
Sāttvika-vṛtta-kathana (Brahmā on the Conduct of Sattva) — Chapter 38
Upa-parva: Guṇa–Vṛtta Upadeśa (Sāttvika Conduct Discourse) — within Āśvamedhika Parva
Brahmā enumerates the ‘third and highest guṇa’ as a practical ethic beneficial to all beings (sarvabhūtahita) and praised as the blameless dharma of the good (satām). The chapter catalogues sattva-markers spanning affect (ānanda, prīti, harṣa), social-ethical restraints (ahiṃsā, akrodha, anasūyā, apaiśunam), and disciplines of character (śauca, tyāga, atandritā, vinaya). A central evaluative claim is repeated: knowledge, conduct, service, exertion, giving, sacrifice, study, vows, and even tapas become ‘mudhā’ (ineffectual) if not integrated with yuktadharma—aligned ethical practice. The discourse defines the stable posture of the sāttvika person as nirmamatva (non-possessiveness), nirahaṃkāra (non-egoism), nirāśīḥ (non-expectation), and sarvataḥ-samatā (equanimity). It then describes the post-mortem fruition for such persons—freedom from sorrow, attainment of heaven, and capacities likened to divine powers—before closing with an epistemic thesis: one who understands the guṇas ‘enjoys the guṇas’ rather than being consumed by them.
Chapter Arc: ब्रह्मा गुरु-स्वर में शिष्य-समूह को संबोधित करते हैं: अब मैं ‘तृतीय’—उत्तम सत्त्वगुण—का वर्णन करूँगा, जो लोक में सर्वभूतहितकारी है। → सत्त्व के लक्षण एक-एक कर उजागर होते हैं—आनन्द, प्रीति, प्रकाश, सुख, अकार्पण्य, असंरम्भ, संतोष, श्रद्धा; फिर क्षमा, धृति, अहिंसा, समता, सत्य, आर्जव, अक्रोध, अनसूया, शौच, दाक्ष्य, पराक्रम; और आगे विनय, साधुवृत्ति, शान्तिकर्म, शुद्धि, शुभबुद्धि—मानो मनुष्य के भीतर का युद्ध अब गुणों के स्तर पर लड़ा जा रहा हो। → गुरु निर्णायक रूप से ‘सात्त्विक वृत्त’ का फल बताते हैं: जो इस आचरण को विधिवत जानकर धारण करता है, वह इच्छित फल प्राप्त करता है; और सत्त्वसम्पन्न महात्मा ‘ऊर्ध्वस्रोतस्’ देवतुल्य वैकारिक माने जाते हैं—ईशित्व, वशित्व, लघिमा आदि मानसिक सिद्धियों की ओर संकेत होता है। → सत्त्व-आधारित जीवन को ब्राह्मण-धर्म, यज्ञ, अध्ययन, व्रत, तप और साधु-दृष्टि से जोड़ा जाता है; अध्याय यह स्थापित करता है कि शुद्ध आचरण ही उन्नति का द्वार है, पर सिद्धि/स्वर्ग के भोग-संस्कार चित्त को विकृत भी कर सकते हैं। → स्वर्ग-प्राप्ति के बाद भोगजनित संस्कारों से चित्त-विकृति का संकेत आगे के विवेचन का द्वार खोलता है—क्या सिद्धि और भोग साधक को बाँध देंगे या मुक्त करेंगे?
