:
सूत बोला—हे वार्ष्णेय, सत्यपराक्रमी! मुझे तनिक भी घबराहट नहीं। यदि क्रोध से भरे जमदग्निनन्दन परशुराम भी आपके सामने आ खड़े हों, तब भी मुझे भय नहीं होगा।
Verse 19
द्रोणो वा रथिनां श्रेष्ठ: कृपो मद्रेश्वरो 5पि वा । तथापि सम्भ्रमो न स्यात् त्वामाश्रित्य महाभुज
महाबाहो! रथियों में श्रेष्ठ द्रोण, कृपाचार्य अथवा मद्रराज शल्य ही क्यों न सामने हों, फिर भी आपके आश्रय में रहकर मुझे घबराहट नहीं हो सकती; भय मुझ पर अधिकार नहीं करेगा।
Verse 20
त्वया सुबहवो युद्धे निर्जिता: शत्रुसूदन । दंशिता: क्रूरकर्माण: काम्बोजा युद्धदुर्मदा:
हे शत्रुसूदन! तुम्हारे द्वारा युद्ध में बहुत-से लोग परास्त किए गए हैं। क्रूर कर्म करने वाले और रण-गर्व से उन्मत्त वे काम्बोज भी तुम्हारे द्वारा दबा दिए गए हैं।
Verse 21
शरबाणासनधरा यवनाश्ष प्रहारिण: । शका: किराता दरदा बर्बरास्ताम्रलिप्तका:
धनुष-बाण धारण करने वाले योद्धा थे—प्रहार में प्रचण्ड यवन; शक, किरात, दरद, बर्बर और ताम्रलिप्त के लोग भी।
Verse 22
अन्ये च बहवो म्लेच्छा विविधायुधपाणय: । न च मे सम्भ्रम: कश्चिद् भूतपूर्व: कथंचन
और भी बहुत-से मलेच्छ थे, जिनके हाथों में नाना प्रकार के आयुध थे। परन्तु मुझे ऐसा घबराहट और व्याकुलता कभी पहले किसी प्रकार नहीं हुई थी।
Verse 23
किमुतैतत् समासाद्य धीरसंयुगगोष्पदम् | आयुष्मन् कतरेण त्वां प्रापपामि धनंजयम्
यह क्या है कि धीर वीरों के लिए भी युद्धभूमि को गाय के खुर के चिन्ह जितना छोटा कर तुम आ पहुँचे हो? आयुष्मन्! इन दोनों मार्गों में से किससे मैं तुम्हें धनंजय के पास पहुँचा दूँ?
Verse 24
शत्रुसूदन! आपने पहले भी युद्धमें बहुतेरे कवचधारी
हे शत्रुसूदन! पहले भी तुमने युद्ध में बहुत-से कवचधारी, क्रूरकर्मा और रण-उन्मत्त काम्बोजों को परास्त किया है। धनुष-बाण धारण करने वाले, प्रहार में कुशल यवनों को जीता है। शकों, किरातों, दरदों, बर्बरों, ताम्रलिप्तों तथा हाथों में नाना प्रकार के आयुध लिए हुए अन्य बहुत-से मलेच्छों को भी हराया है। उन अवसरों पर कभी किसी को किसी प्रकार का भय नहीं हुआ। फिर इस गाय के खुर के चिन्ह के समान तुच्छ युद्धस्थल में आकर भय कैसे हो सकता है? आयुष्मन्! इन दो मार्गों में से किस मार्ग से मैं तुम्हें धनंजय के पास पहुँचा दूँ? हे वार्ष्णेय! तुम किन पर क्रुद्ध हो? किनकी मृत्यु समीप आ गई है? और किनका मन आज यमपुरी जाने को उत्साहित हो रहा है?
Verse 25
के त्वां युधि पराक्रान्तं कालान्तकयमोपमम् | दृष्टवा विक्रमसम्पन्नं विद्रविष्यन्ति संयुगे
युद्धभूमि में कालान्तक यम के समान प्रचण्ड, अद्भुत पराक्रम से सम्पन्न तुम्हें देखकर संग्राम में कौन न भाग खड़ा होगा?
