
Babhruvāhana’s Lament and Appeal for Expiation (प्रायश्चित्त-याचना)
Upa-parva: Aśvamedha-Anubandha (Babhruvāhana–Arjuna Encounter Cycle)
Vaiśaṃpāyana narrates a scene of acute aftermath: the queen, having ceased lamentation, holds her husband’s feet and sits, breathing heavily, gazing upon her son. Babhruvāhana regains consciousness, sees his mother on the battlefield, and voices escalating self-reproach. He frames the sight of his mother reclining beside a fallen hero as unbearable, calls attention to the fallen warrior’s ornaments, and publicly identifies the slain as his “father,” addressing Brahmins as witnesses. He requests immediate śānti rites and asks what prāyaścitta could exist for the sin of killing one’s father (pitṛ-hatyā), asserting that no adequate expiation is available and anticipating hell as the consequence of guru-vadha. He contrasts standard expiations for killing a kṣatriya with the near-impossibility of atoning for patricide. He then addresses the Nāga princess (Ulūpī), claiming he has fulfilled her desire by striking down Arjuna, and declares intent to follow the path of the ancestors, unable to sustain himself. He makes a truth-assertion (satya) before all beings: if his father does not rise, he will fast unto death on that very ground. The chapter closes with Babhruvāhana falling silent, adopting a prāyopaveśa posture, shifting the narrative from combat to ritual-ethical resolution.
Chapter Arc: रणभूमि में धनंजय अर्जुन का निहत होकर पड़ा होना—और उसके ऊपर मणिपुर-नरेश बभ्रुवाहन का अपराध-बोध; चित्रांगदा का विलाप और मूर्च्छा से दृश्य का आरम्भ। → होश में आते ही दिव्यवपुर्धरा चित्रांगदा उलूपी को देखती है और कटु वाणी में कहती है कि ‘तुम्हारे कारण’ मेरे पुत्र ने अपने ही स्वामी को बाण से गिरा दिया। उलूपी पर दोषारोपण, मातृत्व का आक्रोश, और पुत्र के हाथों पति-वध की असह्य विडम्बना तनाव को बढ़ाती है। → उलूपी विनयपूर्वक आग्रह करती है—‘यदि अर्जुन सर्वथा अपराधी भी हों, तो भी क्षमा करो; उन्हें जीवित करो’—और संजीवनी-मणि के प्रयत्न से अर्जुन का पुनर्जीवन होता है; देवपुष्प-वृष्टि और इन्द्र की दिव्य सुमन-वर्षा से क्षण का उत्कर्ष। → अर्जुन उठकर पूर्ण स्वस्थ होते हैं, बभ्रुवाहन को हृदय से लगाते हैं और उसके मस्तक को सूँघकर पिता-स्नेह से आश्वस्त करते हैं; बभ्रुवाहन भी शिर झुकाकर उलूपी से (और समस्त प्रसंग से) सत्य जानने/पूछने की मुद्रा में आता है—दोष, दण्ड और करुणा का संतुलन स्थापित। → अर्जुन के पुनर्जीवन के बाद भी प्रश्न शेष रहता है—यह नियति-रचित द्वन्द्व क्यों घटित हुआ, और उलूपी की योजना/धर्म-प्रेरणा का वास्तविक हेतु क्या था?
Verse 1
अफ--णकात अशीतितमो<्ध्याय: चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोदगार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुनः जीवित होना वैशम्पायन उवाच ततो बहुतरं भीरुर्विलप्य कमलेक्षणा । मुमोह दुःखसंतप्ता पपात च महीतले,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर भीरु स्वभाववाली कमलनयनी चित्रांगदा पतिवियोग-दुःखसे संतप्त होकर बहुत विलाप करती हुई मूर्च्छित हो गयी और पृथ्वीपर गिर पड़ी
वैशम्पायन बोले—तदनन्तर भीरु स्वभाववाली कमलनयनी चित्रांगदा पतिवियोग-दुःख से संतप्त होकर बहुत विलाप करती हुई मूर्च्छित हो गयी और पृथ्वी पर गिर पड़ी।
Verse 2
प्रतिलभ्य च सा संज्ञां देवी दिव्यवपुर्धरा । उलूपीं पन्नगसुतां दृष्टवेदं वाक्यमब्रवीत्,कुछ देर बाद होशमें आनेपर दिव्यरूपधारिणी देवी चित्रांगदाने नागकन्या उलूपीको सामने खड़ी देख इस प्रकार कहा--
फिर कुछ देर बाद होश में आकर दिव्य रूप धारण करने वाली देवी चित्रांगदा ने सामने खड़ी नागकन्या उलूपी को देखकर यह वचन कहा।
Verse 3
उलूपि पश्य भर्तारें शयानं निहतं रणे । त्वत्कृते मम पुत्रेण बाणेन समितिंजयम्,“उलूपी! देखो, हम दोनोंके स्वामी मारे जाकर रणभूमिमें सो रहे हैं। तुम्हारी प्रेरणासे ही मेरे बेटेने समरविजयी अर्जुनका वध किया है
उलूपी! देखो, हमारे स्वामी रणभूमि में मारे जाकर पड़े हैं। तुम्हारे ही कारण मेरे पुत्र ने अपने बाण से समर-विजयी अर्जुन का वध किया है।
Verse 4
ननु त्वमार्यधर्मज्ञा ननु चासि पतिव्रता । यत्त्वस्कृतेड्यं पतित: पतिस्ते निहतो रणे,“बहिन! तुम तो आर्यधर्मको जाननेवाली और पतिव्रता हो। तथापि तुम्हारी ही करतूतसे ये तुम्हारे पति इस समय रणभूमिमें मरे पड़े हैं
बहिन! तुम तो आर्यधर्म को जाननेवाली और पतिव्रता हो। तथापि तुम्हारी ही करतूत से तुम्हारे पूज्य पति रणभूमि में मारे जाकर गिरे पड़े हैं।
Verse 5
किंतु सर्वापराधो<5यं यदि तेड्द्य धनंजय: । क्षमस्व याच्यमाना वै जीवयस्व धनंजयम्,'किंतु यदि ये अर्जुन सर्वथा तुम्हारे अपराधी हों तो भी आज क्षमा कर दो। मैं तुमसे इनके प्राणोंकी भीख माँगती हूँ। तुम धनंजयको जीवित कर दो
किन्तु यदि ये धनंजय (अर्जुन) सर्वथा तुम्हारे अपराधी ही हों, तो भी आज क्षमा कर दो। मैं तुमसे उनके प्राणों की भीख माँगती हूँ—धनंजय को जीवित कर दो।
Verse 6
ननु त्वमार्ये धर्मज्ञा त्रैलोक्यविदिता शुभे | यद् घातयित्वा पुत्रेण भर्तारें नानुशोचसि,'आर्ये! शुभे! तुम धर्मको जाननेवाली और तीनों लोकोंमें विख्यात हो। तो भी आज पुत्रसे पतिकी हत्या कराकर तुम्हें शोक या पश्चात्ताप नहीं हो रहा है, इसका क्या कारण है?
