Ādi-parva Adhyāya 3 — Janamejaya’s Rite, Dhaumya’s Parīkṣā, and Uttanka’s Kuṇḍala Quest (सर्पसत्रप्रस्तावना–गुरुपरीक्षा–उत्तङ्कोपाख्यान)
तमुपाध्यायस्तथापि पीवानमेव दृष्टवोवाच वत्सोपमन्यो सर्वमशेषतस्ते भैक्ष्यं गृह्नामि केनेदानीं वृत्ति कल्पयसीति,उस दशामें भी उपमन्युको पूर्ववत् हृष्ट-पुष्ट ही देखकर उपाध्यायने पूछा--“बेटा उपमन्यु! तुम्हारी सारी भिक्षा तो मैं ले लेता हूँ, फिर तुम इस समय कैसे जीवन-निर्वाह करते हो?”
tam upādhyāyas tathāpi pīvānam eva dṛṣṭvā uvāca—vatsopamanyo sarvam aśeṣatas te bhaikṣyaṁ gṛhṇāmi; kena idānīṁ vṛttiṁ kalpayasīti.
फिर भी उपमन्यु को पहले की तरह हृष्ट-पुष्ट देखकर उपाध्याय ने पूछा—“वत्स उपमन्यु! तुम्हारी सारी भिक्षा तो मैं ले लेता हूँ; फिर इस समय तुम किस उपाय से जीवन-निर्वाह करते हो?”
राम उवाच