Mahabharata Adhyaya 116
Drona ParvaAdhyaya 116107 Versesकौरव-पक्ष में क्षणिक निराशा/अव्यवस्था, पर कृतवर्मा के प्रतिरोध से टकराव फिर तीव्र होता है।

Adhyaya 116

Śaineya’s Breakthrough and Reunion with Arjuna (शैनेयस्य समागमः)

Upa-parva: Jayadratha-vadha-anuyāna (Relief operations and the approach to the Jayadratha objective)

Saṃjaya reports that Sātyaki (Śaineya/Yuyudhāna), acting with urgency for Arjuna’s welfare, advances through congested combat. Trigarta archers initially contain him with chariot barriers and dense arrow volleys, yet Sātyaki defeats a large number of opponents and moves with striking speed across directions, described as almost dance-like mobility amid chariots. Additional groups—Śūrasenas and later Kaliṅgas—attempt to restrain him with sustained missile pressure, but he breaks through and reaches Arjuna. Kṛṣṇa identifies Sātyaki’s approach to Arjuna and praises his loyalty, skill, and the severity of his prior engagements, enumerating the adversaries he has harried. Arjuna, however, responds without elation: he worries about the unknown condition of Yudhiṣṭhira, since Sātyaki was a principal protector. Arjuna further notes the time pressure to neutralize Jayadratha, Sātyaki’s fatigue, and the looming threat posed by Bhūriśravas and others, framing the reunion as strategically complex rather than purely celebratory.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र, संजय से युद्धभूमि का हाल पूछते हुए, अपनी ही सेना की ‘सदा पूजित’ और सुगठित व्यवस्था का स्मरण करता है—और उसी स्मरण में भय की दरारें उभर आती हैं। → संजय रणक्षेत्र का दृश्य रखता है: सहस्रों रथ, अश्व और पदाति व्यग्र होकर इधर-उधर धावमान हैं; यह भगदड़ विजय-आशा के क्षय और कौरव-पक्ष के भीतर फैलती निराशा का संकेत बनती है। → भीमसेन अपनी भुजाओं से मुक्त की हुई सर्प-सदृश भयानक शक्ति/शक्ति-आयुध को कृतवर्मा के रथ की ओर फेंकता है; वह दिशाओं को प्रकाशित करती हुई उल्का की तरह आकाश से गिरती प्रतीत होती है और युद्ध का केंद्र एक ही प्रहार पर सिमट आता है। → प्रहार के बाद रणभूमि में क्षणिक ठहराव और पुनर्संयोजन होता है; कौरव-पक्ष अपने योद्धाओं को संभालने का प्रयास करता है, और शिखण्डी को विषण्ण देखकर ‘हार्दिक्य’ (कृतवर्मा) सहित सैनिक उसका सत्कार/संरक्षण करते हैं—मानो मनोबल को वस्त्रों की तरह झाड़-पोंछ कर फिर पहनाना हो। → महाधनुर्धर महारथी (कृतवर्मा/प्रतिद्वन्द्वी) क्रोध में हँसते हुए तीन-तीन बाणों से भीम को गहरी चोट पहुँचाता है—अगला क्षण पूछता है: क्या भीम इस प्रतिघात को और उग्र प्रतिशोध में बदल देगा?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६८ श्लोक हैं) ऑपन-माज बछ। जज: चतुर्दशाधिकशततमो< ध्याय: धृतराष्ट्रका विषादयुक्त वचन

धृतराष्ट्र ने कहा— संजय! मेरी सेना अनेक गुणों से सम्पन्न है और बड़ी संख्या में जुटाई गई है। यह पाण्डवों की सेना की अपेक्षा अधिक प्रबल है। इसकी व्यूह-रचना भी शास्त्रीय विधि के अनुसार यथोचित की जा रही है; इस प्रकार योद्धाओं का विशाल समूह एकत्र हो गया है।

Verse 2

नित्यं पूजितमस्माभिरभिकामं च नः सदा । प्रौढमत्यद्भुताकारं पुरस्ताद्‌ दृष्टविक्रमम्‌

संजय ने कहा— हमने सदा अपनी सेना का आदर-सत्कार किया है और वह भी सदा से हमारे प्रति अनुरक्त रही है। हमारे सैनिक युद्ध-कला में प्रौढ़ हैं; उनका गठन और रूप अत्यन्त अद्भुत है। इस सेना में वे ही पुरुष रखे गए हैं जिनका पराक्रम अग्रिम पंक्ति में पहले ही देखा जा चुका है।

Verse 3

नातिवृद्धमबालं च नाकृशं नातिपीवरम्‌ | लघुवृत्तायतप्रायं सारगात्रमनामयम्‌

संजय ने कहा— इसमें न कोई अत्यधिक वृद्ध है, न कोई बालक; न कोई बहुत दुबला है, न बहुत मोटा। उनके शरीर हलके, सुडौल और प्रायः दीर्घकाय हैं; अंग-प्रत्यंग सबल हैं, और सभी योद्धा निरोग—युद्ध के योग्य स्वस्थ हैं।

Verse 4

आत्तसंनाहसंछन्न॑ बहुशस्त्रपरिच्छदम्‌ । शस्त्रग्रहणविद्यासु बह्मीषु परिनिष्ठितम्‌

संजय ने कहा— वे सब कसे हुए कवच से आच्छादित और पूर्णतः सन्नद्ध हैं; उनके पास शस्त्रों और उपकरणों की बहुतायत है। शस्त्र-ग्रहण की अनेक विद्याओं में वे दृढ़तापूर्वक प्रशिक्षित हैं।

Verse 5

आरोहे पर्यवस्कन्दे सरणे सान्तरप्लुते । सम्यक्प्रहरणे याने व्यपयाने च कोविदम्‌,चढ़ने, उतरने, फैलने, कूद-कूदकर चलने, भली-भाँति प्रहार करने, युद्धके लिये जाने और अवसर देखकर पलायन करनेमें भी कुशल हैं

संजय ने कहा— वे चढ़ने-उतरने, दौड़ते हुए उतर पड़ने, कठिन भूमि में कूद-कूदकर आगे बढ़ने, युक्ति से सरकते-फैलते चलने, ठीक-ठीक प्रहार करने, युद्ध के लिए आगे बढ़ने और अवसर देखकर पीछे हटने—इन सब में निपुण हैं।

Verse 6

नागेष्वश्वेषु बहुशो रथेषु च परीक्षितम्‌ परीक्ष्य च यथान्यायं वेतनेनोपपादितम्‌

संजय बोले—हाथियों, घोड़ों और रथों पर चढ़कर युद्ध करने की कला में इन लोगों की बार-बार परीक्षा ली गई है; और परीक्षा के बाद उन्हें न्यायानुसार यथायोग्य वेतन देकर संतुष्ट किया गया है।

Verse 7

न गोष्ठया नोपकारेण न सम्बन्धनिमित्तत: । नानाहूत॑ नाप्यभूतं मम सैन्यं बभूव ह

संजय बोले—न तो गोष्ठी के दबाव से बहकाकर, न उपकार करके, और न ही किसी संबंध के कारण मेरी सेना बनी है। इनमें कोई ऐसा नहीं जिसे बुलाया न गया हो, या जिसे पकड़कर बेगार में लाया गया हो। मेरी सारी सेना की यही स्थिति है।

Verse 8

कुलीनार्यजनोपेतं तुष्टपुष्टमनुद्धतम्‌ । कृतमानोपचारं च यशस्वि च मनस्वि च

संजय बोले—वह कुलीन और आर्यजनों से घिरा हुआ था; तृप्त और पुष्ट था, परंतु उद्धत नहीं। उसे पहले ही मान-सम्मान और शिष्टाचार प्राप्त हो चुका था; वह यशस्वी और उच्च मनोबल वाला था।