आर्ये! शुभे! तुम धर्म को जाननेवाली और तीनों लोकों में विख्यात हो। फिर भी अपने ही पुत्र से पति की हत्या कराकर तुम्हें शोक या पश्चात्ताप क्यों नहीं हो रहा?
Verse 7
नाहं शोचामि तनयं हतं पन्नगनन्दिनि । पतिमेव तु शोचामि यस्यातिथ्यमिदं कृतम्,“नागकुमारी! मेरा पुत्र भी मरा पड़ा है, तो भी मैं उसके लिये शोक नहीं करती। मुझे केवल पतिके लिये शोक हो रहा है, जिनका मेरे यहाँ इस तरह आतिथ्य-सत्कार किया गया”
नागकुमारी! मेरा पुत्र भी मरा पड़ा है, तो भी मैं उसके लिये शोक नहीं करती। मैं केवल अपने पति के लिये शोक करती हूँ, जिनके यहाँ इस प्रकार अतिथि-सत्कार के बाद यह अनर्थ हुआ।
Verse 8
इत्युक्त्वा सा तदा देवीमुलूपीं पन्नगात्मजाम् । भर्तारमभिगम्येदमित्युवाच यशस्विनी,नागकन्या उलूपीदेवीसे ऐसा कहकर यशस्विनी चित्राड़दा उस समय पतिके निकट गयी और उन्हें सम्बोधित करके इस प्रकार विलाप करने लगी--
नागकन्या देवी उलूपी से ऐसा कहकर उस समय यशस्विनी स्त्री अपने पति के निकट गयी और उन्हें संबोधित करके इस प्रकार विलाप करने लगी।
Verse 9
उत्तिष्ठ कुरुमुख्यस्य प्रियमुख्य मम प्रिय । अयमश्वो महाबाहो मया ते परिमोक्षित:,“कुरुराजके प्रियतम और मेरे प्राणाधार! उठो। महाबाहो! मैंने तुम्हारा यह घोड़ा छुड़वा दिया है
उठो, कुरुश्रेष्ठ के प्रियतम और मेरे प्राणाधार! महाबाहो, मैंने तुम्हारा यह अश्व छुड़ा दिया है।
Verse 10
ननु त्वया नाम विभो धर्मराजस्य यज्ञिय: । अयमश्चो<्नुसर्तव्य: स शेषे कि महीतले,'प्रभो! तुम्हें तो महाराज युधिष्ठिरके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वके पीछे-पीछे जाना है; फिर यहाँ पृथ्वीपर कैसे सो रहे हो?
प्रभो! तुम्हें तो धर्मराज युधिष्ठिर के यज्ञ-सम्बन्धी इस अश्व के पीछे-पीछे जाना है; फिर तुम यहाँ पृथ्वी पर क्यों पड़े सो रहे हो?
Verse 11
त्वयि प्राणा ममायत्ता: कुरूणां कुरुनन्दन । स कस्मात् प्राणदो<न्येषां प्राणात् संत्यक्तवानसि,“कुरुनन्दन! मेरे और कौरवोंके प्राण तुम्हारे ही अधीन हैं। तुम तो दूसरोंके प्राणदाता हो, तुमने स्वयं कैसे प्राण त्याग दिये?”
कुरुनन्दन! मेरे और कौरवों के प्राण तुम्हारे ही अधीन हैं। तुम तो दूसरों के प्राणदाता हो; फिर तुमने स्वयं अपने प्राण कैसे त्याग दिए?
Verse 12
उलूपि साधु पश्येमं पतिं निपतितं भुवि | पुत्रं चेमं समुत्साद्य घातयित्वा न शोचसि,(इतना कहकर वह फिर उलूपीसे बोली--) '“उलूपी! ये पतिदेव भूतलपर पड़े हैं। तुम इन्हें अच्छी तरह देख लो। तुमने इस बेटेको उकसाकर स्वामीकी हत्या करायी है। कया इसके लिये तुम्हें शोक नहीं होता?
उलूपी! देखो, तुम्हारे पतिदेव भूमि पर गिरे पड़े हैं। तुमने इस पुत्र को उकसाकर स्वामी का वध करवाया है; क्या तुम्हें इसका शोक नहीं होता?
