Adhyaya 89: शौचाचारलक्षणम् — सदाचार, भैक्ष्यचर्या, प्रायश्चित्त, द्रव्यशुद्धि, आशौच-निर्णय
देवद्रोहगुरुद्रोहात् कोटिमात्रेण शुध्यति महापातकशुद्ध्यर्थं तथैव च यथाविधि
devadrohagurudrohāt koṭimātreṇa śudhyati mahāpātakaśuddhyarthaṃ tathaiva ca yathāvidhi
देव-द्रोह और गुरु-द्रोह जैसे अपराध से ‘कोटि’ प्रमाण (अत्यन्त विशाल संख्या) के प्रायश्चित्त से शुद्धि होती है। इसी प्रकार महापातकों की शुद्धि के लिए भी विधि के अनुसार ही कर्म करना चाहिए।
Suta Goswami (narrating prescribed expiations within the Linga Purana discourse)