Adhyaya 51
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 5152 Verses

Adhyaya 51

Adhyāya 51: Kṛṣṇa’s Leave-Taking and Departure for Dvārakā (द्वारकागमनानुमति)

Upa-parva: Dvārikāgamanānumati (Permission for Kṛṣṇa’s departure to Dvārakā)

Vaiśaṃpāyana narrates that Kṛṣṇa instructs Dāruka to yoke the chariot; the Pāṇḍava side also orders the retinue to prepare for travel toward Hāstinapura (Gajasāhvaya / Vāraṇasāhvaya). Kṛṣṇa and Arjuna ride together, conversing; Arjuna then delivers an extended panegyric that frames Kṛṣṇa as cosmic ground and operative intelligence behind decisive wartime outcomes (including strategic guidance and the neutralization of key adversaries). Arriving at Dhṛtarāṣṭra’s residence, both offer formal respects to Dhṛtarāṣṭra, Gāndhārī, Kuntī, Yudhiṣṭhira, Bhīma, the twins, Vidura, and the assembled women of the house, then retire. At dawn they approach Yudhiṣṭhira; Arjuna requests permission for Kṛṣṇa to go to Dvārakā to see Vasudeva, Devakī, Balarāma, and the Vṛṣṇis. Yudhiṣṭhira consents, instructs Kṛṣṇa to convey honors and remembrance, and asks him to return for the horse sacrifice. Kṛṣṇa replies with deference, declining material gifts by affirming Yudhiṣṭhira’s lordship over wealth and land, then departs in a divine chariot, accompanied and ceremonially sent off by prominent allies and citizens.

Chapter Arc: ब्रह्म-वाणी में पंचमहाभूत, मन-बुद्धि और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का रहस्य खुलता है—जैसे भीतर का सारथि इन्द्रियों को साधता है। → सृष्टि-चक्र का आवर्तन (ऋषि-प्रजापति-तत्त्वों का बार-बार उद्भव और लय) और ‘दुराप’ सत्य तक पहुँचने की कठिनता सामने आती है—पर उपाय एक ही बताया जाता है: तप और संयम। → समस्त संस्कारों का शोधन कर आत्मा को आत्मा में संयमित करने वाला साधक उस ‘शुभ ब्रह्म’ को जान लेता है, जिसके आगे फिर कुछ शेष नहीं—अनुगीता का दार्शनिक शिखर यहीं है। → कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—यदि मुझमें प्रीति है तो इस अध्यात्म को सुनकर सम्यक आचरण करो; फिर वे अपने पिता (वसुदेव) के दर्शन की इच्छा प्रकट करते हैं। अर्जुन सहमत होकर नगर चलने को कहता है और युधिष्ठिर से अनुमति लेकर अपनी पुरी जाने की योजना बनती है। → कृष्ण का पिता-दर्शन और अर्जुन का प्रस्थान—आगे नगर-गमन में कौन-सा भावनात्मक/राजनीतिक प्रसंग उभरेगा?

Shlokas

Verse 1

/ अपन का छा है >> >> एकपज्चाशत्तमो< ध्याय: तपस्याका प्रभाव

ब्रह्मा ने कहा—हे महर्षियो! जैसे इन पाँच महाभूतों की उत्पत्ति और नियमन में मन समर्थ है, वैसे ही उनकी स्थिति के काल में भी मन ही भूतों का आत्मा कहा जाता है।

Verse 2

अधिष्ठाता मनो नित्यं भूतानां महतां तथा । बुद्धिरैश्वर्यमाचष्टे क्षेत्रज्ञक्ष स उच्यते,उन पज्चमहाभूतोंका नित्य आधार भी मन ही है। बुद्धि जिसके ऐश्वर्यको प्रकाशित करती है, वह क्षेत्रज्ञ कहा जाता है

महाभूतों सहित समस्त भूतों का नित्य अधिष्ठाता मन ही है। जिसमें बुद्धि ऐश्वर्य और प्रभुत्व को प्रकाशित करती है, वही क्षेत्रज्ञ कहा जाता है।