Verse 26
सात्यकिरुवाच मुण्डानेतान् हनिष्यामि दानवानिव वासव:
सात्यकि बोला—“सूत! जैसे वासव (इन्द्र) दानवों का वध करते हैं, वैसे ही मैं इन मुण्डित-शिर काम्बोजों का संहार करूँगा। इससे मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण होगी; अतः मुझे सीधे उन्हीं की ओर ले चलो। आज उन्हें नष्ट करके ही मैं अपने प्रिय पाण्डव—पाण्डुनन्दन अर्जुन—के पास जाऊँगा।”
Verse 27
प्रतिज्ञां पारयिष्यामि काम्बोजानेव मां वह । अद्यैषां कदनं कृत्वा प्रियं यास्यामि पाण्डवम्
सात्यकि बोला—“मैं अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करूँगा। मुझे सीधे काम्बोजों की ओर ले चलो। आज उनका संहार करके ही मैं अपने प्रिय पाण्डव—अर्जुन—के पास जाऊँगा।”
Verse 28
अद्य द्रक्ष्यन्ति मे वीर्य कौरवा: ससुयोधना: । मुण्डानीके हते सूत सर्वसैन्येषु चासकृत्
आज सुयोधन सहित समस्त कौरव मेरा पराक्रम देखेंगे। सूत! आज मुण्डानीक के मारे जाने पर और फिर-फिर समस्त सेनाओं में विनाश होने पर।
Verse 29
अद्य कौरवसैन्यस्य दीर्यमाणस्य संयुगे । श्र॒त्वा विरावं बहुधा संतप्स्यति सुयोधन:
आज संग्राम में कौरव-सेना के चीर-फाड़ होकर बिखरते समय, उसके नाना प्रकार के आर्तनाद को बार-बार सुनकर सुयोधन संताप से जल उठेगा।
Verse 30
अद्य पाण्डवमुख्यस्य श्वेता श्वस्प महात्मन: । आचार्यस्य कृतं मार्ग दर्शयिष्यामि संयुगे,आज रणक्षेत्रमें मैं अपने आचार्य पाण्डवप्रवर श्वेतवाहन महात्मा अर्जुनके प्रकट किये हुए मार्गको दिखाऊँगा
आज रणभूमि में मैं पाण्डवों में श्रेष्ठ, श्वेताश्व-युक्त महात्मा अर्जुन द्वारा प्रकट किए गए—आचार्य द्रोण के रचे हुए—मार्ग को युद्ध में दिखाऊँगा।
Verse 31
अद्य मद्बाणनिहतान् योधमुख्यान् सहस्रश: । दृष्टवा दुर्योधनो राजा पश्चात्तापं गमिष्यति,आज मेरे बाणोंसे अपने सहस्रों प्रमुख योद्धाओंको मारा गया देखकर राजा दुर्योधन अत्यन्त पश्चात्ताप करेगा
आज मेरे बाणों से सहस्रों प्रमुख योद्धाओं को निहत देखकर राजा दुर्योधन पश्चात्ताप से व्याकुल हो उठेगा।
Verse 32
अद्य मे क्षिप्रहस्तस्य क्षिपत: सायकोत्तमान् | अलातचक्रप्रतिमं धनुर्द्रक्ष्यन्ति कौरवा:,आज शीतघ्रतापूर्वक हाथ चलाकर उत्तम बाणोंका प्रहार करते हुए मेरे धनुषको कौरवलोग अलातचक्रके समान देखेंगे
आज शीघ्र हस्त से उत्तम बाणों का प्रहार करते हुए मेरा धनुष कौरवों को अलातचक्र के समान घूमता हुआ दिखाई देगा।
Verse 33
मत्सायकचिताड्रानां रुधिरं स्रवतां मुहुः । सैनिकानां वध दृष्टवा संतप्स्यति सुयोधन:
मेरे बाणों से विद्ध होकर जिनके अंग-प्रत्यंग रक्त से बारंबार भीगेंगे, ऐसे सैनिकों का वध देखकर सुयोधन संतप्त हो उठेगा।
Verse 34
अद्य मे क्रुद्धरूपस्य निघ्नतश्न वरान् वरान् | द्विरर्जुनमिमं लोकं मंस्यतेड्द्य सुयोधन:
आज क्रुद्धरूप धारण कर मैं कौरव-सेना के श्रेष्ठ-श्रेष्ठ वीरों को चुन-चुनकर मारूँगा; तब सुयोधन आज यह मानेगा कि इस लोक में अब दो अर्जुन हो गए हैं।
Verse 35
अद्य राजसहस्राणि निहतानि मया रणे । दृष्टवा दुर्योधनो राजा संतप्स्यति महामृथे,आज महासमरमें मेरे द्वारा सहस्नों राजाओंका विनाश देखकर राजा दुर्योधनको बड़ा संताप होगा
