ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
सर्वत्र प्राणिनामन्नं प्राणिनां ग्रन्थिरस्म्यहम् प्रशास्ता नयनश्चैव पञ्चात्मा स विभागशः
sarvatra prāṇināmannaṃ prāṇināṃ granthirasmyaham praśāstā nayanaścaiva pañcātmā sa vibhāgaśaḥ
“मैं सर्वत्र प्राणियों का अन्न हूँ; प्राणियों के भीतर का ग्रन्थि (बंधन-बिन्दु) भी मैं ही हूँ। मैं अन्तर्यामी शासक और दर्शन-शक्ति भी हूँ। विभेद में वही प्रभु पंचात्मा रूप से प्रकट होता है।”
Suta Goswami (narrating Shiva’s self-declaration within the discourse)