अन्धकानुग्रहः—शूलारोपणं, रुद्रस्मरण-फलम्, तथा गाणपत्य-प्रदानम् (अध्याय 93)
तुष्टो ऽस्मि वत्स भद्रं ते कामं किं करवाणि ते वरान्वरय दैत्येन्द्र वरदो ऽहं तवान्धक
tuṣṭo 'smi vatsa bhadraṃ te kāmaṃ kiṃ karavāṇi te varānvaraya daityendra varado 'haṃ tavāndhaka
वत्स, मैं तुझसे प्रसन्न हूँ; तेरा कल्याण हो। बता, तेरी कौन-सी कामना पूरी करूँ? हे दैत्येन्द्र अन्धक, वर माँग—मैं तुझे वर देने वाला हूँ।
Shiva (as Pati, the boon-giving Lord addressing Andhaka)