ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
क्रमो ऽयं मलपूर्णस्य ज्ञानप्राप्तेर्द्विजोत्तमाः तस्मादनेन मार्गेण त्यक्तसंगो दृढव्रतः
kramo 'yaṃ malapūrṇasya jñānaprāpterdvijottamāḥ tasmādanena mārgeṇa tyaktasaṃgo dṛḍhavrataḥ
हे द्विजोत्तम! मल से पूर्ण जीव के ज्ञान-प्राप्ति का यह क्रम है। अतः इसी मार्ग से—संग-आसक्ति को त्यागकर और दृढ़ व्रत में स्थित रहकर—वह ज्ञान प्राप्त होता है जो पशु को पति (शिव) की ओर ले जाता है।
Suta Goswami (narrating Shiva-oriented doctrine within the Linga Purana discourse)