Verse 3

इन्द्रियाणि मनो युड्धक्ते सदश्चानिव सारथि: । इन्द्रियाणि मनो बुद्धि: क्षेत्रज्ञे युज्यते सदा

जैसे कुशल सारथि अच्छे घोड़ों को अपने वश में रखता है, वैसे ही मन समस्त इन्द्रियों पर शासन करता है। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि—ये सदा क्षेत्रज्ञ के साथ संयुक्त रहते हैं।

Verse 4

महदश्वसमायुक्तं बुद्धिसंयमनं रथम्‌ | समारुह् स भूतात्मा समन्तात्‌ परिधावति

जिस देहरूपी रथ में इन्द्रियरूपी घोड़े जुते हैं और जिसका नियन्त्रण बुद्धिरूपी लगाम से होता है, उस पर आरूढ़ होकर वह भूतात्मा (क्षेत्रज्ञ) चारों ओर दौड़ता रहता है।

Verse 5

इन्द्रियग्रामसंयुक्तो मनःसारथिरेव च | बुद्धिसंयमनो नित्यं महान्‌ ब्रह्ममयो रथ:,ब्रह्ममय रथ सदा रहनेवाला और महान है, इन्द्रियाँ उसके घोड़े, मन सारथि और बुद्धि चाबुक है

यह महान ब्रह्ममय रथ नित्य है। इन्द्रियाँ इसके घोड़े हैं, मन इसका सारथि है और बुद्धि—जो सदा संयम करती है—इसकी लगाम/चाबुक है।

Verse 6

एवं यो वेत्ति विद्वान्‌ वै सदा ब्रह्ममयं रथम्‌ | स धीर: सर्वभूतेषु न मोहमधिगच्छति,इस प्रकार जो विद्वान्‌ इस ब्रह्ममय रथकी सदा जानकारी रखता है, वह समस्त प्राणियोंमें धीर है और कभी मोहमें नहीं पड़ता

जो विद्वान् इस ब्रह्ममय रथ को सदा इसी प्रकार जानता है, वह समस्त प्राणियों के प्रति धीर रहता है और कभी मोह को प्राप्त नहीं होता।

Verse 7

अव्यक्तादि विशेषान्तं सहस्थावरजड्रमम्‌ । सूर्यचन्द्रप्रभालोकं ग्रहनक्षत्रमण्डितम्‌

वायु ने कहा—यह जगत् एक ब्रह्मवन है। अव्यक्त प्रकृति इसका आदि है और सोलह विशेषों तक इसका विस्तार है—पाँच महाभूत, दस इन्द्रियाँ और एक मन। यह स्थावर-जङ्गम प्राणियों से भरा है। सूर्य-चन्द्रमा के प्रकाश से प्रकाशित है, ग्रह-नक्षत्रों से मण्डित है, और नदियों तथा पर्वतसमूहों से चारों ओर विभूषित है। नाना प्रकार के जलों से यह सदा अलंकृत रहता है। यही समस्त भूतों का जीवन है और समस्त प्राणियों की गति है। इस ब्रह्मवन में क्षेत्रज्ञ विचरण करता है।

Verse 8

नदीपर्वतजालै श्व सर्वतः परिभूषितम्‌ । विविधाभिस्तथा चाद्धिः सततं समलंकृतम्‌

वायु-देव बोले— “यह समस्त जगत् एक ही ब्रह्मवन है। इसकी आदि अव्यक्त प्रकृति है। पाँच महाभूत, दस इन्द्रियाँ और एक मन—इन सोलह विशेष तत्त्वों तक इसका विस्तार है। यह चराचर प्राणियों से परिपूर्ण है; सूर्य-चन्द्रमा आदि के प्रकाश से प्रकाशित है; ग्रहों और नक्षत्रों से सुशोभित है; नदियों और पर्वत-समूहों के जाल से सब ओर विभूषित है; और नाना प्रकार के जलों से सदा अलंकृत है। यही समस्त भूतों का जीवन है और समस्त प्राणियों की गति है। इस ब्रह्मवन में क्षेत्रज्ञ विचरण करता है।”