Verse 9

इसमें सभी लोग कुलीन, श्रेष्ठ, हृष्ट-पुष्ट, उद्ण्डताशून्य, पहलेसे सम्मानित, यशस्वी तथा मनस्वी हैं ।।

संजय बोले—वहाँ के सभी लोग कुलीन और श्रेष्ठ हैं—हृष्ट-पुष्ट हैं, अनुशासनहीन नहीं; पहले से सम्मानित, यशस्वी और मनस्वी हैं। और तात! हमारे मन्त्री तथा अन्य बहुत-से प्रमुख अधिकारी—जो पुण्यकर्मा, लोकपालों के समान पराक्रमी और मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं—सदा इस सेना का पालन और संचालन करते आए हैं।

Verse 10

बहुभि: पार्थिवैर्गुप्तमस्मत्प्रियचिकीर्षुभि: । अस्मानभिसृतै: कामात्‌ सबलै: सपदानुगै:

संजय बोले—अनेक राजाओं ने, जो हमारा प्रिय करने को उत्सुक थे, इस सेना की रक्षा की है। वे केवल अपनी इच्छा से हमारी ओर बढ़े—अपनी-अपनी सेनाओं सहित और अपने अनुयायियों को साथ लिए हुए।

Verse 11

हमारा प्रिय करनेकी इच्छावाले तथा सेना और अनुचरोंसहित स्वेच्छासे ही हमारे पक्षमें आये हुए बहुत-से भूपालगण भी इसकी रक्षामें तत्पर रहते हैं ।।

संजय ने कहा—हमारा प्रिय करने की इच्छा रखने वाले बहुत-से भूपाल भी अपनी-अपनी सेनाओं और अनुचरों सहित स्वेच्छा से हमारे पक्ष में आ गए हैं और उसकी रक्षा में तत्पर खड़े हैं। हमारी यह सेना उस महासागर के समान है जो चारों दिशाओं से बहकर आने वाली नदियों से परिपूर्ण हो—गहरी और अपार। यह पंखरहित होते हुए भी पक्षियों-सी तीव्र गति वाले रथों और घोड़ों से भरी हुई है, और अजेय वेग से उमड़ रही है।

Verse 12

प्रभिन्नकरटैश्वैव द्विरदैरावृतं महत्‌ । यदहन्यत मे सैन्यं किमन्यद्‌ भागधेयत:

संजय ने कहा—गण्डस्थल से मद बहाने वाले महाबली गजराजों से घिरी हुई मेरी यह विशाल सेना यदि शत्रुओं द्वारा काट डाली गई है, तो भाग्य के सिवा इसका और क्या कारण हो सकता है?

Verse 13

योधाक्षय्यजलं भीम॑ वाहनोर्मितरज्धिणम्‌ । क्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्रासझषाकुलम्‌

संजय ने कहा—हे राजन्! मेरी सेना भयंकर समुद्र के समान प्रतीत होती है। योद्धा ही इसके अक्षय जल हैं और वाहन इसकी तरंगमालाएँ हैं। क्षेपणीय अस्त्र, खड्ग, गदा, शक्ति, बाण और प्रास आदि इसमें मछलियों के समान भरे हुए हैं।

Verse 14

ध्वजभूषणसम्बाधरत्नोपलसुसंचितम्‌ । वाहनैरभिधावद्धिर्वायुवेगविकम्पितम्‌

ध्वजों और आभूषणों की भीड़ से वह सघन था और रत्न-उपलों से समृद्ध होकर संचित-सा दीखता था। दौड़ते हुए वाहनों के कारण वायु-वेग से वह कम्पित होता, थरथराता प्रतीत होता था।

Verse 15

द्रोणगम्भीरपातालं कृतवर्ममहाह्दम्‌ । जलसंधमटहाग्राहं कर्णचन्द्रोदयोद्धतम्‌

द्रोणाचार्य उसकी पाताल तक फैली हुई गहराई के समान हैं; कृतवर्मा उसमें महान् ह्रद के समान है; जलसंध (जयद्रथ) उसमें विशाल ग्राह के समान है; और कर्णरूपी चन्द्रमा के उदय से वह सदा उच्छ्वसित होकर उद्वेलित रहता है।

Verse 16

गते सैन्यार्णवं भित्त्वा तरसा पाण्डवर्षभे । संजयैकरथेनैव युयुधाने च मामकम्‌

संजय बोले—मेरे सैन्यरूपी महासागर को वेग से भेदकर जब पाण्डवश्रेष्ठ सव्यसाची अर्जुन और सात्वतवंशी उदार महारथी युयुधान मानो एक ही रथ के सहारे भीतर घुस आए, तब, हे संजय, मुझे अपनी सेना के शेष रहने की कोई आशा नहीं दिखती।

Verse 17

तत्र शेषं न पश्यामि प्रविष्टे सव्यसाचिनि । सात्वते च रथोदारे मम सैन्यस्य संजय

हे संजय! सव्यसाची अर्जुन के भीतर घुस आने पर और उदार रथवाले सात्वतवीर के भी प्रवेश कर जाने पर, मैं अपनी सेना का कोई शेष नहीं देखता।

Verse 18

तौ तत्र समतिक्रान्तौ दृष्टवातीव तरस्विनौ । सिन्धुराजं तु सम्प्रेक्ष्य गाण्डीवस्येषुगोचरे

वहाँ उन दोनों अत्यन्त वेगशाली वीरों को सबका उल्लंघन करके घुसा हुआ देखकर और सिन्धुराज जयद्रथ को गाण्डीव से छूटे बाणों की पहुँच के भीतर उपस्थित पाकर—

Verse 19

कि नु वा कुरव: कृत्यं विदधु: कालचोदिता: । दारुणैकायने काले कथं वा प्रतिपेदिरे

काल से प्रेरित कौरवों ने वहाँ कौन-सा कार्य किया? उस दारुण एकमुखी संहार-काल में, जहाँ मृत्यु के सिवा दूसरी गति न थी, उन्होंने कर्तव्य का निश्चय कैसे किया?

Verse 20

ग्रस्तान्‌ हि कौरवान्‌ मन्ये मृत्युना तात संगतान्‌ । विक्रमो5पि रणे तेषां न तथा दृश्यते हि वै

तात! मैं रणभूमि में एकत्र हुए कौरवों को मानो मृत्यु द्वारा ग्रस्त ही मानता हूँ; क्योंकि युद्ध में उनका पराक्रम भी पहले जैसा नहीं दिखायी देता।

Verse 21

अक्षतौ संयुगे तत्र प्रविष्टी कृष्णपाण्डवौ । न च वारयिता कश्चित्‌ तयोरस्तीह संजय

संजय बोले—उस घोर संग्राम में श्रीकृष्ण और पाण्डव अर्जुन बिना किसी क्षति के हमारी सेना के भीतर घुस गए; और यहाँ, संजय, उन दोनों को रोकने वाला एक भी वीर सामने न आया।

Verse 22

भृताश्न बहवो योधा: परीक्ष्यैव महारथा: । वेतनेन यथायोगं प्रियवादेन चापरे

संजय बोले—बहुत-से महारथी योद्धाओं को हमने परखकर ही सेवा में लिया है; और अन्य अनेक को यथायोग्य वेतन देकर तथा मधुर, सम्मानपूर्ण वचन कहकर आदर दिया है।