आज रणभूमि में मैंने सहस्रों राजाओं का वध किया है। यह देखकर इस महायुद्ध में राजा दुर्योधन शोक और संताप से दग्ध होगा।
Verse 36
अद्य स्नेहं च भक्ति च पाण्डवेषु महात्मसु । हत्वा राजसहस््राणि दर्शयिष्यामि राजसु
आज मैं महात्मा पाण्डवों के प्रति अपना स्नेह और भक्ति प्रकट करूँगा; सहस्रों राजाओं का वध करके राजाओं के बीच इसे स्पष्ट कर दूँगा।
Verse 37
संजय उवाच एवमुक्तस्तदा सूत: शिक्षितान् साधुवाहिन:
संजय बोले—तब ऐसा कहे जाने पर वह सूत, जो सुशिक्षित और मर्यादा-पालन में निपुण था, उसी के अनुसार करने को तत्पर हुआ।
Verse 38
ते पिबन्त इवाकाशं युयुधानं हयोत्तमा:
वे उत्तम घोड़े मानो आकाश को पीते हुए युयुधान को वेग से आगे ले चले।
Verse 39
सात्यकिं ते समासाद्य पृतनास्वनिवर्तिनम्
सात्यकि से सामना होने पर—जो सेना-पंक्तियों में कभी न हटने वाला है—तुम्हारे योद्धाओं को उस अडिग प्रतिद्वन्द्वी का सामना करना पड़ा।
Verse 40
तेषामिषूनथास्त्राणि वेगवान् नतपर्वभि:
Sañjaya said: With swift force, he met their arrows and weapon-launches, bending (or deflecting) them by means of his own shafts—checking the onrush of their attack in the thick of battle.
Verse 41
अच्छिनत् सात्यकी राजन नैनं ते प्राप्तुवत् शरा: । राजन! वेगशाली सात्यकिने झुकी हुई गाँठवाले अपने बाणोंद्वारा उन सबके बाणों तथा अन्य अस्त्रोंको काट गिराया। वे बाण उनके पासतक पहुँच न सके ।।
Sañjaya said: O King, Sātyaki cut down their missiles; none of those arrows could reach him. With swift, well-aimed shafts—knotted and forceful—he severed and brought down all their arrows and other weapons before they could come near. Then that dreadful warrior, wheeling in every direction, with razor-sharp arrows tipped with gold and fletched with vulture-feathers, struck down the Yavanas—cleaving heads and arms, and even slicing through their iron and bronze armor. The passage underscores disciplined martial skill used as protective counter-force in battle: not reckless slaughter, but mastery that neutralizes incoming harm and breaks the enemy’s capacity to strike.
Verse 42
उच्चकर्त शिरांस्युग्रो यवनानां भुजानपि । शैक्यायसानि वर्माणि कांस्थानि च समन्ततः
Sañjaya said: The fierce warrior, wheeling about on every side, hewed off the Yavanas’ heads and arms, and even cut through their armour made of red iron and of bronze. The scene underscores the ruthless momentum of battle, where prowess and weapon-skill overwhelm bodily protection, and violence spreads indiscriminately across the field.
Verse 43
भित्त्वा देहांस्तथा तेषां शरा जम्मुर्महीतलम् | ते हन्यमाना वीरेण म्लेच्छा: सात्यकिना रणे
Sañjaya said: Having pierced their bodies, the arrows then fell upon the earth. Those Mleccha warriors, being struck down in battle by the heroic Sātyaki, were slain—showing the relentless, consequence-laden momentum of war where valor and duty manifest through uncompromising violence.