Verse 1
अफ-्#-रात अष्टात्रिशो5 ध्याय: सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल ब्रह्मोवाच अतः: पर प्रवक्ष्यामि तृतीयं गुणमुत्तमम् । सर्वभूतहितं लोके सतां धर्ममनिन्दितम्,ब्रह्माजीने कहा--महर्षियो! अब मैं तीसरे उत्तम गुण (सत्त्वगुण)-का वर्णन करूँगा, जो जगत्में सम्पूर्ण प्राणियोंका हितकारी और श्रेष्ठ पुरुषोंका प्रशंसनीय धर्म है
ब्रह्मा ने कहा—महर्षियो! अब मैं तीसरे और उत्तम गुण—सत्त्वगुण—का वर्णन करूँगा, जो लोक में समस्त प्राणियों का हितकारी है, सज्जनों द्वारा प्रशंसित और आचरण में निर्दोष धर्म है।
Verse 2
आनन्द: प्रीतिरुद्रेक: प्राकाश्यं सुखमेव च । अकार्पण्यमसंरम्भ: सन्तोष: श्रद्धधानता,आनन्द, प्रसन्नता, उन्नति, प्रकाश, सुख, कृपणताका अभाव, निर्भयता, संतोष, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, किसीके दोष न देखना, पवित्रता, चतुरता और पराक्रम--ये सत्त्वगुणके कार्य हैं
वायुदेव ने कहा—आनन्द, प्रीति, हर्ष का उद्रेक, अन्तःकरण की प्रकाशता और सुख; कृपणता का अभाव, असंरम्भ (अशान्ति-रहित शान्त स्वभाव), संतोष और दृढ़ श्रद्धा—ये सत्त्वगुण के लक्षणरूप कार्य हैं।
Verse 3
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् | अक्रोधश्वानसूया च शौचं दाक्ष्यं पराक्रम:,आनन्द, प्रसन्नता, उन्नति, प्रकाश, सुख, कृपणताका अभाव, निर्भयता, संतोष, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, किसीके दोष न देखना, पवित्रता, चतुरता और पराक्रम--ये सत्त्वगुणके कार्य हैं
वायु-देव बोले— क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, क्रोध का अभाव, किसी के दोष न देखना, पवित्रता, चतुरता और पराक्रम—ये सत्त्वगुण के लक्षण और उसके कार्य हैं।
Verse 4
मुधा ज्ञानं मुधा वृत्तं मुधा सेवा मुधा श्रम: । एवं यो युक्तधर्म: स्यात् सोअमुत्रात्यन्तमश्षुते,नाना प्रकारकी सांसारिक जानकारी, सकाम व्यवहार, सेवा और श्रम व्यर्थ है--ऐसा समझकर जो कल्याणके साधनमें लग जाता है, वह परलोकमें अक्षय सुखका भागी होता है
वायु बोले— सांसारिक ज्ञान व्यर्थ है, सांसारिक आचरण व्यर्थ है, और केवल लौकिक फल के लिए की गई सेवा तथा श्रम भी व्यर्थ हैं। यह समझकर जो युक्त-धर्म, अर्थात् कल्याण के सच्चे साधन में लग जाता है, वह परलोक में अक्षय, परम सुख पाता है।
Verse 5
निर्ममो निरहड़कारो निराशी: सर्वतः सम: । अकामभूत इत्येव सतां धर्म: सनातन:,ममता, अहंकार और आशासे रहित होकर सर्वत्र समदृष्टि रखना और सर्वथा निष्काम हो जाना ही श्रेष्ठ पुरुषोंका सनातन धर्म है
वायु-देव बोले— ममता से रहित, अहंकार से रहित, आशा-तृष्णा से रहित; और सर्वत्र, हर अवस्था में समदृष्टि रखने वाला; तथा पूर्णतः निष्काम हो जाना—यही सत्पुरुषों का सनातन धर्म कहा गया है।
Verse 6
