
अध्याय ६ — युधिष्ठिरस्य वैराग्य-वाक्यं धृतराष्ट्रस्य वनगमनाभिलाषश्च (Chapter 6: Yudhiṣṭhira’s Renunciatory Appeal and Dhṛtarāṣṭra’s Resolve for the Forest)
Upa-parva: Dhṛtarāṣṭra–Yudhiṣṭhira Saṃvāda (Elders’ Withdrawal and Court Reconciliation Episode)
This chapter presents a tightly structured ethical dialogue. Yudhiṣṭhira addresses Dhṛtarāṣṭra with self-reproach: sovereignty and enjoyment are declared worthless if the elder suffers (1–4). He frames Dhṛtarāṣṭra as parental and guru-authority, implying that separation would render the Pandavas directionless (6). He proposes alternative succession—explicitly naming Yuyutsu as a legitimate heir if Dhṛtarāṣṭra wishes (7)—and offers his own withdrawal to the forest, refusing further reputational harm to the elder (8–9). He also articulates a reconciliation stance, stating no enduring resentment remains regarding Duryodhana, attributing events to inevitability and shared delusion (10–11). When Dhṛtarāṣṭra persists in renunciatory intent, citing family custom and his age (16–17), he requests assistance in persuading key figures such as Sañjaya and Kṛpa (19). A physical collapse-like moment follows: Dhṛtarāṣṭra leans on Gāndhārī, appearing lifeless (21–22). Yudhiṣṭhira’s lament underscores impermanence and the reversal of strength (23–25). He vows parallel fasting/observance if the elders do not eat (26). Finally, Yudhiṣṭhira restores Dhṛtarāṣṭra’s composure by gently wiping him with cool water; the auspicious, fragrant touch returns consciousness (27–28). The chapter thus fuses political succession anxieties with ascetic ideals, emphasizing service (śuśrūṣā), guilt-aware governance, and embodied care as dharmic practice.
Chapter Arc: वन-निवास की संध्या में, वृद्ध धृतराष्ट्र राजधर्म की अंतिम मशाल जलाते हैं—मण्डल-नीति, मित्र-शत्रु की पहचान और राज्य-रक्षा के उपायों का उपदेश देते हुए। → वे शत्रुओं और आततायियों के भेद, अमित्र-मित्र के छल, तथा राज्य के आधार—अमात्य, जनपद, दुर्ग, बल, कोश—इन सबकी परख और व्यवस्था पर क्रमशः कठोर निर्देश रखते हैं; साथ ही विपरीत परिस्थिति में क्या देना, क्या रोकना, और कैसे झुकना—इसकी नीति भी खोलते जाते हैं। → विपत्ति-काल की निर्णायक नीति सामने आती है: साम-दाम-भेद-दण्ड के क्रमिक प्रयोग, ‘बेंत-सी वृत्ति’ (नम्रता/लचीलापन) अपनाकर बलवान आक्रान्ता के सामने टिकने या समयानुसार शरण लेने तक का स्पष्ट विधान—जहाँ राज्य-रक्षा हेतु आत्माभिमान का त्याग भी नीति बन जाता है। → धृतराष्ट्र साधु-संग्रह (सज्जनों का संबल), पाप-निग्रह (दुष्टों का दमन), दुर्बलों की रक्षा, और संसाधनों के विवेकपूर्ण विनियोग द्वारा स्थिर शासन का मार्ग समेटते हैं—राजा को यथाशक्ति व्यवस्था, संयम और समय-ज्ञान का पाठ देकर। → यह उपदेश किसके लिए है—केवल राजाओं के लिए, या स्वयं धृतराष्ट्र के पश्चाताप और आत्म-रक्षा की अंतिम रणनीति भी? वन-जीवन की आगे की परीक्षा इस नीति को कठोर सत्य में बदलने को खड़ी है।
Verse 1
नफमशा (0) आस सऔ अत न षष्ठो 5 ध्याय: धृतराष्ट्द्वारा राजनीतिका उपदेश धघतयाट्र उवाच मण्डलानि च बुध्येथा: परेषामात्मनस्तथा । उदासीनगणानां च मध्यस्थानां च भारत
धृतराष्ट्र बोले— भरतनन्दन! तुम्हें शत्रुओं के, अपने पक्ष के, उदासीन राजाओं के तथा मध्यस्थों के मण्डलों (राजनीतिक वृत्तों) का भली-भाँति ज्ञान रखना चाहिए।
Verse 2
चतुर्णा शत्रुजातानां सर्वेषामाततायिनाम् | मित्र चामित्रमित्रं च बोद्धव्यं तेडरिकर्शन
धृतराष्ट्र बोले— शत्रुसूदन! तुम्हें चार प्रकार के शत्रुओं के भेद, षड्विध आततायियों के प्रकार, तथा मित्र और शत्रु के मित्र की पहचान भी भली-भाँति करनी चाहिए।
Verse 3
तथामात्या जनपदा दुर्गाणि विविधानि च । बलानि च कुरुश्रेष्ठ भवत्येषां यथेच्छकम्
इसी प्रकार, कुरुश्रेष्ठ! मंत्रियों, जनपदों, विविध दुर्गों और सेनाओं को उनके-उनके प्रयोजनों के अनुसार तथा परिस्थिति की माँग के अनुसार व्यवस्थित और संचालित करना चाहिए।
Verse 4
ते च द्वादश कौन्तेय राज्ञां वै विषयात्मका: । मन्सत्रिप्रधानाश्न गुणा: षष्टिद्धादिश च प्रभो
हे कुन्तीनन्दन! वे बारह तत्त्व निश्चय ही राजाओं के विषय-व्यवहार और इन्द्रिय-विषयों से संबद्ध हैं। मन, जो त्रिविध प्रधानता वाला कहा गया है, तथा गुणों के सहित—ये साठ और बारह भी कहे जाते हैं, हे प्रभो।
Verse 5
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्रमवासिकपवके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्रका उपदेशविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ
नीतिज्ञ आचार्य कहते हैं—इसे ही ‘मण्डल’ कहा जाता है। हे कुरुश्रेष्ठ! शत्रु अपनी इच्छा के अनुसार राजा के अमात्य-मण्डल, जनपद, नाना प्रकार के दुर्ग और सेना—इन पर दृष्टि लगाए रहते हैं; अतः इनकी रक्षा में सदा सावधान रहना चाहिए। हे प्रभो, कुन्तीनन्दन! ऊपर कहे गए बारह प्रकार के पुरुष राजाओं के मुख्य विषय हैं। मन्त्री के अधीन रहने वाले कृषि आदि साठ कार्य-गुण, और वे बारह वर्ग—इन सबको नीतिविद आचार्यों ने ‘मण्डल’ नाम दिया है। अब, हे युधिष्ठिर! जानो कि षाड्गुण्य नीति इसी पर आश्रित है।
Verse 6
द्विसप्तत्यां महाबाहो ततः षाड्गुण्यजा गुणा:
हे महाबाहो! उन बहत्तर (तत्त्वों) को जान लेने के बाद ही षाड्गुण्य नीति के ये उपाय यथाकाल प्रयुक्त होते हैं—संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय। हे कुन्तीनन्दन! जब अपना पक्ष बलवान और शत्रु-पक्ष दुर्बल प्रतीत हो, तब शत्रुओं से वैर ठानकर युद्ध आरम्भ करे और विपक्षी राजा को जीतने का प्रयत्न करे।