Verse 13
काम॑ स्वपितु बालो<यं भूमौ मृत्युवशं गतः । लोहिताक्षो गुडाकेशो विजय: साधु जीवतु,'मृत्युके वशमें पड़ा हुआ मेरा यह बालक चाहे सदाके लिये भूमिपर सोता रह जाय, किंतु निद्राके स्वामी, विजय पानेवाले अरुणनयन अर्जुन अवश्य जीवित हों--यही उत्तम है
मृत्यु के वश में पड़ा हुआ यह मेरा बालक चाहे सदा के लिए भूमि पर सोता रह जाए; परन्तु निद्रा के स्वामी, विजयशील, अरुणनयन अर्जुन अवश्य जीवित रहें—यही उत्तम है।
Verse 14
नापराधो<स्ति सुभगे नराणां बहुभार्यता । प्रमदानां भवत्येष मा ते5भूद बुद्धिरीदृशी,“सुभगे! कोई पुरुष बहुत-सी स्त्रियोंको पत्नी बनाकर रखे, तो उनके लिये यह अपराध या दोषकी बात नहीं होती। स्त्रियाँ यदि ऐसा करें (अनेक पुरुषोंसे सम्बन्ध रखें) तो यह उनके लिये अवश्य दोष या पापकी बात होती है। अतः तुम्हारी बुद्धि ऐसी क्रूर नहीं होनी चाहिये
Vaiśampāyana said: “O fortunate lady, it is not regarded as a fault for men to have many wives. But for women, such conduct—having relations with many men—is indeed treated as blameworthy. Therefore, do not let your mind become like this (harsh or misguided).”
Verse 15
सख्यं चैतत् कृतं धात्रा शश्वदव्ययमेव तु । सख्यं समभिजानीहि सत्यं सड्भतमस्तु ते,“विधाताने पति और पत्नीकी मित्रता सदा रहनेवाली और अटूट बनायी है। (तुम्हारा भी इनके साथ वही सम्बन्ध है।) इस सख्यभावके महत्त्वको समझो और ऐसा उपाय करो जिससे तुम्हारी इनके साथ की हुई मैत्री सत्य एवं सार्थक हो
Vaiśaṃpāyana said: “This bond of friendship has been ordained by the Creator—everlasting and unbreakable indeed. Therefore, recognize and honor this friendship; let your relationship with them become true and truly fulfilled.”
Verse 16
पुत्रेण घातयित्वैनं पतिं यदि न मेउद्य वै जीवन्तं दर्शयस्यद्य परित्यक्ष्यामि जीवितम्,“तुम्हींने बेटेको लड़ाकर उसके द्वारा इन पतिदेवकी हत्या करवायी है। यह सब करके यदि आज तुम पुनः इन्हें जीवित करके न दिखा दोगी तो मैं भी प्राण त्याग दूँगी
Having made my own son strike him down, if you do not show me my husband alive today—indeed today—I will renounce my life. The utterance frames a moral ultimatum: the speaker treats the husband’s life as the non-negotiable center of dharma and marital fidelity, and holds the instigator accountable for restoring what was wrongfully taken.
Verse 17
साहं दुःखान्विता देवि पतिपुत्रविनाकृता । इहैव प्रायमाशिपष्ये प्रेक्षन्त्यास्ते न संशय:,'देवि! मैं पति और पुत्र दोनोंसे वज्चित होकर दु:खमें डूब गयी हूँ। अतः अब यहीं तुम्हारे देखते-देखते मैं आमरण उपवास करूँगी, इसमें संशय नहीं है”
Vaiśaṃpāyana said: “O goddess, bereft of both husband and son, I am overwhelmed by sorrow. Therefore, here itself—before your very eyes—I shall undertake prāya (a fast unto death); of this there is no doubt.”
Verse 18
इत्युक्त्वा पन्नगसुतां सपत्नी चैत्रवाहनी । ततः प्रायमुपासीना तूष्णीमासीज्जनाधिप,नरेश्वर! नागकन्यासे ऐसा कहकर उसकी सौत चित्रवाहनकुमारी चित्रांगा आमरण उपवासका संकल्प लेकर चुपचाप बैठ गयी
Vaiśaṃpāyana said: Having spoken thus to the serpent-maiden, her co-wife—the princess of Citravāhana—then undertook the vow of prāya (fasting unto death). Sitting in solemn silence, she remained steadfast, O king, O lord of men. The episode underscores the grave ethical weight of marital rivalry and honor, where a woman chooses self-denial as a final protest and expiation rather than open conflict.
Verse 19
वैशम्पायन उवाच ततो विलप्य विरता भर्तु: पादौ प्रगृह् सा । उपविष्टा भवद् दीना सोच्छवासं पुत्रमीक्षती,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर विलाप करके उससे विरत हो चित्रांगदा अपने पतिके दोनों चरण पकड़कर दीनभावसे बैठ गयी और लंबी साँस खींच- खींचकर अपने पुत्रकी ओर भी देखने लगी
वैशम्पायन बोले—तब विलाप करके और फिर मौन हो, वह अपने पति के चरणों को पकड़कर दीनभाव से बैठ गई। लंबी-लंबी, टूटती साँसें भरती हुई वह बार-बार अपने पुत्र की ओर देखने लगी।
Verse 20
ततः संज्ञां पुनर्लब्ध्वा स राजा बभ्रुवाहन: । मातरं तामथालोक्य रणभूमावथाब्रवीत्,थोड़ी ही देरमें राजा बभ्रुवाहनको पुनः चेत हुआ। वह अपनी माताको रणभूमिमें बैठी देख इस प्रकार विलाप करने लगा--
तत्पश्चात राजा बभ्रुवाहन को शीघ्र ही पुनः चेतना प्राप्त हुई। रणभूमि में अपनी माता को बैठी देखकर वह शोकाकुल होकर इस प्रकार बोलने लगा।
Verse 21
इतो दुःखतरं कि नु यन्मे माता सुखैधिता । भूमौ निपतितं वीरमनुशेते मृतं पतिम्,“हाय! जो अबतक सुखोंमें पली थी, वही मेरी माता चित्रांगदा आज मृत्युके अधीन होकर पृथ्वीपर पड़े हुए अपने वीर पतिके साथ मरनेका निश्चय करके बैठी हुई है। इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है?