Verse 23

असत्कारभृतस्तात मम सैन्ये न विद्यते । कर्मणा हानुरूपेण लभ्यते भक्तवेतनम्‌,तात! मेरी सेनामें कोई भी ऐसा नहीं है, जिसे अनादरपूर्वक रखा गया हो। सबको उनके कार्यके अनुरूप ही भोजन और वेतन प्राप्त होता है

संजय बोले—तात, मेरी सेना में कोई भी ऐसा नहीं है जिसे अनादर के साथ रखा गया हो; प्रत्येक को उसके कर्म के अनुरूप ही भोजन-भत्ता और वेतन मिलता है।

Verse 24

न चायोधो5भवत्‌ कश्चिन्मम सैन्ये तु संजय । अल्पदानभृतस्तात तथा चाभूतको नर:,तात संजय! मेरी सेनामें ऐसा एक भी योद्धा नहीं रहा होगा जिसे थोड़ा वेतन दिया जाता हो अथवा बिना वेतनके ही रखा गया हो

संजय बोले—तात संजय, मेरी सेना में ऐसा एक भी योद्धा नहीं था जो बिना वेतन के हो; न कोई अल्प वेतन पर पाला गया, न ही किसी को बिना मजदूरी के रखा गया।

Verse 25

पूजितो हि यथाशक्त्या दानमानासनैर्मया । तथा पुन्रैश्न मे तात ज्ञातिभिश्न सबान्धवै:

संजय बोले—तात, मैंने यथाशक्ति दान, मान और आसन आदि देकर सबका सम्मान किया है; और वैसे ही मेरे पुत्रों ने भी, कुटुम्बियों तथा समस्त बन्धु-बान्धवों सहित, उन योद्धाओं का समुचित सत्कार किया है।

Verse 26

तेच प्राप्यैव संग्रामे निर्जिता: सव्यसाचिना । शैनेयेन परामृष्टा: किमन्यद्‌ भागधेयत:

वे संग्रामभूमि में पहुँचते ही सव्यसाची अर्जुन से पराजित हो गए और शैनेय सात्यकि ने भी उन्हें कुचल डाला। इसे भाग्य के विधान के सिवा और क्या कहा जा सकता है?

Verse 27

रक्ष्यते यश्ष संग्रामे ये च संजय रक्षिण: । एक: साधारण: पन्था रक्ष्यस्य सह रक्षिभि:

संजय! संग्राम में जिसकी रक्षा की जाती है और जो उसके रक्षक हैं—रक्षणीय पुरुष के लिए रक्षकों सहित अब एक ही साधारण मार्ग रह जाता है: वे साथ ही टिकें या साथ ही गिरें।

Verse 28

अर्जुन समरे दृष्टवा सैन्धवस्याग्रत: स्थितम्‌ । पुत्रो मम भृशं मूढ: कि कार्य प्रत्यपद्यत,अर्जुनको समरांगणमें सिन्धुराजके सामने खड़ा देख अत्यन्त मोहग्रस्त हुए मेरे पुत्रने कौन-सा कर्तव्य निश्चित किया?

समर में अर्जुन को सैन्धव के सामने खड़ा देखकर मेरा पुत्र अत्यन्त मोहग्रस्त हो गया; उसने कौन-सा कर्तव्य निश्चित किया?

Verse 29

सात्यकिं च रणे दृष्टवा प्रविशन्‍्तम भीतवत्‌ । कि नु दुर्योधन: कृत्यं प्राप्तकालममन्यत,सात्यकिको रफक्षेत्रमें निर्भय-सा प्रवेश करते देख दुर्योधनने उस समयके लिये कौन- सा कर्तव्य उचित माना?

रणक्षेत्र में सात्यकि को निर्भय-सा प्रवेश करते देखकर उस समय दुर्योधन ने कौन-सा कर्तव्य उचित माना?

Verse 30

सर्वशस्त्रातिगौ सेनां प्रविष्टी रथिसत्तमौ । दृष्टवा कां वै धृतिं युद्धे प्रत्यपद्यन्त मामका:

सम्पूर्ण शस्त्रों की पहुँच से परे, रथियों में श्रेष्ठ सात्यकि और अर्जुन जब मेरी सेना में प्रविष्ट हो गए, तब उन्हें देखकर मेरे पक्ष के लोगों ने युद्ध में कैसी धैर्य-धारणा की?

Verse 31

दृष्टवा कृष्णं तु दाशार्हमर्जुनार्थे व्यवस्थितम्‌ । शिनीनामृषभं चैव मन्ये शोचन्ति पुत्रका:

अर्जुन के हित में रथ पर स्थित दाशार्ह-वीर श्रीकृष्ण को और शिनियों में वृषभ सात्यकि को देखकर, मैं मानता हूँ कि मेरे पुत्र शोक में डूब गए होंगे।

Verse 32

दृष्टवा सेनां व्यतिक्रान्तां सात्वतेनार्जुनेन च । पलायमानांश्व कुरून्‌ मन्ये शोचन्ति पुत्रका:

सात्यकि और अर्जुन को सेना को लाँघकर आगे बढ़ते तथा कौरवों को रणभूमि से भागते देखकर, मैं मानता हूँ कि मेरे पुत्र शोक में डूब गए होंगे।

Verse 33

विद्रुतान्‌ रथिनो दृष्टवा निरुत्साहान्‌ द्विषज्जये । पलायनकृतोत्साहान्‌ मन्ये शोचन्ति पुत्रका:

शत्रु-विजय के लिए उत्साहहीन होकर अपने रथियों को भागते, और भागने में ही पराक्रम दिखाते देखकर, मैं मानता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे होंगे।

Verse 34

शून्यान्‌ कृतान्‌ रथोपस्थान्‌ सात्वतेनार्जुनेन च । हतांश्व योधान्‌ संदृश्य मन्ये शोचन्ति पुत्रका:

सात्यकि और अर्जुन द्वारा रथों की बैठकें सूनी कर दी गईं और योद्धा मारे गए—यह देखकर मैं मानता हूँ कि मेरे पुत्र अत्यन्त दुःखी हो गए होंगे।

Verse 35

व्यश्वनागरथान्‌ दृष्टवा तत्र वीरान्‌ सहस्रश: । धावमानान्‌ रणे व्यग्रान्‌ मन्‍्ये शोचन्ति पुत्रका:

वहाँ सहस्रों वीरों को घोड़े, हाथी और रथ से रहित होकर, रणभूमि में व्याकुलता से दौड़ते देखकर, मैं मानता हूँ कि मेरे पुत्र शोकमग्न हो गए होंगे।

Verse 36

महानागान्‌ विद्रवतो दृष्टवार्जुनशराहतान्‌ । पतितान्‌ पततक्चान्यान्‌ मन्ये शोचन्ति पुत्रका:

संजय बोले—अर्जुन के बाणों से आहत होकर बड़े-बड़े गजराजों को भागते, गिरते और गिरे हुए देखकर मैं समझता हूँ कि आपके पुत्र शोक कर रहे होंगे।

Verse 37

विहीनांश्व॒ कृतानश्चान्‌ विरथांश्व कृतान्‌ नरान्‌ । तत्र सात्यकिपार्थाभ्यां मन्ये शोचन्ति पुत्रका:

संजय बोले—वहाँ सात्यकि और पार्थ (अर्जुन) ने घोड़ों को सवारों से हीन कर दिया और योद्धाओं को रथविहीन कर दिया है। यह देखकर-सुनकर मैं मानता हूँ कि आपके पुत्र शोक में डूब रहे होंगे।

Verse 38

हयौघान्‌ निहतान्‌ दृष्टवा द्रवमाणांस्ततस्तत: । रणे माधवपार्थाभ्यां मन्ये शोचन्ति पुत्रका:

