Adhyaya 89: शौचाचारलक्षणम् — सदाचार, भैक्ष्यचर्या, प्रायश्चित्त, द्रव्यशुद्धि, आशौच-निर्णय
समाहितो ब्रह्मपरो ऽप्रमादी शुचिस् तथैकान्तरतिर् जितेन्द्रियः /* समाप्नुयाद्योगमिमं महात्मा महर्षयश्चैवम् अनिन्दितामलाः
samāhito brahmaparo 'pramādī śucis tathaikāntaratir jitendriyaḥ /* samāpnuyādyogamimaṃ mahātmā maharṣayaścaivam aninditāmalāḥ
जो मन से समाहित, ब्रह्म-परायण, सदा सावधान, शुद्ध, एकान्त-ध्यान में रत और इन्द्रियजयी है—वह महात्मा इस योग को प्राप्त करता है। इसी प्रकार निर्दोष, निर्मल महर्षि भी पति (शिव) में एकाग्र होकर पशु के पाशों को शिथिल करते हैं।
Suta Goswami (narrating the teaching as part of the Linga Purana’s yogic instruction)