Verse 44
शतशो< भ्यपतंस्तत्र व्यसवो वसुधातले । वे बाण उनके शरीरोंको विदीर्ण करके पृथ्वीमें घुस गये। वीर सात्यकिके द्वारा रणभूमिमें आहत होकर सैकड़ों म्लेच्छ प्राण त्यागकर धराशायी हो गये ।।
Sañjaya said: There, by the hundreds, lifeless bodies fell upon the earth. The arrows, having torn through their bodies, plunged into the ground. Struck on the battlefield by the hero Sātyaki, hundreds of the mleccha warriors gave up their lives and collapsed. The scene underscores the grim, impersonal momentum of war—where prowess and duty drive action, yet the cost is measured in lives abruptly ended.
Verse 45
पज्च षट् सप्त चाष्टौ च बिभेद यवनान् शरै: । वे कानतक खींचकर छोड़े हुए और अविच्छिन्न गतिसे परस्पर सटकर निकलते हुए बाणोंद्वारा पाँच
संजय बोले—सात्यकि ने धनुष खींचकर ऐसे बाण छोड़े कि उनकी धारा अविच्छिन्न रही; उन बाणों से वह एक ही साथ पाँच, छः, सात और आठ यवनों को विदीर्ण कर देता था। हे नराधिप! वहाँ आपकी सेना का संहार करते हुए शैनेय ने सहस्रों काम्बोजों और शकों, शबरों, किरातों और बर्बरों की लाशों से भूमि को पाटकर अगम्य बना दिया; वह धरती मांस और रक्त की कीचड़ से भर गई।
Verse 46
शबराणां किरातानां बर्बराणां तथैव च । अगम्यरूपां पृथिवीं मांसशोणितकर्दमाम्
शबरों, किरातों और बर्बरों—ऐसे ही वन्य जनों—से भरी वह धरती अगम्य-सी प्रतीत होती थी; वह मांस और रक्त की कीचड़ बन गई थी।
Verse 47
दस्यूनां सशिरस्त्राणै: शिरोभिलूनमूर्थजै:
वहाँ दस्युओं के सिर बिखरे पड़े थे—कुछ शिरस्त्राण सहित, कुछ के केश कटे हुए—मानो युद्ध ने मनुष्यों की पहचान और मर्यादा दोनों छीन ली हों।
Verse 48
रुधिरोक्षितसवरज़िस्तैस्तदायोधनं बभौ
रक्त से सने अंगों के कारण वह रणक्षेत्र भयावह जान पड़ता था; वध के रंग ने उसकी छवि ही बदल दी थी।
Verse 49
कबन्न्धै: संवृतं सर्व ताम्रा भ्रे: खमिवावृतम् | जिनके सारे अंग खूनसे लथपथ हो रहे थे, उन कबन्धोंसे भरा हुआ वह सारा रफक्षेत्र लाल रंगके बादलोंसे ढके हुए आकाशके समान जान पड़ता था ।।
कबन्धों से आच्छादित वह समूचा रणक्षेत्र, जिनके अंग रक्त से लथपथ थे, ताम्रवर्ण बादलों से ढके आकाश के समान प्रतीत होता था।
Verse 50
ते सात्वतेन निहता: समावत्रुर्वसुंधराम् । वज्र और विद्युतकें समान कठोर स्पर्शवाले सुन्दर पर्वयुक्त बाणोंद्वारा सात्यकिके हाथसे मारे गये उन यवनोंने वहाँकी भूमिको अपनी लाशोंसे ढक लिया ।।
संजय बोले—सात्वत वीर के हाथों मारे गए यवनों ने अपने शवों से धरती ढक दी। वज्र और बिजली के समान कठोर स्पर्श वाले, सुन्दर पर्वयुक्त बाणों से सात्यकि के हाथों वे वहाँ ढेर हो गए। थोड़े-से यवन ही बचे; वे टूटे-बिखरे, बड़ी कठिनाई से प्राण सँभाले, लगभग अचेत थे। युद्ध में युयुधान से पराजित होकर वे हाथों और कोड़ों से घोड़ों को मारते, अत्यन्त वेग पकड़कर भय से चारों ओर भाग निकले।