विश्रम्भो द्वीस्तितिक्षा च त्याग शौचमतन्द्रिता । आनृशंस्यमसम्मोहो दया भूतेष्वपैशुनम्,विश्वास, लज्जा, तितिक्षा, त्याग, पवित्रता, आलस्यरहित होना, कोमलता, मोहका अभाव, प्राणियोंपर दया करना, चुगली न खाना, हर्ष, संतोष, गर्वहीनता, विनय, सद्बर्ताव, शान्तिकर्ममें शुद्धभावसे प्रवृत्ति, उत्तम बुद्धि, आसक्तिसे छूटना, जगत्के भोगोंसे उदासीनता, ब्रह्मचर्य, सब प्रकारका त्याग, निर्ममता, फलकी कामना न करना तथा धर्मका निरन्तर पालन करते रहना--ये सब सत्त्वगुणके कार्य हैं
वायु-देव बोले— विश्वास, लज्जा, तितिक्षा, त्याग, पवित्रता, आलस्यरहित होना; कोमलता, मोह का अभाव, प्राणियों पर दया करना और चुगली न करना—ये सत्त्वगुण के चिह्न हैं, जो अंतःकरण की निर्मलता और संयम से धर्म को धारण करते हैं।
Verse 7
हर्षस्तुष्टिविस्मयश्व विनय: साधुवृत्तिता । शान्तिकर्मणि शुद्धिश्व शुभा बुद्धिर्विमोचनम्,विश्वास, लज्जा, तितिक्षा, त्याग, पवित्रता, आलस्यरहित होना, कोमलता, मोहका अभाव, प्राणियोंपर दया करना, चुगली न खाना, हर्ष, संतोष, गर्वहीनता, विनय, सद्बर्ताव, शान्तिकर्ममें शुद्धभावसे प्रवृत्ति, उत्तम बुद्धि, आसक्तिसे छूटना, जगत्के भोगोंसे उदासीनता, ब्रह्मचर्य, सब प्रकारका त्याग, निर्ममता, फलकी कामना न करना तथा धर्मका निरन्तर पालन करते रहना--ये सब सत्त्वगुणके कार्य हैं
वायु बोले— हर्ष, संतोष, विस्मय, विनय और साधु-आचरण; शान्तिकर्म में शुद्धभाव; शुभ और विवेकी बुद्धि तथा वैराग्य-युक्त विमोचन—और साथ ही विश्वास, लज्जा, तितिक्षा, त्याग, पवित्रता, आलस्य का अभाव, कोमलता, मोह का अभाव, प्राणियों पर दया, परनिंदा से विरति; फिर प्रसन्नता, तृप्ति, गर्वहीनता, सद्व्यवहार, शुद्ध संकल्प से शान्ति-कर्तव्यों में प्रवृत्ति, उत्तम समझ, आसक्ति से छूटना, भोगों से उदासीनता, ब्रह्मचर्य, सर्वत्याग, निर्ममता, फलाकांक्षा का त्याग और धर्म का निरन्तर पालन—ये सब सत्त्वगुण के ही प्रभाव और प्रकाश हैं।
Verse 8
उपेक्षा ब्रह्मचर्य च परित्यागश्न सर्वश: | निर्ममत्वमनाशीष्ट्वमपरिक्षतधर्मता,विश्वास, लज्जा, तितिक्षा, त्याग, पवित्रता, आलस्यरहित होना, कोमलता, मोहका अभाव, प्राणियोंपर दया करना, चुगली न खाना, हर्ष, संतोष, गर्वहीनता, विनय, सद्बर्ताव, शान्तिकर्ममें शुद्धभावसे प्रवृत्ति, उत्तम बुद्धि, आसक्तिसे छूटना, जगत्के भोगोंसे उदासीनता, ब्रह्मचर्य, सब प्रकारका त्याग, निर्ममता, फलकी कामना न करना तथा धर्मका निरन्तर पालन करते रहना--ये सब सत्त्वगुणके कार्य हैं
वायुदेव बोले—उपेक्षा, ब्रह्मचर्य और सर्वथा त्याग; निर्ममता, फल की कामना का अभाव और धर्म में अडिग स्थिरता; विश्वास, लज्जा, तितिक्षा, दानशीलता, पवित्रता, आलस्यरहितता, कोमलता, मोह का अभाव; प्राणियों पर दया, चुगली का त्याग, हर्ष, संतोष; गर्वहीन नम्रता, विनय, सदाचार; शान्तिकर्मों में शुद्ध भाव से प्रवृत्ति, उत्तम बुद्धि, आसक्ति से छूटना, जगत् के भोगों से उदासीनता; इन्द्रिय-संयम, सर्वप्रकार का परित्याग, निर्ममता, निष्कामता और धर्म का निरन्तर पालन—ये सब सत्त्वगुण के लक्षण और कार्य हैं।
Verse 9
