अध्याय 91: अरिष्ट-लक्षण, मृत्यु-संस्कार, पाशुपत-धारणा तथा ओङ्कार-उपासना
यस्य वा स्नातमात्रस्य हृदयं पीड्यते भृशम् जायते दन्तहर्षश् च तं गतायुषमादिशेत्
yasya vā snātamātrasya hṛdayaṃ pīḍyate bhṛśam jāyate dantaharṣaś ca taṃ gatāyuṣamādiśet
जो स्नान करके निकला ही हो और जिसका हृदय अत्यन्त पीड़ित हो, तथा दाँतों का कंपकंपी (कटकट) भी हो उठे, उसके विषय में ‘गतायु’—आयु समाप्त—ऐसा कहना चाहिए।
Suta Goswami (narrating to the sages at Naimisharanya)