संजय बोले—रणक्षेत्र में माधव और पार्थ द्वारा मारे गये तथा इधर-उधर भागते हुए अश्वसमूहों को देखकर मैं मानता हूँ कि आपके पुत्र शोकदग्ध हो रहे होंगे।

Verse 39

पत्तिसंघान्‌ रणे दृष्टवा धावमानांश्व सर्वश: । निराशा विजये सर्वे मन्ये शोचन्ति पुत्रका:,पैदल सिपाहियोंको रणक्षेत्रमें सब ओर भागते देख मैं समझता हूँ, मेरे सभी पुत्र विजयसे निराश हो शोक कर रहे होंगे

संजय बोले—रणक्षेत्र में पैदल सिपाहियों के दलों को सब ओर भागते देख मैं समझता हूँ कि आपके सभी पुत्र विजय से निराश होकर शोक कर रहे होंगे।

Verse 40

द्रोणस्प समतिक्रान्तावनीकमपराजितौ । क्षणेन दृष्टवा तौ वीरौ मन्ये शोचन्ति पुत्रका:

संजय बोले—किसी से पराजित न होने वाले उन दोनों वीरों—अर्जुन और सात्यकि—को क्षणभर में द्रोणाचार्य की अजेय सेना-व्यवस्था का उल्लंघन करते देखकर मैं मानता हूँ कि आपके पुत्र शोकाकुल हो गये होंगे।

Verse 41

सम्मूढो 5स्मि भृशं तात श्रुत्वा कृष्णधनंजयौ । प्रविष्टी मामकं सैन्यं सात्वतेन सहाच्युतौ

संजय बोले—तात! सात्यकिसहित श्रीकृष्ण और धनंजय (अर्जुन) के हमारी सेना में प्रविष्ट होने का समाचार सुनकर मैं अत्यन्त मोहग्रस्त हो गया हूँ; वे अच्युत हैं, जो धर्म-मर्यादा से कभी च्युत नहीं होते।

Verse 42

तस्मिन्‌ प्रविष्टे पृतनां शिनीनां प्रवरे रथे । भोजानीकं व्यतिक्रान्ते किमकुर्वत कौरवा:,शिनिप्रवर महारथी सात्यकि जब कृतवर्माकी सेनाको लाँचधकर कौरवी सेनामें प्रविष्ट हो गये तब कौरवोंने क्या किया?

संजय बोले—शिनिवंश के श्रेष्ठ वीर सात्यकि उत्तम रथ पर आरूढ़ होकर भोजों की सेना-व्यूह को लाँघकर कौरवों की पृतना में प्रविष्ट हो गया; तब कौरवों ने क्या किया?

Verse 43

तथा द्रोणेन समरे निगृहीतेषु पाण्डुषु । कथें युद्धम भूत्‌ तत्र तनन्‍्ममाचक्ष्व संजय

संजय! जब द्रोणाचार्य ने समरभूमि में पूर्वोक्त प्रकार से पाण्डवों को रोककर दबा दिया, तब वहाँ युद्ध किस प्रकार हुआ? यह सब मुझे बताओ।

Verse 44

द्रोणो हि बलवान श्रेष्ठ: कृतास्त्रो युद्धदुर्मद: । पज्चालास्ते महेष्वासं प्रत्यविध्यन्‌ कथं रणे

संजय बोले—द्रोण तो बलवान, श्रेष्ठ, अस्त्रविद्या में पूर्ण निपुण और युद्धोन्मत्त हैं; फिर रण में उन पाञ्चालों ने उस महाधनुर्धर को किस प्रकार प्रत्याघात किया?

Verse 45

बद्धवैरास्ततो द्रोणे धनंजयजयैषिण: । द्रोणाचार्य अस्त्रविद्यामें निपुण, युद्धमें उन्‍्मत्त होकर लड़नेवाले, बलवान एवं श्रेष्ठ वीर हैं। पांचाल-सैनिकोंने उस समय रणक्षेत्रमें महाधनुर्धर द्रोणको किस प्रकार घायल किया? क्योंकि वे द्रोणाचार्यसे वैर बाँधकर अर्जुनकी विजयकी अभिलाषा रखते थे || ४४ $ ।।

तब द्रोण के प्रति वैर बाँधकर और धनंजय (अर्जुन) की विजय की अभिलाषा रखते हुए पाञ्चाल रण में और भी उत्कट होकर भिड़ गए। उन सबके बीच भारद्वाजपुत्र द्रोण दृढ़-वैर वाले महान् महारथी के रूप में डटे रहे।

Verse 46

अर्जुनश्वापि यच्चक्रे सिन्धुराजवध॑ प्रति । तन्मे सर्व समाचक्ष्व कुशलो हासि संजय

धृतराष्ट्र बोले—सिन्धुराज (जयद्रथ) के वध के उद्देश्य से अर्जुन ने जो-जो किया, वह सब मुझे विस्तार से बताओ। संजय, सब कुछ कहो—क्या तुम कुशल से हो?

Verse 47

संजय! भरद्वाजके पुत्र महारथी अश्वत्थामा भी पांचालोंसे दृढ़तापूर्वक वैर बाँधे हुए थे। अर्जुनने सिन्धुराज जयद्रथका वध करनेके लिये जो-जो उपाय किया, वह सब मुझसे कहो; क्योंकि तुम कथा कहनेमें कुशल हो ।।

संजय बोले—भरतश्रेष्ठ! यह विपत्ति आपके अपने ही अपराध से उत्पन्न हुई है। वीर! इसे पाकर आप साधारण मनुष्यों की भाँति शोक करने योग्य नहीं हैं।

Verse 48

पुरा यदुच्यसे प्राज्जैः सुहृद्धिर्विदुरादिभि: । मा हार्षी: पाण्डवान्‌ राजन्निति तन्न त्वया श्रुतम्‌

संजय बोले—पहले जब विदुर आदि बुद्धिमान् हितैषी सुहृदों ने आपसे कहा था—‘राजन्! पाण्डवों के साथ अन्याय मत कीजिये’—तब आपने उनकी बात नहीं सुनी।

Verse 49

सुहृदां हितकामानां वाक्‍्यं यो न शूणोति ह । स महद्‌ व्यसन प्राप्प शोचते वै यथा भवान्‌,जो हितैषी सुहृदोंकी बात नहीं सुनता है, वह भारी संकटमें पड़कर आपके ही समान शोक करता है

संजय बोले—जो हित चाहने वाले सुहृदों की बात नहीं सुनता, वह बड़े संकट में पड़कर आपके ही समान शोक करता है।

Verse 50

याचितो<सि पुरा राजन्‌ दाशार्हैण शमं प्रति । नच तं लब्धवान्‌ काम॑ त्वत्त: कृष्णो महायशा:

संजय बोले—राजन्! पहले दाशार्हवंशी महायशस्वी श्रीकृष्ण ने आपसे शान्ति के लिये प्रार्थना की थी; परन्तु आपकी ओर से उनकी वह इच्छा पूरी न हुई।

Verse 51

तव निर्गुणतां ज्ञात्वा पक्षपातं सुतेषु च । द्वैधीभावं तथा धर्मे पाण्डवेषु च मत्सरम्‌

संजय बोले—नृपश्रेष्ठ! जब सम्पूर्ण लोकों के तत्त्वज्ञ और सर्वलोकेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने आपकी सद्गुणहीनता, अपने पुत्रों के प्रति पक्षपात, धर्म के विषय में आपकी दुविधा और पाण्डवों के प्रति आपकी ईर्ष्या जान ली, तब उन्होंने कौरवों और पाण्डवों के बीच उस महान् युद्ध को घटित होने दिया।