“इससे बढ़कर दुःख और क्या होगा कि मेरी माता, जो सुखों में पली थी, आज भूमि पर गिरे हुए वीर पति को मृत मानकर उसके पास पड़ी है—उसके साथ मृत्यु का संकल्प किए हुए।”
Verse 22
निहन्तारं रणे<5रीणां सर्वशस्त्रभृतां वरम् मया विनिहतं संख्ये प्रेक्षते दुर्मरं बत,'संग्राममें जिनका वध करना दूसरेके लिये नितान्त कठिन है, जो युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेवाले तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं, उन्हीं मेरे पिता अर्जुनको आज यह मेरे ही हाथों मरकर पड़ा देख रही है
“हाय! जो रण में शत्रुओं के संहारक, समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, और जिनका वध करना अत्यन्त कठिन था—उन्हीं को मैंने युद्ध में मार गिराया; और अब वह दृश्य मेरी माता देख रही है, जो सहा नहीं जाता।”
Verse 23
अहो<स्या हृदयं देव्या दृढं यज्ञ विदीर्यते । व्यूढोरस्क॑ महाबाहें प्रेक्षन्त्या निहतं पतिम्
वैशम्पायन बोले—“अहो! हे यज्ञ! उस देवी का हृदय दृढ़ होते हुए भी विदीर्ण हो रहा है। वह उदार-उर, महाबाहु अपने पति को हत पड़ा देखकर तड़प रही है।”
Verse 24
यत्र नाहं न मे माता विप्रयुज्येत जीवितात्,“तभी तो इस संकटके समय भी मेरे और मेरी माताके प्राण नहीं निकलते। हाय! हाय! मुझे धिककार है, लोगों! देख लो! मुझ पुत्रके द्वारा मारे गये कुरुवीर अर्जुनका सुनहरा कवच यहाँ पृथ्वीपर फेंका पड़ा है”
वैशम्पायन बोले— इस घोर संकट में न मैं और न मेरी माता प्राणों से वियुक्त होते हैं। हाय! हाय! मुझे धिक्कार है! लोगों, देखो— मेरे ही पुत्र के हाथों मारे गए कुरुवीर अर्जुन का स्वर्णिम कवच यहाँ धरती पर फेंका पड़ा है।
Verse 25
हा हा धिक् कुरुवीरस्य संनाहं काज्चनं भुवि । अपविद्धं हतस्येह मया पुत्रेण पश्यत,“तभी तो इस संकटके समय भी मेरे और मेरी माताके प्राण नहीं निकलते। हाय! हाय! मुझे धिककार है, लोगों! देख लो! मुझ पुत्रके द्वारा मारे गये कुरुवीर अर्जुनका सुनहरा कवच यहाँ पृथ्वीपर फेंका पड़ा है”
वैशम्पायन बोले— हाय! हाय! मुझे धिक्कार है! देखो— कुरुवीर का स्वर्ण कवच धरती पर पड़ा है; यहाँ वह उसी का है, जिसे मेरे ही पुत्र ने मार गिराया।
Verse 26
भो भो पश्यत मे वीरं पितरं ब्राह्मणा भुवि | शयानं वीरशयने मया पुत्रेण पातितम्,हे ब्राह्मणो! देखो, मुझ पुत्रके द्वारा मार गिराये गये मेरे वीर पिता अर्जुन वीरशय्यापर सो रहे हैं
वैशम्पायन बोले— हे ब्राह्मणों, देखो— देखो! मेरे वीर पिता यहाँ पृथ्वी पर वीरशय्या पर पड़े हैं; उन्हें मैंने ही, पुत्र होकर, गिरा दिया।
Verse 27
ब्राह्मणा: कुरुमुख्यस्य ये मुक्ता हपसारिण: । कुर्वन्ति शान्तिं कामस्य रणे यो5यं मया हत:,'कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके घोड़ेके पीछे-पीछे चलनेवाले जो ब्राह्मणलोग शान्तिकर्म करनेके लिये नियुक्त हुए हैं, वे इनके लिये कौन-सी शान्ति करते थे, जो ये रणभूमिमें मेरेद्वारा मार डाले गये!
वैशम्पायन बोले— हे कुरुश्रेष्ठ! जो ब्राह्मण कुरुमुख्य (राजा) के अश्व के पीछे-पीछे नियुक्त होकर शान्तिकर्म कर रहे थे, वे इस पुरुष के लिए कैसी शान्ति कर रहे थे, जो रण में मेरे हाथों मारा गया?
Verse 28
व्यादिशन्तु च किं विप्रा: प्रायश्ित्तमिहाद्य मे । सुनृशंसस्य पापस्य पितृहन्तू रणाजिरे,'ब्राह्मणो! मैं अत्यन्त क्रूर, पापी और समरांगणमें पिताकी हत्या करनेवाला हूँ। बताइये, मेरे लिये अब यहाँ कौन-सा प्रायश्रित्त है?
