पाण्डोः तपः-प्रसङ्गः, ऋण-धर्मः, अपत्य-प्राप्ति-चिन्ता
Pāṇḍu’s Asceticism, the Doctrine of Debts, and Deliberations on Progeny
सहजं कवचं बिश्रत् कुण्डलो द्योतितानन: । अजायत सुत: कर्ण: सर्वलोकेषु विश्रुत:,जन्मके साथ ही कवच धारण किये उस बालकका मुख जन्मजात कुण्डलोंसे प्रकाशित हो रहा था। इस प्रकार कर्ण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सब लोकोंमें विख्यात है
sahajaṃ kavacaṃ bibhrat kuṇḍalo dyotitānanaḥ | ajāyata sutaḥ karṇaḥ sarvalokeṣu viśrutaḥ ||
जन्म से ही कवच धारण किए, और जन्मजात कुण्डलों से जिसका मुख प्रकाशित था—ऐसा पुत्र उत्पन्न हुआ: कर्ण, जो समस्त लोकों में विख्यात हुआ।
वैशम्पायन उवाच