अध्याय ९६: शरभ-प्रादुर्भावः, नृसिंह-दर्पशमनम्, विष्णोः शिवस्तुतिः, फलश्रुति
अतस्त्वमुग्रकलया मृत्योर्मृत्युर्भविष्यसि स्थिरधन्वा क्षयो वीरो वीरो विश्वाधिकः प्रभुः
atastvamugrakalayā mṛtyormṛtyurbhaviṣyasi sthiradhanvā kṣayo vīro vīro viśvādhikaḥ prabhuḥ
अतः मेरी उग्र-कला से तुम मृत्यु के भी मृत्यु बनोगे। हे स्थिरधन्वा! तुम क्षय-कर्ता, वीर—हाँ, सर्वोत्तम वीर—और जगत से भी अधिक अधिपति, प्रभु की आज्ञा से शासन करने वाले होगे।
Shiva (within Suta’s narration to the sages)