प्रभासे कृष्णार्जुनसमागमः तथा द्वारकाप्रवेशः | Kṛṣṇa–Arjuna Meeting at Prabhāsa and Entry into Dvārakā
पितामहं नमस्कृत्य तद्वाक्यमभिनन्द्य च । निर्ममे योषितं दिव्यां चिन्तयित्वा पुनः पुन:,ब्रह्माजीकी आज्ञाको शिरोधार्य करके विश्वकर्माने उन्हें प्रणाम किया और खूब सोच- विचारकर एक दिव्य युवतीका निर्माण किया
pitāmahaṃ namaskṛtya tadvākyam abhinandya ca | nirmame yoṣitaṃ divyāṃ cintayitvā punaḥ punaḥ ||
पितामह को प्रणाम कर और उनके वचन का अनुमोदन करके, विश्वकर्मा ने बार-बार विचार कर एक दिव्य युवती का निर्माण किया।
नारद उवाच