ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
नाड्यां प्राणे च विज्ञाने त्व् आनन्दे च यथाक्रमम् हृद्याकाशे य एतस्मिन् सर्वस्मिन्नन्तरे परः
nāḍyāṃ prāṇe ca vijñāne tv ānande ca yathākramam hṛdyākāśe ya etasmin sarvasminnantare paraḥ
नाड़ियों में, प्राण में, विज्ञान में और फिर आनन्द में—क्रमशः—हृदय-आकाश में जो परम है, वही इस समस्त अंतः-अनुभव के भीतर अन्तर्यामी रूप से स्थित है।
Suta Goswami (narrating a Shaiva yogic teaching within the Linga Purana discourse)