Mahabharata Adhyaya 34
Bhishma ParvaAdhyaya 3416 Verses

Adhyaya 34

Bhakti–Akṣara-Upāsanā-Viveka (Devotion to the Personal vs. Contemplation of the Imperishable)

Upa-parva: Bhagavadgītā Parva (Gītā-Upākhyāna within Bhīṣma Parva)

This chapter opens with Arjuna’s comparative question: among those who worship the personal divine with steady devotion and those who contemplate the imperishable, unmanifest absolute (akṣara/avyakta), who are more established in yoga. Kṛṣṇa answers with a graded taxonomy of spiritual practice. Devotional worship with mind fixed on the personal form is affirmed as the most integrated (yuktatama). Contemplation of the unmanifest is acknowledged as valid but described as more arduous for embodied agents, requiring restraint of the senses, equanimity, and universal welfare orientation. The discourse then provides an accessibility ladder: (1) steady concentration on the divine, (2) practice through repetition (abhyāsa-yoga), (3) action dedicated to the divine purpose, and (4) renunciation of the fruits of all actions, culminating in peace. The closing section defines the behavioral profile of the “dear devotee”: non-hostility, compassion, non-possessiveness, equanimity in pleasure/pain, patience, contentment, steadiness, freedom from agitation, and impartiality toward praise/blame. The chapter ends by commending those who follow this ‘dharmic nectar’ with faith and commitment.

Chapter Arc: कुरुक्षेत्र के रण-तट पर, श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—“हे महाबाहो! मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन फिर सुनो,” मानो युद्ध के शोर के बीच एक गूढ़ दीपक जल उठता है। → भगवान् ‘योग’ के प्रभाव—अपनी सर्वव्यापकता, भक्तों पर अनुग्रह, और भक्ति की अद्भुत शुद्धि-शक्ति—का विस्तार करते हैं; वे बताते हैं कि अधम कही जाने वाली जातियों तक भी, यदि वे शरण लें, तो पवित्रता और गति का द्वार खुल जाता है। → भगवान् का निर्णायक वचन उभरता है—जो सतत प्रेमपूर्वक भजन करते हैं, उनके हृदय में स्थित होकर वे स्वयं अज्ञान का अंधकार तत्त्वज्ञान-दीप से नष्ट करते हैं; और जो एक बार भी “मैं तेरा हूँ” कहकर शरण आता है, उसे वे सब भूतों से अभय देते हैं—यह उनका व्रत है। → अध्याय का निष्कर्ष यह स्थापित करता है कि समस्त ‘गुप्त रहस्यों’ में सर्वोच्च रहस्य पुरुषोत्तम का तत्त्व और प्रेम-भक्ति है—ज्ञान, शुद्धि और अभय का मूल स्रोत वही शरणागति है। → रणभूमि की तात्कालिकता बनी रहती है—यह दिव्य आश्वासन अर्जुन के कर्म-निर्णय को कैसे दृढ़ करेगा, इसका संकेत देकर कथा अगले अध्याय की ओर बढ़ती है।

Shlokas

Verse 1

श्रीभगवान्‌ बोले--हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचनको सुन, जिसे मैं तुझ अतिशय प्रेम रखनेवालेके लिये हितकी इच्छासे कहूँगा

श्रीभगवान् बोले—हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन। तू मुझे अत्यन्त प्रिय है, इसलिये तेरे हित की इच्छा से मैं इसे तुझसे कहूँगा।

Verse 2

सम्बन्ध-- पहले श्लोकमें भगवान्‌ने जिस विषयपर कहनेकी प्रतिज्ञा की है

देवताओं के समुदाय और महर्षि भी मेरी उत्पत्ति—मेरे प्राकट्य—को नहीं जानते; क्योंकि मैं ही सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ।

Verse 3

१८) “जिनके अश्रित भक्तोंका आश्रय लेकर किरात

जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों का महान् ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में असम्मूढ (अविविक्त) पुरुष सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।