Verse 9

आजीवं सर्वभूतानां सर्वप्राणभूतां गति: । एतद्‌ ब्रह्मवनं नित्यं तस्समिं श्वरति क्षेत्रवित्‌

वायु-देव बोले— “यही समस्त भूतों की आजीविका है और समस्त प्राणियों की परम गति है। यह नित्य जगत ‘ब्रह्मवन’ है; इसके भीतर क्षेत्रज्ञ (चेतन आत्मा) विचरण करता है।”

Verse 10

लोके5स्मिन्‌ यानि सत्त्वानि त्रसानि स्थावराणि च । तान्येवाग्रे प्रलीयन्ते पश्चाद्‌ भूतकृता गुणा: । गुणेभ्य: पञचभूतानि एष भूतसमुच्छूय:

वायु-देव बोले— “इस लोक में जो-जो सत्त्व हैं—जंगम और स्थावर—वे सबसे पहले प्रकृति में विलीन होते हैं। फिर पाँच भूतों से उत्पन्न कार्यरूप गुण लीन होते हैं; और उन गुणों के लय के बाद स्वयं पाँच महाभूत भी लीन हो जाते हैं। इस प्रकार समस्त भूतसमुदाय प्रकृति में समा जाता है।”

Verse 11

देवा मनुष्या गन्धर्वा: पिशाचासुरराक्षसा: । सर्वे स्वभावत: सृष्टा न क्रियाभ्यो न कारणात्‌

वायु बोले— “देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पिशाच, असुर और राक्षस—ये सभी अपने-अपने स्वभाव से सृजित हैं; न किसी विशेष क्रिया से, न किसी बाह्य कारण से इनकी उत्पत्ति हुई है।”

Verse 12

एते विश्वसृजो विप्रा जायन्तीह पुन: पुनः । तेभ्य: प्रसूतास्तेष्वेव महाभूतेषु पडचसु । प्रलीयन्ते यथाकालमूर्मय: सागरे यथा

वायु बोले— “विश्व की सृष्टि करने वाले ये विप्र—मरीचि आदि—यहाँ बार-बार जन्म लेते हैं। वे पाँच महाभूतों से उत्पन्न होकर, समय आने पर उन्हीं पाँच महाभूतों में लीन हो जाते हैं—जैसे समुद्र में तरंगें उठती हैं और काल पाकर उसी में शांत हो जाती हैं।”

Verse 13

विश्वसृग्भ्यस्तु भूते भ्यो महा भूतास्तु सर्वश: । भूतेभ्यश्चापि पञ्चभ्यो मुक्तो गच्छेत्‌ परां गतिम्‌

विश्व की रचना करने वाले प्राणियों से ही सर्वथा पंच महाभूत प्रकट होते हैं। और जो उन पाँच महाभूतों के बन्धन से भी मुक्त हो जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

Verse 14

प्रजापतिरिदं सर्व मनसैवासृजत्‌ प्रभु: । तथैव देवानूषयस्तपसा प्रतिपेदिरे,शक्तिसम्पन्न प्रजापतिने अपने मनके ही द्वारा सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि की है तथा ऋषि भी तपस्यासे ही देवत्वको प्राप्त हुए हैं

समर्थ प्रभु प्रजापति ने केवल मन के द्वारा ही इस समस्त जगत की सृष्टि की। उसी प्रकार ऋषियों ने भी तपस्या से देवत्व को प्राप्त किया।

Verse 15

तपसश्चानुपूव्येंण फलमूलाशिनस्तथा । त्रैलोक्यं तपसा सिद्धा: पश्यन्तीह समाहिता:

तपस्या की क्रमिक साधना से, तथा फल-मूल का आहार करने से, तप से सिद्ध हुए महात्मा यहाँ चित्त को एकाग्र करके तीनों लोकों को क्रमशः प्रत्यक्ष देखते हैं।

Verse 16

ओऔषधान्यगदादीनि नानाविद्याशक्ष सर्वश: । तपसैव प्रसिद्धयन्ति तपोमूलं हि साधनम्‌,आरोग्यकी साधनभूत ओषधियाँ और नाना प्रकारकी विद्याएँ तपसे ही सिद्ध होती हैं। सारे साधनोंकी जड़ तपस्या ही है

आरोग्य के साधनभूत ओषधियाँ, अगद आदि तथा नाना प्रकार की विद्याएँ—ये सब तपस्या से ही प्रसिद्धि और सिद्धि पाती हैं; क्योंकि समस्त साधनों की जड़ तप ही है।

Verse 17

यददुरापं दुराम्नायं दुराधर्ष दुरन्वयम्‌ | तत्‌ सर्व तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्‌

जो अत्यन्त दुर्लभ है, जिसका अभ्यास कठिन है, जिसे वश में करना कठिन है और जिसकी संगति या अनुरूपता कठिन है—वह सब तपस्या से साध्य हो जाता है; क्योंकि तप का प्रभाव दुर्जेय है।

Verse 18

सुरापो ब्रह्महा स्तेयी भ्रूणहा गुरुतल्पग: । तपसैव सुतप्तेन मुच्यते किल्बिषात्‌ ततः

वायु ने कहा—शराबी, ब्राह्मण-हन्ता, चोर, भ्रूण-हन्ता और गुरु-पत्नी की शय्या का अपमान करने वाला—ऐसा घोर पापी भी, यदि सत्य और तीव्र तप करे, तो केवल तपस्या से ही उस पाप-भार से मुक्त हो जाता है।

Verse 19

मनुष्या: पितरो देवा: पशवो मृगपक्षिण: । यानि चान्यानि भूतानि त्रसानि स्थावराणि च

वायु ने कहा—मनुष्य, पितर, देवता, पशु, मृग और पक्षी—तथा अन्य जो भी प्राणी हैं, चर और अचर।

Verse 20

तपः:परायणा नित्यं सिद्धयन्ते तपसा सदा । तथैव तपसा देवा महामाया दिवं गता:

वायु ने कहा—जो नित्य तपस्या में परायण रहते हैं, वे सदा तपस्या से ही सिद्धि पाते हैं। उसी प्रकार तपस्या के बल से महामायावी देवता स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं।

Verse 21

मनुष्य, पितर, देवता, पशु, मृग, पक्षी तथा अन्य जितने चराचर प्राणी हैं, वे सब नित्य तपस्यामें संलग्न होकर ही सदा सिद्धि प्राप्त करते हैं। तपस्याके बलसे ही महामायावी देवता स्वर्गमें निवास करते हैं ।।

वायु ने कहा—मनुष्य, पितर, देवता, पशु, मृग, पक्षी तथा अन्य जितने भी चर-अचर प्राणी हैं, वे सब नित्य तपस्या में संलग्न होकर ही सदा सिद्धि प्राप्त करते हैं। तपस्या के बल से ही महामायावी देवता स्वर्ग में निवास करते हैं। पर जो लोग आलस्य त्यागकर, आशीर्वादयुक्त सकाम कर्म करते हुए भी अहंकार से युक्त रहते हैं, वे प्रजापति के लोक को जाते हैं।

Verse 22

ध्यानयोगेन शुद्धेन निर्ममा निरहंकृता: । आप्नुवन्ति महात्मानो महान्तं लोकमुत्तमम्‌,जो अहंता-ममतासे रहित हैं, वे महात्मा विशुद्ध ध्यानयोगके द्वारा महान्‌ उत्तम लोकको प्राप्त करते हैं