Verse 52

तव जिद्दामभिप्रायं विदित्वा पाण्डवान्‌ प्रति | आर्तप्रलापांश्व बहूनू मनुजाधिपसत्तम

संजय बोले—मनुजाधिपसत्तम! पाण्डवों के प्रति आपके हठी अभिप्राय और आपके बहुत-से आर्त, आत्मदीन वचनों को जानकर, सर्वलोकतत्त्वज्ञ और सर्वलोकेश्वर श्रीकृष्ण ने यह भी पहचान लिया कि आप सर्वथा गुणहीन हैं—पुत्रों के प्रति पक्षपाती, धर्म के विषय में द्विधाग्रस्त, पाण्डवों के प्रति ईर्ष्यालु, उनके विरुद्ध कुटिल योजनाएँ रचने वाले और व्याकुल मनुष्य की भाँति व्यर्थ बहुत बोलने वाले। इसलिए उन्होंने कौरव-पाण्डवों के महान् युद्ध को घटित होने दिया।

Verse 53

सर्वलोकस्य तत्त्वज्ञ: सर्वलोकेश्वर: प्रभु: वासुदेवस्ततो युद्ध कुरूणामकरोन्महत्‌

संजय बोले—नृपश्रेष्ठ! तब समस्त लोकों के तत्त्वज्ञ और सर्वलोकेश्वर प्रभु वासुदेव ने कुरुओं का वह महान् युद्ध घटित कराया।

Verse 54

आत्मापराधात्‌ सुमहान्‌ प्राप्तस्ते विपुल: क्षय: । नैन॑ दुर्योधने दोष कर्तुमहसि मानद,मानद! अपने ही अपराधसे आपके सामने यह महान्‌ जनसंहार प्राप्त हुआ है। आपको यह सारा दोष दुर्योधनपर नहीं मढ़ना चाहिये

संजय बोले—मानद! अपने ही अपराध से आपके सामने यह अत्यन्त महान् और व्यापक विनाश आया है। आप यह दोष दुर्योधन पर नहीं मढ़ सकते।

Verse 55

न हि ते सुकृतं किंचिदादौ मध्ये च भारत । दृश्यते पृष्ठतश्चैव त्वन्मूलो हि पराजय:,भारत! मुझे तो आगे, पीछे या बीचमें आपका कोई भी शुभ कर्म नहीं दिखायी देता। इस पराजयकी जड़ आप ही हैं

संजय बोले—भारत! मुझे न आरम्भ में, न मध्य में, न अंत में आपका कोई भी शुभ कर्म दिखाई देता है। इस पराजय की जड़ आप ही हैं।

Verse 56

तस्मादवस्थितो भूत्वा ज्ञात्वा लोकस्य निर्णयम्‌ । शृणु युद्ध यथावृत्तं घोरं देवासुरोपमम्‌

इसलिए स्थिर होकर और लोक के निश्चित स्वभाव को जानकर, देवासुर-संग्राम के समान भयंकर इस युद्ध का यथार्थ वृत्तान्त सुनो।

Verse 57

प्रविष्टे तव सैन्यं तु शैनेये सत्यविक्रमे । भीमसेनमुखा: पार्था: प्रतीयुर्वाहिनीं तव,जब सत्यपराक्रमी सात्यकि कौरव-सेनामें प्रविष्ट हो गये, तब भीमसेन आदि कुन्तीकुमारोंन आपकी विशाल वाहिनीपर आक्रमण किया

जब सत्यपराक्रमी शैनेय सात्यकि आपकी सेना में प्रविष्ट हो गया, तब भीमसेन के नेतृत्व में पार्थों ने आपकी विशाल वाहिनी पर धावा बोला।

Verse 58

आगच्छतस्तान्‌ सहसा क्रुद्धरूपान्‌ सहानुगान्‌ । दधारैको रणे पाण्डून्‌ कृतवर्मा महारथ:,सेवकोंसहित कुपित होकर सहसा आक्रमण करनेवाले उन पाण्डववीरोंको रणक्षेत्रमें एकमात्र महारथी कृतवर्माने रोका

सेवकों सहित क्रुद्ध होकर सहसा धावा बोलते उन पाण्डवों को रण में अकेले महारथी कृतवर्मा ने रोक लिया।

Verse 59

यथोद्वृत्तं वारयते वेला वै सलिलार्णवम्‌ | पाण्डुसैन्यं तथा संख्ये हार्दिक्य: समवारयत्‌

जैसे तटभूमि उफनते समुद्र के जल को रोकती है, वैसे ही संग्राम में हार्दिक्य कृतवर्मा ने पाण्डव-सेना को रोक दिया।

Verse 60

तत्राद्भुतमपश्याम हार्दिक्यस्य पराक्रमम्‌ । यदेनं सहिता: पार्था नातिचक्रमुराहवे,वहाँ हमने कृतवर्माका अद्भुत पराक्रम देखा। सारे पाण्डव एक साथ मिलकर भी समरांगणमें उसे लाँधच न सके

वहाँ हमने हार्दिक्य कृतवर्मा का अद्भुत पराक्रम देखा—सारे पार्थ एकत्र होकर भी रण में उसे लाँघ न सके।

Verse 61

ततो भीमस्टत्रिभिर्विंद्ध्वा कृतवर्माणमाशुगै: । शड्खं दध्मौ महाबाहुर्हर्षयन्‌ सर्वपाण्डवान्‌,तदनन्तर महाबाहु भीमने तीन बाणोंद्वारा कृतवर्माको घायल करके समस्त पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाते हुए शंख बजाया

तब महाबाहु भीम ने तीव्र बाणों से कृतवर्मा को तीन बार बेधकर, समस्त पाण्डवों का उत्साह बढ़ाते हुए शंखनाद किया।

Verse 62

सहदेवस्तु विंशत्या धर्मराजश्न पञ्चभि: । शतेन नकुलश्नापि हार्दिक्यं समविध्यत,सहदेवने बीस, धर्मराजने पाँच और नकुलने सौ बाणोंसे कृतवर्माको बींध डाला

सहदेव ने बीस बाणों से, धर्मराज युधिष्ठिर ने पाँच से और नकुल ने भी सौ बाणों से हार्दिक्य कृतवर्मा को बेध डाला।

Verse 63

द्रौपदेयास्त्रिसप्तत्या सप्तभिश्न घटोत्कच: । धृष्टद्युम्नस्त्रिभिश्वापि कृतवर्माणमार्दयत्‌,द्रौपदीके पुत्रोंने तिहत्तर, घटोत्कचने सात और धृष्टद्युम्नने तीन बाणोंद्वारा उसे गहरी चोट पहुँचायी

द्रौपदी के पुत्रों ने तिहत्तर बाणों से, घटोत्कच ने सात बाणों से और धृष्टद्युम्न ने तीन बाणों से कृतवर्मा को और अधिक आर्द्रित (आहत) किया।

Verse 64

विराटो द्रुपदश्चैव याज्ञसेनिश्व पञ्चभि: । शिखण्डी चैव हार्दिक्यं विद्ूध्वा पजचभिराशुगै:

विराट, द्रुपद और याज्ञसेनि ने पाँच-पाँच तीव्र बाणों से हार्दिक्य को बेधा; और शिखण्डी ने भी पाँच वेगवान बाणों से उसे विद्ध किया।