Verse 7
यदा स्वपक्षो बलवान् परपक्षस्तथाबल: । विगृहा शत्रून् कौन्तेय जेय: क्षितिपतिस्तदा
धृतराष्ट्र ने कहा—हे कुन्तीनन्दन, महाबाहो! जब अपना पक्ष बलवान और पर-पक्ष उसी प्रकार दुर्बल हो, तब शत्रुओं से वैर ठानकर राजा को चाहिए कि वह प्रतिद्वन्द्वी नरेश को जीतने का प्रयत्न करे।
Verse 8
यदा परे च बलिन: स्वपक्षश्वैव दुर्बल: । सार्ध विद्वांस्तदा क्षीण: परै: संधिं समाश्रयेत्,परंतु जब शत्रु-पक्ष प्रबल और अपना ही पक्ष दुर्बल हो, उस समय क्षीणशक्ति विद्वान् पुरुष शत्रुओंके साथ संधि कर ले
परन्तु जब शत्रु-पक्ष बलवान और अपना पक्ष दुर्बल हो, तब क्षीण-शक्ति वाला विद्वान् पुरुष शत्रुओं के साथ संधि का आश्रय ले।
Verse 9
द्रव्याणां संचयश्चैव कर्तव्य: सुमहांस्तथा | तदा समर्थो यानाय नचिरेणैव भारत
बहुत-सा अन्न-धन और अन्य सामग्री भी एकत्र करनी चाहिए। तब, हे भारत, मनुष्य शीघ्र ही यात्रा के लिए पूर्णतः समर्थ हो जाता है।
Verse 10
भूमिरल्पफला देया विपरीतस्य भारत
धृतराष्ट्र बोले: हे भारत, जो विरोध में खड़ा हो, उसे भी अल्पफल देने वाली भूमि तक दे देनी चाहिए—ताकि अभाव से वैर न बढ़े और न्यायोचित समझौते का मार्ग खुला रहे।
Verse 11
विपरीतान्निगृह्नीयात् स्वं हि संधिविशारद:
धृतराष्ट्र बोले: संधि-समझौते में निपुण पुरुष को चाहिए कि जो प्रवृत्तियाँ विपरीत दिशा में ले जाएँ, उन्हें अपने भीतर ही संयमित करे। यही सच्चे राजधर्म का लक्षण है—उत्तेजना नहीं, आत्मसंयम।
Verse 12
संध्यर्थ राजपुत्रं वा लिप्सेथा भरतर्षभ । विपरीतं न तच्छेय: पुत्र कस्यांचिदापदि
हे भरतश्रेष्ठ, केवल संधि या विराम के लिए किसी राजकुमार को पाने की चेष्टा मत करना। किसी संकट में वह उपाय कल्याण के विपरीत पड़ता है; इसलिए, पुत्र, उसे नहीं अपनाना चाहिए।
Verse 13
तस्या: प्रमोक्षे यत्नं च कुर्या: सोपायमन्त्रवित् यदि शत्रुकी विपरीत दशा हो और वह संधिके लिये प्रार्थना करे तो संधिविशारद पुरुष उससे उपजाऊ भूमि
धृतराष्ट्र ने कहा: उपाय और मंत्रणा का ज्ञाता राजा संकट से मुक्त होने के लिए यत्न करे। यदि शत्रु विपरीत दशा में पड़कर संधि माँगे, तो संधि-विशारद पुरुष उससे उपजाऊ भूमि, सुवर्ण-रजत आदि धातु, तथा बलवान मित्र और सेना जैसी ठोस जमानतें लेकर ही संधि करे; अथवा, हे भरतश्रेष्ठ, प्रतिद्वन्द्वी राजा के पुत्र को अपने यहाँ बंधक रूप में रखने का प्रयत्न करे—इसके विपरीत आचरण प्रशंसनीय नहीं। और यदि कोई आपत्ति आ जाए, तो तुम-जैसा नीति-परामर्श में निपुण राजा उससे निकलने का उपाय करे। फिर वह कहता है: हे राजेन्द्र, राजा को अपनी प्रजा का भी ध्यान रखना चाहिए; जो दीन-दरिद्र और असहाय—जैसे अंधे-बधिर—हों, उनका आदरपूर्वक पालन करे। और शत्रु के विषय में, महाबली राजा क्रमशः या एक साथ समस्त उपाय आरम्भ करे—उसे पीड़ा दे, उसकी गति रोक दे, और उसका खजाना नष्ट कर दे।