वायु-देव ने कहा—जो महात्मा विशुद्ध ध्यानयोग से शुद्ध होकर, ममता से रहित और अहंकार से शून्य हो जाते हैं, वे महान् उत्तम लोक को प्राप्त करते हैं।

Verse 23

ध्यानयोगमुपागम्य प्रसन्नमतय: सदा । सुखोपचयमव्यक्तं प्रविशन्त्यात्मवित्तमा:

जो ध्यानयोग का आश्रय लेकर सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं, वे आत्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ पुरुष सुख की राशिभूत अव्यक्त परमात्मा में प्रवेश करते हैं।

Verse 24

ध्यानयोगमादुपागम्य निर्ममा निरहंकृता: । अव्यक्तं प्रविशन्‍्तीह महतां लोकमुत्तमम्‌

पर जो ध्यानयोग से पीछे लौटकर—अर्थात् ध्यान में असफल होकर भी—ममता और अहंकार से रहित जीवन व्यतीत करता है, वह निष्काम पुरुष भी महापुरुषों के उत्तम अव्यक्त लोक में लीन हो जाता है।

Verse 25

अव्यक्तादेव सम्भूत: समसंज्ञां गत: पुन: । तमोरजो भ्यां निर्मुक्त: सत्त्वमास्थाय केवलम्‌

वह अव्यक्त से ही प्रकट होकर फिर समता की अवस्था को प्राप्त होता है; तमोगुण और रजोगुण के बन्धनों से मुक्त होकर केवल सत्त्व का आश्रय लेता है।

Verse 26

निर्मुक्त: सर्वपापेभ्य: सर्व सृजति निष्कलम्‌ | क्षेत्रज्ञ इति तं विद्याद्‌ यस्तं वेद स वेदवित्‌

जो सब पापों से मुक्त होकर भी निष्कलंक रहते हुए सबकी सृष्टि करता है, उसे ‘क्षेत्रज्ञ’ जानना चाहिए; जो उसे जान लेता है, वही वेदवेत्ता है।

Verse 27

जो सब पापोंसे मुक्त रहकर सबकी सृष्टि करता है, उस अखण्ड आत्माको क्षेत्रज्ञ समझना चाहिये। जो मनुष्य उसका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वही वेदवेत्ता है ।।

चित्त को चित्त के ही मूल में लौटा कर मुनि संयमित होकर स्थित रहे; क्योंकि चित्त जिस में लग जाता है, वह निश्चय ही उसी का स्वरूप हो जाता है—यह सनातन गोपनीय रहस्य है।

Verse 28

अव्यक्तादिविशेषान्तमविद्यालक्षणं स्मृतम्‌ । निबोधत तथा हीदं गुणैर्लक्षणमित्युत,अव्यक्तसे लेकर सोलह विशेषोंतक सभी अविद्याके लक्षण बताये गये हैं। ऐसा समझना चाहिये कि यह गुणोंका ही विस्तार है

अव्यक्त से लेकर सोलह विशेषों तक—यह सब अविद्या का लक्षण कहा गया है। और यह भी समझो कि यहाँ जो वर्णन है, वह वास्तव में गुणों के ही लक्षणों का विस्तार है।

Verse 29

द्वयक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्रयक्षरं ब्रह्म शाश्वतम्‌ । ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम्‌

दो अक्षर का ‘मम’ (यह मेरा है) मृत्यु-स्वरूप है, और तीन अक्षर का ‘न मम’ (यह मेरा नहीं) शाश्वत ब्रह्म की ओर ले जाने वाला है। ‘मेरा’ मृत्यु देता है; ‘मेरा नहीं’ सनातन को देता है।

Verse 30

कर्म केचित्‌ प्रशंसन्ति मन्दबुद्धिरता नरा: । ये तु वृद्धा महात्मानो न प्रशंसन्ति कर्म ते

कुछ मन्दबुद्धि में रत मनुष्य कर्म की प्रशंसा करते हैं; पर जो वृद्ध महात्मा हैं, वे उन कर्मों को श्रेष्ठ नहीं मानते।