Verse 65

पुनर्विव्याध विंशत्या सायकानां हसन्निव | विराट

फिर शिखण्डी ने मानो हँसते हुए बीस बाणों से उसे पुनः बेधा। तत्पश्चात्, राजन्, कृतवर्मा ने चारों ओर से बाण चलाकर उन महारथियों में से प्रत्येक को पाँच-पाँच बाणों से विद्ध किया और भीमसेन को सात बाणों से घायल किया। फिर उसने उनके धनुष और ध्वज काटकर उन्हें रथों से पृथ्वी पर गिरा दिया।

Verse 66

एकैकं पज्चभिर्विद्ध्वा भीमं॑ विव्याध सप्तभि: । धनुर्ध्वजं चास्य तथा रथाद्‌ भूमावपातयत्‌

संजय बोले— कृतवर्मा ने उन महारथियों में से प्रत्येक को पाँच-पाँच बाणों से बींधकर भीमसेन को सात बाणों से घायल किया। फिर, राजन्, उसने तत्क्षण भीम का धनुष और ध्वज काटकर रथ से पृथ्वी पर गिरा दिया।

Verse 67

अथैनं छिन्नधन्वानं त्वरमाणो महारथ: । आजपघानोरसि क्रुद्ध: सप्तत्या निशितै: शरै:,भीमसेनका धनुष कट जानेपर महारथी कृतवर्माने कुपित हो बड़ी उतावलीके साथ सत्तर पैने बाणोंद्वारा उनकी छातीमें गहरा आघात किया

तब धनुष कट जाने से निरस्त हुए भीमसेन पर महारथी कृतवर्मा ने क्रोध में, उतावली से, सत्तर पैने बाणों द्वारा उनकी छाती में प्रहार किया।

Verse 68

स गाढविद्धो बलवान हार्दिक्यस्य शरोत्तमै: । चचाल रथमध्यस्थ: क्षितिकम्पे यथाचल:

हार्दिक्य (कृतवर्मा) के श्रेष्ठ बाणों से गहरे बींधे गए बलवान् भीमसेन रथ के भीतर बैठे-बैठे ही भूकम्प में हिलते पर्वत के समान काँपने लगे।

Verse 69

भीमसेनं तथा दृष्टवा धर्मराजपुरोगमा: । विसृजन्त: शरान्‌ राजन्‌ कृतवर्माणमार्दयन्‌,राजन! भीमसेनको वैसी अवस्थामें देखकर धर्मराज आदि महारथियोंने बाणोंकी वर्षा करके कृतवर्माको बड़ी पीड़ा दी

राजन्! भीमसेन को उस दशा में देखकर धर्मराज (युधिष्ठिर) आदि महारथियों ने बाणों की वर्षा करके कृतवर्मा को अत्यन्त पीड़ा दी।

Verse 70

त॑ं तथा कोष्ठकीकृत्य रथवंशेन मारिष । विव्यधु: सायकै्ईश्टा रक्षार्थ मारुतेर्मुधे

माननीय नरेश! हर्ष से भरे पाण्डव-योद्धाओं ने भीमसेन (मारुतिनन्दन) की रक्षा के लिए रथों की पंक्ति से कृतवर्मा को मानो कोष्ठ में बन्द-सा कर दिया और रणभूमि में उसे अपने चुने हुए बाणों का लक्ष्य बना दिया।

Verse 71

प्रतिलभ्य तत: संज्ञां भीमसेनो महाबल: । शक्ति जग्राह समरे हेमदण्डामयस्मयीम्‌,इसी बीचमें महाबली भीमसेनने सचेत होकर समरांगणमें सुवर्णमय दण्डसे विभूषित एक लोहेकी शक्ति हाथमें ले ली

तत्पश्चात् होश में आते ही महाबली भीमसेन ने रणभूमि में सुवर्णमय दण्ड से विभूषित लोहे की शक्ति हाथ में ले ली।

Verse 72

चिक्षेप च रथात्‌ तूर्ण कृतवर्मरथं प्रति । सा भीमभुजनिर्मुक्ता निर्मुक्तोरगसंनिभा

फिर उसने रथ पर से शीघ्र ही उसे कृतवर्मा के रथ की ओर फेंक दिया। भीम की भुजा से छूटी वह शक्ति केंचुली त्यागे हुए सर्प के समान वेग से जा पड़ी।

Verse 73

तामापतन्तीं सहसा युगान्ताग्निसमप्रभाम्‌

वह शक्ति सहसा टूट पड़ी—युगान्त की अग्नि के समान प्रज्वलित तेज से दीप्त।

Verse 74

द्वाभ्यां शराभ्यां हार्दिक्यो निजघान द्विधा तदा । उस समय अपने ऊपर आती हुई प्रलयकालकी अग्निके समान उस शक्तिको सहसा दो बाण मारकर कृतवर्माने उसके दो टुकड़े कर दिये | ७३ $ ।।

तब हार्दिक्य (कृतवर्मा) ने दो बाणों से उसे मारकर दो टुकड़े कर दिया। वह सुवर्ण-भूषित शक्ति कटकर भूमि पर गिर पड़ी।

Verse 75

शक्ति विनिहतां दृष्टवा भीमश्लुक्रोध वै भूशम्‌

अपनी शक्ति को नष्ट हुई देखकर भीमसेन क्रोध से उन्मत्त हो उठा। उसने भारी टंकार करने वाला दूसरा वेगशाली धनुष हाथ में लिया और कुपित होकर रणभूमि में कृतवर्मा का सामना करने बढ़ा।

Verse 76

ततोअन्यद्‌ धनुरादाय वेगवत्‌ सुमहास्वनम्‌ । भीमसेनो रणे क्रुद्धो हार्दिक्यं समवारयत्‌

तब भीमसेन ने दूसरा धनुष उठा लिया—वेगवान् और अत्यन्त भारी टंकार वाला। रणभूमि में वे क्रोध से भर उठे और हार्दिक्य कृतवर्मा का सामना कर उसे रोकने लगे।

Verse 77

अथैनं पञ्चभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे । भीमो भीमबलो राजंस्तव दुर्मन्त्रितेन च,राजन्‌! आपकी ही कुमन्त्रणासे वहाँ भयंकर बलशाली भीमसेनने कृतवर्माकी छातीमें पाँच बाण मारे

फिर भयंकर बल वाले भीम ने उसकी छाती में पाँच बाण मारे। राजन्, यह भी आपकी ही कुमंत्रणा का फल है।

Verse 78

भोजतस्तु क्षतसर्वाजड्रो भीमसेनेन मारिष | रक्ताशोक इवोत्फुल्लो व्यभ्राजत रणाजिरे

माननीय नरेश! भोजवंशी कृतवर्मा, भीमसेन के बाणों से सर्वांग क्षत-विक्षत होकर रणभूमि में रक्त से लथपथ भी लाल अशोक के खिले वृक्ष की भाँति चमक उठा।

Verse 79

ततः क्रुद्धस्त्रिभिर्बाणैर्भीमसेनं हसन्निव । अभिहत्य दृढं युद्धे तान्‌ सर्वान्‌ प्रत्यविध्यत

तब वह क्रुद्ध होकर, मानो हँसता हुआ, तीन बाणों से भीमसेन पर प्रहार कर बैठा। युद्ध में दृढ़ आघात करके उसने प्रत्युत्तर में उन सबको भी बेध दिया।

Verse 80

तेडपि त॑ प्रत्यविध्यन्त सप्तभि: सप्तभि: शरै:

वे भी प्रत्युत्तर में उसे सात-सात बाणों से बेधने लगे। तब क्रोध से भरे महारथी कृतवर्मा ने, मानो हँसते हुए, रणभूमि में एक क्षुरप्र से शिखण्डी का धनुष काट डाला।