मुधा दानं मुधा यज्ञो मुधा5धीतं मुधा व्रतम् । मुधा प्रतिग्रहश्वैव मुधा धर्मो मुधा तप:,सकाम दान, यज्ञ, अध्ययन, व्रत, परिग्रह, धर्म और तप--ये सब व्यर्थ हैं--ऐसा समझकर जो उपर्युक्त बर्तावका पालन करते हुए इस जगत्में सत्यका आश्रय लेते हैं और वेदकी उत्पत्तिके स्थानभूत परब्रह्म परमात्मामें निष्ठा रखते हैं, वे ब्राह्मण ही धीर और साधुदर्शी माने गये हैं
वायुदेव बोले—सकाम भाव से किया हुआ दान व्यर्थ है, यज्ञ व्यर्थ है, अध्ययन व्यर्थ है और व्रत भी व्यर्थ है; प्रतिग्रह भी व्यर्थ है; इसी प्रकार सकाम धर्म और तप भी व्यर्थ हैं। यह जानकर जो लोग ऊपर बताए हुए सदाचार का पालन करते हुए इस लोक में सत्य का आश्रय लेते हैं और वेद की उत्पत्ति-स्थान परब्रह्म परमात्मा में निष्ठा रखते हैं, वे ही ब्राह्मण धीर और साधुदर्शी माने जाते हैं।
Verse 10
एवंवृत्तास्तु ये केचिल्लोके5स्मिन् सत्त्वसंश्रया: | ब्राह्मणा ब्रह्म॒योनिस्थास्ते धीरा: साधुदर्शिन:,सकाम दान, यज्ञ, अध्ययन, व्रत, परिग्रह, धर्म और तप--ये सब व्यर्थ हैं--ऐसा समझकर जो उपर्युक्त बर्तावका पालन करते हुए इस जगत्में सत्यका आश्रय लेते हैं और वेदकी उत्पत्तिके स्थानभूत परब्रह्म परमात्मामें निष्ठा रखते हैं, वे ब्राह्मण ही धीर और साधुदर्शी माने गये हैं
वायु बोले—इस लोक में जो कोई ऐसे आचरण वाले हैं, जो सत्त्व का आश्रय लेकर रहते हैं, और ब्राह्मण होकर ब्रह्म-योनि, अर्थात् परब्रह्म में दृढ़ स्थित हैं—वे ही धीर और साधुदर्शी हैं। सकाम दान, यज्ञ, अध्ययन, व्रत, परिग्रह, (केवल रूढ़) धर्म और तप को व्यर्थ जानकर वे सत्य और ब्रह्म-निष्ठा से युक्त उच्च आचरण को धारण करते हैं।
Verse 11
हित्वा सर्वाणि पापानि नि:शोका हाथ मानवा: । दिवं प्राप्प तु ते धीरा: कुर्वते वै ततस्तनू:,वे धीर मनुष्य सब पापोंका त्याग करके शोकसे रहित हो जाते हैं और स्वर्गलोकमें जाकर वहाँके भोग भोगनेके लिये अनेक शरीर धारण कर लेते हैं
वायु बोले—सब पापों का त्याग करके मनुष्य शोक से रहित हो जाते हैं। स्वर्ग को प्राप्त करके वे धीर जन वहाँ के भोगों का अनुभव करने हेतु फिर अनेक शरीर धारण करते हैं।
Verse 12
ईशित्वं च वशित्वं च लघुत्व॑ं मनसश्न ते । विकुर्वते महात्मानो देवास्त्रिदिवगा इव
वायु बोले—ईशित्व, वशित्व तथा मन का लघुत्व—ये सामर्थ्य महात्माओं में वैसे ही प्रकट होते हैं जैसे त्रिदिव में निवास करने वाले देवताओं में।
Verse 13
विकुर्वन्त: प्रकृत्या वै दिवं प्राप्तास्ततस्तत:
वायु ने कहा—अपने-अपने स्वभाव के अनुसार आचरण करते हुए वे क्रमशः, यथाकाल, स्वर्ग को प्राप्त हुए।
Verse 14
इत्येतत् सात्त्विकं वृत्तं कथित वो द्विजर्षभा: । एतद् विज्ञाय लभते विधिवद् यद् यदिच्छति,श्रेष्ठ ब्राह्मणों! इस प्रकार मैंने तुमलोगोंसे सत्त्वगुणके कार्योंका वर्णन किया। जो इस विषयको अच्छी तरह जानता है, वह जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसीको पा लेता है
श्रेष्ठ ब्राह्मणों! इस प्रकार मैंने तुमसे सत्त्वगुण के आचरण का वर्णन किया। जो इसे विधिपूर्वक जान लेता है, वह जो-जो चाहता है, उसे प्राप्त कर लेता है।
Verse 15