Verse 14
क्रमेण युगपत् सर्व व्यवसायं महाबल: । पीडनं स्तम्भनं चैव कोशभड्स्तथैव च
धृतराष्ट्र बोले—राजेन्द्र! महाबली राजा शत्रु के विरुद्ध अपना समूचा उद्योग क्रमशः या एक साथ आरम्भ करे। वह उसे पीड़ा दे, उसकी गति रोक दे और उसके कोष का भी नाश कर दे।
Verse 15
कार्य यत्नेन शत्रूणां स्वराज्यं रक्षता स्वयम् । न च हिंस्यो5भ्युपगत: सामन्तो वृद्धिमिच्छता
अपने राज्य की रक्षा करने वाले राजा को शत्रुओं के साथ यत्नपूर्वक उचित व्यवहार करना चाहिए; परन्तु अपनी वृद्धि चाहने वाले नरेश को शरण में आए हुए सामन्त को कभी हानि नहीं पहुँचानी चाहिए।
Verse 16
कौन्तेय तं न हिंसेत् स यो महीं विजिगीषते । गणानां भेदने योगमीप्सेथा: सह मन्सत्रिभि:
कौन्तेय! जो समूची पृथ्वी को जीतना चाहता है, वह उस सामन्त की कभी हिंसा न करे। तुम अपने मन्त्रियों सहित सदा शत्रुगणों में फूट डालने के उपाय की इच्छा रखो।
Verse 17
साधुसंग्रहणाच्चैव पापनिग्रहणात् तथा । दुर्बलाश्ैव सततं नान्वेष्टव्या बलीयसा
सज्जनों से मेल-जोल बढ़ाए और दुष्टों को कैद करके दण्ड दे। महाबली नरेश को दुर्बल शत्रु के पीछे सदा नहीं पड़े रहना चाहिए।
Verse 18
तिष्ठेथा राजशार्दूल वैतसीं वृत्तिमास्थित: । यद्येनममभियायाच्च बलवान दुर्बल॑ नृप:
राजशार्दूल! तुम वैतसी वृत्ति (बेंत के समान नम्र, सरल और अल्पोपजीवी जीवन) अपनाकर यहीं ठहरे रहो। चाहे कोई बलवान् पुरुष या दुर्बल नरेश उस पर चढ़ आए, वह इसी संयमित मार्ग में स्थिर रहे।
Verse 19
अशबनुवंश्न युद्धाय निष्पतेत् सह मन्त्रिभि:
अश्वनूवंश्न मंत्रियों सहित युद्ध के लिए निकल पड़े।
Verse 20
असम्भवे तु सर्वस्य यथा मुख्येन निष्पतेत् । क्रमेणानेन मुक्ति: स्याच्छरीरमिति केवलम्
यदि किसी भी उपाय से संधि न हो सके, तो मुख्य उपाय को अपनाकर विपक्षी पर युद्ध के लिए टूट पड़े। इस क्रम में यदि शरीर नष्ट भी हो जाए, तो भी वीर पुरुष के लिए वही मुक्ति है; उसके लिए निर्णायक साधन केवल शरीर का अर्पण ही है।
Verse 56
वृद्धिक्षयौ च विज्ञेयौ स्थानं च कुरुसत्तम | युधिष्ठिर! तुम इस मण्डलको अच्छी तरह जानो; क्योंकि राज्यकी रक्षाके संधि-विग्रह आदि छ: उपायोंका उचित उपभोग इन्हींके अधीन है। कुरुश्रेष्ठ! राजाको चाहिये कि वह अपनी वृद्धि
कुरुश्रेष्ठ! वृद्धि और क्षय तथा स्थिर स्थिति—इन तीनों को भलीभाँति जानो। युधिष्ठिर! नीति के इस मण्डल को अच्छी तरह समझो, क्योंकि राज्य की रक्षा के लिए संधि-विग्रह आदि छह उपायों का उचित प्रयोग इसी पर निर्भर है। इसलिए कुरुश्रेष्ठ! राजा को अपनी वृद्धि, क्षय और स्थिति का सदा यथार्थ ज्ञान रखना चाहिए।
Verse 96