Verse 31

कर्मणा जायते जन्तुर्मूर्तिमान्‌ू षोडशात्मक: । पुरुषं ग्रसते5विद्या तद्‌ ग्राह्मममृताशिनाम्‌

कर्म से जीव जन्म लेता है और सोलह तत्त्वों से युक्त स्थूल देह धारण करता है। अविद्या पुरुष को निगलती रहती है; और वह अमृतभोजी देवताओं तक के लिए भी ग्राह्य—अर्थात् उनके वश में—हो जाता है।

Verse 32

तस्मात्‌ कर्मसु निःस्नेहा ये केचित्‌ पारदर्शिन: । विद्यामयो<यं पुरुषो न तु कर्ममय: स्मृत:

इसलिए जो पारदर्शी ज्ञानी हैं, वे कर्मों में आसक्त नहीं होते; क्योंकि यह पुरुष (आत्मा) ज्ञानमय माना गया है, कर्ममय नहीं।

Verse 33

य एवममृतं नित्यमग्राहां शश्वदक्षरम्‌ । वश्यात्मानमसंश्लटिष्टं यो वेद न मृतो भवेत्‌

वायु बोले—जो इस प्रकार चेतन आत्मा को अमृतस्वरूप, नित्य, इन्द्रियातीत, शाश्वत और अक्षर; जितेन्द्रिय तथा असंग जानता है, वह मृत्यु के बन्धन में नहीं पड़ता।

Verse 34

अपूर्वमकृतं नित्यं य एनमविचारिणम्‌ | य एवं विन्देदात्मानमग्राह्मममृताशनम्‌ । अग्राह्मोड्मृतो भवति स एशभि: कारणैर्ध्ुव:

वायु बोले—जिसकी दृष्टि में आत्मा अपूर्व (अनादि), अकृत (अजन्मा), नित्य, अचल, अग्राह्य और अमृताशी है, वह इन गुणों का चिन्तन करके स्वयं भी इन्द्रियातीत, निश्चल और अमृतस्वरूप हो जाता है।

Verse 35

आयोज्य सर्वसंस्कारान्‌ संयम्यात्मानमात्मनि | स तद्‌ ब्रह्म शुभं वेत्ति यस्माद्‌ भूयो न विद्यते

जो चित्त को शुद्ध करने वाले समस्त संस्कारों का सम्पादन करके मन को आत्मा में संयमित कर देता है, वही उस कल्याणमय ब्रह्म को जान लेता है, जिससे बढ़कर कुछ नहीं।

Verse 36

प्रसादे चैव सत्त्वस्य प्रसादं समवाप्नुयात्‌ लक्षणं हि प्रसादस्य यथा स्यात्‌ स्वप्नदर्शनम्‌

वायु बोले—अन्तःकरण के स्वच्छ हो जाने पर साधक को शुद्ध प्रसन्नता प्राप्त होती है। प्रसाद का लक्षण यह है कि जैसे जागे हुए मनुष्य के लिए स्वप्न-दर्शन शांत हो जाता है, वैसे ही चित्त-शुद्धि का चिह्न निर्मल, अविचल आनन्द है।

Verse 37

गतिरेषा तु मुक्तानां ये ज्ञानपरिनिषछिता: । प्रवृत्तयश्न या: सर्वा: पश्यन्ति परिणामजा:,ज्ञाननिष्ठ जीवन्मुक्त महात्माओंकी यही परम गति है; क्योंकि वे उन समस्त प्रवृत्तियोंको शुभाशुभ फल देनेवाली समझते हैं

वायु बोले—ज्ञान में परिनिष्ठित मुक्त महात्माओं की यही परम गति है; क्योंकि वे समस्त प्रवृत्तियों को परिणामजन्य समझते हैं और उन्हें शुभ-अशुभ फल देने वाली जानकर भीतर से मुक्त रहते हैं।

