ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
शास्त्रमित्युच्यते भागं श्रुतेः कर्मसु तद्द्विजाः मूर्धानं ब्रह्मणः सारम् ऋषीणां कर्मणः फलम्
śāstramityucyate bhāgaṃ śruteḥ karmasu taddvijāḥ mūrdhānaṃ brahmaṇaḥ sāram ṛṣīṇāṃ karmaṇaḥ phalam
हे द्विजो, श्रुति का जो अंश कर्मकाण्ड में प्रवृत्त करता है, वही ‘शास्त्र’ कहलाता है। वह ब्रह्म-विद्या का शिरोमणि, ऋषियों का निचोड़ा हुआ सार और उनके तपोमय कर्म का परिपक्व फल है।
Suta Goswami (narrating to the sages of Naimisharanya)