वैशम्पायन बोले— हे ब्राह्मणों! आज ही, यहीं मेरे लिए प्रायश्चित्त बताइए। मैं अत्यन्त क्रूर, पापी और रणभूमि में पिता-हन्ता हूँ।
Verse 29
दुश्चरा द्वादशसमा हत्वा पितरमद्य वै । ममेह सुनृशंसस्य संवीतस्यास्य चर्मणा,“आज पिताकी हत्या करके मेरे लिये बारह वर्षोतक कठोर व्रतका पालन करना अत्यन्त कठिन है। मुझ क्रूर पितृघातीके लिये यहाँ यही प्रायश्नित्त है कि मैं इन्हींके चमड़ेसे अपने शरीरको आच्छादित करके रहूँ और अपने पिताके मस्तक एवं कपालको धारण किये बारह वर्षोतक विचरता रहूँ। पिताका वध करके अब मेरे लिये दूसरा कोई प्रायश्ित्त नहीं है
वैशम्पायन बोले— “आज पिता की हत्या करके मेरे लिए बारह वर्षों तक कठोर व्रत का पालन करना अत्यन्त कठिन है। मैं क्रूर पितृघाती हूँ; मेरे लिए यहाँ यही एक प्रायश्चित्त है कि मैं उन्हीं के चमड़े से अपने शरीर को ढँककर, उनके मस्तक और कपाल को धारण किए बारह वर्ष तक भटकता रहूँ। पिता-वध के बाद मेरे लिए दूसरा कोई प्रायश्चित्त नहीं है।”
Verse 30
शिर:कपाले चास्यैव युज्जत: पितुरद्य मे । प्रायक्षित्तं हि नास्त्यन्यद्धत्वाद्य पितरं मम,“आज पिताकी हत्या करके मेरे लिये बारह वर्षोतक कठोर व्रतका पालन करना अत्यन्त कठिन है। मुझ क्रूर पितृघातीके लिये यहाँ यही प्रायश्नित्त है कि मैं इन्हींके चमड़ेसे अपने शरीरको आच्छादित करके रहूँ और अपने पिताके मस्तक एवं कपालको धारण किये बारह वर्षोतक विचरता रहूँ। पिताका वध करके अब मेरे लिये दूसरा कोई प्रायश्ित्त नहीं है
वैशम्पायन बोले— “आज अपने पिता को मारकर मेरे लिए कोई दूसरा प्रायश्चित्त नहीं है। मेरा तप यही है— मैं उन्हीं के चमड़े से अपने को ढँकूँ और उनके कटे हुए मस्तक तथा कपाल को धारण करके विचरूँ।”
Verse 31
पश्य नागोत्तमसुते भर्तारें निहतं मया । कृतं॑ प्रियं मया तेडद्य निहत्य समरेडर्जुनम्,“नागराजकुमारी! देखो, युद्धमें मैंने तुम्हारे स््वामीका वध किया है। सम्भव है आज समरांगणमें इस तरह अर्जुनकी हत्या करके मैंने तुम्हारा प्रिय कार्य किया हो
वैशम्पायन बोले— “हे नागश्रेष्ठ की पुत्री! देखो, मैंने तुम्हारे पति का वध कर दिया है। सम्भव है कि आज रणभूमि में अर्जुन को मारकर मैंने तुम्हारा प्रिय कार्य किया हो।”
Verse 32
सो5हमद्य गमिष्यामि गति पितृनिषेविताम् । न शव्नोम्यात्मना55त्मानमहं धारयितुं शुभे,'परंतु शुभे! अब मैं इस शरीरको धारण नहीं कर सकता। आज मैं भी उस मार्गपर जाऊँगा, जहाँ मेरे पिताजी गये हैं
वैशम्पायन बोले— “अतः आज मैं उसी मार्ग पर जाऊँगा, जिस पर मेरे पितर गए हैं। हे शुभे! अब मैं अपने ही बल से इस शरीर को धारण नहीं कर सकता।”
Verse 33
सा त्वं मयि मृते मातस्तथा गाण्डीवधन्वनि । भव प्रीतिमती देवि सत्येनात्मानमालभे,“मातः! देवि! मेरे तथा गाण्डीवधारी अर्जुनके मर जानेपर तुम भलीभाँति प्रसन्न होना। मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि पिताजीके बिना मेरा जीवन असम्भव है”
वैशम्पायन बोले— “मातः! देवि! मेरे मर जाने पर और गाण्डीवधारी अर्जुन के भी मर जाने पर तुम प्रसन्न रहना, शोक न करना। मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ— पिता के बिना मेरा जीवन सम्भव नहीं।”
Verse 34
इत्युक्त्वा स ततो राजा दुःखशोकसमाहत: । उपस्पृश्य महाराज दुःखाद् वचनमब्रवीत्,महाराज! ऐसा कहकर दुःख और शोकसे पीड़ित हुए राजा बभ्रुवाहनने आचमन किया और बड़े दुःखसे इस प्रकार कहा--
यह कहकर दुःख और शोक से अभिभूत राजा ने आचमन किया। फिर, हे महाराज, अत्यन्त व्याकुल होकर उसने बड़े दुःख से ये वचन कहे।
Verse 35
शृण्वन्तु सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च । त्वं च मातर्यथा सत्यं ब्रवीमि भुजगोत्तमे,'संसारके समस्त चराचर प्राणियो! आप मेरी बात सुनें। नागराजकुमारी माता उलूपी! तुम भी सुन लो। मैं सच्ची बात बता रहा हूँ
समस्त स्थावर-जंगम प्राणी सुनें। और तुम भी, हे भुजगोत्तमा माता उलूपी, सुनो; मैं जैसा सत्य है वैसा ही कह रहा हूँ।
Verse 36
यदि नोीत्तिष्ठति जय: पिता मे नरसत्तम: । अस्मिन्नेव रणोद्देशे शोषयिष्ये कलेवरम्,“यदि मेरे पिता नरश्रेष्ठ अर्जुन आज जीवित हो पुनः उठकर खड़े नहीं हो जाते तो मैं इस रणभूमिमें ही उपवास करके अपने शरीरको सुखा डालूँगा
यदि मेरे पिता—नरश्रेष्ठ, जयशील अर्जुन—जीवित होकर फिर नहीं उठते, तो मैं इसी रणभूमि में उपवास करके अपने शरीर को सुखा डालूँगा।
Verse 37
न हि मे पितरं हत्वा निष्कृतिर्विद्यते क्वचित् | नरकं प्रतिपत्स्यामि ध्रुवं गुरुवधार्दित:,'पिताकी हत्या करके मेरे लिये कहीं कोई उद्धारका उपाय नहीं है। गुरुजन (पिता)-के वधरूपी पापसे पीड़ित हो मैं निश्चय ही नरकमें पहडूँगा'
पिता का वध करके मेरे लिए कहीं कोई प्रायश्चित्त नहीं है। गुरु—पिता—वध के पाप से पीड़ित होकर मैं निश्चय ही नरक को प्राप्त होऊँगा।
Verse 38
वीरं हि क्षत्रियं हत्वा गोशतेन प्रमुच्यते । पितरं तु निहत्यैवं दुर्लभा निष्कृतिर्मम,“किसी एक वीर क्षत्रियका वध करके विजेता वीर सौ गोदान करनेसे उस पापसे छुटकारा पाता है; परंतु पिताकी हत्या करके इस प्रकार उस पापसे छुटकारा मिल जाय, यह मेरे लिये सर्वथा दुर्लभ है
किसी वीर क्षत्रिय का वध करके मनुष्य सौ गोदान से उस पाप से छूट जाता है; पर अपने पिता का वध करके वैसी ही निष्कृति मिल जाए—यह मेरे लिए अत्यन्त दुर्लभ है।
Verse 39
एष एको महातेजा: पाण्डुपुत्रो धनंजय: । पिता च मम धर्मात्मा तस्य मे निष्कृति: कुतः,'ये पाण्डुपुत्र धनंजय अद्वितीय वीर, महान् तेजस्वी, धर्मात्मा तथा मेरे पिता थे। इनका वध करके मैंने महान् पाप किया है। अब मेरा उद्धार कैसे हो सकता है?”