Verse 81

शिखण्डिनस्ततः: क्रुद्धः क्षुरप्रेण महारथ: । धनुश्रिच्छेद समरे प्रहसन्निव सात्वत:

तब क्रोध से भरे महारथी कृतवर्मा ने रणभूमि में उपहास-सा हँसते हुए क्षुरप्र (तीक्ष्ण) बाण से शिखण्डी का धनुष काट डाला।

Verse 82

शिखण्डी तु ततः क्रुद्धश्छिन्ने धनुषि सत्वर: | असिं जग्राह समरे शतचन्द्रं च भास्वरम्‌

धनुष कटते ही शिखण्डी क्रुद्ध हो उठा और तुरंत रणभूमि में तलवार तथा सौ चन्द्र-चिह्नों वाली चमकीली ढाल उठा ली।

Verse 83

भ्रामयित्वा महच्चर्म चामीकरविभूषितम्‌ । तमसिं प्रेषयामास कृतवर्मरथं प्रति,उसने स्वर्णभूषित विशाल ढालको घुमाकर कृतवर्मके रथपर वह तलवार दे मारी

उसने स्वर्ण-विभूषित विशाल ढाल को घुमाकर कृतवर्मा के रथ की ओर अपनी तलवार दे मारी।

Verse 84

स तस्य सशरं चापं छित्त्वा राजन्‌ महानसि: । अभ्यगाद्‌ धरणीं राजंश्ष्युतं ज्योतिरिवाम्बरात्‌,राजन! वह महान्‌ खड्ग कृतवर्माके बाणसहित धनुषको काटकर आकाशशसे टूटे हुए तारेके समान धरतीमें समा गया

राजन्! वह महान् खड्ग बाणों सहित कृतवर्मा के धनुष को काटकर, आकाश से टूटे तारे की भाँति धरती पर जा गिरा।

Verse 85

एतस्मिन्नेव काले तु त्वरमाणं महारथा: । विव्यधु: सायकैर्गाढं कृतवर्माणमाहवे,इसी समय पाण्डव महारथियोंने युद्धमें जल्दी-जल्दी हाथ चलानेवाले कृतवर्माको अपने बाणोंद्वारा भारी चोट पहुँचायी

उसी समय युद्ध में वेग से बढ़ते कृतवर्मा को पाण्डवों के महारथियों ने बाणों की वर्षा से बुरी तरह घायल कर दिया।

Verse 86

अथान्यद्‌ धनुरादाय त्यक्त्वा तच्च महद्‌ धनु: । विशीर्ण भरतश्रेष्ठ: हार्दिक्य: परवीरहा

तदनन्तर, भरतश्रेष्ठ! शत्रुवीरों का संहार करने वाले हार्दिक्य कृतवर्मा ने टूटे हुए उस विशाल धनुष को त्यागकर दूसरा धनुष हाथ में ले लिया। फिर युद्ध के प्रवाह में उसने पाण्डवों को तीन-तीन बाणों से घायल किया और शिखण्डी को भी अनेक बाणों से बेध डाला।

Verse 87

विव्याध पाण्डवान्‌ युद्धे त्रिभिस्त्रिभिरजिद्वागै: । शिखण्डिनं च विव्याध त्रिभि: पठचभिरेव च

संजय बोले—भरतश्रेष्ठ! कृतवर्मा ने युद्ध में पाण्डवों को तीन-तीन बाणों से बेधा। उसने शिखण्डी को भी पहले तीन और फिर पाँच बाणों से घायल कर दिया।

Verse 88

धनुरन्यत्‌ समादाय शिखण्डी तु महायशा: । अवारयन्‌ कूर्मनखैराशुगै्दिकात्मजम्‌,तत्पश्चात्‌ महायशस्वी शिखण्डीने भी दूसरा धनुष लेकर कछुओंके नखोंके समान धारवाले बाणोंद्वारा कृतवर्माका सामना किया

तत्पश्चात महायशस्वी शिखण्डी ने भी दूसरा धनुष उठाया और कछुए के नखों के समान तीक्ष्ण अग्र वाले वेगवान बाणों से दिकात्मज कृतवर्मा को रोक दिया।

Verse 89

ततः क्रुद्धो रणे राजन्‌ हृदिकस्यात्मसम्भव: । अभिदुद्राव वेगेन याज्ञसेनिं महारथम्‌

संजय बोले—राजन्! तब रणभूमि में क्रुद्ध होकर हृदिकपुत्र कृतवर्मा ने बड़े वेग से महारथी याज्ञसेनि शिखण्डी पर धावा किया।

Verse 90

भीष्मस्य समरे राजन मृत्योहेतुं महात्मन: । विदर्शयन्‌ बल॑ शूर: शार्टूल इव कुज्जरम्‌

राजन्! महात्मा भीष्म की मृत्यु के हेतु बने शिखण्डी पर वह शूरवीर अपना बल दिखाता हुआ ऐसे टूट पड़ा, जैसे शार्दूल हाथी पर झपटता है।

Verse 91

तौ दिशां गजसंकाशौ ज्वलिताविव पावकौ । समापेततुरन्योन्यं शरसड्घैररिंदमौ

संजय बोले—दिशाओं के दिग्गजों के समान विशाल और अग्नि के समान प्रज्वलित वे दोनों शत्रुदमन वीर एक-दूसरे पर टूट पड़े। बाणसमूहों की घनी वर्षा से उन्होंने परस्पर आक्रमण किया।

Verse 92

विधुन्वानौ धनुःश्रेष्ठे संदथधानौ च सायकान्‌ | विसृजन्तो च शतशो गभस्तीनिव भास्वरौ

संजय बोले—वे दोनों तेजस्वी वीर अपने श्रेष्ठ धनुषों को झकझोरते हुए और बाणों को डोरी पर चढ़ाते हुए, सैकड़ों की संख्या में बाण छोड़ने लगे—मानो प्रज्वलित किरणें फूट रही हों।

Verse 93

जैसे दो सूर्य पृथक्‌ू-पृथक्‌ अपनी किरणोंका विस्तार करते हों, उसी प्रकार वे दोनों वीर अपने श्रेष्ठ धनुष हिलाते और उनपर सैकड़ों बाणोंका संधान करके छोड़ते थे ।।

संजय बोले—मानो दो सूर्य अलग-अलग अपनी किरणें फैलाते हों, वैसे ही वे दोनों वीर अपने श्रेष्ठ धनुष हिलाकर सैकड़ों बाण संधान कर छोड़ते थे। तीक्ष्ण बाणों से एक-दूसरे को संतप्त करते हुए वे दोनों महारथी युगांत के दो सूर्यों के समान दीप्त हो रहे थे।

Verse 94

कृतवर्मा च समरे याज्ञसेनिं महारथम्‌ | विद्ध्वेषुभिस्त्रिसप्तत्या पुनर्विव्याध सप्तभि:,कृतवर्माने समरांगणमें महारथी शिखण्डीको पहले तिहत्तर बाणोंसे घायल करके फिर सात बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया

संजय बोले—समर में कृतवर्मा ने महारथी याज्ञसेनि शिखण्डी को तिहत्तर बाणों से बेधा और फिर सात बाणों से पुनः घायल किया।

Verse 95

स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत्‌ | विसृज्य सशरं चापं मूर्च्छयाभिपरिप्लुत:,उन बाणोंकी गहरी चोट खाकर शिखण्डी व्यथित एवं मूर्च्छित हो धनुष-बाण त्यागकर रथकी बैठकमें बैठ गया

संजय बोले—गहरे बाणों से विद्ध होकर शिखण्डी व्यथित और मूर्च्छित हो गया। वह धनुष-बाण छोड़कर रथ की बैठक पर जा बैठा।

