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Shloka 25

अध्याय ९६: शरभ-प्रादुर्भावः, नृसिंह-दर्पशमनम्, विष्णोः शिवस्तुतिः, फलश्रुति

सूत उवाच इत्युक्तो वीरभद्रेण नृसिंहः शान्तया गिरा ततो ऽधिकं महाघोरं कोपं प्रज्वालयद्धरिः

sūta uvāca ityukto vīrabhadreṇa nṛsiṃhaḥ śāntayā girā tato 'dhikaṃ mahāghoraṃ kopaṃ prajvālayaddhariḥ

सूत बोले—वीरभद्र के शांत वचनों से ऐसा कहे जाने पर भी नरसिंह हरि शांत न हुए; अपितु उन्होंने और भी अधिक महाघोर क्रोध प्रज्वलित कर दिया।

सूत उवाचSūta said
सूत उवाच:
इति-उक्तःthus addressed/spoken to
इति-उक्तः:
वीरभद्रेणby Vīrabhadra
वीरभद्रेण:
नृसिंहःNarasiṁha (the Man-Lion form)
नृसिंहः:
शान्तयाpacifying, calming
शान्तया:
गिराby speech/words
गिरा:
ततःthen/thereupon
ततः:
अधिकम्even more
अधिकम्:
महा-घोरम्exceedingly terrible
महा-घोरम्:
कोपम्anger, wrath
कोपम्:
प्रज्वालयत्kindled, inflamed
प्रज्वालयत्:
हरिःHari (Viṣṇu)
हरिः:

Suta