शरभप्रादुर्भावो नाम षण्णवतितमोऽध्यायः (जलन्धरविमर्दनम्)
दुर्धरेण रथाङ्गेन कृच्छ्रेणापि द्विजोत्तमाः स्थापयामास वै स्कन्धे द्विधाभूतश् च तेन वै
durdhareṇa rathāṅgena kṛcchreṇāpi dvijottamāḥ sthāpayāmāsa vai skandhe dvidhābhūtaś ca tena vai
हे द्विजोत्तमो, उस दुर्धर रथाङ्ग (चक्र) को उसने बड़े कष्ट से अपने कंधे पर रखा; और उसी क्रिया से वह चक्र दो भागों में विभक्त हो गया।
Suta Goswami