अन्धकानुग्रहः—शूलारोपणं, रुद्रस्मरण-फलम्, तथा गाणपत्य-प्रदानम् (अध्याय 93)
भगवन्देवदेवेश भक्तार्तिहर शङ्कर त्वयि भक्तिः प्रसीदेश यदि देयो वरश् च मे
bhagavandevadeveśa bhaktārtihara śaṅkara tvayi bhaktiḥ prasīdeśa yadi deyo varaś ca me
हे भगवन्, देवों के देव, भक्तों का दुःख हरने वाले शंकर! मुझ पर प्रसन्न हों। यदि मुझे वर देना हो, तो मुझे आप में अचल भक्ति ही दीजिए।
A devotee (within Suta’s narration) addressing Lord Shiva