वैशम्पायन बोले—यह पाण्डुपुत्र धनंजय (अर्जुन) अद्वितीय वीर और महान् तेजस्वी थे। वही मेरे धर्मात्मा पिता भी थे। उनके वध का कारण बनकर मैंने घोर पाप किया है; अब मेरी निष्कृति और उद्धार कहाँ से होगा?
Verse 40
इत्येवमुक्त्वा नूपते धनंजयसुतो नृपः । उपस्पृश्याभवत् तूष्णीं प्रायोपेतो महामति:,नरेश्वरर ऐसा कहकर धनंजयकुमार परम बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहन पुन: आचमन करके आमरण उपवासका व्रत लेकर चुपचाप बैठ गया
यह कहकर धनंजयपुत्र परम बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहन ने आचमन किया और फिर मौन होकर प्रायोपवेश (आमरण उपवास) का संकल्प लेकर बैठ गया।
Verse 41
वैशमग्पायन उवाच प्रायोपविष्टे नृपती मणिपूरेश्वरे तदा । पितृशोकसमाविष्टे सह मात्रा परंतप,वैशम्पायनजी कहते हैं--शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय! पिताके शोकसे संतप्त हुआ मणिपुरनरेश बभ्रुवाहन जब माताके साथ आमरण उपवासका व्रत लेकर बैठ गया, तब उलूपीने संजीवनमणिका स्मरण किया। नागोंके जीवनकी आधारभूत वह मणि उसके स्मरण करते ही वहाँ आ गयी
वैशम्पायन बोले—शत्रुओं को संताप देने वाले जनमेजय! उस समय मणिपुर के राजा बभ्रुवाहन पिता के शोक से व्याकुल होकर माता के साथ प्रायोपवेश (आमरण उपवास) का व्रत लेकर बैठ गए। तब उलूपी ने नागों के जीवनाधार संजीवनमणि का स्मरण किया; स्मरण करते ही वह मणि वहाँ उपस्थित हो गई।
Verse 42
उलूपी चिन्तयामास तदा संजीवनं मणिम् । स चोपातिष्ठत तदा पन्नगानां परायणम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय! पिताके शोकसे संतप्त हुआ मणिपुरनरेश बभ्रुवाहन जब माताके साथ आमरण उपवासका व्रत लेकर बैठ गया, तब उलूपीने संजीवनमणिका स्मरण किया। नागोंके जीवनकी आधारभूत वह मणि उसके स्मरण करते ही वहाँ आ गयी
वैशम्पायन बोले—तब उलूपी ने संजीवनमणि का ध्यान किया; और वह मणि, जो नागों का परम आश्रय है, उसी क्षण वहाँ उपस्थित हो गई।
Verse 43
त॑ गृहीत्वा तु कौरव्य नागराजपते: सुता । मन: प्रह्लादनीं वाचं सैनिकानामथाब्रवीत्,कुरुनन्दन! उस मणिको लेकर नागराजकुमारी उलूपी सैनिकोंके मनको आह्लाद प्रदान करनेवाली बात बोली--
कौरवनन्दन! उस मणि को लेकर नागराज की पुत्री उलूपी ने सैनिकों से उनके मन को प्रसन्न करने वाली वाणी में कहा।
Verse 44
उत्तिष्ठ मा शुच: पुत्र नैव विष्णुस्त्वया जित: । अजेय: पुरुषैरेष तथा देवै: सवासवै:,“बेटा बभ्रुवाहन! उठो, शोक न करो! ये अर्जुन तुम्हारे द्वारा परास्त नहीं हुए हैं। ये तो सभी मनुष्यों और इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अजेय हैं
वैशम्पायन बोले—वत्स, उठो; शोक मत करो। तुमने विष्णु को नहीं जीता है। यह वीर मनुष्यों से तो क्या, इन्द्रसहित समस्त देवताओं से भी अजेय है।
Verse 45
मया तु मोहनी नाम मायैषा सम्प्रदर्शिता | प्रियार्थ पुरुषेन्द्रस्य पितुस्तेडद्य यशस्विन:,“यह तो मैंने आज तुम्हारे यशस्वी पिता पुरुषप्रवर धनंजयका प्रिय करनेके लिये मोहनी माया दिखलायी है
वैशम्पायन बोले—आज मैंने ही ‘मोहिनी’ नाम की यह माया दिखायी है, तुम्हारे यशस्वी पिता—पुरुषश्रेष्ठ—को प्रसन्न करने के लिये।
Verse 46
जिज्ञासुह्दोष पुत्रस्य बलस्य तव कौरव: । संग्रामे युद्धातो राजन्नागत: परवीरहा,“राजन! तुम इनके पुत्र हो। ये शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कुरुकूलतिलक अर्जुन संग्राममें जूझते हुए तुम-जैसे बेटेका बल-पराक्रम जानना चाहते थे। वत्स! इसीलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये प्रेरित किया है। सामर्थ्यशाली पुत्र! तुम अपनेमें अणुमात्र पापकी भी आशंका न करो
वैशम्पायन बोले—राजन्, शत्रुवीरों का संहार करने वाले वे कौरव अर्जुन संग्राम में युद्ध करके लौटे हैं; वे तुम—दोषपुत्र—के बल-पराक्रम को जानना चाहते थे।
Verse 47
तस्मादसि मया पुत्र युद्धाय परिचोदित: । मा पापमात्मन: पुत्र शड़केथा हाण्वपि प्रभो,“राजन! तुम इनके पुत्र हो। ये शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कुरुकूलतिलक अर्जुन संग्राममें जूझते हुए तुम-जैसे बेटेका बल-पराक्रम जानना चाहते थे। वत्स! इसीलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये प्रेरित किया है। सामर्थ्यशाली पुत्र! तुम अपनेमें अणुमात्र पापकी भी आशंका न करो
