Mahabharata Adhyaya 111
Adi ParvaAdhyaya 11134 Verses

Adhyaya 111

पाण्डोः तपः-प्रसङ्गः, ऋण-धर्मः, अपत्य-प्राप्ति-चिन्ता (Pāṇḍu’s Asceticism, the Doctrine of Debts, and Deliberations on Progeny)

Upa-parva: Sambhava Upa-Parva (Genealogies and Early Kuru Continuities)

Vaiśaṃpāyana describes Pāṇḍu’s disciplined ascetic life and his favorable standing among siddhas and cāraṇas. Pāṇḍu, accompanied by his queens, attempts an arduous northward ascent toward a heavenly passage and voices concern for their hardship. He then articulates a dharmic problem: an heirless person lacks access to auspicious post-mortem states because humans are born with four obligations (ṛṇa), and while obligations to gods, sages, and humans can be discharged through sacrifice, study/asceticism, and compassion, the ancestral obligation requires progeny and śrāddha. He laments that a curse has obstructed his capacity to beget children and enumerates recognized categories of sons used in exceptional circumstances for lineage continuity. Hearing ascetics predict that he will obtain worthy offspring, Pāṇḍu privately addresses Kuntī, arguing that progeny is the stabilizing foundation of dharma and proposing a sanctioned method (niyoga-like recourse) by analogy to earlier precedent, urging prompt action for succession.

Chapter Arc: शूरसेन के सत्यवचन और मित्र-धर्म से कथा आरम्भ होती है—संतानहीन कुन्तिभोज को वचन देकर वह अपनी ज्येष्ठ कन्या कुन्ती को उसे सौंप देता है, और इसी दान से आगे चलकर एक अद्भुत भाग्य-रेखा खिंचती है। → कुन्ती के जीवन में दुर्वासा का आगमन और उसकी सेवा से प्राप्त मन्त्र (देव-आवाहन की शक्ति) भीतर ही भीतर एक भय और आकर्षण जगाता है—देवों को बुलाने की क्षमता, पर लोक-लज्जा और अनजाने परिणामों का संकट। कौतूहल/अविवेक से वह सूर्यदेव का आवाहन करती है; देव प्रत्यक्ष होकर वरदान/संयोग की मांग के साथ उसे धर्म-संकट में डालते हैं। → सूर्य के तेज से कर्ण का जन्म होता है—जन्मजात कवच-कुण्डल सहित। आगे चलकर उसी कर्ण का महान त्याग-क्षण प्रतिध्वनित होता है: इन्द्र के याचक-वेष में आने पर कर्ण अपने शरीर से कवच उतारकर और कुण्डल काटकर दान दे देता है; इसी कर्म से वह ‘वैकर्त्तन’ कहलाता है। → कुन्ती नवजात कुमार को देखकर दीन-मन से एकान्त में सोचती है कि ऐसा क्या करे जिससे ‘सुकृत’ हो—लोक-लज्जा, मातृत्व और भविष्य-भय के बीच वह निर्णय की ओर बढ़ती है। कर्ण की पहचान/नाम-परिवर्तन (वसुषेण से वैकर्त्तन) उसके भाग्य को स्थायी रूप से चिह्नित करता है। → कुन्ती के सामने प्रश्न खड़ा रह जाता है—इस दिव्य-तेजस्वी पुत्र के साथ वह क्या करेगी, और यह गुप्त जन्म आगे चलकर किस-किस के जीवन को उलट देगा?

Shlokas

Verse 1

है 7 >> छा अि>-छऋाज दशाधिकशततमोब<् ध्याय: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! यदुवंशियों में श्रेष्ठ शूर नामक पुरुष हुए, जो वसुदेव के पिता थे। उनकी एक कन्या हुई, जिसका नाम पृथा था; इस पृथ्वी पर रूप में उसकी कोई तुलना नहीं थी।

Verse 2

पितृष्वस्रीयाय स तामनपत्याय भारत । अग्रयमग्रे प्रतिज्ञाय स्वस्यापत्यं स सत्यवाक्‌

वैशम्पायन बोले—हे भारत! सत्यवचन शूरसेन ने अपनी पितृ-बहन के पुत्र, जो निःसंतान था, उससे पहले ही यह प्रतिज्ञा कर रखी थी कि मैं तुम्हें अपनी पहली संतान दूँगा। इसलिए पूर्व वचन को निभाने के लिए उसने निश्चय किया कि अपनी प्रथम संतान उसी को अर्पित करेगा—यह वचनपालन और कुलधर्म की मर्यादा थी।