Verse 96

तं॑ विषण्णं रणे दृष्टवा तावका: पुरुषर्षभ । हार्दिक्यं पूजयामासुर्वासांस्यादुधुवुश्च ह,नरश्रेष्ठ! रणक्षेत्रमें शिखण्डीको विषादग्रस्त देख आपके सैनिक कृतवर्माकी प्रशंसा करने और वस्त्र हिलाने लगे

रणभूमि में शिखण्डी को विषादग्रस्त देखकर, हे पुरुषश्रेष्ठ, आपके सैनिक हार्दिक्य (कृतवर्मा) का सम्मान करने लगे और हर्ष में अपने वस्त्र हिलाने लगे।

Verse 97

शिखण्डिनं तथा ज्ञात्वा हार्दिक्यदशरपीडितम्‌ । अपोवाह रणाद यन्ता त्वरमाणो महारथम्‌,महारथी शिखण्डीको कृतवर्माके बाणोंसे पीड़ित जान सारथि बड़ी उतावलीके साथ उसे रणभूमिसे बाहर ले गया

महारथी शिखण्डी को कृतवर्मा (हार्दिक्य) के बाणों से अत्यन्त पीड़ित जानकर, सारथि बड़ी उतावली के साथ उसे रणभूमि से बाहर ले गया।

Verse 98

सादितं तु रथोपस्थे दृष्टवा पार्था: शिखण्डिनम्‌ । परिवव्रू रथैस्तूर्ण कृतवर्माणमाहवे

शिखण्डी को रथ के पिछले भाग में बेसुध-सा बैठा देखकर कुन्तीपुत्रों ने तुरंत ही रणभूमि में अपने रथों से कृतवर्मा को चारों ओर से घेर लिया।

Verse 99

तत्राद्भुतं परं चक्रे कृतवर्मा महारथ: । यदेक: समरे पार्थान्‌ वारयामास सानुगान्‌

वहाँ महारथी कृतवर्मा ने अत्यन्त अद्भुत पराक्रम किया—अकेला होकर भी उसने सेवकों सहित पाण्डवों को समरभूमि में रोक लिया।

Verse 100

पार्थान्‌ जित्वाजयच्चेदीन्‌ पज्चालान्‌ सृञ्जयानपि । केकयांश्व महावीर्यान्‌ कृतवर्मा महारथ:

महारथी कृतवर्मा ने पाण्डवों को जीतकर चेदियों को परास्त किया; फिर पांचालों, सृञ्जयों और महापराक्रमी केकयों को भी हरा दिया।

Verse 101

ते वध्यमाना: समरे हार्दिक्येन सम पाण्डवा: | इतश्रैतश्न धावन्तो नैव चक्रुर्धुतिं रणे,समरांगणमें कृतवर्मके बाणोंकी मार खाकर पाण्डव-सैनिक इधर-उधर भागने लगे। वे रणभूमिमें कहीं भी स्थिर न हो सके

समरांगण में कृतवर्मा (हार्दिक्य) के बाणों की मार से पाण्डवों की सेना इधर-उधर भागने लगी। बाण-वृष्टि के बीच वे रणभूमि में कहीं भी स्थिर न रह सके और उनका धैर्य टूट गया।

Verse 102

जित्वा पाण्डुसुतान्‌ युद्धे भीमसेनपुरोगमान्‌ । हार्दिक्य: समरे$तिष्ठद्‌ विधूम इव पावक:,युद्धमें भीमसेन आदि पाण्डवोंको जीतकर कृतवर्मा उस रणक्षेत्रमें धूमरहित अग्निके समान शोभा पाता हुआ खड़ा था

युद्ध में भीमसेन के अग्रणी रहते हुए पाण्डु-पुत्रों को जीतकर हार्दिक्य कृतवर्मा उस रणक्षेत्र में धूमरहित अग्नि के समान तेजस्वी होकर अडिग खड़ा रहा।

Verse 103

ते द्राव्यमाणा: समरे हार्दिक्येन महारथा: । विमुखा: समपद्यन्त शरवृष्टिभिरार्दिता:,समरांगणमें कृतवर्माके द्वारा खदेड़े गये और उसकी बाण-वर्षसे पीड़ित हुए पूर्वोक्त सभी महारथियोंने युद्धसे मुँह मोड़ लिया

समर में हार्दिक्य कृतवर्मा द्वारा खदेड़े जाकर और उसकी बाण-वृष्टि से पीड़ित वे सभी महारथी युद्ध से विमुख होकर पीछे हटने लगे।

Verse 114

इति श्रीमहा भारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे कृतवर्मपराक्रमे चतुर्दशाधिकशततमो<ध्याय:

इस प्रकार श्रीमहाभारत के द्रोणपर्व में, जयद्रथवधपर्व के अंतर्गत, सात्यकि-प्रवेश तथा कृतवर्मा-पराक्रम का वर्णन करने वाला एक सौ चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 723

कृतवर्माणमभित: प्रजज्वाल सुदारुणा | और शीघ्र ही उसे अपने रथसे कृतवर्मके रथपर चला दिया। भीमसेनके हाथोंसे छूटी हुई, केंचुलसे निकले हुए सर्पके समान वह भयंकर शक्ति कृतवर्मके समीप जाकर प्रज्वलित हो उठी

तभी भीमसेन के हाथ से छूटी हुई वह अत्यन्त भयंकर शक्ति शीघ्र ही उसके रथ से कृतवर्मा के रथ की ओर जा पहुँची। केंचुल से निकले हुए सर्प के समान वह कृतवर्मा के समीप पहुँचकर चारों ओर प्रज्वलित हो उठी।

Verse 743

द्योतयन्ती दिशो राजन्‌ महोल्केव नभश्च्युता । राजन! सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करती हुई वह सुवर्णभूषित शक्ति कटकर आकाशशसे गिरी हुई बड़ी भारी उल्काके समान पृथ्वीपर गिर पड़ी

संजय बोले—राजन्! सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित करती हुई, सुवर्ण-भूषणों से अलंकृत वह शक्ति कटकर आकाश से छूटी हुई महान उल्का के समान पृथ्वी पर आ गिरी।

Verse 796

त्रिभिस्त्रिभिर्महेष्वासो यतमानान्‌ महारथान्‌ । तदनन्तर उस महाथधनुर्धरने क्रोधमें भरकर हँसते हुए ही तीन बाणोंद्वारा भीमसेनको गहरी चोट पहुँचाकर युद्धमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले उन सभी महारथियोंको तीन- तीन बाणोंसे बींध डाला

संजय बोले—वह महाधनुर्धर क्रोध से भरकर हँसते हुए ही तीन बाणों से भीमसेन को गहरी चोट पहुँचा गया। तत्पश्चात् विजय की इच्छा से युद्ध में प्रयत्नशील उन सब महारथियों को उसने तीन-तीन बाणों से बेध डाला।

Frequently Asked Questions

Arjuna confronts competing duties: pursuing the urgent Jayadratha objective while ensuring Yudhiṣṭhira’s protection; Sātyaki’s arrival signals success in reinforcement but also implies potential exposure of the king to Droṇa’s capture strategy.

Excellence in action and loyalty do not dissolve ethical complexity: even a successful relief operation must be evaluated against systemic risk, uncertainty, and the hierarchy of obligations within a dharmic polity.

No explicit phalaśruti is presented in this unit; the chapter functions as embedded strategic-ethical commentary through dialogue (Kṛṣṇa’s framing and Arjuna’s assessment) rather than as a standalone didactic closure.

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