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Shloka 18

Bhakti–Akṣara-Upāsanā-Viveka

Devotion to the Personal vs. Contemplation of the Imperishable

अपने-आप बछ। अर 3. संसारमें और शास्त्रोंमें जितने भी गुप्त रखनेयोग्य रहस्यके विषय माने गये हैं

यहाँ श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं है; दिया गया अंश श्लोक नहीं, बल्कि विस्तृत टीका/व्याख्या (गीता ९ के राजविद्या-राजगुह्य आदि प्रसंग) जैसा है। इसलिए इस verse_id के लिए श्लोकानुवाद करने हेतु मूल श्लोक-पाठ (देवनागरी/IAST) चाहिए।

अजुन उवाच