इसलिए, पुत्र, मैंने तुम्हें युद्ध के लिए प्रेरित किया है। हे समर्थ पुत्र, अपने लिए पाप की रंचमात्र भी शंका मत करना।
Verse 48
ऋषिरेष महानात्मा पुराण: शाश्वतो$क्षर: । नैनं शक्तो हि संग्रामे जेतुं शक्रोडपि पुत्रक,“ये महात्मा नर पुरातन ऋषि, सनातन एवं अविनाशी हैं। बेटा! युद्धमें इन्हें इन्द्र भी नहीं जीत सकते
वैशम्पायन बोले—यह महात्मा ऋषि पुरातन, सनातन और अविनाशी हैं। बेटा, संग्राम में इन्हें इन्द्र भी जीत नहीं सकते।
Verse 49
अयं तु मे मणिर्दिव्य: समानीतो विशाम्पते । मृतान् मृतान् पन्नगेन्द्रानु यो जीवयति नित्यदा,'प्रजानाथ! मैं यह दिव्यमणि ले आयी हूँ। यह सदा युद्धमें मरे हुए नागराजोंको जीवित किया करती है। प्रभो! तुम इसे लेकर अपने पिताकी छातीपर रख दो। फिर तुम पाण्थुपुत्र कुन्तीकुमार अर्जुनको जीवित हुआ देखोगे”
वैशम्पायन बोले—प्रजानाथ! मैं यह दिव्य मणि ले आई हूँ। यह युद्ध में मरे हुए नागराजों को सदा जीवित कर देती है। प्रभो! इसे लेकर अपने पिता की छाती पर रख दो; तब तुम कुन्तीपुत्र पाण्डव अर्जुन को पुनः जीवित देखोगे।
Verse 50
एनमस्योरसि त्वं च स्थापयस्व पितु: प्रभो । संजीवितं तदा पार्थ स त्वं द्रष्टासि पाण्डवम्,'प्रजानाथ! मैं यह दिव्यमणि ले आयी हूँ। यह सदा युद्धमें मरे हुए नागराजोंको जीवित किया करती है। प्रभो! तुम इसे लेकर अपने पिताकी छातीपर रख दो। फिर तुम पाण्थुपुत्र कुन्तीकुमार अर्जुनको जीवित हुआ देखोगे”
प्रभो! इस मणि को तुम अपने पिता की छाती पर रख दो। तब, हे पार्थ, तुम पाण्डव को जीवित हुआ देखोगे।
Verse 51
इत्युक्तः स्थापयामास तस्योरसि मर्णिं तदा । पार्थस्यामिततेजा: स पितु: स्नेहादपापकृत्,उलूपीके ऐसा कहनेपर निष्पाप कर्म करनेवाले अमित तेजस्वी बभ्रुवाहनने अपने पिता पार्थकी छातीपर स्नेहपूर्वक वह मणि रख दी
ऐसा कहे जाने पर निष्पाप कर्म करने वाले, अमित तेजस्वी बभ्रुवाहन ने पिता पार्थ के प्रति स्नेह से उस मणि को उनकी छाती पर रख दिया।
Verse 52
तस्मिन् न्यस्ते मणौ वीरो जिष्णुरुज्जीवित: प्रभु: । चिरसुप्त इवोत्तस्थौ मृष्टलोहितलोचन:,उस मणिके रखते ही शक्तिशाली वीर अर्जुन देरतक सोकर जगे हुए मनुष्यकी भाँति अपनी लाल आँखें मलते हुए पुनः जीवित हो उठे
उस मणि के रखे जाते ही शक्तिशाली वीर जिष्णु (अर्जुन) जीवित हो उठे। वे देर तक सोकर जागे हुए मनुष्य की भाँति लाल आँखें मलते हुए उठ बैठे।
Verse 53
तमुत्थितं महात्मानं लब्धसंज्ञं मनस्विनम् । समीक्ष्य पितरं स्वस्थं ववन्दे बश्रुवाहन:,अपने मनस्वी पिता महात्मा अर्जुनको सचेत एवं स्वस्थ होकर उठा हुआ देख बभ्रुवाहनने उनके चरणोंमें प्रणाम किया
अपने मनस्वी पिता महात्मा अर्जुन को सचेत और स्वस्थ होकर उठता देख बभ्रुवाहन ने उनके चरणों में प्रणाम किया।
Verse 54
उत्यथिते पुरुषव्याप्रे पुनर्लक्ष्मीवति प्रभो । दिव्या: सुमनस: पुण्या ववृषे पाकशासन:,प्रभो! पुरुषसिंह श्रीमान् अर्जुनके पुनः उठ जानेपर पाकशासन इन्द्रने उनके ऊपर दिव्य एवं पवित्र फूलोंकी वर्षा की
वैशम्पायन बोले— प्रभो! पुरुषसिंह श्रीमान् अर्जुन के पुनः उठ खड़े होने पर पाकशासन इन्द्र ने उसके ऊपर दिव्य और पवित्र पुष्पों की वर्षा की।
Verse 55
अनाहता दुन्दुभयो विनेदुर्मेघनि:स्वना: । साधु साध्विति चाकाशे बभूव सुमहान् स्वन:,मेघके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाली देव-दुन्दुभियाँ बिना बजाये ही बज उठीं और आकाशमें साधुवादकी महान् ध्वनि गूँजने लगी
वैशम्पायन बोले— बिना बजाये ही मेघ-गर्जना-सी गम्भीर ध्वनि करने वाली देव-दुन्दुभियाँ गूँज उठीं और आकाश में “साधु! साधु!” का महान् नाद फैल गया।
Verse 56
उत्थाय च महाबाहु: पर्याश्वस्तो धनंजय: । बभ्रुवाहनमालिड्ग्य समाजिघ्रत मूर्थनि,महाबाहु अर्जुन भलीभाँति स्वस्थ होकर उठे और बभ्रुवाहनको हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघने लगे