Verse 51
जिता: संख्ये महाराज युयुधानेन दंशिता: । पाण्णिशिश्व कशाभिश्च ताडयन्तस्तुरज्रमान्
संजय बोले—महाराज! रण में युयुधान ने उन्हें जीत लिया; उसके प्रहार से वे व्याकुल हो उठे। वे लगाम और कोड़ों से घोड़ों को मारते हुए उन्हें आगे हाँकने लगे।
Verse 52
काम्बोजसैन्यं विद्राव्य दुर्जयं युधि भारत
संजय बोले—हे भारत! युद्ध में दुर्जय काम्बोज-सेना को खदेड़कर (वह आगे बढ़ा)।
Verse 53
यवनानां च तत् सैन्यं शकानां च महद्बलम् | ततः स पुरुषव्यात्र: सात्यकि: सत्यविक्रम:
संजय बोले—यवनों की वह सेना भी थी और शकों की महान्, बलशाली वाहिनी भी। तब सत्यपराक्रमी पुरुषसिंह सात्यकि आगे बढ़ा।
Verse 54
प्रविष्टस्तावकान् जित्वा सूतं याहीत्यचोदयत् । भरतनन्दन! उस रफणक्षेत्रमें दुर्जय काम्बोज-सेनाको
संजय बोले—आपकी सेना में घुसकर उन्हें जीत लेने के बाद उसने सारथी को प्रेरित किया—“आगे बढ़ो!” भरतनन्दन! रण में उसका वह कर्म देखकर—जो पहले किसी और ने न किया था—सब योद्धा विस्मय में डूब गए।
Verse 55
चारणा: सहगन्धर्वा: पूजयाज्चक्रिरे भृशम् । जिसे पहले दूसरोंने नहीं किया था, समरांगणमें सात्यकिके उस पराक्रमको देखकर चारणों और ग्रन्धवोंने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।।
संजय बोले—चारणों ने गन्धर्वों सहित उस वीर का अत्यन्त सम्मान किया। रणभूमि में सात्यकि का वह अद्भुत पराक्रम देखकर—जो पहले किसी ने नहीं किया था—उन्होंने बार-बार उसकी प्रशंसा की। और जब अर्जुन के पृष्ठरक्षक सात्यकि आगे बढ़ा, तो उसे देखकर चारण हर्षित हो उठे; हे प्रजानाथ, आपके अपने सैनिकों ने भी उसकी सराहना कर उसे आदर दिया।
Verse 86
पत्त्यश्वरथनागौघै: पतितैर्विषमीकृताम् । “देखो, पाण्डवप्रवर किरीटधारी अर्जुन जिस मार्गसे गये हैं, वहाँकी भूमि धराशायी हुए पैदलों, घोड़ों, रथों और हाथियोंके समुदायसे विषम एवं दुर्लड्घ्य हो गयी है
संजय बोले—देखो, पाण्डवों में श्रेष्ठ किरीटधारी अर्जुन जिस मार्ग से गया है, वहाँ की भूमि गिरे हुए पैदल, घोड़े, रथ और हाथियों के ढेरों से विषम और दुर्दम्य हो गई है।
Verse 119
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे यवनपराजये एकोनविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के द्रोणपर्व में, जयद्रथवधपर्व के अंतर्गत, सात्यकि-प्रवेश तथा यवन-पराजय विषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 256
केषां वैवस्वतो राजा स्मरतेड्द्य महाभुज । युद्धमें काल
सूत बोले—हे महाबाहो! आज वैवस्वत राजा यम किन-किनका स्मरण कर रहे हैं? युद्ध में काल, अन्तक और यम के समान पराक्रम दिखाने वाले, बल-विक्रमसम्पन्न आप-जैसे वीर को देखकर आज कौन-से योद्धा रणभूमि छोड़कर भागेंगे? हे महाबाहो, आज राजा यम किनका नाम ले रहे हैं?
