अध्याय 91: अरिष्ट-लक्षण, मृत्यु-संस्कार, पाशुपत-धारणा तथा ओङ्कार-उपासना
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे यतिप्रायश्चित्तं नाम नवतितमो ऽध्यायः सूत उवाच अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि अरिष्टानि निबोधत येन ज्ञानविशेषेण मृत्युं पश्यन्ति योगिनः
iti śrīliṅgamahāpurāṇe pūrvabhāge yatiprāyaścittaṃ nāma navatitamo 'dhyāyaḥ sūta uvāca ata ūrdhvaṃ pravakṣyāmi ariṣṭāni nibodhata yena jñānaviśeṣeṇa mṛtyuṃ paśyanti yoginaḥ
इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के पूर्वभाग में ‘यति-प्रायश्चित्त’ नामक इक्यानवेवाँ अध्याय आरम्भ होता है। सूत बोले—अब मैं अरिष्ट (अपशकुन/पूर्वसूचनाएँ) बताऊँगा; उन्हें समझो—उस विशेष ज्ञान से, जिससे योगी मृत्यु को भी देख लेते हैं।
Suta Goswami