Verse 4

२१) 'हे उद्धव! संतोंका परमप्रिय “आत्मा” रूप मैं एकमात्र श्रद्धा-भक्तिसे ही वशीभूत होता हूँ। मेरी भक्ति जन्मतः चाण्डालोंको भी पवित्र कर देती है।” यहाँ “पापयोनय:” पदको स्त्री

बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख-दुःख, भव-अभाव तथा भय और अभय—ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं।

Verse 5

अहिंसा: समता तुष्टिस्तपोः दानं यशोडयश: । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधा:

अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, कीर्ति और अपकीर्ति—प्राणियों के ये नाना प्रकार के भाव मुझसे ही, भिन्न-भिन्न रूपों में, उत्पन्न होते हैं।

Verse 6

महर्षय: सप्त पूर्वे चत्वारोी35 मनवस्तथा । मद्धभावा मानसा जाता येषां लोक इमा: प्रजा:

सात महर्षि और उनसे भी पूर्व के चार मनु—मेरे ही भाव से युक्त—मेरे मन और संकल्प से उत्पन्न हुए; और उन्हीं से जगत की यह समस्त प्रजा प्रकट हुई।

Verse 7

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । सो<विकम्पेन योगेनः युज्यते नात्र संशय:

जो पुरुष मेरी इस विभूति और योगशक्ति को तत्त्वतः जानता है, वह अविचल भक्तियोग से युक्त हो जाता है—इसमें कोई संशय नहीं।

Verse 8

सम्बन्ध-- भगवान्‌के प्रभाव और विथूतियोंके ज्ञानका फल अविचल भक्तियोगकी प्राप्ति बतलायी गयी

मैं ही सबका उद्गम हूँ; मुझसे ही सब प्रवृत्त होता है—ऐसा जानकर, भावसमन्वित बुद्धिमान जन मेरी भक्ति करते हैं।

Verse 9

इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‌्गीतापव॑के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्‌्गीतोपनिषद्‌र्में: श्रीकृष्णाजुनसंवादमें राजविद्याराजगुह्ययोग नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ,८ ।।

जिनका चित्त मुझमें लगा है और जिनके प्राण मुझमें ही स्थित हैं, वे भक्तजन परस्पर एक-दूसरे को मेरी चर्चा से बोध कराते हैं; और नित्य मेरा गुणगान करते हुए सदा तृप्त रहते हैं तथा मुझमें ही रमण करते हैं।

Verse 10

सम्बन्ध-- उपर्युक्त प्रकारसे भजन करनेवाले भक्तोंके प्रति भगवान्‌ क्या करते हैं; अगले दी शलोकोंमें यह बतलाते हैं-- तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌ । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते

जो निरन्तर मुझमें युक्त रहकर प्रेमपूर्वक मेरा भजन करते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धियोग (तत्त्वज्ञान-रूप विवेक) प्रदान करता हूँ, जिसके द्वारा वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।

Verse 11

हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये उनके अन्तःकरणमें स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अन्धकारको प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपकके द्वारा नष्ट कर देता हूँ

उन पर अनुग्रह करने के लिए, उनके अन्तःकरण में स्थित मैं स्वयं ही अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को प्रकाशमय ज्ञान-दीपक द्वारा नष्ट कर देता हूँ।

