ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
अत्युग्रं कालकूटाख्यं संहृतं भगवंस्त्वया अतः प्रतिष्ठितं सर्वं त्वया देव वृषध्वज
atyugraṃ kālakūṭākhyaṃ saṃhṛtaṃ bhagavaṃstvayā ataḥ pratiṣṭhitaṃ sarvaṃ tvayā deva vṛṣadhvaja
हे भगवन्! आपके द्वारा अत्यन्त उग्र कालकूट विष को रोक लिया गया। इसलिए हे वृषध्वज देव! सब कुछ आपके ही द्वारा स्थिर और सुव्यवस्थित हुआ है।
Devas (within Suta’s narration)