ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
नारकी पापकृत्स्वर्गी पुण्यकृत् पुण्यगौरवात् व्यतिमिश्रेण वै जीवश् चतुर्धा संव्यवस्थितः
nārakī pāpakṛtsvargī puṇyakṛt puṇyagauravāt vyatimiśreṇa vai jīvaś caturdhā saṃvyavasthitaḥ
पाप करने वाला नारकी होता है और पुण्य करने वाला पुण्य के गौरव से स्वर्गगामी होता है। पुण्य-पाप के मिश्रण से जीव चार प्रकार की गति में व्यवस्थित होता है।
Suta Goswami