Verse 38

एषा गतिर्विरक्तानामेष धर्म: सनातन: । एषा ज्ञानवतां प्राप्तिरेतद्‌ वृत्तमनिन्दितम्‌,यही विरक्त पुरुषोंकी गति है, यही सनातन धर्म है, यही ज्ञानियोंका प्राप्तव्य स्थान है और यही अनिन्दित सदाचार है

यह विरक्त जनों की यही गति है; यही सनातन धर्म है। यही ज्ञानियों का प्राप्तव्य पद है, और यही अनिन्द्य सदाचार है।

Verse 39

समेन सर्वभूतेषु निःस्प्हेण निराशिषा | शक्‍्या गतिरियं गन्तुं सर्वत्र समदर्शिना

जो समस्त प्राणियों में समभाव रखता है, जो निःस्पृह और निराशिष है तथा जिसकी दृष्टि सर्वत्र सम है—वही ज्ञानी पुरुष इस परम गति को प्राप्त कर सकता है।

Verse 40

एतद्‌ व: सर्वमाख्यातं मया विप्रर्षिसत्तमा: । एवमाचरत क्षिप्रं ततः सिद्धिमवाप्स्यथ

हे विप्रर्षियों में श्रेष्ठो! यह सब मैंने तुमसे पूर्णतः कह दिया। अब इसी प्रकार शीघ्र आचरण करो; तब तुम परम सिद्धि प्राप्त करोगे।

Verse 41

गुरुउ्वाच इत्युक्तास्ते तु मुनयो गुरुणा ब्रह्मणा तथा । कृतवन्तो महात्मानस्ततो लोकमवाप्नुवन्‌

गुरु—ब्रह्मा—द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उन महात्मा मुनियों ने उसी के अनुसार आचरण किया; और तब उन्होंने उत्तम लोक प्राप्त किया।

Verse 42

त्वमप्येतनन्‍्महा भाग मयोक्तं ब्रह्मणो वच: । सम्यगाचर शुद्धात्मंस्तत: सिद्धिमवाप्स्यसि

हे महाभाग! तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध है; अतः मेरे द्वारा कहे गए ब्रह्मा के इस उपदेश का भलीभाँति आचरण करो। तब तुम भी सिद्धि प्राप्त करोगे।

Verse 43

वायुदेव उवाच इत्युक्त: स तदा शिष्यो गुरुणा धर्ममुत्तमम्‌ । चकार सर्व कौन्तेय ततो मोक्षमवाप्तवान्‌

वायुदेव बोले—गुरुदेव की ऐसी शिक्षा पाकर उस शिष्य ने समस्त उत्तम धर्मों का यथावत् पालन किया। इसलिए, हे कौन्तेय, वह संसार-बन्धन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त हुआ।

Verse 44

कृतकृत्यश्न स तदा शिष्य: कुरुकुलोदवह । तत्‌ पद समनुप्राप्तो यत्र गत्वा न शोचति,कुरुकुलनन्दन! उस समय कृतार्थ होकर उस शिष्यने वह ब्रह्मपद प्राप्त किया, जहाँ जाकर शोक नहीं करना पड़ता

वायुदेव बोले—कुरुकुल-नन्दन! उस समय कृतार्थ होकर उस शिष्य ने वह परम पद (ब्रह्मपद) प्राप्त किया, जहाँ पहुँचकर फिर शोक नहीं करना पड़ता।

Verse 45

अर्जुन उवाच को न्वसौ ब्राह्मण: कृष्ण कश्च शिष्यो जनार्दन । श्रोतव्यं चेन्मयैतद्‌ वै तत्त्वमाचक्ष्व मे विभो

अर्जुन बोले—जनार्दन श्रीकृष्ण! वे ब्रह्मनिष्ठ गुरु कौन थे और शिष्य कौन था? प्रभो, यदि यह तत्त्व मेरे सुनने योग्य हो, तो कृपा करके मुझे ठीक-ठीक बताइए।