तदा सर्व विधेयं स्थात् स्थाने न स विचारयेत् । भारत! राजाको सदैव द्रव्योंका महान् संग्रह करते रहना चाहिये। जब वह शीघ्र ही शत्रुपर आक्रमण करनेमें समर्थ हो
तब जो-जो करना आवश्यक हो, उसे बिना विलम्ब व्यवस्थित कर ले; निर्णायक क्षण में वह डगमगाए नहीं। भारत! राजा को सदा द्रव्यों का बड़ा संग्रह बनाए रखना चाहिए। और जब वह शीघ्र ही शत्रु पर प्रहार करने में समर्थ हो जाए, तब उस समय अपना कर्तव्य शांत और दृढ़ चित्त से भलीभाँति विचारकर वैसा ही करे।
Verse 103
हिरण्यं कुप्य भूयिष्ठं मित्र क्षीणमथो बलम् | भारत! यदि अपनी विपरीत अवस्था हो तो शत्रुको कम उपजाऊ भूमि
भारत! यदि अपनी अवस्था विपरीत हो और साधन क्षीण हो रहे हों, तो शत्रु के साथ भी संधि कर ले—कम उपजाऊ भूमि, थोड़ा-सा सोना, और अधिक मात्रा में जस्ता-पीतल आदि धातु देकर; साथ ही दुर्बल मित्र और घटित सेना सौंपकर।
Verse 183
सामादिभिरुपायैस्तं क्रमेण विनिवर्तये: । राजसिंह! तुम्हें बेंतकी-सी वृत्ति (नम्नता)-का आश्रय लेकर रहना चाहिये। यदि किसी दुर्बल राजापर बलवान् राजा आक्रमण करे तो क्रमश: साम आदि उपायोंद्वारा उस बलवान् राजाको लौटानेका प्रयत्न करना चाहिये
धृतराष्ट्र ने कहा—राजसिंह! तुम्हें बेंत की भाँति नम्र होकर रहना चाहिए—टूटने के लिए नहीं, झुककर बचने के लिए। यदि कोई बलवान राजा किसी दुर्बल राजा पर चढ़ आए, तो क्रमशः साम आदि उपायों से—पहले समझाइश और नीति से, फिर आवश्यकता अनुसार अन्य उपायों से—उस आक्रान्ता को लौटाने का प्रयत्न करना चाहिए।
Verse 193
कोशेन पोरैर्दण्डेन ये चास्य प्रियकारिण: । यदि अपनेमें युद्धकी शक्ति न हो तो मन्त्रियोंके साथ उस आक्रमणकारी राजाकी शरणमें जाय तथा कोश
धृतराष्ट्र ने कहा—यदि अपने में युद्ध करने की शक्ति न हो, तो मंत्रियों के साथ उस आक्रमणकारी राजा की शरण में जाना चाहिए। कोश, पुरवासी जन, दण्डशक्ति और जो कुछ भी प्रिय तथा उपयोगी हो—सब अर्पित करके उस प्रतिद्वन्द्वी को लौटाने का प्रयत्न करना चाहिए।
He faces the conflict between maintaining rājadharma (continuing to rule and stabilize the realm) and the ethical demand to prioritize elder well-being and accountability for suffering—leading him to consider relinquishing kingship and following the elders into ascetic life.
Detachment is not mere withdrawal but an ethics of care: remorse can be transformed into service, reconciliation, and restraint, while acknowledging impermanence and treating authority-figures (elders/gurus) as central to moral orientation.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s significance is thematic and practical—modeling how post-conflict legitimacy is repaired through humility, elder-care, and acceptance of āśrama transitions within the broader mokṣa-oriented movement of the final books.