Verse 3

अग्रजामथ तां कन्‍्यां शूरो<नुग्रहकाड्क्षिणे | प्रददौ कुन्तिभोजाय सखा सख्ये महात्मने,उन्हें पहले कन्या ही उत्पन्न हुई। अतः कृपाकांक्षी महात्मा सखा राजा कुन्तिभोजको उनके मित्र शूरसेनने वह कन्या दे दी

वैशम्पायन बोले—जब उसकी पहली संतान कन्या हुई, तब उपकार करने की इच्छा से शूरसेन ने मित्रता-धर्म निभाते हुए अपने महात्मा मित्र कुन्तिभोज को वह कन्या दे दी।

Verse 4

सा नियुक्ता पितुर्गेहि देवता5तिथिपूजने । उग्र पर्यचरत्‌ तत्र ब्राह्मणं संशितव्रतम्‌

वैशम्पायन बोले—पिता के घर में पृथा को देवताओं के पूजन और अतिथियों के सत्कार का कार्य सौंपा गया था। उसी समय वहाँ कठोर व्रतधारी, उग्र स्वभाव वाले एक ब्राह्मण आए; पृथा ने धर्मानुसार अनुशासनपूर्वक उनकी सेवा की।

Verse 5

निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदु: । तमुग्रं संशितात्मानं सर्वयत्नैरतोषयत्‌

वैशम्पायन बोले—धर्म के विषय में जिसका निश्चय गुप्त रहता था, उसे लोग दुर्वासा कहते थे। वे उग्र और संयमित आत्मा वाले थे; पृथा ने सब प्रकार के यत्नों से उन्हें पूर्णतः संतुष्ट कर दिया।

Verse 6

तस्यै स प्रददौ मन्त्रमापद्धर्मान्ववेक्षया । अभिचाराभिसंयुक्तमब्रवीच्चैव तां मुनि:

वैशम्पायन बोले—आपद्धर्म का विचार करके उस मुनि ने पृथा को एक मन्त्र दिया, जो वशीकरण-प्रयोग से सम्बद्ध था, और उसके प्रयोग की विधि भी बताई। इसके बाद मुनि ने उससे आगे कहा।

Verse 7

य॑ य॑ देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । तस्य तस्य प्रसादेन पुत्रस्तव भविष्यति,'शुभे! तुम इस मन्त्रद्वारा जिस-जिस देवताका आवाहन करोगी, उसी-उसीके अनुग्रहसे तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा"

वैशम्पायन बोले—हे शुभे! तुम इस मन्त्र से जिस-जिस देवता का आवाहन करोगी, उसी-उसी की कृपा से तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी।

Verse 8

तथोक्ता सा तु विप्रेण कुन्ती कौतूहलान्विता । कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी

ब्राह्मण के ऐसा कहने पर कौतूहल से भरी कुन्ती ने—यद्यपि वह अभी कुमारी थी—मन्त्र की शक्ति की परीक्षा के लिए यशस्विनी राजकन्या ने सूर्यदेव अर्क का आवाहन किया।

Verse 9

सा ददर्श तमायान्तं भास्करं लोकभावनम्‌ । विस्मिता चानवद्याज्ञी दृष्टवा तन्‍्महद्भुतम्‌

आवाहन करते ही उसने देखा कि लोकों के उत्पत्ति-पालनकर्ता भगवान् भास्कर आ रहे हैं। उस महान् अद्भुत को देखकर निर्दोष अंगोंवाली, विवेकशील कुन्ती विस्मित हो उठी।

Verse 10

तां समासाद्य देवस्तु विवस्वानिदमब्रवीत्‌ | अयमस्म्यसितापाड़ि ब्रूहि किं करवाणि ते

तब देव विवस्वान उसके पास आकर बोले—“हे श्यामनेत्री पाण्डी! मैं आ गया हूँ। बताओ, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?”