Verse 366
बल॑ वीर्य कृतज्ञत्वं मम ज्ञास्यन्ति कौरवा: । आज सहस्रों राजाओंका संहार करके मैं इन राजाओंके समाजमें महात्मा पाण्डवोंके प्रति अपने स्नेह और भक्तिका प्रदर्शन करूँगा। अब कौरवोंको मेरे बल
कौरव मेरे बल, पराक्रम और कृतज्ञता को जानेंगे। आज सहस्रों राजाओं का संहार करके मैं इन राजाओं के समाज में महात्मा पाण्डवों के प्रति अपने स्नेह और भक्ति का प्रदर्शन करूँगा। अब कौरवों को मेरे सामर्थ्य, शौर्य और कृतज्ञ निष्ठा का प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाएगा।
Verse 373
शशाड्कसंनिकाशान् वै वाजिनो व्यनुदद् भृशम् | संजय कहते हैं--राजन्! सात्यकिके ऐसा कहनेपर सारथिने चन्द्रमाके समान श्वेत वर्णवाले उन घोड़ोंको
संजय बोले—राजन्! सात्यकि के ऐसा कहने पर सारथि ने चन्द्रमा के समान श्वेत, सुशिक्षित और सुदृढ़ सवारी देने वाले उन घोड़ों को बड़े वेग से हाँका और उन्हें रण-संघर्ष के बीच धकेल दिया।
Verse 386
प्रापपन् यवनान् शीघ्र॑ं मन:ःपवनरंहस: । मन और वायुके समान वेगवाले उन उत्तम घोड़ोंने आकाशको पीते हुए-से चलकर युयुधानको शीघ्र ही यवनोंके पास पहुँचा दिया
संजय बोले—मन और वायु के समान वेगवाले वे उत्तम घोड़े मानो आकाश को पीते हुए-से दौड़े और युयुधान को शीघ्र ही यवनों के पास पहुँचा दिया।
Verse 466
कृतवांस्तत्र शैनेय: क्षपयंस्तावकं॑ बलम् | प्रजानाथ! सात्यकिने आपकी सेनाका संहार करते हुए वहाँकी भूमिको सहस्रों काम्बोजों
संजय बोले—प्रजानाथ! वहाँ शैनेय सात्यकि आपकी सेना का संहार करते हुए सहस्रों काम्बोजों, शकों, शबरों, किरातों और बर्बरों की लाशों से भूमि को पाटकर उसे अगम्य बना चुका था; वहाँ मांस और रक्त की कीच जम गई थी।
Verse 476
दीर्घकूचैर्मही कीर्णा विबर्हैरण्डजैरिव । उन लुटेरोंके लंबी दाढ़ीवाले शिरस्त्राणयुक्त मुण्डित मस्तकोंसे आच्छादित हुई रणभूमि पंखहीन पक्षियोंसे व्याप्त हुई-सी जान पड़ती थी
संजय बोले—लंबी कलगीवाले शिरस्त्राणों और मुण्डित मस्तकों से रणभूमि ऐसी कीर्ण हो गई थी कि वह मानो पंखहीन पक्षियों से व्याप्त धरती-सी जान पड़ती थी।
Verse 513
जवमुनत्तममास्थाय सर्वतः प्राद्रवन् भयात् । महाराज! थोड़े-से यवन शेष रह गये थे
संजय बोले—महाराज! अत्यन्त वेग का आश्रय लेकर वे भय से चारों ओर भागे। थोड़े-से यवन ही शेष रह गए थे, जिन्होंने बड़ी कठिनाई से प्राण बचाए थे; अपने दल से बिछुड़कर वे अचेत-से हो रहे थे। रणभूमि में युयुधान ने उन सब कवचधारी यवनों को जीत लिया था। वे हाथों और कोड़ों से अपने घोड़ों को पीटते हुए, उत्तम वेग का सहारा लेकर, आतंकित होकर चारों ओर भाग निकले।
Verse 3936
बहवो लघुहस्ताश्न॒ शरवर्षरवाकिरन् । युद्धमें कभी पीछे न हटनेवाले सात्यकिको अपनी सेनाओंके बीच पाकर शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले बहुतेरे यवनोंने उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी
संजय बोले—बहुतेरे लघुहस्त योद्धा बाण-वर्षा के गर्जन से रणभूमि भरने लगे। युद्ध में कभी पीछे न हटने वाले सात्यकि को अपनी सेना के बीच खड़ा देखकर अनेक यवनों ने शीघ्रता से उस पर शरों की वर्षा आरम्भ कर दी।
The dilemma concerns achieving a vow-bound objective under a lethal constraint: Arjuna must complete the act before sunset yet avoid triggering the curse that would punish the agent if Jayadratha’s head touches the ground.
The chapter emphasizes disciplined agency: pledged responsibility requires not only intent but precise knowledge of constraints, counsel, and method—showing how outcomes in the epic are shaped by both resolve and technical discernment.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary functions narratively through communal astonishment and Kṛṣṇa’s commendation, marking the episode as exemplary of vow-fulfillment and constraint-aware action within the war’s ethical frame.
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