अध्याय 91: अरिष्ट-लक्षण, मृत्यु-संस्कार, पाशुपत-धारणा तथा ओङ्कार-उपासना
तथौंकारमयो योगी त्व् अक्षरी त्वक्षरी भवेत् प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्मलक्षणमुच्यते
tathauṃkāramayo yogī tv akṣarī tvakṣarī bhavet praṇavo dhanuḥ śaro hyātmā brahmalakṣaṇamucyate
इस प्रकार प्रणवमय योगी अक्षररूप होकर अक्षर (अविनाशी) में प्रतिष्ठित हो जाता है। प्रणव धनुष है और आत्मा ही बाण—यही ब्रह्म का लक्षण कहा गया है।
Suta Goswami (narrating the teaching as part of the Linga Purana discourse)