Verse 12

सम्बन्ध--गीताके सातवें अध्यायके पहले शलोकमें अपने समग्ररूपका ज्ञान करानेवाले जिस विषयको युननेके लिये भगवान्‌ने अर्जुनको आज्ञा दी थी तथा दूसरे श्लोकमें जिस विज्ञानसहित ज्ञानको पूर्णतया कहनेकी प्रतिज्ञा की थी, उसका वर्णन भगवान्‌ने सातवें अध्यायमें किया। उसके बाद आठवें जअध्यायमें अर्जुनके सात प्रश्नेंका उत्तर देते हुए भी भगवान्‌ने उसी विषयका स्पष्टीकरण किया: किंतु वहाँ कहनेकी शैली दूसरी रही; इसलिये नवम अध्यायके आरम्भमें पुनः विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करके उसी विषयको अंग- प्रत्यंगोंसाहित भलीभॉति समझाया। तदनन्तर दूसरे शब्दोंमें पुनः उसका स्पष्टीकरण करनेके लिये दसवें अध्यायके पहले शलोकमें उसी विषयको पुनः कहनेकी प्रतिज्ञा की और पाँच श्लोकोंद्वार अपनी योगशक्ति और विभूतियोंका वर्णन करके सातवें श्लोकमें उनके जाननेका फल अविचल भक्तियोगकी प्राप्ति बतलायी। फिर आठवें और नवें श्लोकोंमें भक्तियोगके द्वारा भगवान्‌के भजनमें लगे हुए भ्क्तोंक भाव और आचरणका वर्णन किया और दसवें तथा ग्यारहवेंमें उसका फल अज्ञानजनित अन्धकारका नाश और भगवान्‌की प्राप्ति करा देनेवाले बुद्धियोगकी प्राप्ति बतलाकर उस विषयका उपसंद्यार कर दिया। इसपर भगवान्‌की विभरूति और योगको तत्त्वसे जानना भगवत्प्राप्तियें परम सहायक है, यह बात समझकर अब सात श*लोकोंमें अर्जुन पहले भरगवान्‌की स्घुति करके भगवान्‌से उनकी योगशक्ति और विभूतियोंका विस्तारसहित वर्णन करनेके लिये प्रार्थना करते हैं-- अजुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्र परमं भवान्‌ | पुरुष शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्‌

अर्जुन ने कहा—आप परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं, परम पवित्र हैं। आप शाश्वत, दिव्य पुरुष हैं—आदि देव, अजन्मा और सर्वव्यापी।

Verse 13

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वताः

उन पर ही अनुकम्पा करने के लिए, उनके आत्मभाव में स्थित मैं अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को प्रकाशमान ज्ञान-दीपक से नष्ट कर देता हूँ।

Verse 14

३३) अर्थात्‌ एक बार भी "मैं तेरा हूँ” यों कहकर मेरी शरणमें आये हुए और मुझसे अभय चाहनेवालेको मैं सभी भूतोंसे अभय कर देता हूँ, यह मेरा व्रत है।।

अर्जुन ने कहा—(यहाँ शरणागति का उपदेश है: जो एक बार भी ‘मैं तेरा हूँ’ कहकर भगवान् की शरण में आता और अभय चाहता है, उसे प्रभु सब प्राणियों से अभय करते हैं—यह उनका व्रत है। वे अव्यय, सबका कारण, ‘अव्यय बीज’ और प्रलय में जगत् के ‘निधान’ हैं। इसलिए स्थायी शान्ति और मोक्ष का मार्ग केवल कर्मकाण्ड या पद-प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि निष्काम भक्ति और पूर्ण समर्पण है।)

Verse 18

अपने-आप बछ। अर 3. संसारमें और शास्त्रोंमें जितने भी गुप्त रखनेयोग्य रहस्यके विषय माने गये हैं

यहाँ श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं है; दिया गया अंश श्लोक नहीं, बल्कि विस्तृत टीका/व्याख्या (गीता ९ के राजविद्या-राजगुह्य आदि प्रसंग) जैसा है। इसलिए इस verse_id के लिए श्लोकानुवाद करने हेतु मूल श्लोक-पाठ (देवनागरी/IAST) चाहिए।

Verse 33

भीष्मपर्वणि तु त्रयस्त्रिंशो 5ध्याय:,भीष्मपर्वमें तैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

भीष्मपर्व में तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

Arjuna frames a comparative dilemma of method: whether steady devotion to the personal divine or contemplation of the unmanifest imperishable constitutes superior yogic establishment, i.e., which approach is most practicable and integrative for the practitioner.

Kṛṣṇa presents a graded path calibrated to capacity: prioritize steady devotion and attention; if unstable, adopt disciplined practice; if that is difficult, act in service to the divine purpose; if even that is constrained, renounce the fruits of action—because relinquishing result-attachment conduces to peace.

Yes. The chapter closes by commending those who faithfully follow this teaching described as ‘dharmic nectar’ (dharmyāmṛta), indicating that adherence to the outlined discipline and virtues is itself presented as highly valued and spiritually efficacious within the text’s soteriological frame.

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