Verse 11

(आहूतोपस्थितं भद्रे ऋषिमन्त्रेण चोदितम्‌ । विद्धि मां पुत्रलाभाय देवमर्क शुचिस्मिते ।।

वैशम्पायन बोले—“हे भद्रे! ऋषि के मन्त्र से प्रेरित होकर तुम्हारे बुलाते ही मैं यहाँ उपस्थित हुआ हूँ, ताकि तुम्हें पुत्र-लाभ हो। हे पवित्र मुस्कानवाली! मुझे सूर्यदेव अर्क जानो।” कुन्ती बोली—“हे शत्रुहन्ता प्रभो! एक ब्राह्मण ने मुझे वरदान-स्वरूप देवताओं के आवाहन का मन्त्र और उसकी विद्या दी थी। उसी की परीक्षा करने के लिए, हे विभो, मैंने आपका आवाहन किया।”

Verse 12

एतस्मिन्नपराधे त्वां शिरसाहं प्रसादये । योषितो हि सदा रक्ष्या: स्वापराद्धापि नित्यश:

इस अपराध के लिए मैं मस्तक झुकाकर आपसे प्रसन्न होकर क्षमा करने की प्रार्थना करती हूँ। क्योंकि स्त्रियाँ सदा रक्षणीय हैं; वे स्वयं अपराध कर बैठें, तब भी श्रेष्ठ पुरुषों को निरन्तर उनकी रक्षा ही करनी चाहिए।

Verse 13

सूर्य उवाच वेदाहं सर्वमेवैतद्‌ यद्‌ दुर्वासा वरं ददौ । संत्यज्य भयमेवेह क्रियतां संगमो मम

सूर्यदेव बोले—शुभे! मैं यह सब जानता हूँ कि दुर्वासाने तुम्हें वर दिया है। इसलिए भय त्यागकर यहीं मेरे साथ समागम के लिए सहमत हो जाओ।

Verse 14

अमोघं दर्शन महामाहूतश्वास्मि ते शुभे । वथाद्वाने5पि ते भीरु दोष: स्वान्नात्र संशय:

शुभे! मेरा दर्शन कभी निष्फल नहीं होता और तुमने मुझे आवाहित किया है। भीरु! यदि यह आवाहन व्यर्थ भी हुआ, तो भी निःसंदेह तुम्हें भारी दोष लगेगा।

Verse 15

वैशम्पायन उवाच एवमुक्ता बहुविध॑ सान्त्वपूर्व विवस्व॒ता । सा तु नैच्छद्‌ वरारोहा कन्याहमिति भारत

वैशम्पायन बोले—भारत! विवस्वान् (सूर्य) ने पहले सान्त्वना देकर इस प्रकार बहुत-सी बातें कही; परन्तु “मैं अभी कुमारी हूँ” ऐसा सोचकर वह वरारोहा कन्या समागम के लिए राजी न हुई।

Verse 16

बन्धुपक्ष भयाद्‌ भीता लज्जया च यशस्विनी । तामर्कः पुनरेवेदमब्रवीद्‌ भरतर्षभ

वैशम्पायन बोले—यशस्विनी (कुन्ती) बन्धु-बान्धवों में अपयश फैलने के भय से भी डरी हुई थी और लज्जा से भी विवश थी। भरतश्रेष्ठ! तब अर्क (सूर्य) ने उससे फिर यह कहा।

Verse 17

(पुत्रस्ते निर्मित: सुभ्रु शूणु यादृक्छुभानने ।।

वैशम्पायन बोले— सुन्दर भौंहोंवाली, शुभ मुखवाली राजकुमारी! सुनो, तुम्हारे लिए जैसा पुत्र बनेगा। शुचिस्मिते! वह आदित्य के दिव्य कुण्डल और मेरा कवच धारण किए हुए जन्म लेगा; उसका कवच किसी भी शस्त्र-अस्त्र से भेदा न जा सकेगा। ब्राह्मणों के लिए उसके पास कोई वस्तु अदेय न होगी—दान में वह कभी संकोच न करेगा। मेरे द्वारा प्रेरित किए जाने पर भी वह अपने मन में कभी अयोग्य कर्म या विचार को स्थान न देगा। ब्राह्मणों के याचना करने पर वह निश्चय ही सब प्रकार के दान देगा; और साथ ही वह स्वाभिमानी, तेजस्वी होगा।

Verse 18

प्रकाशकर्ता तपन: सम्बभूव तया सह । तत्र वीर: समभवत्‌ सर्वशस्त्रभृतां वर: । आमुक्तकवच: श्रीमान्‌ देवगर्भ: श्रियान्वित:

वैशम्पायन बोले— प्रकाश और ताप के कर्ता भगवान् सूर्य ने उसके साथ समागम किया। उस संयोग से उसी समय एक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ था। वह जन्म से ही कवच धारण किए हुए, श्रीसम्पन्न और तेजस्वी था—मानो देवगर्भ से उत्पन्न दिव्य बालक।