प्रकीर्तिता: सत्त्वगुणा विशेषतो यथाददुक्तं गुणवृत्तमेव च । नरस्तु यो वेद गुणानिमान् सदा गुणान् स भुड्धक्ते न गुणैः स युज्यते,यह सत्त्वगगुणका विशेषरूपसे वर्णन किया गया तथा सत्त्वगुणका कार्य भी बताया गया। जो मनुष्य इन गुणोंको जानता है, वह सदा गुणोंको भोगता है, किंतु उनसे बँधता नहीं
वायु ने कहा—सत्त्वगुणों का विशेष रूप से वर्णन किया गया है और गुणों की प्रवृत्ति भी यथावत् बताई गई है। जो मनुष्य इन गुणों को सदा जानता है, वह गुणों का भोग करता है, पर उनसे बँधता नहीं; वह गुणों का उपभोग करता है, किंतु उनसे युक्त नहीं होता।
Verse 37
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपव॑के अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्वमेधिकपर्व के अंतर्गत अनुगीतापर्व में गुरु-शिष्य संवादविषयक सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 38
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादेडष्टत्रिंशो 5ध्याय:
इति श्रीमहाभारत के आश्वमेधिकपर्व में अनुगीतापर्व के अंतर्गत गुरु-शिष्य संवाद का अड़तीसवाँ अध्याय।
Verse 126
ऊर्ध्वस्रोतस इत्येते देवा वैकारिका: स्मृता: । सत्त्वगुणसम्पन्न महात्मा स्वर्गवासी देवताओंकी भाँति ईशित्व, वशित्व और लघिमा आदि मानसिक सिद्धियोंको प्राप्त करते हैं। वे ऊर्ध्वत्रोता और वैकारिक देवता माने गये हैं
वायु ने कहा— जिन्हें ‘ऊर्ध्वस्रोतस्’ कहा जाता है, वे वैकारिक देवता माने गए हैं। सत्त्वगुण से सम्पन्न, स्वर्ग में निवास करने वाला महात्मा देवताओं की भाँति ईशित्व, वशित्व और लघिमा आदि मानसिक सिद्धियाँ प्राप्त करता है। ऐसा पुरुष ऊर्ध्वस्रोतस् और वैकारिक देवता के रूप में जाना जाता है।
Verse 136
यद् यदिच्छन्ति तत् सर्व भजन्ते विभजन्ति च । (योगबलसे) स्वर्गको प्राप्त होनेपर उनका चित्त उन-उन भोगजनित संस्कारोंसे विकृत होता है। उस समय वे जो-जो चाहते हैं, उस-उस वस्तुको पाते और बाँटते हैं
वायु ने कहा— वे जो-जो चाहते हैं, वह सब पूर्ण रूप से प्राप्त करते हैं; और प्राप्त करके उसे बाँटते-वितरित भी करते हैं। स्वर्ग के भोगों को पाकर उनका चित्त भोगजन्य संस्कारों से विकृत हो जाता है; तब इच्छा ही उनके पाने और बाँटने का कारण बनती है।
The dilemma is the reliability of external religiosity: whether acts like dāna, yajña, study, vows, and tapas have value when the agent lacks sattvika conduct; the chapter answers by making ethical alignment the prerequisite for efficacy.
Sattva is expressed as verifiable conduct—compassion, truth, purity, restraint, equanimity—and the person who understands the guṇas can engage life without being dominated by reactive qualities.
Yes: the chapter claims that those established in sattva abandon sins, become free from grief, attain heaven, and gain extraordinary capacities; it further states that knowing the guṇas enables mastery over them (‘enjoys the guṇas, not enjoyed by the guṇas’).