Verse 46

वायुदेव उवाच अहं गुरुर्महाबाहो मन: शिष्यं च विद्धि मे । त्वत्प्रीत्या गुह्ममेतच्च कथितं ते धनंजय

वायुदेव बोले—महाबाहो! मैं ही गुरु हूँ और मेरे मन को ही शिष्य समझो। धनंजय! तुम्हारे प्रति स्नेहवश मैंने यह गोपनीय रहस्य तुम्हें बताया है।

Verse 47

मयि चेदस्ति ते प्रीतिर्नित्यं कुरुकुलोद्वह । अध्यात्ममेतच्छुत्वा त्वं सम्यगाचर सुव्रत

वायुदेव बोले—कुरुकुल-नन्दन! यदि मुझ पर तुम्हारा नित्य प्रेम और श्रद्धा है, तो इस अध्यात्म-तत्त्व को सुनकर तुम उत्तम व्रतधारी की भाँति इसका यथावत् और निरन्तर आचरण करो।

Verse 48

ततस्त्वं सम्यगाचीर्णे धर्मेडस्मिन्नरिकर्षण । सर्वपापविनिर्मुक्तो मोक्ष प्राप्स्पसि केवलम्‌,शत्रुदमन! इस धर्मका पूर्णतया आचरण करनेपर तुम समस्त पापोंसे छूटकर विशुद्ध मोक्षको प्राप्त कर लोगे

तब, हे शत्रुदमन! इस धर्म का सम्यक् और पूर्ण आचरण कर लेने पर तुम समस्त पापों से मुक्त होकर केवल विशुद्ध मोक्ष को प्राप्त करोगे।

Verse 49

पूर्वमप्येतदेवोक्त युद्धकाल उपस्थिते । मया तव महाबाहो तस्मादत्र मन: कुरु,महाबाहो! पहले भी मैंने युद्धकाल उपस्थित होनेपर यही उपदेश तुमको सुनाया था। इसलिये तुम इसमें मन लगाओ

हे महाबाहो! युद्धकाल उपस्थित होने पर पहले भी मैंने यही उपदेश तुम्हें सुनाया था; इसलिए अब तुम इसी में अपना मन लगाओ।

Verse 50

मया तु भरतश्रेष्ठ चिरदृष्ट: पिता प्रभु: । तमहं द्रष्टमेच्छामि सम्मते तव फाल्गुन

हे भरतश्रेष्ठ फाल्गुन (अर्जुन)! मेरे प्रभु पिता को देखे बहुत दिन हो गए हैं; मैं उनका दर्शन करना चाहता हूँ। यदि तुम्हारी सम्मति हो, तो मैं द्वारका जाकर उनके दर्शन करूँ।

Verse 51

वैशम्पायन उवाच इत्युक्तवचन कृष्णं प्रत्युवाच धनंजय: । गच्छावो नगरं कृष्ण गजसाह्दयमद्य वै

वैशम्पायन बोले—कृष्ण के ऐसा कहने पर धनंजय (अर्जुन) ने उत्तर दिया—“हे कृष्ण! आज ही हम गजसाह्वय (हस्तिनापुर) नगर चलें। वहाँ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर से मिलकर और उनकी आज्ञा लेकर आप अपनी पुरी को पधारें।”

Verse 52

समेत्य तत्र राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम्‌ । समनुज्ञाप्य राजान स्वां पुरी यातुमहसि

वहाँ जाकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर से मिलो और उनसे अनुमति लेकर फिर अपनी पुरी को जाना तुम्हारे लिये उचित है।

Frequently Asked Questions

The chapter balances personal devotion and gratitude toward Kṛṣṇa with institutional dharma: departures, honors, and resources are regulated through the king’s consent and court protocol, not private impulse.

Arjuna frames Kṛṣṇa as both transcendent ground and practical guide—suggesting that effective action and moral restoration require aligning human agency with a larger cosmological order and disciplined counsel.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s function is narrative and doctrinal—integrating post-war legitimacy, devotional theology, and courtly procedure within the broader Āśvamedhika arc.