Verse 19

सहजं कवचं बिश्रत्‌ कुण्डलो द्योतितानन: । अजायत सुत: कर्ण: सर्वलोकेषु विश्रुत:

जन्म से ही कवच धारण किए, और जन्मजात कुण्डलों से जिसका मुख प्रकाशित था—ऐसा पुत्र उत्पन्न हुआ: कर्ण, जो समस्त लोकों में विख्यात हुआ।

Verse 20

प्रादाच्च तस्यै कन्यात्वं पुन: स परमद्युति: । दत्त्वा च तपतां श्रेष्ठो दिवमाचक्रमे तत:

परम तेजस्वी भगवान् सूर्य ने उसे पुनः कन्यात्व प्रदान किया। यह वर देकर तपस्वियों में श्रेष्ठ, तपनशील भगवान् सूर्य तत्पश्चात् देवलोक को चले गए।

Verse 21

उस नवजात कुमारको देखकर वृष्णिवंशकी कन्या कुलीके हृदयमें बड़ा दुःख हुआ। उसने एकाग्रचितसे विचार किया कि अब क्‍या करनेसे अच्छा परिणाम निकलेगा

उस नवजात कुमार को देखकर वृष्णिवंश की कन्या कुलीका के हृदय में बड़ा दुःख उमड़ आया। उसने मन को एकाग्र करके विचार किया—अब कौन-सा मार्ग अपनाने से कल्याणकारी परिणाम निकलेगा।

Verse 22

गूहमानापचारं सा बन्धुपक्षभयात्‌ तदा । उत्ससर्ज कुमारं तं जले कुन्ती महाबलम्‌,उस समय कुट॒म्बीजनोंके भयसे अपने उस अनुचित कृत्यको छिपाती हुई कुन्तीने महाबली कुमार कर्णको जलमें छोड़ दिया

उस समय कुटुम्बीजनों के भय से अपने उस अनुचित कृत्य को छिपाती हुई कुन्ती ने महाबली कुमार कर्ण को जल में छोड़ दिया।

Verse 23

तमुत्सृष्टं जले गर्भ राधाभर्ता महायशा: । पुत्रत्वे कल्पयामास सभार्य: सूतनन्दन:

जल में छोड़े हुए उस नवजात शिशु को महायशस्वी सूतनन्दन अधिरथ ने, जिसकी पत्नी का नाम राधा था, उठा लिया। उसने और उसकी पत्नी ने उस बालक को अपना पुत्र मान लिया।

Verse 24

नामधेयं च चक्राते तस्य बालस्य तायुभौ | वसुना सह जातो<यं वसुषेणो भवत्विति,उन दम्पतिने उस बालकका नामकरण इस प्रकार किया; यह वसु (कवच-कुण्डलादि धन)-के साथ उत्पन्न हुआ है, इसलिये वसुषेण नामसे प्रसिद्ध हो

उन दम्पति ने उस बालक का नामकरण इस प्रकार किया—यह वसु (कवच-कुण्डल आदि धन) के साथ उत्पन्न हुआ है, इसलिए वसुषेण नाम से प्रसिद्ध हो।

Verse 25

स वर्थमानो बलवान्‌ सर्वास्त्रिपूद्यतो 5भवत्‌ | आ पृष्ठतापादादित्यमुपातिष्ठत वीर्यवान्‌

वह बलवान बालक बड़े होने के साथ ही सब प्रकार की अस्त्रविद्या में निपुण हुआ। पराक्रमी कर्ण प्रातःकाल से लेकर जब तक सूर्य पृष्ठभाग की ओर न चले जाते, सूर्योपस्थान करता रहता था।

Verse 26

तस्मिन्‌ काले तु जपतस्तस्य वीरस्य धीमत: । नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत्‌ किंचिद्‌ वसु महीतले

उस समय मन्त्र-जप में लगे हुए बुद्धिमान-वीर कर्ण के लिये इस पृथ्वी पर कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जिसे वह ब्राह्मणों के माँगने पर न दे सके।

Verse 27

(ततः काले तु कम्मिंश्चिचत्‌ स्वप्रान्ते कर्णमब्रवीत्‌ । आदित्यो ब्राह्मणो भूत्वा शूणु वीर वचो मम ।।