वैशम्पायन बोले— महाबाहु धनञ्जय (अर्जुन) पूर्णतः स्वस्थ होकर उठे और बभ्रुवाहन को हृदय से लगाकर उसके मस्तक को स्नेहपूर्वक सूँघने लगे।
Verse 57
ददर्श चापि दूरेडस्य मातरं शोककर्शिताम् । उलूप्या सह तिष्ठन्तीं ततो5पृच्छद् धनंजय:,उससे थोड़ी ही दूरपर बभ्रुवाहनकी शोकाकुल माता चित्रांगदा उलूपीके साथ खड़ी थी। अर्जुनने जब उसे देखा, तब बशभ्रुवाहनसे पूछा--
वैशम्पायन बोले— उसने थोड़ी दूर पर अपनी माता को भी देखा, जो शोक से कृश हो रही थी और उलूपी के साथ खड़ी थी; तब धनञ्जय (अर्जुन) ने बभ्रुवाहन से पूछा।
Verse 58
किमिदं लक्ष्यते सर्व शोकविस्मयहर्षवत् । रणाजिरममित्रघ्न यदि जानासि शंस मे,'शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर पुत्र! यह सारा समरांगण शोक, विस्मय और हर्षसे युक्त क्यों दिखायी देता है? यदि जानते हो तो मुझे बताओ
वैशम्पायन बोले— “हे शत्रुसंहारक वीर पुत्र! यह सारा रणांगण शोक, विस्मय और हर्ष से युक्त क्यों दिख रहा है? यदि जानते हो तो मुझे बताओ।”
Verse 59
जननी च किमर्थ ते रणभूमिमुपागता । नागेन्द्रदुहििता चेयमुलूपी किमिहागता,“तुम्हारी माता किसलिये रणभूमिमें आयी है? तथा इस नागराजकन्या उलूपीका आगमन भी यहाँ किसलिये हुआ है?
वैशम्पायन बोले— “तुम्हारी माता किस कारण रणभूमि में आई है? और नागराज की पुत्री यह उलूपी भी यहाँ क्यों आई है?”
Verse 60
जानाम्यहमिदं युद्ध त्वया मद्वचनात् कृतम् । स्त्रीणामागमने हेतुमहमिच्छामि वेदितुम्,“मैं तो इतना ही जानता हूँ कि तुमने मेरे कहनेसे यह युद्ध किया है; परंतु यहाँ स्त्रियोंके आनेका क्या कारण है? यह मैं जानना चाहता हूँ
वैशम्पायन बोले— “मैं इतना जानता हूँ कि तुमने मेरे कहने से यह युद्ध किया; पर यहाँ स्त्रियों के आने का कारण क्या है—यह मैं जानना चाहता हूँ।”
Verse 61
तमुवाच तथा पृष्टो मणिपूरपतिस्तदा । प्रसाद्य शिरसा विद्वानुलूपी पृच्छयतामियम्,पिताके इस प्रकार पूछनेपर विद्वान् मणिपुरनरेशने पिताके चरणोंमें सिर रखकर उन्हें प्रसन्न किया और कहा--'पिताजी! यह वृत्तान्त आप माता उलूपीसे पूछिये”
ऐसा पूछे जाने पर विद्वान् मणिपुरपति ने पिता के चरणों में सिर रखकर उन्हें प्रसन्न किया और कहा— “पिताजी! यह वृत्तान्त आप माता उलूपी से पूछिए।”
Verse 80
इति श्रीमहा भारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे अर्जुनप्रत्युज्जीवने अशीतितमो<ध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्वमेधिक पर्व के अनुगीता-पर्व में अश्वानुसरण तथा अर्जुन के पुनर्जीवन-विषयक अस्सीवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 233
दुर्मरं पुरुषेणेह मन्ये हुध्वन्यनागते । “चौड़ी छाती और विशाल भुजावाले अपने पतिको मारा गया देखकर भी जो मेरी माता चित्रांगदा देवीका दृढ़ हृदय विदीर्ण नहीं हो जाता है। इससे मैं यह मानता हूँ कि अन्तकाल आये बिना मनुष्यका मरना बहुत कठिन है
वैशम्पायन बोले— “मैं मानता हूँ कि अन्तकाल आये बिना यहाँ मनुष्य का मरना अत्यन्त कठिन है। चौड़ी छाती और विशाल भुजाओं वाले अपने पति को मरा हुआ देखकर भी मेरी माता देवी चित्रांगदा, धैर्यवती, शोक से विदीर्ण नहीं होतीं। इससे मैं यही निष्कर्ष करता हूँ कि अन्तिम घड़ी आये बिना मनुष्य पर मृत्यु सहज नहीं होती।”
Babhruvāhana treats his battlefield act as pitṛ-hatyā (father-slaying) and confronts the dilemma of whether any ritual or ethical remedy can address an offense perceived as uniquely non-expiable, despite the broader political-ritual context.
The chapter portrays moral responsibility as independent of outcome: even when actions occur under contested duties, the agent must examine harm, seek learned guidance, and prioritize restoration and truthfulness over self-justification.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter uses satya-vacana and prāyopaveśa as meta-ethical instruments: truth-assertion and self-restraint function as narrative signals that dharma is pursued through accountability and reparative intent.