वैशम्पायन बोले—एक समय स्वप्न में सूर्यदेव ब्राह्मण का रूप धारण करके कर्ण से बोले—“वीर! मेरी बात सुनो। यह रात बीतते ही प्रभात में वासव (इन्द्र) ब्राह्मण-वेष में तुम्हारे पास आएँगे। उन्हें भिक्षा मत देना। उन्होंने तुम्हारे जन्मजात कवच और कुण्डलों को हर लेने का निश्चय किया है। इसलिए मैं तुम्हें सत्य बात से सावधान करता हूँ—मेरी वाणी स्मरण रखना।” यह कहकर स्वप्न में ब्राह्मणरूपी सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गए। कर्ण जाग उठा और स्वप्न का अर्थ सोचने लगा। फिर इन्द्र ब्राह्मण बनकर भिक्षार्थी होकर आए और कर्ण से कवच तथा कुण्डलों की याचना करने लगे।

Verse 28

स्वशरीरात्‌ समुत्कृत्य कवचं स्वं निसर्गजम्‌ । कर्णस्तु कुण्डले छित्त्वा प्रायच्छत्‌ कृताञ्जलि:

वैशम्पायन बोले—कर्ण ने हाथ जोड़कर श्रद्धापूर्वक अपने शरीर से जन्मजात कवच उधेड़ डाला और दोनों कुण्डलों को भी काटकर दान में दे दिया।

Verse 29

प्रतिग्रह तु देवेशस्तुष्टस्तेनास्य कर्मणा । (अहो साहसमित्येवं मनसा वासवो हसन्‌ । देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्‌ ।।

वैशम्पायन बोले—उस कर्म से संतुष्ट होकर देवेश वासव (इन्द्र) मन-ही-मन मुस्कराए और सोचने लगे—“अहो! कैसा साहस! देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षसों में ऐसा कर्म करने वाला दूसरा कौन है?” फिर उन्होंने स्पष्ट कहा—“वीर! मैं तुम्हारे इस कर्म से प्रसन्न हूँ; जो चाहो, वर माँगो।” कर्ण ने कहा—“भगवन्! आपकी दी हुई वह अमोघ शक्ति (बरछी) चाहता हूँ, जो शत्रुओं का संहार करती है।” तब देवराज ने उसे शक्ति प्रदान की।

Verse 30

देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्‌ । यमेकं जेतुमिच्छेथा: सोडनया न भविष्यति

वैशम्पायन बोले—“वीरवर! देव, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग और राक्षसों में से जिस एक को तुम जीतना चाहोगे, वह इस शक्ति के प्रहार से जीवित न बचेगा।”

Verse 31

प्राड़ नाम तस्य कथितं वसुषेण इति क्षितौ । कर्णो वैकर्तनश्वैव कर्मणा तेन सो5भवत्‌

वैशम्पायन बोले—पहले इस पृथ्वी पर उसका नाम वसुषेण प्रसिद्ध था। फिर अपने शरीर से कवच काटकर अलग करने के उस कर्म के कारण वह कर्ण और वैकर्तन नाम से भी विख्यात हुआ।

Verse 109

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वनें धृतराष्ट्रविवाहविषयक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के आदिपर्व के अन्तर्गत सम्भवपर्व में धृतराष्ट्र के विवाह-विषयक एक सौ नौवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 110

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कर्णसम्भवे दशाधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्यझा भारत आदिपव॑ीके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कर्णकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के आदिपर्व के अन्तर्गत सम्भवपर्व में कर्ण-सम्भव (कर्ण की उत्पत्ति) विषयक एक सौ दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 231

दृष्टवा कुमारं जात॑ सा वार्ष्णेयी दीनमानसा । एकाग्रं चिन्तयामास कि कृत्वा सुकृतं भवेत्‌

नवजात बालक को देखकर वह वार्ष्णेयी स्त्री दीन-मन होकर एकाग्रचित्त से सोचने लगी—क्या करूँ कि सुकृत हो जाए।

Frequently Asked Questions

Pāṇḍu faces a conflict between personal limitation (a curse obstructing procreation) and public-ritual duty (securing progeny to discharge the ancestral debt and preserve dynastic continuity), prompting consideration of exceptional, norm-governed solutions.

Dharma is operationalized through obligations: ritual, learning, compassion, and lineage duties are interdependent. The chapter frames progeny not merely as desire but as a structured responsibility tied to social order and ancestral rites.

No explicit phalaśruti is stated here; instead, the meta-logic is juridical-ethical: failure to recognize and discharge obligations (especially pitṛ-ṛṇa) is presented as leading to the absence of favorable post-mortem standing, motivating the narrative’s policy discussion.

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